"क्यों न उन्हें आज़माया जाए?"
राजनीति के चतुर खिलाड़ी अर्जुन सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं. पहले आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और फिर राहुल गांधी वाले बयान पर पार्टी का उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से चापलूस ठहराना. अर्जुन सिंह से विस्तृत बातचीत की हरिंदर बवेजा और अजित साही ने. कमाल ये कि बातचीत में वे अपने पिछले बयान से भी आगे निकल गए. ये पूछने पर कि अगर अगले चुनाव में पार्टी के पास प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह और राहुल गांधी में से किसी एक के नेतृत्व में उतरने का विकल्प हो तो उनकी पसंद क्या होगी?, उनका जवाब था कि क्यों न राहुल गांधी को आज़माया जाए .
बड़ी संख्या में लोग, जिनमें आईआईटी के प्रोफेसर भी शामिल हैं, आरक्षण का विरोध कर रहे हैं. आपके मुताबिक इसका क्या कारण हो सकता है?
इसकी वजह स्वाभाविक पूर्वाग्रह है. इसका विरोध करने की कोई वजह नहीं है क्योंकि किसी का भी हक नहीं मारा गया है. ऐसा नहीं है कि हम ये 27 फीसदी दूसरों के में से ले रहे हैं. उसमें तो कोई कमी नहीं होगी जबकि ओबीसी के लिए भी प्रावधान किया जाएगा. इसी वजह से सीटों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी. यही वजह है कि हमने इसे लागू करने के लिए तीन साल की समयसीमा रखी है.
छात्रों को डर है कि आरक्षण की वजह से अच्छे अंक लाने के बावजूद उन्हें प्रवेश नहीं मिलेगा.
जब प्रवेश लेने वालों की संख्या घटाई ही नहीं जा रही तो फिर समस्या क्या है? समस्या सिर्फ पूर्वाग्रह से पैदा हो रही है जिसे मैं नहीं मानता.
ये भी तर्क दिया जा रहा है कि आरक्षण का मतलब है योग्यता से समझौता.
ये फिर से वही बात है. सभी प्रतिभाशाली छात्र प्रवेश तो प्रवेश पाएंगे ही. क्या दूसरों के लिए भी कुछ छोड़ा जाएगा या नहीं? आखिर वे भी उसी भगवान की संतान हैं.
कई दूसरे तर्क भी हैं...
सभी तर्क एक जैसे ही हैं. बुनियादी बात ये है कि भारत में एक समतामूलक रवैया अपनाने की ज़रूरत है और संसाधनों तक सभी की न्यायसंगत पहुंच को सुनिश्चित करके ऐसा किया जा सकता है.
मान लीजिए हम आपसे कहें कि ऐसे भी लोग हैं जो जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करते और जाति प्रथा भारत को कमजोर करती है.
ऐसा केवल शिक्षा के मामले में कहा जा सकता है. बाकी सभी क्षेत्रों में जातिवाद का बोलबाला है. ये सभी तर्क किसी तरह अपने पूर्वाग्रह को एक गरिमापूर्ण चोला ओढ़ाने के लिए हैं.
आप क्रीमीलेयर को भी आरक्षण के दायरे में लाने की काफी कोशिश कर रहे थे मगर ऐसा हो नहीं पाया.
यूपीए समन्वय समिति इस बात पर एकराय थी कि मानव संसाधन मंत्रालय को क्रीमीलेयर को भी शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए. अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे नकार दिया है. इसपर हमारा सुप्रीम कोर्ट की खिलाफत करने का सवाल ही पैदा नहीं होता.
हमने ओबीसी वर्ग के कुछ लोगों से बात की. क्रीमीलेयर वाले तर्क के समर्थन में उनका कहना था कि अगर ढाई लाख रूपये सालाना की आमदनी वाले ओबीसी वर्ग के लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाएगा तो आईआईटी और आईआईएम की फीस कौन चुकाएगा? आपकी इस पर क्या प्रतिक्रिया है?
मैं इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दूंगा. इस पर सभी के बीच चर्चा होनी चाहिए. ये समझना जरूरी है कि हम फैसले को बदल नहीं सकते...
