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   रामा रामा कैसा ड्रामा ?
रामा रामा का ड्रामा दरअसल पति पत्नी के संबंधों पर आधारित है. ऐसा लगता है कि इस तरह की भारतीय फिल्मों के किसी एनसाइक्लोपीडिया को पढ़ कर उसमें से पति पत्नी के बीच की गलतफहमियों, तकरार और उससे उपजे बिखराव के दृश्य छांट लिए गए हों...फिर उन्हें थोड़ा सा तोड़-मरोड़ कर, एक ताने-बाने में पिरो दिया गया हो. मिसाल के तौर पर फिल्म की एक नायिका द्वारा मरने का स्वांग रचने वाला दृश्य...जब नायिका का पति घबरा कर डॉक्टर को फोन करने लगता है तो वो इस बात पर मुंह फुला लेती है कि पतिदेव उसके ग़म में मौत को गले लगाने के बजाय डॉक्टर को याद कर रहे हैं...दृश्य सीधा केतन मेहता साहब की ‘माया मेमसाब’ से पार कर लिया गया है.
फिल्म में ग़लतफ़हमियां पैदा करने वाले दृश्य इतने बचकाने हैं कि ग़लतफंहमी होने से पहले ही, बड़ों की तो बात ही छोड़िए--जिनके लिए ये फिल्म बनाई गई होगी--बच्चों को भी मालूम पड़ जाता है कि आगे क्या गड़बड़ होने वाली है. जबकि नायक और नायिका के बीच ऐसा क्या हुआ कि वो एक दूसरे से इतना खार खाए रहते हैं...इस बात का पता अंत तक नहीं चलता.
पति पत्नी के संबंधों पर बनी फिल्मों की बॉलीवुड में कोई कमी नहीं. हाल ही में नज़र डालें तो ‘साथिया’, ‘चलते-चलते’ जैसी कुछ बहुत ही उम्दा फिल्में दर्शकों को देखने को मिली हैं. मगर उनसे रामा रामा की तुलना करना एक बड़ी हिमाकत हो जाएगी.
तो क्या ये कहा जाए कि रामा रामा एक बकवास फिल्म है...शायद नहीं. रामा रामा को तीसरे दर्जे की फिल्म कहना तो उचित नहीं होगा पर ये प्रथम श्रेणी में तो हरगिज़ भी नहीं रखी जा सकती...
फिल्म के अपने कुछ क्षण हैं जो आवश्यक रूप से राजपाल यादव से जुड़े हुए है. उनकी अदाकारी तो लाजवाब है ही उनके लिए लिखे गए संवादों ने भी कई जगह इसमें चार चांद लगाए हैं. फिल्म में ‘ऑफिस-ऑफिस’ से प्रसिद्धि पाए संजय मिश्रा भी अपनी चिर परिचित शैली के अभिनय से लोगों का ठीकठाक मनोरंजन करवा देते हैं. आशीष चौधरी भी ठीक ही हैं. नायिकाओं यानी कि नेहा धूपिया और अमृता अरोड़ा के करने के लिए न तो बहुत कुछ था और न ही उन्होंने ऐसा कुछ किया भी. संगीत बुरा नहीं लगता मगर हॉल से निकलने के बाद कुछ याद भी नहीं रहता.
फिल्म का तकनीकी पक्ष—कैमरा से लेकर संपादन तक--बिलकुल साधारण सा है जो कि फिल्म के दृश्यों को किसी भी तरह से प्रभावी बनाने में कोई मदद नहीं करता.
कुल मिलाकर फिल्म में कुछ जगहों पर गुदगुदाने वाले दृश्य छिटके हुए मिलेंगे मगर कई जगह अगर समीक्षा लिखने की मजबूरी न हो तो फिल्म छोड़ कर भाग जाने का मन भी कर सकता है.
संजय दुबे
























