“मैं ऑफिस में रोया करती थी”
तीन बार बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकीं राबड़ी देवी ने जब जुलाई 1997 में पहली बार सत्ता संभाली थी तो शुरुआत में कई दिन उन्होंने ऑफिस में रोते हुए बिताए थे. एक कम पढ़ी-लिखी सीधी-साधी गृहिणी के लिए रसोई के बजाय अचानक मुख्यमंत्री कार्यालय संभालना बहुत कष्टकारक अनुभव था.
इन अनुभवों का विस्तृत खाका राबड़ी देवी के जीवन पर आधारित एक हालिया किताब ‘राबड़ी देवी : लालूज़ मास्टरस्ट्रोक’ में खींचा गया है. पटना स्थित पत्रकार मनोज चौरसिया द्वारा लिखी गई ये किताब राबड़ी के गृहिणी से बिहार की गूंगी गुड़िया सीएम और फिर विपक्ष की तेजतर्रार नेता बनने तक के सफर की दास्तान है.
किताब में राबड़ी कहती हैं, “मैं ऑफिस में रोया करती थी. मुझे डर लगता था. मेरा दिल जोर-जोर से धड़कता था और मुझे अनजान लोगों से मिलने से चिढ़ होती थी. मुझे समझ में ही नहीं आता था कि मैं क्या बात करूं. मगर अफसरों ने मेरा हौसला बढ़ाया और मुझे बताया कि काम कैसे करना है.”
सत्ता संभालने के एक साल के भीतर ही राबड़ी ने सरकार चलाने का हुनर सीख लिया था. उनके शब्दों में, “मैंने तनाव जैसे शब्द को अपने दिमाग में कभी घुसने नहीं दिया. सबका रुटीन बना लिया था. कौन काम करना है. कैसे करना है. सब रुटीन के अनुसार करते थे.”
| मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद सबसे पहले उन्होंने अपना नाम लिखना सीखा. पटना की तत्कालीन जिला अधिकारी राजबाला वर्मा ने राबड़ी को पढ़ना और लिखना सिखाया. 15 दिन में उन्होंने अक्षरों को पहचानना और आधिकारिक फाइलों पर हस्ताक्षर करना शुरू कर दिया. |
आम धारणा ये है कि अपने उत्तराधिकारी के रूप में वे लालू की पहली पसंद थीं. मगर यदि किताब की मानें तो ऐसा नहीं था. सीबीआई अदालत में आत्मसमर्पण करने और जेल भेजे जाने से तीन दिन पहले लालू उत्तराधिकारी चुनने के लिए राजद नेताओं के साथ चर्चाएं कर रहे थे. ऐसी ही एक चर्चा के दौरान अचानक 20 पार्टी विधायक उनके पास आए और राबड़ी का नाम सुझाया.
लालू तो मान गए मगर राबड़ी ने जब ये सुना तो उनकी त्यौरियां चढ़ गईं. राजद विधायक उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के लिए मना रहे थे और उनकी बात सुनते समय राबड़ी जिस कुर्सी पर बैठी हुईं थीं, उससे भी हिलने के लिए तैयार नहीं थीं.
आखिरकार किसी तरह उन्हें मना लिया गया. मगर राजभवन में जब शपथ लेने के लिए उनका नाम पुकारा गया तो हिचकती हुईं राबड़ी लालू के कई बार कहने के बाद ही मंच पर चढ़ीं. शपथ लेने के दौरान वो बार-बार शब्दों पर अटकती रहीं.
फिर लालू जेल चले गए और राबड़ी के कठिन राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई. पांचवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देने की वजह से और इसको भी दशकों बीत जाने से उन्हें लिखना पढ़ना बिल्कुल भी नहीं आता था. मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद सबसे पहले उन्होंने अपना नाम लिखना सीखा. पटना की तत्कालीन जिला अधिकारी राजबाला वर्मा ने राबड़ी को पढ़ना और लिखना सिखाया. 15 दिनों में उन्होंने अक्षरों को पहचानना और आधिकारिक फाइलों पर हस्ताक्षर करना शुरू कर दिया. एक स्थानीय हिंदी पत्रिका की संपादक डॉ. शांति ओझा ने भी पढ़ाई में राबड़ी की मदद की. किताब में डॉ. ओझा कहती हैं, “अगर उनका मूड ठीक नहीं होता था तो वो कुछ भी सुनने को तैयार नहीं होती थीं और कहती थीं, 'जा, ना पढ़ब(जाओ, नहीं पढ़ना)'.”
