अथक किंतु मर्यादित संघर्ष
धनबल और बाहुबल के खिलाफ मध्यवर्ग की लड़ाई का प्रतीक बन चुकीं नीलम कटारा की मर्यादित लड़ाई का एक अध्याय आने वाली 14 मई को पूरा होने वाला है जब अदालत उनके बेटे नितिश की हत्या पर कोई फैसला सुनाएगी...मगर वे जानती हैं कि इस लड़ाई में अभी कई अध्याय और बाकी हैं और वे बिना थके इसके लिए तैयार हैं.
16 फरवरी 2002 को रात 11 बजे नीलम कटारा को एक एसएमएस मिला. ये उनके बेटे नीतिश का था जो एक शादी में शामिल होने गाजियाबाद गया था. इसमें लिखा था, ‘चाहे मैं जिस भी वक्त घर आऊं मुझे सुबह 9 बजे जगा देना और कोई बहाना मत बनाना.’ अगली सुबह अपने 23 साल के बेटे के साथ एक जांच के लिए अस्पताल जाने की योजना बना रही नीलम को क्या पता था कि वो अपने बेटे को अब कभी नहीं जगा पाएंगी.
नीतिश उस रात घर नहीं लौटा. तीन दिन बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने जली अवस्था में उसकी लाश बुलंदशहर जिले में पड़ने वाले खुर्जा नामक कस्बे के पास से बरामद की. 20 फरवरी की शाम पुलिस ने नीलम को फोन कर उनसे शव की पहचान करने के लिए आने को कहा. अपने छोटे बेटे नितिन के साथ आधी रात के वक्त नीलम अस्थायी रूप से बने मुर्दाघर पहुंची. टॉर्च की रोशनी में सबसे पहले उनकी नजर शव के पांवों पर पड़ी. फिर पहचान करने के लिए उन्होंने अपनी हथेली नीतिश की हथेली पर रखी जो पूरी तरह नहीं जली थी(नीतिश की हथेली उनकी हथेली से थोड़ी बड़ी थी). हालांकि अब तक वे समझ चुकी थीं मगर फिर भी किसी चमत्कार की आशा में आखिर में थोड़ी देर बाद उन्होंने नितिश के जले हुए चेहरे को भी देखा. बस संदेह के सारे बहाने खत्म हो गए. उस हृदयविदारक क्षण को याद करते हुए 56 साल की नीलम कहती हैं, “मुझे महसूस हुआ कि मेरे पांव कांप रहे हैं. फिर अचानक पता नहीं कहां से मुझमें जैसे ताकत आ गई. मैंने खुद से कहा कि जिसने भी ये किया है उसे सजा जरूर मिलनी चाहिए.”
| “मुझे महसूस हुआ कि मेरे पांव कांप रहे हैं. और फिर अचानक पता नहीं कहां से मुझमें ताकत आ गई. मैंने खुद से कहा कि जिसने भी ये किया है उसे सजा जरूर मिलनी चाहिए.” |
नीतिश की हत्या कथित रूप से विकास और विशाल यादव ने की जो अपराध से राजनीति की दुनिया में आए डी पी यादव के बेटे और भतीजे हैं. आरोप है कि इन दोनों ने 16 फरवरी 2002 की रात, गाजियाबाद से नीतिश का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी क्योंकि नीतिश की उनकी बहन भारती यादव के साथ दोस्ती थी, जो उन्हें नामंज़ूर था.
नीलम के लिए अपने बेटे की मौत को भुला कर आगे बढ़ना जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती थी. केंद्रीय विद्यालय संगठन में शिक्षा अधिकारी इस महिला के लिए इंसाफ की लड़ाई का सफर इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि रेलवे में सीनियर ब्यूरोक्रेट उनके पति निशित 2001 में अमायोट्रॉफिक लेटरल स्केलेरोसिस नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित पाए गए थे. छोटा बेटा नितिन पुणे से इंजीनियरिंग कर रहा था. यानी हालात का मुकाबला करने की जिम्मेदारी अब अकेले नीलम पर आन पड़ी थी. अदालतों के बारे में नीलम की जानकारी कई लोगों की तरह हिंदी फिल्मों तक ही सीमित थी. वो बताती हैं, “23 फरवरी 2002 को यादव भाइयों की गिरफ्तारी के बाद मैं पहली बार कोर्ट में गई थी.”
नीलम याद करती हैं कि फरवरी की उस रात से पहले उनकी जिंदगी का सफर बेहद खूबसूरत रहा था. लखनऊ के एक बोर्डिंग स्कूल से पढ़ाई करने के बाद 1976 में उन्होंने अपने मित्र निशित से शादी की. बाद में वो बैंकिंग से शिक्षा के क्षेत्र में आ गईं. पति-पत्नी, दोनों को फोटोग्राफी और घूमने-फिरने खासकर वन्य अभ्यारण्यों की सैर करने का बहुत शौक था. 1978 में नीतिश का जन्म हुआ और 1980 में नितिन का. बाद में परिवार उस घर में आ गया जिसमें नीलम आज भी रहती हैं. साथ देने को अगर कोई है तो नीतिश का छोटा सा पालतू कुत्ता. नीलम कहती हैं, “इस दरम्यान हमें सिर्फ एक ही झटका लगा था और वो थी मेरे पति की बीमारी. मगर नीतिश मेरा हौसला बढ़ाता रहता था.” इसके बाद नीलम और नीतिश ही परिवार की जिम्मेदारी संभालते थे. जुलाई 2001 में कटारा परिवार ने कान्हा राष्ट्रीय अभ्यारण्य की यात्रा की थी. ये आखिरी बार था जब वो किसी यात्रा पर एक साथ गए थे.
