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   'भारत की ठसक चीन से ज्यादा होगी'
अर्थव्यवस्था के मामले में भले ही भारत, चीन की बराबरी न कर पाए मगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी ठसक आने वाले समय में चीन से ज्यादा होगी, ये कहना है जाने-माने आर्थिक जानकार, अमेरिकी थिंक टैंक के सदस्य और 13 सालों तक विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका द इकॉनॉमिस्ट के संपादक रहे बिल एमॉट का. अपनी हालिया किताब में बिल ने बताया है कि चीन, भारत और जापान की प्रतिस्पर्धा आने वाले दशक के स्वरूप को किस तरह प्रभावित करेगी. अजित साही से बातचीत में बिल ने इससे जुड़े कई पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की .
हर कोई कह रहा है कि भारत आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है. मगर आपका कहना है कि आने वाले कई दशकों तक चीन हर मोर्चे पर भारत से आगे रहने वाला है. क्या भारत हमेशा चीन से एक कदम पीछे ही रहेगा?
हां, भारत की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक चीन की तुलना में छोटी ही रहेगी. चीन इतना आगे बढ़ गया है कि कहा नहीं जा सकता कि ये परिदृश्य कब बदलेगा. मगर जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था उन्नति करेगी ये बस आकार में ही चीन से पीछे रहेगी. बाकी सभी महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे अंतरराष्ट्रीय शक्ति और प्रभाव, दूसरे देशों के साथ पारस्परिक निर्भरता, सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति आदि के मामले में भारत का वजन लगातार बढ़ता जाएगा. फिर भले ही चीन की अर्थव्यवस्था भारत से 20, 40 या 100 फीसदी ही बड़ी क्यों न हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत की ठसक चीन से कहीं ज्यादा होगी.
चीन का सकल घरेलू उत्पाद भारत से तीन गुना ज्यादा है. उसका विदेशी मुद्रा भंडार भी भारत से छह गुना अधिक है. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, निर्यात, अंतरराष्ट्रीय निवेश, स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में भी चीन हमसे कहीं आगे है. इसके बावजूद आप लिखते हैं कि दोनों ही एशिया का नेतृत्व कर सकते हैं.
एशिया में नेतृत्व इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि किसका सकल घरेलू उत्पाद सबसे ज्यादा है. नेतृत्व के लिए आपको आर्थिक ताकत की ज़रूरत तो होती ही है जिससे कि पारस्परिक निर्भरता पैदा हो मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूसरे देशों के साथ संवाद करने की क्षमता (सॉफ्ट पॉवर) भी सैन्य या आर्थिक शक्ति जितनी ही महत्वपूर्ण है. मेरा मानना है कि इस मायने में भारत, चीन को बराबरी की टक्कर देगा. इसकी आर्थिक ताकत बढ़ेगी. इसकी सैन्य शक्ति पहले से ही काफी मजबूत है. इसलिए मेरे हिसाब से ये सच नहीं है कि एशिया में चीन का ही दबदबा रहेगा.
क्या आप ये बात कुछ उदाहरणों के साथ समझा सकते हैं?
सॉफ्ट पॉवर का मतलब ये है कि आपमें अपनी विश्वसनीयता और वैधता के बल पर लोगों को अपने पक्ष में लाने की क्षमता है. देखा जाए तो भारत ने अब तक एशिया में इस शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया है मगर यूरोपीय यूनियन में सॉफ्ट पॉवर का काफी इस्तेमाल होता है. जो देश यूरोप के साथ बेहतर व्यापारिक रिश्ते चाहते हैं उन्हें यूरोपियन मानदंडों और सिद्धांतों का अनुसरण करना होता है. मेरा मानना है कि ऐसा ही एशिया में भी हो सकता है. यानी ऐसा हो सकता है कि आर्थिक ताकत के मामले में चीन से पीछे होने पर भी चीन के पड़ोसी देश नैतिकता और विदेश नीति के मामले में भारत की राह पर चलना चाहें.
आपकी किताब में इस पर भी चर्चा की गई है कि चीन का सुरक्षा बजट 18 फीसदी और भारत का आठ फीसदी सालाना के हिसाब से बढ़ रहा है. दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में निर्यात के बढ़ते योगदान को देखते हुए क्या आपको लगता है कि विदेशी बाजारों में हितों के टकराव और वैश्विक संसाधनों को लेकर चीन और भारत एक दूसरे के साथ उलझेंगे?
मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा. मेरे हिसाब से सीधे-सीधे टकराव दोनों में से किसी की भी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा नहीं होगा. हालांकि सीमाओं और पड़ोसी देशों से रिश्तों के मसले पर खतरे पैदा हो सकते हैं. सीमावर्ती इलाकों में सैन्य टकराव की काफी संभावनाएं हैं. संसाधनों के मामले में भी भारत और चीन के बीच काफी प्रतिस्पर्धा रहेगी. यानी अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दुनिया के दूसरे देशों में कांट्रेक्ट और विशेष पहुंच पाने के लिए दोनों देश एक दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में रहेंगे. मुझे नहीं लगता इससे कोई सैन्य टकराव पैदा होगा. अच्छी खबर ये है कि अगर आप कोई अफ्रीकी देश हैं तो आपका समर्थन पाने और संसाधनों के लिए दो बड़े देश होड़ में होंगे और आपको भी दोनों की प्रतिस्पर्धा का लाभ होगा.
आपकी किताब कहती है कि कुछ लोग 1962 के भारत-चीन युद्ध के मूल में जो विवाद था उसे ‘उपनिवेशवाद के अवशेष’ के तौर पर देखते हैं. मगर क्या चीन के मामले में भारत अतीत को पूरी तरह से भुला सकता है, खासतौर पर जब चीन का पाकिस्तान को समर्थन जगजाहिर है?
न तो भारत और न ही चीन इसे पूरी तरह से पीछे छोड़ सकते हैं. ये भविष्य में भी दोनों देशों के बीच कड़वाहट की वजह रहेगा. हालांकि मुझे नहीं लगता कि इससे निकट भविष्य में कोई टकराव पैदा होगा मगर मेरा मानना है कि ये बहुत संवेदनशील मसला है. इस मसले पर रणनीतिक, ऐतिहासिक और वैचारिक मतभेद हैं और उन्हें बहुत आसानी से नहीं सुलझाया जा सकता. ये केवल तकनीकी मामला नहीं है.
बुनियादी ढांचे के मामले में चीन भारत से कोसों आगे है. हवाई अड्डे, रेलवे स्टेशन, बंदरगाह, सड़कें—हर मायने में देखा जाए तो इसकी सरकारी एजेंसियों ने विश्व स्तर का बुनियादी ढांचा विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है. इस क्षेत्र में भारतीय सरकार की विफलता को देखते हुए क्या आपको लगता है कि इसका हल अकेले निजी क्षेत्र के पास है?
चीन और भारत के बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता के फर्क को देखकर ही कहा जा सकता है कि आर्थिक विकास के मामले में भारत चीन से 10-15 साल पीछे है. भारत में बुनियादी ढ़ांचे के विकास की अगुवाई निजी क्षेत्र करेगा. इसकी शुरुआत तो हो ही चुकी है. मगर चूंकि सरकार भी बुनियादी ढांचे के निर्माण में कई स्तरों पर शामिल होती है, मसलन कानून बनाना, जमीन की खरीद, तो उसके सहयोग के बिना निजी क्षेत्र ऐसा नहीं कर सकता. सरकार को इसमें शामिल होना ही पड़ेगा.
क्या आपको लगता है कि ऐसा दिन आएगा जब भारतीय और चीनी सरकारी व निजी उपक्रम एक दूसरे की कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदेंगे?
मेरा अनुमान है कि भारत और चीन दोनों ही एक दूसरे की कंपनियों में हिस्सेदारी की खरीद का मजबूती से विरोध करेंगे. उदाहरण के लिए एक चीनी टेलकॉम कंपनी को किसी भारतीय टेलीकॉम कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी खरीदने की इजाजत कभी नहीं दी जाएगी. ठीक वैसे ही जैसे चीनी कंपनियों को भारतीय बंदरगाहों के विकास में शामिल होने की अनुमति नहीं होती. दोनों देश इस मामले में काफी संवेदनशील रहे हैं और मुझे नहीं लगता कि ये स्थिति कभी खत्म होगी.
पारंपरिक रूप से भारत को एक ऐसे देश के तौर पर देखा जाता रहा है जिसके पास नैतिकता के ऊंचे मानंदड हैं. मगर हाल में तिब्बती प्रदर्शनकारियों और पीछे म्यांमार के मसले पर इसकी प्रतिक्रिया को देखकर ऐसा नहीं लगता कि अर्थव्यवस्था की वेदी पर नैतिकता को कुर्बान किया जा रहा है? क्या नैतिक रूप से मजबूत देश के मुकाबले एक परमाणु और आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत अपने नागरिकों का बेहतर ख्याल रख पाएगा?