राबड़ी के लिए पढ़ाई जहां मुश्किल थी वहीं अधिकारियों के लिए इससे भी ज़्यादा टेढ़ी खीर था मुख्यमंत्री के लिए भाषण तैयार करना. स्वतंत्रता दिवस नजदीक था और परंपरा के अनुसार राबड़ी को पटना के गांधी मैदान में भाषण देना था. छोटा से छोटा ऐसा भाषण तैयार करने के लिए, जिसे मुख्यमंत्री आसानी से याद कर सकें, मुख्यमंत्री सचिवालय से उपसचिव के रूप में सेवानिवृत एन के उपाध्याय मधुप ने कई रातें जागकर बिताईं. उनकी मेहनत बेकार नहीं गई और राबड़ी ने धाराप्रवाह भाषण दिया.
स्वतंत्रता दिवस की संध्या पर राबड़ी को दूरदर्शन औऱ आकाशवाणी पर राज्य के लोगों के लिए संदेश देना था. राबड़ी के 20 सेकेंड को रिकार्ड करने के लिए 45 घंटे की कवायद हुई क्योंकि उनसे स्वतंत्रता और स्वाधीनता, इन दो शब्दों का उच्चारण नहीं हो पा रहा था.
लालू ने राबड़ी को समझाया था कि वो फाइलों पर हस्ताक्षर करने से पहले वरिष्ठ नौकरशाहों से फाइलों में लिखे को जोर-जोर से पढ़ने के लिए कहें. राबड़ी ऐसा करना नहीं भूलती थीं. मगर किताब के मुताबिक अहम फैसले हमेशा लालू ही लेते थे जो अपने एक विश्वासपात्र अधिकारी के जरिये जेल से लगातार मुख्यमंत्री के संपर्क में रहते थे. लालू ने राबड़ी को समझाया था कि वो फाइलों पर हस्ताक्षर करने से पहले वरिष्ठ नौकरशाहों से फाइलों के पाठ्य को जोर-जोर से पढ़ने के लिए कहें. राबड़ी ऐसा करना नहीं भूलती थीं. मगर किताब के मुताबिक अहम फैसले हमेशा लालू ही लेते थे.
राबड़ी राजद सांसद और केंद्रीय मंत्री कांति सिंह से बहुत खार खाती थीं. इसकी वजह ये धारणा थी कि कांति कॉलेज के दिनों से लालू की ‘गर्लफ्रेंड’ हैं. लालू ने उनके लिए देवेगौड़ा, गुजराल और वर्तमान यूपीए सरकार में मंत्री पद सुनिश्चित करवाया था. लालू परिवार के करीबी लोगों के मुताबिक, कांति, राबड़ी के लिए किसी खलनायिका से कम नहीं थीं और हाथ में झाड़ू लिए उन्होंने एक बार कांति को घर से बाहर तक निकाल दिया था. किताब में एक राजद नेता के हवाले से ये बात कही गई है.
1995 में राबड़ी ने विधानसभा चुनावों के लिए अपने भाई साधु यादव को पार्टी का टिकट देने की मांग की. जब लालू ने इसे ठुकरा दिया तो नाराज राबड़ी ने खाना बनाने से इनकार कर दिया. उस समय लालू ने एक पत्रकार से कहा था, राबड़ीजी रुसल बारी (राबड़ी जी नाराज हैं). उन्हें मनाने के लिए लालू ने साधु को विधानपरिषद में पहुंचा दिया.
जब राबड़ी मुख्यमंत्री थीं तो एक बार उन्होंने विधानसभा में विपक्ष के नेता सुशील मोदी को ये कहते हुए धमकाया था, मुंह ठकोच देंगे(मैं तुम्हारा मुंह तोड़ दूंगी). जब मोदी ने उनके इस्तीफे की मांग की तो वो अपने संसदीय कार्य मंत्री रामचंद्र पुर्वे पर चिल्लाईं, चूड़ी पहन कर आइल बरन का?(क्या तुम यहां चूड़ी पहनकर आए हो?)
जब बिहार की जनता ने उन्हें कुर्सी से हटा दिया तो सत्ताधारी एनडीए को लगा कि राबड़ी विपक्ष की एक कमजोर नेता साबित होंगी. मगर अपने आक्रामक तेवरों से उन्होंने सबको हैरान कर दिया. विधानसभा में एक तीखी बहस के दौरान राबड़ी और राजद की एक दूसरी महिला विधायक जबर्दस्ती अध्यक्ष नारायण चौधरी के कक्ष में घुस गए. इसके बाद राबड़ी ने अपनी कुछ चूड़ियां निकालीं और चौधरी को थमा दीं. फिर बाहर आते हुए उन्होंने नारे लगाए, ये स्पीकर नहीं, स्टिकर है. एक और बहस के दौरान राबड़ी ने अपनी चप्पल निकाली और ट्रेजरी बेंच पर बैठे लोगों की तरफ लहराने लगीं.
