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   दो भाइयों का आपसी चारा

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काशीनाथ सिंह के नए-पुराने संस्मरणों का एक संकलन आया है घर का जोगी जोगड़ा। राजकमल प्रकाशन से छपी इस पुस्तक में सबसे अद्भुत बात यह है कि पुस्तक के कवर पर नामवर सिंह की तस्वीर प्रकाशित है। पुस्तक खोलने पर पता चलता है कि घर का जोगी जोगड़ा की उपाधि दरअसल समालोचक और उनके बड़े भाई नामवर सिंह के लिए ही है और यह पुस्तक पूरी तरह नामवरजी के बचपन से लेकर वर्तमान तक के सफर का आंखों देखा आख्यान है, जिसमें तमाम स्थानों पर लेखक खुद उन परिस्थितियों और घटनाओं का हिस्सा रहा है जिसके बारे में वह लिख रहा है। 

इस लिहाज़ से पूरी पुस्तक को आप पढ़ जाएं तो कुल मिला कर यही समझ में आएगा कि न तो केंद्रीय पात्र के साथ और न ही उन पाठकों के साथ इस पुस्तक में न्याय किया गया है, जो इससे पहले 'काशी का अस्सी' और 'आछे दिन पाछे गए' के मुरीद रहे हैं। काशीनाथ सिंह ने हमेशा वही लिखा है जो भोगा है और जिसका वे हिस्सा रहे हैं। इसीलिए जब 'हंस' में कई साल पहले 'संतो घर में झगड़ा भारी' और 'देख तमासा लकड़ी का' प्रकाशित हुए थे, तो अस्सी के तमाम पात्रों में इस बात को लेकर नाराज़गी छा गई थी कि काशी ने सबको तो एक्सपोज़ कर दिया, लेकिन खुद को एक पवित्र गाय की भांति बचाते हुए नैरेटर की भूमिका अख्तियार कर ली। हालांकि, बनारस में चीजों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाता, इसलिए मामला आया और गया हो गया।

एक बात जो उन संस्मरणों से उभर कर आई, वो यह कि काशीनाथ अपने आसपास का वर्णन जितनी खालिस ऑब्जेक्टिविटी से करते हैं, उसका सानी नहीं। सवाल उठता है कि प्रस्तुत पुस्तक में ऑब्जेक्टिविटी तो दूर, इतनी सघन सब्जेक्टिवटी क्यों दिखाई देती है जहां नामवर के व्यक्तित्व को पहाड़-सा बना कर पेश किया गया है

एक बात जो उन संस्मरणों से उभर कर आई, वो यह कि काशीनाथ अपने आसपास का वर्णन जितनी खालिस ऑब्जेक्टिविटी से करते हैं, उसका सानी नहीं। सवाल उठता है कि प्रस्तुत पुस्तक में ऑब्जेक्टिविटी तो दूर, इतनी सघन सब्जेक्टिवटी क्यों दिखाई देती है जहां नामवर के व्यक्तित्व को पहाड़-सा बना कर पेश किया गया है, जो गरबीली गरीबी में भी रास्ता चीर कर आगे बढ़ जाता है। एकाध उदाहरण देखें-

'और नामवर की आंखें- ये आंखें उस बारह बीघे के काश्‍तकार के लड़के की आंखें थीं जिसे चौदह साल तक जीयनपुर के ऊसर ने बाजरा, सवां, गन्‍ने का रस, मटर की घुंघनी और खारा पानी पिला-खिला कर पाला था, जो दस वर्षों तक काशी विश्‍वविद्यालय के विद्यार्थियों की आंख की पुतली था, जो महीनों तक चुनाव के दौरान रोटी-नमक-प्‍याज खाकर भूखे-नंगे गांवों की खाक छानता रहा था। जो पांच सालों तक जेब में चवन्‍नी डाल कर फुटपाथों के चक्‍कर लगाता रहा था, जिसे मार्क्‍सवाद ने दृष्टि दी थी और इसी नगर के टकियल लोग जब घास नहीं डालते थे तो कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने सहारा दिया था...।'

ठीक है, कि विपन्नता का भी एक सौंदर्यशास्त्र होता होगा, लेकिन गरीबी कितनी गरबीली होती है, इसका जवाब तय करने वाले सिर्फ लेखक ही नहीं हैं, बल्कि देश की 70 फीसदी भूखी-नंगी जनता भी है। पूछा जाना चाहिए कि नामवर और काशीनाथ क्या दोनों ही गरीबी के महिमामंडन के ऐसे मुहावरों को अपनी बुनियादी विचारधारा मार्क्‍सवाद के बरअक्स संतुलित पाते हैं, जिसका जाने कितनी बार इस पुस्तक में हवाला दिया गया है? क्‍या यह बॉलीवुडीय शैली में गरीबी का ग्‍लैमराइजेशन नहीं है?

