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   “मुझे मुंबई से नफरत है”
बॉलीवुड में सबसे ज़्यादा मेहनताना लेने वाले हिट फिल्म निर्देशक हैं प्रियदर्शन। मलयालम, तमिल और तेलगू फिल्म जगत में सफलता का परचम लहराने वाले प्रियदर्शन को बॉलीवुड आने में थोड़ा समय तो लगा मगर गर्दिश और विरासत जैसी हिट फिल्में देकर जल्द ही वो मुंबई फिल्म उद्योग के भी चहेते निर्देशक बन गए. हेराफेरी, हंगामा, गरम मसाला और भूलभुलैया बनाने वाले प्रियदर्शन से मिंटी तेजपाल की ख़ास बातचीत।
थोड़ा सा अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताइए।
मेरे पिताजी विश्वविद्यालय के लाइब्रेरियन थे, हमारे घर में एक बड़ा सा पुस्तकालय था। हमारा शहर त्रिवेंद्रम काफी रूढ़िवादी शहर था और यहां आप छह बजे के बाद घर के बाहर जाने की सोच भी नहीं सकते थे। ऐसे में हमारे पास एक ही विकल्प बचता था, घर पर बैठकर रेडियो सुनना। आठवीं कक्षा तक आते-आते मैंने लगभग सारे मलयालम उपन्यास पढ़ डाले थे। मैनें रामायण, महाभारत और अरेबियन नाइट्स भी पढ़ी। आज मेरे अंदर कल्पना करने की जो थोड़ा बहुत योग्यता है वो इसी वजह से है। कॉलेज का ज्यादातर समय मैं इंडिया कॉफी हाउस या फिर क्रिकेट के मैदान में बिताता था। कॉफी हाउस में कुछ छात्रों को हम विदेशी कहते थे-- ये छात्र हरियाणा और पंजाब के होते थे। इनसे बातचीत करने के लिए हमें अंग्रेज़ी बोलनी पड़ती थी। बाद में मेरे एक दोस्त ने बताया कि इस भाषा को सीखने का सबसे बढ़िया तरीका है अश्लील साहित्य पढ़ो। उसने मुझे कुछ किताबें भी दी, इस तरह से मैंने अंग्रेज़ी पढ़ना शुरू कर दिया। इसके बाद मैं निक कार्टर और जेम्स हेडली को पढ़ने लगा। पढ़ाई ने ही मेरी ज़िंदगी बनाई। मेरी आंख में चोट लगने की वजह से क्रिकेट से मेरा नाता टूट गया। मैं अपना एमए पूरा नहीं कर सका। इसके बाद मैं फिल्मों की तरफ मुड़ गया।
तो क्या आपका पढ़ाई से प्यार अभी भी जारी है?
नहीं, निर्देशन में कूदने से पहले मैंने जो कुछ भी पढ़ा था उसी से गुजारा कर रहा हूं। उसके बाद मुझे पढ़ने का मौका ही नहीं मिला। मेरी सोच और नज़रिए में कॉमिक्सों का बहुत योगदान है। कॉमिक्स भी सिनेमा की तर्ज पर ही रचे जाते हैं।
फिल्म के सेट पर आप काफी खुश मिजाज़ नज़र आते हैं। कभी आप तनाव या गुस्से का शिकार हुए?
74 फिल्में और 140 विज्ञापनों के बाद आप जो करते हैं उसके प्रति पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं। आज ही स्क्रीन प्ले लिखने के दौरान मैं तनाव में था। लेकिन एक बार ये काम खत्म हो गया तो फिर पूरी तरह से आराम...मैं इस तरह से फिल्में बनाता हूं जैसे कि हम पिकनिक पर हों।
आप निर्देशन के साथ स्क्रीनप्ले भी कैसे लिख पाते हैं?
मैं हमेशा लिखता हूं, क्योंकि मैंने अपना करियर ही एक लेखक के रूप में शुरू किया था। कॉलेज के दिनों में मैं फिल्मों से प्यार करता था लेकिन कभी निर्देशक या लेखक बनने के बारे में नहीं सोचा था। अपनी 74 में से 36 फिल्में मैंने खुद लिखी हैं। मेरे ख्याल से ये विश्वव्यापी समस्या है...यहां गिने चुने स्क्रीनप्ले लेखक ही बचे हैं। इनमें से भी ज्यादातर खुद ही निर्देशक भी बनना चाहते हैं।
आपकी फिल्मों की सफलता के पीछे किसका हाथ है?
लॉरेल और हार्डी, बूस्टर कीटन और चार्ली चैप्लिन।
बचपन में इन फिल्मों को आप कैसे देखते थे?