लालू के लिए राबड़ी का प्रेम और समर्पण किसी से छिपा नहीं है. 1973 में जब उनकी शादी हुई थी तो वो महज़ 14 साल की थीं और लालू 25 के. शादी के एक साल बाद तक वो पति का चेहरा नहीं देख सकी थीं. लालू बेरोज़गार थे और पटना में एक कमरे में अपने बड़े भाई के साथ रहा करते थे. राबड़ी के परिवार के पास काफी जमीन थी और उस जमाने में उन्हें दहेज के रूप में 5000 रुपये और कुछ गायें मिली थीं. राबड़ी की बाकी तीन बहनों की शादी संपन्न परिवारों में हुई थीं इसलिए जब उनके पिता ने उनका रिश्ता एक बेरोजगार नौजवान के साथ किया तो परिवार में काफी होहल्ला मचा. मगर राबड़ी के पिता का कहना था कि उन्हें लड़का पसंद है.
राबड़ी का नाम तो दिलचस्प है ही उनके परिवार में बाकी सदस्यों के नाम भी कम दिलचस्प नहीं हैं. प्रसूति के बाद महिला को जो खाने की इच्छा होती है, नवजात बच्चे का वही नाम रखने की परंपरा बिहार में पुरानी है. यही वजह है कि राबड़ी का नाम राबड़ी और उनकी बहनों के नाम जलेबिया, रसगुल्लवा और पनवा हैं.
राबड़ी की नौ संतानों के नामकरण की कहानी भी दिलचस्प है. मसलन जब पहली बेटी का जन्म हुआ था तो लालू छात्र नेता थे और मीसा नाम के एक आपातकालीय कानून के तहत उन्हें गिरफ्तार कर जेल में रखा गया था. इसलिए बेटी का नाम मीसा रख दिया गया. 1977 में जब दूसरी बेटी का जन्म हुआ तो लालू छपरा से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे इसलिए उसका नामकरण हुआ चुन्नू. बाकी बच्चों के नामों के साथ भी ऐसी ही दिलचस्प कहानियां जुड़ी हुई हैं.
आनंद एसटी दास
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कुल टिप्पणियां: 4
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प्रेषक : sunil choudharyek dilchasp kahani hai. mera manana hai ek anpadh kisi padhe likhe se jyada imandar ho sakta hai. akhir jitne ghotale ho rahe hai wo sab padhe likhe log hi kar rahe hai. chahe top IAS off. ho ya top leader.
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प्रेषक : उमेश कुमार्राबडी की कहानी बेहद रोचक लगी।लेखक ने राबडी की जीवनी के साथ कितना न्याय किया है यह तो पुस्तक पढने के बाद पता लगेगा, क्योँकी जीवनी के बारे मे कहा जाता है की अर्धसत्य होता है। आत्मकथा तो चौराहे मे अपने कपडे एक-एक कर उतारने जैसा अनुभव है। बहरहाल पुस्तक की समीक्षा से पाठको को कई नई जानकारी मिली है।
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प्रेषक : संदीप सिंहसचमुच बेबद रोचक लेख है। चाय की तलब होते हुए भी पूरा समाप्त किए बगैर उठने का मन नहीं किया। राबड़ी की पहली पारी जहां लोकतंत्र का भद्दा मजाक सरीखी दिखी वहीं दूसरी पारी (यानी विपक्ष का तेज तर्रार नेता बनने तक) में हम उसी लोकतंत्र पर फिर से गर्व करने लगे। हर पैरा रोचक पहलू से सराबोर, नामकरण के तो क्या कहने। समूची किताब पढ़ने को मन मचलने लगा।
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प्रेषक : rajeev jainकिताब तो पता नहीं कब पढ पाते। पढ पाते भी नहीं पर पुस्तक समीक्षा के रूप में ही आपने बहुत कुछ बता दिया। लिखा भी अच्छी तरह गया है। खबर पढते समय एकाग्रता भंग नहीं होती। कांति सिंह वाला प्रसंग लिखा है, तो खबर पुख्ता हो गई, वर्ना यह पहले सुना सुनाया ही लगता था।






















