• print प्रिंट करें

   स्ट्रेन्जर्स : पहली बॉल पर छक्का

फॉन्ट आकार Decrease font Enlarge font
image

गज़ब! जी हां नये ज़माने की फ़िल्मों में एक और नाम जोड़ने वाली एक फ़िल्म है स्ट्रेंजर्स। ये कहना कि स्ट्रेंजर्स हॉलीवुड की फ़िल्मों से प्रेरित है, नाइंसाफी होगी, निर्देशक आनंद राय की मेहनत पर्दे पर दिखती है, अपनी पहली ही फ़िल्म में राय ने अपना जौहर दिखा दिया है. हर सीक्वेंस में यानी हर बॉल पर उन्होंने रन बटोरे हैं. यहां ये बताते चलना जरूरी है कि फ़िल्मों में फुल्टू मस्ती खोजने वालों को स्ट्रेंजर्स शायद उतनी रास न आए, हो सकता है वो दो-तीन बार झपकी भी ले लें, लेकिन कमाल के प्लॉट पर मनोज शॉ की सिनेमेटॉग्राफी और फिर एडिटिंगसबकी मेहनत रंग लाती है और यही इस फ़िल्म को नये दौर की फ़िल्मों की सूची में जगह दिलाता है. जाहिर तौर पर बीइंग सायरस और मनोरमा सिक्स फीट अंडर के बाद फ़िल्म प्रेमी और कुछ नया तलाशने वाले दर्शकों के लिए ये फ़िल्म ट्वेंटी-20 क्रिकेट सरीखी है.

जाहिर तौर पर बीइंग सायरस और मनोरमा सिक्स फीट अंडर के बाद फ़िल्म प्रेमी और कुछ नया तलाशने वाले दर्शकों के लिए ये फ़िल्म ट्वेंटी-20 क्रिकेट सरीखी है.  

पति-पत्नी के संबंधों को लेकर बनी ये फ़िल्म दो फ्लैशबैक्स में चलती है. दो अजनबी साउथम्प्टन से लंदन जाने वाली एक ट्रेन में मिलते हैं. राहुल( जिमी शेरगिल) की मुलाकात संजीव राय ( केके मेनन) से होती है जहां दोनों अपनी अपनी ज़िंदगी के किस्से एक दूसरे को सुनाते हैं. एक असफल लेखक राहुल कैसे प्रीति(नंदना सेन) से मिलता है, दोनों की शादी हो जाती है लेकिन ये संबंध सफल साबित नहीं होता. दूसरी तरफ बिज़नेसमैन संजीव राय अपनी पत्नी नंदिनी( सोनाली कुलकर्णी) को लेकर परेशान हैं जो असमय हुए अपने बेटे की मौत से उबर नहीं पा रही. संजीव राहुल के सामने एक दूसरे की पत्नियों का कत्ल करने की बात रखता है. फ़िल्म का थ्रिल अभी तक बना हुआ है, लंदन पहुंचने में अभी चार घंटे बाकी हैं. या यूं कहें स्लॉग ओवर्स में सौ रन चाहिए और विकेट बचे हैं सिर्फ चार.

लेकिन फ्लैशबैक की कडियों में पिरोई गई स्ट्रेंजर्स आखिर तक ये सस्पेंस बनाये रखती है कि आखिर हुआ क्या था. बहरहाल ये तो हम भी नहीं बतायेंगे.  

हां, कहानी में मानवीय पहलुओं को जिस तरह जोड़ा गया है वो क़ाबिले तारीफ़ है सोनाली थोड़े समय के लिए ही आती हैं मगर चंद संवादों से ही अपने पात्र को बखूबी स्थापित कर देती हैं. केके मेनन, जिमी शेरगिल और नंदना सेन ने भी अच्छा अभिनय किया है। एक बार फिर से सिनेमेटोग्राफी और एडिटिंग की जितनी तारीफ़ की जाए कम है.

अचित्र

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 2

  • प्रेषक : maaz khan naya bhojpur,buxar,bihar 802133
    india me koi v film banti hai to uske uper ye aarop lagna shuru ho jata hai ki wo hollywood ki film se copy hai,ye badi afsos ki bat hai bollywood wale mehnat karte hain or faltu me badnam hote hain unki mehnat pani me jata hai,inse bachna chahiye darsakon ko,maaz khan,naya bhojpur buxar
  • प्रेषक : mihir
    मैंने ये फिल्म OCEAN'S CINEFAN FILM FESTIVAL में देखी थी और तब ही मुझे इसमें काफ़ी झोल नज़र आये थे. बेशक फिल्म प्रयोगात्मक है लेकिन सिर्फ कहानी कहने के तरीके और फिल्म की संरचना में प्रयोग से फिल्म अच्छी नहीं हो जाती. यहाँ आप उदाहरण के लिए कुछ वक्त पहले आई फिल्म जानेमन को देख सकते हैं. इसीलिए मैंने आपकी इंग्लिश पत्रिका में जो समीक्षा पढ़ी थी वो मुझे काफी रास भी आई थी. लेकिन यहाँ फिल्म की तारीफ देखकर अजीब लगा. इस फिल्म को ज्यादा भाव दिया जाना ठीक नहीं.