इस मामले में मैं किस्मत वाला था। चित्रलेखा, चलचित्र जैसी तमाम फिल्म सोसाइटीज़ की वजह से केरल में अंतरराष्ट्रीय सिनेमा का अच्छा खासा प्रभाव था। मैं पिताजी के पैसे चुराता था। दस पैसे का एक टिकट होता था। पर्दे पर जो भी चलता था बहुत मनोहारी लगता था, चाहे वो कार्टून हो, डॉक्यूमेंट्री हो या फिर कुछ और। मैं हिंदी फिल्मों का भी दीवाना था। मुझे सारे पुराने हिंदी गाने याद थे।
दोस्तों के बीच प्रियदर्शन की क्या छवि है?
लोग मुझसे कहते हैं कॉमेडी फिल्ममेकर के लिहाज से मैं थोड़ा गंभीर दिखता हूं। पर कॉमेडी बनाने के लिए मैं मसखरा नहीं बन सकता। पर हां, हास्य के मामले में मैं खुद के साथ धोखा नहीं कर सकता। मेरा मानना है कि जो चीज़ मुझे हंसा सकती है वो लोगों को भी हंसा सकती है। अपने पहले बच्चे के जन्म के पहले भगवान से मैंने अपने बच्चे में दो चीज़ें ही मांगी थीं- सेंस ऑफ ह्यूमर और कॉमन सेंस।
फिल्म में बारीकियां कहां से ले आते हैं?
निम्न मध्य वर्ग से होने का अपना ही फायदा है। हमें हर जगह जाने का मौका मिलता है। बसों में जाना, लोगों को बातें करते देखना। मैं हमेशा घटनाओं के मज़ेदार पहलू की तरफ देखता रहता हूं। इसे मैंने अपने पिताजी से सीखा है। जब मेरे माता-पिता आपस में झगड़ते थे तो मैं हंसता था। क्योंकि उनकी भाषा और कटाक्ष बहुत मजेदार होते थे।
हिंदी फिल्म उद्योग में आपका प्रिय कलाकार कौन है?
यहां मेरा कोई फेवरेट नहीं है। जब मैं हिंदी फिल्मों मे आया तो मुझे कई परेशानियां झेलनी पड़ी। मुझे ज्यादातर स्टेज कलाकारों को चुनना पड़ा क्योंकि हिंदी सिनेमा में सालों से कॉमेडी का एक निश्चित ढर्रा चला आ रहा था। हास्य तब पैदा होता है जब अभिनेता गंभीर बना रहे और हालात दर्शकों को हंसने पर मजबूर करें। मेरा मानना है कि मलयाली अभिनेता स्टेज के अपने अनुभव और गहरी संवेदनशीलता की वजह से देश के सबसे बेहतरीन कलाकार हैं। हिंदी सिनेमा में मेरा कोई फेवरेट नहीं है। 'विरासत' हिंदी में किया गया मेरा अब तक का सबसे बढ़िया काम है, लेकिन मैं अपनी मलयालम फिल्मों को ही ज्यादा पसंद करता हूं।
दुर्भाग्य से मैंने आपकी कोई भी मलयालम फिल्म देखी नहीं है।
मेरी फिल्मों ने 60 राष्ट्रीय पुरस्कार और तमाम राज्य स्तरीय पुरस्कार जीते हैं लेकिन मैं खुद कभी कोई पुरस्कार नहीं पा सका। "कांजीवरम" मेरी पहली गंभीर फिल्म थी। ये फिल्म कांजीवरम सिल्क बनाने वाले जुलाहों, उनकी ज़िंदगी और देश में साम्यवाद के उभार पर आधारित थी। इसकी पृष्ठभूमि 1920 की थी। ये पहली फिल्म थी जिसे मैंने खुद अपने लिए बनाया था। दक्षिण भारत में कॉमेडी बना-बनाकर मैं ऊब गया था इसलिए मैंने इधर का रुख किया और विरासत और गर्दिश जैसी फिल्में बनाई। अब मैं फिर से कॉमेडी से ऊब गया हूं।
हेरा फेरी एक अलग तरह की फिल्म थी। ये एक मील के पत्थर जैसी थी।
मुझे हेरा फेरी पर गर्व है लेकिन ये मौलिक फिल्म नहीं थी बल्कि एक अंग्रेज़ी फिल्म 'सी द मैन रन' से प्रेरित थी। मेरे निर्माता इससे बहुत परेशान थे। उनका कहना था कि ये फिल्म देखने पर लगता है जैसे इसे एक करोड़ में बनाया गया हो। मेरे हीरो फटे कपड़ों में थे। मैंने उनसे कहा कि पूरी फिल्म गरीबी की कॉमेडी पर आधारित है। फिल्म में तमाम ऐसे क्षण थे जो वास्तविक जीवन की घटनाओं से मेल खाते थे।
हिंदी फिल्मों का व्यापार कैसे बदल गया है?
