जोधा अकबर-विवाद छोड़ें, फिल्म देखें
आखिरी मगर मुद्दे की बात सबसे पहले...अगर एक बढ़िया फिल्म देखने की इच्छा काफी दिनों से पूरी न हुई हो तो तुरंत समय निकालें और अपनी ये इच्छा पूरी कर लें. और अगर फिल्म की लंबाई, जोकि चार घंटे से कुछ ही कम है, को ध्यान में रखा जाए तो ये एक अच्छी फिल्म के साथ दूसरी अच्छी फ्री वाला मामला बन जाता है.
फिल्म का कथानक इतिहास और कल्पना का गठजोड़ है मगर अगर ज़्यादा दिमाग न लगाएं तो इस गठजोड़ की गांठों का एहसास तक नहीं होता. ये मेल छाछ और पानी जैसा है जो छाछ की कमी को पूरा करके सबको तृप्त करने जैसा एहसास देता है. वैसे भी ऐतिहासिक विषयों पर आधारित होने के बावजूद फिल्मों का ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन पाना इस माध्यम की प्रकृति ही नहीं है और अगर ऐसा करने की कोशिश की भी जाए तो उसके लिए भी कम से कम अविवादित ऐतिहासिक साक्ष्य तो होने चाहिए. दरअसल इस तरह की फिल्में अगर अपने समय के माहौल और परिस्थितियों से आपको ठीक से वाकिफ़ करवा पाती हैं तो यही इनकी सफलता मानी जाती है. और जोधा अकबर इसी मायने में सफल नज़र आती है. भले, जोधा का नाम जोधा न रहा हो, भले ही वो अकबर की एकमात्र मलिका न रही हों, भले ही असल अकबर का डीलडौल ह्रितिक रौशन जैसा न रहा हो और फिल्म के कुछ ऐतिहासिक चरित्र कोरी कल्पना की उपज हों मगर फिल्म अकबर के उदारवादी रुझान और इसके चलते मुगल काल के स्वर्णिम युग का एक कामचलाऊ से थोड़ा अच्छा ही चित्र बना देती है.
| भले, जोधा का नाम जोधा न रहा हो, भले ही वो अकबर की एकमात्र मलिका न रही हों, भले ही असल अकबर का डीलडौल ह्रितिक रौशन जैसा न रहा हो और फिल्म के कुछ ऐतिहासिक चरित्र कोरी कल्पना की उपज हों मगर फिल्म अकबर के उदारवादी रुझान और इसके चलते मुगल काल के स्वर्णिम युग का एक कामचलाऊ से थोड़ा अच्छा ही चित्र बना देती है. |
अगर हमने बचपन में इतिहास पढ़ा है तो जानते होंगे कि हिंदू और मुसलमानों को एक करने और उनके बीच वैमनस्य की खाई पाटने के उद्देश्य से अकबर महान ने दीन-ए-इलाही नाम का एक धर्म चलाने की व्यवस्था की थी. फिल्म में तो इस बात को नहीं दिखाया गया है मगर किसी भी अनजान शख़्स को अगर फिल्म देखने के बाद इसका पता चले तो उसे बेझिझक ऐसा लगेगा कि जोधा फिल्म का नायक ऐसा कर सकता है.
फिल्म में जोधा अकबर के बीच का प्रेम केन्द्र में ज़रूर है और कई लोगों को इस पर एतराज़ भी हो सकता है...मगर ये एक बादशाह द्वारा सोच-समझकर, एक रणनीति के तहत की गई शादी के बाद, साथ रहकर, गुण दोषों के आधार पर पत्नी के लिए उपजा स्वत:स्फूर्त लगाव है जिसमें कहीं भी किसी भी तरह का ओछापन नज़र नहीं आता.
फिल्म का एक और मज़बूत पक्ष इसके संवाद हैं जिन्हें मशहूर हिंदी लेखक के पी सक्सैना ने लिखा है और इसमें उन्होंने शब्दों का चयन निहायत ही खूबसूरती और संजीदगी से किया है. हल्केपन की कोई गुंजाइश ही नहीं है. मगर हिंदी और अंग्रेज़ी की घालमेल पर पल रही आज की महानगरीय युवा पीढ़ी को संवादों के इस खालिसपन से थोड़ी परेशानी ज़रूर हो सकती है.
फिल्म में नितिन देसाई के बनाए सेट्स बहुत ही भव्य और नीता लुल्ला की पोशाकें बेहद लुभावनी हैं. संगीत, गोवारीकर और पूरे देश के ही पसंदीदा संगीतकार ए आर रहमान का है और लगान और स्वदेश से उन्नीस होते हुए भी काफी मधुर है.
मगर फिल्म में हल्की-फुल्की कुछ कमियां भी हैं. जैसे फिल्माए गए युद्ध के दृश्य उतने अच्छे नहीं बन पाए हैं. उन्हें भव्यता का जामा पहनाने की कोशिश ज़रूर की गई है लेकिन वे बस ठीकठाक ही हैं. इसके अलावा फिल्म का नृत्य निर्देशन बहुत साधारण सा ही है और फिल्म थोड़ी लंबी भी है.
अभिनय के मामले में ह्रितिक फिल्म की जान हैं और वर्तमान में आमिरखान के बाद अब वो ऐसे अकेले सुपरस्टार नज़र आते हैं जिनके एक-एक संवाद में पीछे की मेहनत साफ झलकती है. ऐश्वर्या राय में एक राजपूतानी का गर्व और सौंदर्य बड़ी ही सहजता से छलकता है मगर फिल्म में उनके अभिनय पर ये कहा जा सकता है कि उनमें बात तो है मगर वो वाली नहीं.
एक सबसे बढ़िया बात फिल्म की ये है कि इसमें गोवारीकर ने दो समुदायों की भावनाओं का बखूबी ध्यान रखा है. अगर ये कहीं किसी तरह की भावनाओं को उद्वेलित करती भी है तो वो एक दूसरे के प्रति सद्भावनाओं को. शायद यही संतुलन फिल्म की सबसे बड़ी सफलता है. मगर ध्यान रहे कि जोधा अकबर केवल एक बढ़िया फिल्म भर है कोई 'मुगले आज़म' नहीं.
संजय दुबे






