क्या एक बार फिर से कोर्ट जाने की संभावना है?
मैं नहीं जानता. फिलहाल तो हम ऐसा करने के इच्छुक नहीं हैं.
फैसला जिस दिन आया था आपने इसे ऐतिहासिक बताया था. पर कांग्रेस में सभी इससे सहमत नहीं हैं. क्या ऐसा उनके और आपके बीच के विरोध की वजह से है. क्या ये राजनीतिक विरोध है या …?
ये आपको उनसे पूछना चाहिए. आप गलत व्यक्ति से पूछ रहे हैं.
प्रधानमंत्री कार्यालय में भी एक वर्ग का कहना है कि क्रीमीलेयर छूट गए.
इस पर किसी को भी जवाब देने की जिम्मेदारी मेरी नहीं है. जो है वो तो है ही.
सर्वेक्षण बताते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति के कोटे का पूरा उपयोग कभी नहीं हो पाता. इसके प्रभावी इस्तेमाल के लिए क्या किया जा सकता है?
कोटा भगवान ने नहीं बनाया है. ये कोशिशें हम लोग ही कर रहे हैं सबसे पहले तो हमें ही ईमानदार होना पड़ेगा. हमें ऐसा नहीं करना होगा कि हम ये कहें तो कि सभी को कोटा मिले मगर हम उन्हें ऐसा करनें ही नहीं दें.
अच्छी गुणवत्ता वाली प्राथमिक शिक्षा के बारे में आप क्या सोचते हैं?
मैं इस मुद्दे को या तो ये या फिर वो की तरह से नहीं देखता. प्राथमिक शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है क्यों कि ये बुनियाद होती है. अगर आपके पास ये नहीं हो तो आप उच्च शिक्षा में क्या कर पाएंगे? पहले तो सबको साथ लेकर चलने की बात थी जिसकी तरफ हम धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं (मगर) ऐसा हो नहीं पाया है.
पिछले चुनावों में भाजपा ने भारत उदय का नारा दिया था जिसे जनता ने नकार दिया. क्या आपको लगता है कि भारत समृद्ध और तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है जैसा कि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा मानता है?
15 साल पीछे देखें तो आज भारत निश्चित तौर पर आर्थिक दृष्टि से बेहतर है और हमने काफी तरक्की की है. मगर मुझे नहीं लगता कि ये कहना सही है कि सब कुछ किया जा चुका है और अब कुछ करने की जरूरत नहीं है.
अर्जुन सेनगुप्त रिपोर्ट ने कड़वी हकीकत के जो आंकड़े पेश किए हैं उनके मुताबिक हमारे देश की 77 फीसद जनता बस 600 रुपये महीने पर गुजारा कर रही है. समाज के सबसे गरीब तबके के कल्याण के लिए क्या किए जाने की जरूरत है?
मेरा मानना है कि समाज के सबसे गरीब तबके को उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता. गांधीजी कहते थे कि जब तक आप कतार के आखिर में खड़े आदमी का ध्यान नहीं रखते तब तक आपका काम पूरा नहीं होता. ये मुश्किल काम है इसलिए इसे जारी रहना होगा.
बौद्दिक वर्ग और मीडिया में एक आम धारणा है कि बीते वक्त में हमने जो कुछ भी झेला है उससे बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता मुक्त बाजार पूंजीवाद ही है.
उन्हें अपनी सोच रखने की आजादी है मगर मेरा मानना है कि ये रास्ता भारत के लिए नहीं है.
आप एक मंझे हुए और तजुर्बेकार राजनीति विश्लेषक रहे हैं. अब जब कि चुनाव एक साल दूर हैं आपके हिसाब से 27 फीसदी आरक्षण के मुद्दे का राजनैतिक असर क्या होगा?
ये इस पर निर्भर करता है कि राजनीतिक पार्टियां इसे किस तरह से लेती हैं. लेकिन 27 फीसदी आरक्षण इसलिए संभव हो सका क्योंकि सभी राजनैतिक पार्टियों में इसे लेकर आम सहमति थी. संविधान में संशोधन और कानून बनाते वक्त इसपर जो एकराय बनी वो कभी-कभी ही देखने को मिलती है.