भारत की विदेश नीति का नैतिक पक्ष शायद काफी पहले मर चुका है. वास्तव में ईमानदारी से कहा जाए तो मुझे याद भी नहीं कि आखिरी बार कब भारत की विदेश नीति नैतिकता से प्रेरित रही थी. भारत काफी समय से राष्ट्रीय हित पर आधारित विदेश नीति का अनुसरण कर रहा है. तिब्बत और म्यांमार पर उसके रुख से जाहिर होता है कि आर्थिक उन्नति और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के रास्ते में वो सिद्धांतों को बाधा नहीं बनने देना चाहता. इससे पता चलता है कि चीन के मामले में भारत खुद को बचाव की मुद्रा में महसूस करता है. वो चीन के सामने झुका हुआ है. भारत उन मुद्दों पर अपने पड़ोसी को बिल्कुल नाराज नहीं करना चाहता जिन पर वास्तव में उसका कोई नियंत्रण नहीं है. तिब्बत और म्यांमार के मसले पर भारत कहीं ज्यादा मजबूत तरीके से नैतिक बचाव की मुद्रा अख्तियार कर सकता था. मगर उसे लगता है कि इससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला. इसलिए मेरे हिसाब से सरकार का सिद्धांत ये है कि ऐसा किया ही क्यों जाए? न तो इसका कोई बड़ा फायदा है और न ही ऐसा करने के लिए कोई बड़ा राजनीतिक दबाव बन रहा है. और फिर इसके नकारात्मक परिणामों के खतरे भी हैं. जब तक भारत को ये नहीं लगता कि वो खुद में मजबूत और आत्मविश्वास से भरा हुआ है और जब तक उसे ये महसूस नहीं होता कि सख्त रुख दिखाने से उसे कुछ क्षेत्रीय फायदे हो सकते हैं तब तक वो झुका हुआ ही रहेगा.
चीन की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था और राजनीतिक ताकत को संतुलित करने के लिए अमेरिका और जापान भारत के साथ और भी करीबी रिश्ते विकसित करना चाहते हैं. इससे एक ऐसा गठबंधन बन सकता है जिससे चीन की अहमियत और हितों को खतरा हो सकता है. आपके हिसाब से चीन भारत को ऐसा करने से रोकने के लिए क्या कदम उठा सकता है?
मुझे नहीं लगता चीन सीधे कोई कदम उठा सकता है. चीन ये कर सकता है कि वो अपने गठबंधन बनाए. जैसा ये बांग्लादेश और कुछ दूसरे पड़ोसियों के परमाणु कार्यक्रम में मदद के लिए सहमति जताकर कर रहा है. चीन भी कई देशों से मजबूत संबंध विकसित करके भारत के गठबंधनों को बेअसर कर सकता है.
आपकी किताब में लिखा है कि किस तरह पाकिस्तान की मदद कर चीन ने भारत को उलझाए रखा है. नवाज शरीफ ने पिछले हफ्ते तहलका से कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई दुश्मनी नहीं होनी चाहिए और दोनों देशों को आपस में वीजा की जरूरत को खत्म करना चाहिए. साफ है कि भारत की आर्थिक सफलता पाकिस्तान के लोगों को अपनी तरफ खींच रही है. मगर दूसरी तरफ इस्लामी कट्टरपंथ पाकिस्तान में चरम पर है. ये दोनों स्थितियां आपके हिसाब से पाकिस्तान को कहां ले जाएंगी और इसका भारत पर क्या असर होगा?
पाकिस्तान एक रास्ते पर जा रहा है जिसमें कहीं न कहीं पर उदारवादियों और कट्टरपंथियों का टकराव होना तय है. सरकार का वहां देश के एक बड़े इलाके पर नियंत्रण ही नहीं है और ये स्थिति हमेशा नहीं रखी जा सकती. इसका नतीजा ये होगा कि पाकिस्तान एक संकट के बाद दूसरे संकट से घिरता चला जाएगा. नवाज शरीफ सही हैं. भारत की प्रतिक्रिया व्यापार के रास्ते खोलने, वीसा की पाबंदियां हटाने के रूप में सामने आनी चाहिए ताकि दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधर सकें. वीजा पाबंदियों का आतंकवाद पर कोई असर नहीं हुआ है. एक तरह से देखा जाए तो ये अतीत से चली आ रही एक बेकार की नीति है. मैं जानता हूं कि इसे बदलना बहुत मुश्किल है. भारत के लिए बेहतर ये रहेगा कि वो सीमा के दोनों तरफ विकास की प्रक्रिया को आसान बनाए और उन चीजों को प्रभावित करने की कोशिश करना छोड़ दे जिन पर इसका बस नहीं चलता यानी इस्लामिक कट्टरपंथ और आतंकवाद.
