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   'मिथ्या' तो है मिथ्या
फिल्म देख कर बाहर निकलते दर्शकों में से एक-‘कितना बढ़िया होता अगर ये फिल्म थोड़ा और छोटी होती’. दूसरा-'थोड़ी नहीं ज़्यादा भी हो सकती थी'. बात करने के तरीके और चेहरे के भावों से लग रहा था कि छोटा होने की बात फिल्म की गुणवत्ता सुधारने को लेकर नहीं—शायद उन्हें इसकी गुंजाइश ही नहीं दिखी--बल्कि दर्शकों यानी कि खुद की हालत कम बिगड़ने के हिसाब से कही गई थी.
हालांकि अगर विशुद्ध आंकड़ो पर जाएं तो मिथ्या पहले ही भारतीय मानकों के हिसाब से काफी छोटी—दो घंटे से कुछ कम—है मगर बात ये भी ठीक ही है कि अगर बनने के बाद फिल्म में ज़्यादा कुछ करना संभव न होता तो इसे थोड़ा और छोटा करके ही दर्शकों को थोड़ी राहत दी जा सकती थी.
मिथ्या के निर्देशक मल्टीप्लेक्स संस्कृति की फिल्मों के लिए मशहूर रजत कपूर हैं जिनकी पुरानी फिल्मों 'मिक्स्ड डबल्स' और 'रघु रोमियो' को खासी सराहना मिल चुकी है. मगर इस फिल्म में वो जैसी फिल्में अब तक बनाते आए हैं, उनके और कुछ भव्य, पहले से
बड़ा करने की ऊहापोह में फंसे नज़र आते हैं. पूरी फिल्म में छोटे-छोटे मुद्दों पर, हल्की-फुल्की, आम जीवन को कई-कई कोणों से, करीब से छूती फिल्में बनाने वाला रजत कपूर कहीं नज़र नहीं आता. मगर इस फिल्म में वो जैसी फिल्में अब तक बनाते आए हैं, उनके और कुछ भव्य, पहले से बड़ा करने की ऊहापोह में फंसे नज़र आते हैं. पूरी फिल्म में छोटे-छोटे मुद्दों पर, हल्की-फुल्की, आम जीवन को कई-कई कोणों से, करीब से छूती फिल्में बनाने वाला रजत कपूर कहीं नज़र नहीं आता.
नायक की शक्ल किसी से मिलना और उसका अपने हमशक्ल की जगह ले लेना, पहले भी कई फिल्मों के केन्द्र में रहा है, इसमें भी है और यहां तक फिल्म ठीकठाक भी है. मगर इसके बाद नायक ग़फ़लत में पड़ जाता है और इसको जिस तरह से फिल्माया जाता है वो दर्शकों को गहरी दुविधा में डाल देता है. यानी कि जो फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण भाग है वही हजम नहीं हो पाता है.
फिल्म में मुख्य भूमिका रणवीर शौरी की है और अब तक अपनी हर ऊल-जुलूल भूमिका को सहजता से निभा कर खासी तारीफें बटोर चुके रणवीर के अभिनय के कई रंग मिथ्या में देखने को मिलते हैं. मगर फिल्म के ख़त्म होते-होते इस बात का अहसास हो जाता है कि हास्य की विधा में तो वे पारंगत हैं—शायद वे खुद भी ऐसे ही हैं-- मगर कोई गहरी, ज़्यादा ठहरी हुई भूमिका निभाना अभी भी उनके बस की बात नहीं. फिल्म में जहां-जहां उनके मतलब का काम है वो छा जाते हैं मगर जहांकहीं कथानक उनसे थोड़ा अलग होने की मांग करता है वे आम या उससे थोड़ा नीचे ही नज़र आते हैं.
नसीरुद्दीन शाह, सौरभ शुक्ला, विनय पाठक आदि ने जितना हो सकता था फिल्म को सहारा दिया है. नेहा धूपिया का रोल फिल्म में काफी बड़ा और महत्वपूर्ण भी है मगर वो फिल्म में थोड़ा सा ग्लैमर डालने के अलावा कुछ और खास नहीं कर पातीं. उनसे ज़्यादा प्रभावित तो छोटे से रोल में इरावती हर्षे ही कर जाती हैं
अगर शूटिंग वाले शुरुआती दृश्य को छोड़ दें तो फिल्म में नाच गाने नहीं है, अगर एक दो होते तो हो सकता था दर्शक फिल्म के लंबे होने की इस कदर शिकायत नहीं करते.
संजय दुबे
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कुल टिप्पणियां: 1
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प्रेषक : NehaMain aapke review se sehmat hu.maine bhi film dekhi hai.sahi main film kuch jayada hi lambi thi. Aur kuch khas pravawaith nahin karti film darsako ko.Aapki agale review ka intezar rahega.Aur is baar apaka review padkar movie dekhne jaungi. great job.keep it up.
