राजनैतिक फायदे के हिसाब से बात करें तो कांग्रेस के लिए इसमें क्या है?
कांग्रेस अगर चाहे तो इसका फायदा उठा सकती है. अगर ये ऐसा नहीं चाहती तो कोई किसी को मजबूर नहीं कर रहा. मगर सच यही है कि ये कांग्रेस और संप्रग सरकार की पहल है. कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता और ये सब प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के लगातार समर्थन और मार्गदर्शन से ही संभव हो सका.
राहुल गांधी पर आपके बयान को इस तरह बनाया जा रहा है कि जैसे ये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ हो. आपने ये सोचकर तो ऐसी बात नहीं कही होगी?
बिल्कुल भी नहीं. और यही नहीं बल्कि मैंने तो ऐसा कोई बयान ही नहीं दिया कि मनमोहनजी की जगह राहुलजी को आना चाहिए. जो सवाल मुझसे पूछा गया वो ये था कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी को पेश कर रही है. मेरा जवाब था कि क्यों नहीं. मैंने बस यही कहा था.
मगर क्या आपको लगता है कि ये एक बढ़िया विचार(आइडिया) है?
हर किसी को अलग सोच रखने का अधिकार है. मैं कहूंगा कि ये एक अच्छा विचार है.
राहुल गांधी में आपको क्या खास बात नजर आती है?
मैं व्यक्तिगत नजरिये से इस पर कुछ कहना नहीं चाहता मगर मैं देख सकता हूं कि वो देश से जुड़े मुद्दों को समझने के लिए काफी मेहनत कर रहे हैं. मुझे उनमें उनके पिता जैसी बात नजर आती है. मैं इतना ही कहना चाहूंगा.
एक प्रधानमंत्री, मंत्री या किसी दूसरी जिम्मेदारी को निभाते हुए ऐसी कौन सी विशेष बातें हैं जो आप सोचते हैं कि राहुल प्रशासन में ला सकते हैं?
उनमें चीजों को स्वीकार करने और सीखने का दृढसंकल्प और खुलापन है. मुझे लगता है कि इन गुणों के साथ बहुत कुछ किया जा सकता है. अगर किसी की सोच संकीर्ण है तो करने के लिए कुछ नहीं रह जाता.
कैबिनेट में कुछ युवा चेहरों का आगमन हुआ है. क्या आपको लगता है कि कांग्रेस को और अधिक युवा ऊर्जा की जरूरत है?
क्यों नहीं?
क्या आप नए चेहरों के लिए जगह छोड़ना चाहेंगे? या आपको लगता है कि आपके पास अभी भी करने के लिए काफी कुछ है?
अगर सिर्फ यही रास्ता बचा है तो मैं ऐसा करुंगा.
मनमोहन सिंह सरकार का कार्यकाल खत्म होने वाला है. अगर संप्रग सरकार का विश्लेषण किया जाए तो आपके मुताबिक इसकी उपलब्धियां क्या रही हैं और क्या ऐसा है जो अब भी किए जाने की जरूरत है?
मैं सोचता हूं कि डॉ. मनमोहन सिंह जी ऐसे कई काम करने में कामयाब हुए हैं जो इस देश के भविष्य को प्रभावित करेंगे. आर्थिक विकास के अलावा उन्होंने उच्च शिक्षा में जिस तरह के विस्तार को दिशा दी है उससे देश का कद और छवि बढ़ी है. मेरा मानना है कि देश उनका ऋणी है. इससे पहले कभी भी इस तरह की उन्नति देखने को नहीं मिली. मुद्रास्फीति और महंगाई जैसी कुछ समस्याएं भी हैं मगर मुझे यकीन है कि आने वाले महीनों में इनसे भी प्रभावी तरीके से निपटा जा सकेगा.