पाकिस्तान कई मायनों में भारत से काफी पीछे है. फिर भी उसे सैन्य दृष्टि से भारत के बराबर कहा जाता है. मगर चीन को इस मामले में भारत से काफी आगे कहा जाता है. क्या आपको लगता है कि युद्ध की स्थिति में भारत, चीन को टक्कर दे सकता है?
मुझे नहीं लगता कि लड़ाई के परिदृश्य में भारत को चीन की बराबरी करने की जरूरत है. असल सवाल ये है कि अगर लड़ाई हुई तो क्या भारत चीन को काफी नुकसान पहुंचा सकता है? जवाब है हां. इसलिए कि दोनों ही देश परमाणु शक्ति हैं. ये एक बड़ा निवारक है. फिर भारत की सैन्य क्षमता भी ऐसी है कि सीधे टकराव से पहले चीन को गंभीरता से सोचना पड़ेगा. खासकर भारतीय नौसेना तो चीन को मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है.
तो अब बात 1962 जैसी नहीं रही?
निश्चित रूप से नहीं.
आपने लिखा है कि चीन और भारत का आर्थिक विकास अपने साथ एक भारी दुष्प्रभाव लेकर आएगा. दोनों देशों के बड़े उत्पादक और उपभोक्ता बनने की वजह से ग्लोबल तापमान में बढ़ोतरी होगी.
पर्यावरण के नजरिये से देखा जाए तो भारत और चीन में हालात बेहद खराब हैं. इसकी वजह ये है कि यहां पर्यावरण संबंधी कानून सख्ती से लागू नहीं किए जा रहे. दुनिया में कई ऐसे देश हैं जिन्होंने आर्थिक विकास के साथ ही पर्यावरण संबंधी मोर्चे पर भी तरक्की की है. चीन और भारत के लिए भी ऐसा करना पूरी तरह से संभव है. वास्तव में कहूं तो चीन ऐसा करने के काफी नजदीक है. पर्यावरण के लिए वहां पर काफी बढ़िया कानून हैं मगर उन्हें प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जा रहा. लेकिन बढ़ते शहरी मध्य वर्ग में पर्यावरण के प्रति बढ़ रही जागरूकता से कम्युनिस्ट पार्टी की चिंता बढ़ती जा रही है. पिछले कुछ सालों से इसके नेता अपने भाषणों में स्थानीय सरकारों से पर्यावरण के अनुकूल नीतियां बनाने की बात जोर देकर कहने लगे हैं. इसका परिणाम ये होगा कि चीन अगले कुछ वर्षों में तरक्की के उस रास्ते पर आगे बढ़ने लगेगा जो पर्यावरण के लिए कहीं ज्यादा अनुकूल होगा. ठीक वैसे ही जैसे सत्तर के दशक में जापान दुनिया की सबसे गंदगी भरी अर्थव्यवस्था से विश्व का सबसे साफ और सबसे ज्यादा ऊर्जा बचाने वाला देश बनने की राह पर अग्रसर हो गया था.
आपकी किताब में दो अलग-अलग दौर के दो कथन हैं- एक तो ये कि एक समय जापान का पर्यावरण किस हद तक खराब था, और दूसरा वर्तमान चीन पर है.
बिल्कुल, जापान इस वक्त साफ-सुथरी ऊर्जा और विशेषकर स्वच्छ हवा के मामले में दुनिया का अगुवा है. इस मामले में जापान से काफी कुछ सीखा जा सकता है, विशेषकर चीन के मामले में. भारत तो अभी काफी गरीब देश है, इस अवस्था में स्वच्छ स्वरूप वाले विकास को अपनाना इसके लिए बहुत दुष्कर है. पर्यावरण परिवर्तन पर जारी बहस में भारत को शामिल करना और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की अधिकतम सीमा निर्धारित करने के लिए उसे तैयार करना चीन के मुकाबले बहुत मुश्किल होगा. पश्चिमी जगत का विचार है कि ग्लोबल वार्मिंग के मसले पर चीन बड़ा खतरा बनने वाला है. मेरा मानना है कि चीन की बजाय भारत ज्यादा परेशानी खड़ी कर सकता है. कुछ हद तक इसकी वजह यहां का लोकतंत्र है जहां जबर्दस्ती चीज़ों को लागू करना मुश्किल है, लेकिन इसकी मुख्य वजह है भारत एक अल्पविकसित देश है लिहाजा ये कठोर पर्यावरणीय प्रतिबंधों और करों का बोझ नहीं उठा सकता.
