एक बार आजा नचले
फ़िल्म चाहे कैसी भी हो मगर नब्बे के दशक वाली फिल्मों की खुराक पर पले-बढे हमारे जैसे लोग तो शायद उसे देखने जाएंगे ही. हर किसी के सपनों में आने वाली माधुरी ने इतने सालों बाद क्या जादू किया है? क्या उनकी अदाएं अब भी उतनी ही दिलकश हैं? परदेसी बाबू से शादी रचा अमेरिका में बसी दो नन्हें-मुन्नों की मां माधुरी अब कैसी लगती हैं? या फ़िर...
कुछ उत्सुकता आज के रिएलिटी प्रोग्रामों ने भी बढ़ाई है जिनमें भाग लेती माधुरी में लोगों को हेमा मालिनी जैसी नज़ाकत और नफासत नज़र आ रही थी.
आजा नचले एक ऐसी युवती(माधुरी दीक्षित) की कहानी है जिसका सब कुछ नृत्य और नृत्य का मन्दिर अजंता ही होता है...एक अमेरिकी फोटोग्राफर हिन्दुस्तान आता है दोनों में प्यार हो जाता है और युवती युवक के साथ पूरे जहान से पंगा लेने के बाद अमेरिका चली जाती है. कुछ सालों बाद अपनी छोटी सी बेटी के साथ जब वो वापस आती है तो पता लगता है कि अजंता को उजाड़कर उसकी जगह शॉपिंग मॉल बनाया जा रहा है...फ़िर शुरू होती है थियेटर को बचाने की भागदौड़... अभिनय के मामले में वो कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पातीं. हाँ मगर जहां नाच गाने की बात आती वहाँ आज भी उनका कोई सानी नहीं मगर अब वो नृत्य करती नज़र आती हैं. उसमें वो पहले जैसी बात नहीं जब नृत्य उनके अंग-प्रत्यंग से फूटता सा प्रतीत होता था.
फ़िल्म के आख़िरी आधा घंटे को छोड़ दें तो सब कुछ आम मुम्बईया फिल्मों जैसा ही है...फ़िल्म में भले ही एक हीरो बीस-बीस खलनायकों की छुट्टी नहीं कर रहा हो मगर कई चीज़ें इस तरह से घटित होती हैं जो कि केवल हिन्दी फिल्मों के दर्शक ही पचा सकते हैं.
फ़िल्म का आख़िरी आधा घंटा ज़रूर अनोखा है और एक दर्शक के ही शब्दों में यही फ़िल्म की टिकट में खर्चे पैसे वसूल करवाता है. दरअसल फ़िल्म के अंत में एक लैला मजनू की ज़िंदगी पर आधारित नृत्य नाटिका जैसा कुछ है. और इसे जिस तरह से फिल्माया गया है उसे देखकर ऐसा लगता है कि नचले में बाकी सारी चीज़ें जैसे इस एक मुख्य चीज़ तक पहुंचाने के लिए ही रची गईं हैं. इस दौरान माधुरी भी जैसे अपने पूरे पुराने वाले शबाब में नज़र आतीं हैं.
जहां तक अभिनय की बात है तो फ़िल्म में सभी ने--माधुरी को फिलहाल छोड़ देते हैं-- जितना उनके पात्रों ने अनुमति दी उस हिसाब से बढिया से बढिया अभिनय करने की कोशिश की है. वैसे भी अभिनय करने वाले जब रघुवीर यादव, इरफान, कोंकणा, रणवीर शौरी और विनय पाठक सरीखे हों तो ये बिना फ़िल्म देखे भी कहा जा सकता है. मगर फ़िल्म का एक बहुत ही उजला पक्ष अक्षय खन्ना हैं जो अपने छोटे से रोल में हीं खासा प्रभावित करते हैं. इसके अलावा कोंकणा इस बार भी जब उन्होंने जैसा चाहा वैसा ही दर्शकों को महसूस करा रही थीं.
फ़िल्म में चक दे फेम सलीम-सुलेमान का संगीत पहले ही खासी ऊंचाइयां छू चुका है.
अब बात माधुरी की. इसमें कोई शक नहीं कि वो बला की खूबसूरत हैं मगर अभिनय के मामले में वो कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पातीं. हाँ मगर जहां नाच गाने की बात आती है वहाँ आज भी उनका कोई सानी नहीं मगर अब वो थिरकती हैं तो उसमें वो पहले जैसी बात नज़र नहीं आती जब नृत्य उनके अंग-प्रत्यंग से फूटता सा प्रतीत होता था.
क्या इस फ़िल्म को उनकी फिल्मों में वापसी की तरह देखा जाए. शायद नहीं. पाँच साल बाद उनके जैसी सुपर स्टार का किसी फ़िल्म में काम करना लोगों में उत्सुकता जगा उन्हें टिकट खिड़की पर एक बार तो ला सकता है. मगर ऐसा हर बार हो पाए इसके लिए उनकी उम्र और प्रतिभा को ध्यान में रखकर भूमिकाओं को गढ़ने की ज़रूरत होगी.
क्यों कि माधुरी अब चालीस की उम्र वाली एक बेहद खूबसूरत महिला तो हैं मगर तेजाब की उन्मुक्त षोडशी नहीं और ऐसा इस फ़िल्म में कदम- कदम पर महसूस होता है.
संजय दुबे
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कुल टिप्पणियां: 1
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प्रेषक : avtansh.chitranshIt's good but as for as my concerned I can go for one more show.






