नक्सलवाद की समस्या से किस स्तर पर निपटे जाने की जरूरत है? राजीव गांधी ने कुछ ऐसा किया था जो इतिहास में कुछ ही नेताओं ने किया है. उन्होंने विद्रोहियों के साथ समझौते की पेशकश की थी. क्या आपको लगता है कि इस तरह के किसी विकल्प की तरफ देखा जा सकता है?
एक अकेली चीज से कुछ नहीं होने वाला. आपको दोनों उपायों से काम लेना होगा. अगर आप केवल ताकत का इस्तेमाल करेंगे तो विचार नहीं मरने वाला, भले ही वो गलत विचार क्यों न हो. उस विचार को उसकी जगह दी जानी चाहिए ताकि उस पर चलने वाले व्यक्ति को ये देखने का समय मिले कि जो वह कह रहा है उससे कुछ होने वाला है या नहीं. मगर यदि बंदूक की गोली ही एक अकेला जवाब है तो मुझे नहीं लगता कि इससे मदद मिलेगी.
आरक्षण पर वापस आते हैं. क्या आपको लगता है कि एक ऐसा दिन आएगा जब इसकी कोई जरूरत नहीं होगी?
मकसद यही है. मगर ये कब तक हो सकता है इसकी भविष्यवाणी मैं नहीं कर सकता.
एक मोटा-मोटा अनुमान?
ये बहुत अनौपचारिक सा बयान होगा. मैं कैसे कह सकता हूं कि 10 साल, 15 साल या 20 साल में ऐसा हो जाएगा?
अच्छा, कम से कम कितना?
कोशिश ये होनी चाहिए कि इसे जितना जल्दी हो सके खत्म किया जा सके. और अगर पर्याप्त कोशिशें की गईं तो बहुत जल्द ये सवाल ही नहीं रहेगा. दरअसल इस पर अब तक आधे-अधूरे मन से ही काम हुआ है और जब आप ऐसा करते हैं तो आप न इधर के रहते हैं न उधर के.
पार्टी की इस टिप्पणी पर कि गांधी परिवार चापलूसी को प्रोत्साहन नहीं देता, आपका क्या कहना है?
ये चापलूसों के लिए था.
और ये चापलूस कौन हैं?
ये फैसला करना आपका काम है.
क्योंकि आपने भी राहुल गांधी पर बयान दिया था पर है कि आप इसे खुद के ऊपर नहीं ले रहे हैं.
मैं कभी भी चापलूस नहीं रहा तो मैं इसे खुद पर कैसे ले सकता हूं.
अगर अगले चुनाव में पार्टी के पास प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह और राहुल गांधी में से किसी एक के नेतृत्व में उतरने का विकल्प हो तो आपकी पसंद क्या होगी?
मैं फिर से आपसे वही सवाल पूछूंगा. क्यों न उन्हें (राहुल गांधी को) आज़माया जाए? मनमोहन सिंह सहित हर कोई युवा पीढ़ी की बात कर रहा है. यहां तक कि उन्होंने ही सबसे पहले ये कहा था कि राहुल गांधी भविष्य के नेता हैं. क्या मैं गलत हूं?
तो क्या आप ये कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री को भी उनका समर्थन करना चाहिए?
नहीं, मैं ये नहीं कह रहा और न ही मैं ये कह रहा हूं कि ये एक प्रस्ताव है.
क्या आपको लगता है कि राहुल गांधी चुनाव में ज्यादा लोगों को पार्टी की तरफ खींच सकते हैं? उत्तर प्रदेश में अनुभव कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है.
(उत्तर प्रदेश में) संगठन उनकी कोशिशों का फायदा नहीं उठा सका.
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कुल टिप्पणियां: 1
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प्रेषक : vinod insanthis is an fantastic interview.arjun singh ki kathni aur karni ek nahi hai.UPA kewal aur kewal voton ki khatir desh main arakshan ki aag jala rahi hai.aur ek din in poltics walon kp khud bhi ishme jalana hoga kyonki aaj aur kal hameshaek jaisa nahi hota. an exemple on this kal ko inke parivar walon main se achanak koi bimar hota hai aur samne ik arakshit doctor without knowledge treatment karta hai then they think they do wrong.






