आपके मुताबिक भारत को करों में बढ़ोत्तरी कर विकास के लिए वित्तीय संसाधनों को जुटाना चाहिए. आप चीन की बात करते हैं जहां पिछले दस सालों के दौरान जीडीपी में कर राजस्व का हिस्सा बढ़कर दोगुना हो गया है. बहुतों का मानना है कि चीन ऐसा कर सकता है क्योंकि वहां निरंकुश शासन है. लेकिन एक लोकतंत्र होने के नाते यहां लोकप्रिय फैसले लेने की मजबूरी है.
दुनिया के तमाम लोकतंत्र करों की दरों को बढ़ाने में सफल होते प्रतीत होते हैं. इसलिए मेरी समझ में नहीं आता कि इसमें ऐसा क्या है कि जो इसे भारत में असंभव बना देता है. भारतीय नेताओं के लिए ये एक आसान बहाना होता है. दुनिया के सभी लोकतंत्रों के उदाहरण इसे झुठलाते हैं जहां जनप्रतिनिधि करों को स्वीकार्य बनाने में मदद करते हैं.
भारत की कहानी को किस चीज़ से सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है?
मुद्रास्फीति भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि अगर ये लंबे समय तक कायम रही तो निजी निवेशक हतोत्साहित हो जाएंगे. भारत में विकास की तेज़ रफ्तार के पीछे हाल ही में निवेश में आयी तेज़ी का हाथ है. दूसरा मुख्य ख़तरा है सामाजिक अस्थिरता का, जैसा कुछ दिन पहले नंदीग्राम में दिखा.
और चीन के मामले में क्या ख़तरे हो सकते हैं?
मुद्रास्फीति चीन के लिए भी बड़ा खतरा है. बल्कि उनके मामले में तो मुद्रास्फीति राजनीतिक विरोध और अस्थिरता पैदा कर सकती है. 80 के दशक के अंत में थ्येनआनमन चौक पर हुए विद्रोह की वजह मुद्रास्फीति का बढ़ना भी था.
भारत की सांस्कृतिक विविधता को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर तो पेश नहीं किया जा रहा? क्या ये इसकी सफलता में रुकावट बन सकती है?
ऐसा तब तक नहीं होना चाहिए जब तक कि भारत का लोकतंत्र (स्थानीय और राष्ट्रीय) असफल न हो जाय और समाज के सभी तबकों की आवाज़ उठाने के लायक ही न रहे. बहुधर्मिता और विविधता न तो इसकी ताकत है ना ही कमज़ोरी. ये भारत की पहचान का एक हिस्सा मात्र है. असल सवाल ये है कि इस बहुधर्मिता और विविधता को अपने हित में कैसे इस्तेमाल किया जाय.
लाखों भारतीयों का अमेरिका के प्रति गहरा आकर्षण है. क्या भारत को चीन के साथ जनता के स्तर पर संबंधों को मजबूत करने की पहल करनी चाहिए?
मेरे ख्याल से अमेरिका सालों साल तक, शायद हमेशा विश्व का सबसे विकसित देश बना रहेगा, बढ़िया विश्वविद्यालयों, तकनीक और रहन-सहन के स्तर पर. साथ ही ये दुनिया भर के अप्रवासियों और विदेशियों के लिए भी सबसे पसंदीदा देश बना रहेगा. लिहाजा मुझे उम्मीद है कि भारतीय आगे भी अमेरिका से उतनी ही मजबूती से जुड़े रहेंगे. चीन के विकास और प्रभाव को देखते हुए कुछ भारतीयों को यहां काम करने, पढ़ने-लिखने, ज्ञान बढ़ाने और संपर्क बनाने का ख्याल आ सकता है. लेकिन ये अमेरिका का विकल्प नहीं है.
क्या आपको लगता है कि भारत और चीन कभी नजदीकी रिश्ते बना पाएंगे?