'भैया के अस्सीवें बसंत' पर छापे गए इस संस्मरण संकलन में तीन हिस्से हैं जीयनपुर, गरबीली गरीबी वह और घर का जोगी जोगड़ा। आखिर में 'नामवर से काशी' नामक एक कथित साक्षात्कार है। आपके सपने क्या थे, आपको किनसे मिलना अच्छा लगता है, आपको कैसा लग रहा है जैसे प्रश्नों से बना यह साक्षात्कार देख कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि यह जबर्दस्ती का लेखकीय प्रयास है जो पुस्तक में पूरक की भूमिका निभाने के लिए किया गया है।

नामवर सिंह के व्यक्तित्व के अंतर्विरोधों पर कोई बात यहां नहीं है, न ही दिल्ली में उनके लेखकीय जीवन का कोई हवाला है। उदाहरण के लिए, बनारस से निकलने के काफी बाद बीएचयू के कुलपति श्रीमाली ने नामवरजी से विभाग में हिंदी पढ़ाने का एक बार अनुरोध किया था, जिसका जिक्र इस पुस्‍तक में है। काशीनाथ के यह पूछने पर, कि चले क्‍यों नहीं जाते, नामवर ने जवाब दिया था- 'ठाकुरों-बामनों की पॉलिटिक्‍स करने आऊं यहां? जेएनयू में बहुत मजे में हूं।'  ठीक है कि लेखक ने यह संवाद किताब में शामिल किया, लेकिन बहुत दिन तो नहीं हुए जब बनारस के ही उदय प्रताप कॉलेज में नामवरजी का अमृत महोत्‍सव मनाया गया था। आखिर 'ठाकुरों' के उस ब्रांडेड कॉलेज में अपना महोत्‍सव मनवाने की विवशता क्‍या थी? इस पर भी बात तो की ही जा सकती थी, लेकिन ऐसे प्रसंगों को काशीनाथ ने सिरे से छोड़ दिया है। जाहिर तौर पर 'अकार' में नामवरजी का जो विवादित साक्षात्कार छपा था, उसे जानने वाले और वहीं से उड़ान भरने वाले पाठक को यह पुस्तक दो भाइयों का आपसी चारा ही लगेगी जिसका कोई व्यापक सार्वजनिक महत्व नहीं।

सवाल उठता है कि उम्र के इस पड़ाव पर आकर कोई भी लेखक इतना कमजोर क्यों हो जाता है कि वह अपने बीते जीवन के संघर्षों को याद कर रूमानी होने के सिवाय कुछ नहीं कर पाता? नामवर साक्षात्‍कार में बताते हैं कि एक बार किसी नए-नए लेखक की पुस्‍तक में एक शुभाशंसा प्रकाशनार्थ उन्‍होंने जबर्दस्‍ती लिखी थी, इसके अलावा और कोई ऐसा काम नहीं किया। जानने वाले जानते हैं कि पटना से लेकर दिल्‍ली तक उन्‍होंने कैसे-कैसे नवलेखकों की पुस्‍तकों का लोकार्पण किया और उन्‍हें लेखक बना दिया, जिसका हालिया उदाहरण पिछले वर्ष एक टीवी पत्रकार के तथाकथित कविता संग्रह का लोकार्पण था।

काशीनाथ सिंह जैसे ठेठ देशज लेखक द्वारा ऐसे परिवारी गद्य को छपवाने का कोई अर्थ समझ नहीं आता। वैसे पाठक चाहें तो इस पुस्तक को पढ़ लें, पढ़ने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन काशीनाथ सिंह की छवि टूटने का डर है। इसके अलावा जिन्होंने नामवरजी की बेरुखी को दिल्ली में झेला है, उनके मन में भी इस प्रशंसात्मक गद्य को पढ़ कर एक स्तर पर कड़वाहट और बढ़ जाएगी।

अभिषेक श्रीवास्तव

पुस्तक: घर का जोगी जोगड़ा

लेखक: काशीनाथ सिंह

मूल्य: 60 रुपए

प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

 

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 2

  • प्रेषक : pravin
    namwar g ka rajpoot rajpoot ka khel bahut gahara hai infact jatiwad ka upyog har hindustani karta hai
  • प्रेषक : shree prakash
    can i suggest a better title for this review?...could it be better to say it..samanti soch ka bhaichara