नीतिश की मौत ने इस परिवार की जिंदगी को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया. नीलम के अगले 18 महीने अस्पतालों, अदालत और अपने ऑफिस के बीच चक्कर लगाते हुए गुजरे. वो बताती हैं, “सोने के लिए मैं नींद की गोलियां लेने लगी मगर मुझे डर लगता था कि अगर मैं सो गई तो कहीं मेरे पति को कुछ न हो जाए. फिर मुझे ये भी चिंता होती थी कि अगर मैं सोई नहीं तो अगले दिन काम कैसे करूंगी.” निशित का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया और अगस्त 2003 में उनकी मौत हो गई. बेटे के बाद पति का साथ भी छूट गया मगर नीलम ने अकेले ही अपनी लड़ाई जारी रखी. मगर आज जब वो उन गानों को सुनती हैं जो कभी वो अपने हंसते-खेलते परिवार के साथ सुना करती थीं तो उनके आंसू रुक नहीं पाते. कटारा परिवार में सभी संगीत के दीवाने थे. अब नीलम मुश्किल से ही संगीत के किसी कार्यक्रम में जाती हैं.
नीलम की वकील और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता कामिनी जायसवाल उन क्षणों को याद करती हैं जब अपने बेटे की मौत के बाद नीलम पहली बार उनसे मिली थीं. वो कहती हैं, “पहले दिन ही उनकी शांतचित्तता ने मेरा ध्यान उनकी तरफ खींचा. बचाव पक्ष के वकील ने उन पर ऐसी व्यक्तिगत टिप्पणियां की थीं कि मेरा खून खौल गया था मगर नीलम ने अपनी गरिमा कभी नहीं छोड़ी और वो हमेशा संयत रहीं. ” 300 सुनवाइयों, लाखों रूपये के खर्च और छह साल के बाद 22 अप्रैल 2008 को हत्या के इस विवादास्पद मामले में अदालती कार्यवाही पूरी हो गई. अदालत ने अंतिम फैसला सुनाने के लिए 14 मई 2008 की तारीख तय की है. धनबल और बाहुबल के खिलाफ मध्यवर्ग की लड़ाई का प्रतीक बन चुकीं नीलम से जब हम पूछते हैं कि क्या इस दौरान कभी उन्हें कोई डर लगा तो वो बिना समय गंवाए जवाब देती हैं, “मैं एक इंसान की तरह रहूंगी. बिल में छिपे किसी चूहे की तरह नहीं.”
नीलम के पिता ए एन कौल 81 वर्ष के हैं. पूर्व आईएएस अधिकारी कौल बताते हैं कि नीलम बचपन से ही दृढ़ इच्छाशक्ति की मालिक थीं और हमेशा सच बोलती थीं फिर चाहे इसमें कितना ही नुकसान क्यों न हो. कौल ने पढाई-लिखाई में हमेशा आगे रहने वाली अपनी बेटी को सिखाया था कि उन्हें किसी भी परिस्थिति में कभी भी रोना नहीं है. मगर आज जब वो उन गानों को सुनती हैं जो कभी वो अपने हंसते-खेलते परिवार के साथ सुना करती थीं तो वो अपने पिता की सीख पर कायम नहीं रह पातीं. कटारा परिवार में सभी संगीत के दीवाने थे. अब नीलम मुश्किल से ही संगीत के किसी कार्यक्रम में जाती हैं. वो कहती हैं, “मुझे वापस घर आकर बेहद खाली-खाली सा लगता है.”
बातचीत के दौरान नीलम अपने बेटे के कथित हत्यारों के बारे में एक बार भी आक्रोश के साथ बात नहीं करतीं. न ही वो नीतिश और भारती की दोस्ती को लेकर कोई पछतावा ही जाहिर करती हैं. वो कहती हैं, “लोग कहते हैं कि मुझे उसे रोकना चाहिए था मगर मैंने अपने बच्चों पर कभी अपने फैसले नहीं लादे.” नीलम बताती हैं कि शायद ही ऐसा कोई दिन होता हो जब वो घर से बाहर निकलती हों और लोग उनके पास आकर ये न कहते हों कि हम भी आपके साथ हैं. कई ऐसे लोगों के फोन भी आते हैं जिन्हें वो जानती भी नहीं और जो उन्हें शुभकामनाएं देते हैं. फैसले के बाद क्या? इस सवाल पर नीलम कहती हैं, “मैं इस बारे में अभी कुछ नहीं सोचना चाहती.”
नीलम कटारा की लड़ाई कई मायनों में असाधारण है. बेटे और पति को खोने वाली इस महिला को जिंदगी ने इन झटकों पर शोक मनाने तक का समय नहीं दिया. बावजूद इसके उन्होंने दिखा दिया कि लड़ाई मर्यादित तरीके से किस तरह लड़ी जाती है.
शोभिता नैथाणी
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कुल टिप्पणियां: 2
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प्रेषक : Shivani ChaturvediNeelam jaisi himmat doosron ko jeena sikhati hai. Unki jagah agar koi aur hota to shayad depression me chala jata. she showed that how to fight and how to overcome from such tragic situations.
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प्रेषक : masoomNeelam Kataaraa ek majboot aur himmat wali khatoon hai.. aur unhone ye saabit kar diya ki suche ka hi bol bala hota hai.. Bharti Yadav pls. ab to tum apni zubaan khol do..






