ये बहुत मुश्किल है. हालांकि दोनो पक्ष मतभेदों को खत्म करने और नज़दीक आने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों पक्षों के मन में गहरी आशंकाएं है. चीन और भारत हमेशा एक दूसरे के लिए महत्वपूर्ण देश बने रहेंगे. लेकिन दोनों कभी नज़दीकी दोस्त नहीं बन सकते.
1978 से चीन के उदारीकरण का मकसद सार्वजनिक क्षेत्र की बजाय निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना था. पूंजीपतियों को कम्युनिस्ट पार्टी से हाथ मिलाने के लिए आमंत्रित किया गया. क्या ये राजनीतिक ढांचे का लोकशाहीकरण है?
चीन में आर्थिक ढांचा उदार बन गया है. लोगों को पहले की अपेक्षा रहने, मनचाही जगह पर काम करने और यहां तक की इच्छा के अनुसार पूजा-पाठ की भी आज़ादी है. लेकिन राजनीतिक सुधार अभी तक नहीं हुआ है. यहां बोलने की आज़ादी नहीं है, किसी तरह के राजनीतिक अधिकार नहीं हैं. निकट भविष्य में ऐसा होने के संकेत भी नहीं है. जो थोड़ी बहुत बहुलता दिखाई देती भी है वो कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर ही है. लेकिन एक बाहरी के तौर पर हम उनकी अंतरिम बहसों के बारे में कुछ भी नहीं जान सकते. पोलित ब्यूरो और दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर अहम बदलाव हुआ है. अब ये और भी प्रतिभा आधारित हो गया है. बहुत सारे पद कार्यकाल की सीमा में आते हैं, जिससे अधिकारियों की अदला-बदली होती रहती है. यहां तक कि सर्वोच्च पदों पर भी ऐसा ही होता है.
यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद कइयों का मानना है कि सही मायनों में आर्थिक लोकतंत्र अभी नहीं आया है. क्या भारत शिक्षा और स्वास्थ्य के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए निरंकुशतावादी ढांचे की तरफ बढ़ रहा है?
मुझे नहीं लगता कि भारत इस तरह की व्यवस्था की तरफ जा रहा है. सार्वजनिक चिकित्सा और शिक्षा की जो दुर्दशा है वो भारत की आज़ादी के बाद के दौर और उसके लोकतंत्र का दर्द है. ये कोई नई बात नहीं है. आर्थिक विकास के साथ बड़ी मात्रा में कर राजस्व भी आना चाहिए. और इस राजस्व को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत प्रभावी और समतामूलक शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश करना चाहिए.
चीन के विपरीत भारत बहुधर्मी देश है. क्या इससे अराजकता पैदा होती है और विकास के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित नहीं हो पाता?
मुझे इस तर्क में कोई दम नज़र नहीं आता कि कई धर्मों वाला कोई देश तरक्की नहीं कर सकता. तमाम देशों ने इसी राह पर चलकर सफलता हासिल की है. भारत का लोकतंत्र बंटा हुआ और अराजक है. लेकिन जैसा कि हाल के वर्षों में हमने देखा है ये अर्थव्यवस्था के तेज़ विकास में ये कोई रुकावट नहीं डालता.
चीन में "थ्री रिप्रजेंट्स" के विचार के मुताबिक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी उच्च तकनीक एवं प्रॉद्योगिकी और जन संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है. क्या भारत की राजनीतिक पार्टियां सत्ता हथियाने की भावना के अलावा किसी और चीज़ का प्रतिनिधित्व करती हैं?
सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रति संदेह की भावना होना स्वाभाविक है, कम्युनिस्ट हो या कोई और. "थ्री रिप्रजेंट" प्रचार और नियंत्रण का एक शगूफा भर है. मुझे नहीं लगता कि ये कम्युनिस्ट पार्टी को दूसरी पार्टियों से श्रेष्ठ बना देता है. महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि हमारे लोकतंत्र में नेताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने की लड़ाई हमें लड़नी ही होगी. अगर हम ऐसा करने में सफल रहते हैं तो हम कह सकेंगे कि हमारी व्यवस्था वास्तव में चीन से बेहतर है.
फोटो : शैलेंद्र पांडेय
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प्रेषक : pravinye sawal jada bada hai ki china me swatantrata aam adami ke liye kitana hai ohan arhthik unnati ke nam par na jane kitni pusten gulam mansikata me ji rahi hai aur jo sanskiritk unnati ohan pichale 50 varson me ho sakti thi woh ruk gai hai
