मैं हिंदी फिल्मों में पैसा बनाने की नीयत से आया था। इसके अलावा मेरा कोई लक्ष्य नहीं था। फिल्मों में आने के विचार से मेरे माता पिता खुश नहीं थे। एक बहन की शादी करनी थी और एक लड़का फिल्मों में, ये अच्छी बात नहीं थी। जब एक विश्वविद्यालय ने मुझे अपने निदेशकों में से एक बनने का प्रस्ताव दिया तो मेरे माता पिता को विश्वास ही नहीं हुआ। सिनेमा भी इसी तरह से बदल रहा है। मेरा मानना है कि हम लोग घटिया काम का शिकार होते जा रहे हैं। मैं कहना चाहूंगा कि इतने सारे पुरस्कारों के बावजूद बॉलीवुड में कोई कुछ भी नहीं करना चाहता। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यहां बहुत ज्यादा राजनीति होती है। हर व्यक्ति चमक दमक औऱ बड़े नामों का ही पक्ष लेता है। ये सारा मीडिया बूम एक गुब्बारे के जैसा है जो किसी भी समय फट सकता है। जब मैं निर्माताओं और फिल्मी पंडितों से बात करता हूं तो पता चलता है कि 90 फीसदी फिल्में फ्लॉप होती हैं।
लेकिन आपने खूब पैसा बनाया?
बिल्कुल, एक लाइन से छह हिट फिल्में देने के बाद आप पैसा बनाते ही हैं। लोग कहते हैं मैं फिल्म उद्योग में सबसे ज्यादा पैसा लेने वाला निर्देशक हूं। मैं ये जानना चाहता हूं कि दूसरे कितना लेते हैं।
सिनेमा के इतर भी आपकी कोई दुनिया है? राजनीति, खेल...
नहीं, मेरा पूरा ध्यान फिल्मों पर है। जो पैसा मैंने कमाया है उसे मैंने थियेटर, स्टूडियो, कैमरा उपकरण, डॉल्बी स्टूडियो आदि बनवाने में लगाया, ये सब चेन्नई में है। मुझे पता है कि रबर की खेती बहुत फायदेमंद है लेकिन मुझे इसकी एबीसी भी नहीं पता।
हिंदी फिल्मों के किन निर्देशकों ने आपको प्रभावित किया?
एक भी हिंदी फिल्म निर्देशक ने मुझे प्रभावित नहीं किया। मुझे पता है कि यहां मैं बुरा काम कर रहा हूं लेकिन वो तो मुझसे भी बेकार काम कर रहे हैं। साउथ की कुछ फिल्में ज़रूर मुझे प्रभावित करती हैं। अमीर सुल्तान ने तमिल फिल्म 'पारुथि वीरन' बनायी थी जो सुपरहिट रही और बर्लिन में भी इसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। हिंदी में सुल्तान की फिल्म के दर्जे की एक भी फिल्म नहीं है। यहां तमाम ऐसे निर्देशक हैं जिनकी फिल्में देख कर मुझे चिढ़न होती हैं।
क्या आप मलयालम में लिखते हैं?
मैं मलयालम में लिखकर उसका अंग्रेज़ी में अनुवाद करता हूं। संवाद निर्देशक इसे अपने हिसाब से हिंदी में लिख देते हैं। मैं हमेशा चेन्नई में अपने घर चला जाता हूं। मुझे मुंबई से नफरत है। अगर स्टूडियो की जरूरत नही होती है तो मैं हमेशा मुंबई से बाहर ही शूटिंग करता हूं।
कोई फिल्म स्क्रीन प्ले के दौरान बनती है या फिर एडिटिंग के दौरान?
स्क्रीन प्ले के दौरान। जब मैं फिल्म की शूटिंग करता हूं, इसकी एडिटिंग अपने दिमाग में ही कर लेता हूं। मलयालम फिल्म इंडस्ट्री एक बढ़िया प्रशिक्षण स्थल है। हमारा बजट बहुत मामूली होता है लेकिन हमारी स्पर्धा स्टीवेन स्पीलबर्ग से होती है।
सितारों के अहम के टकराव से कैसे निपटते हैं?
जब मैंने सलमान खान के साथ 5.30 बजे शूटिंग शुरू की तो पूरी मुंबई ने मुझे दाद दी। मुंबई में इस समय कोई आदमी नहीं उठता है। मैं आपको बताऊं कि उसने ऐसा क्यों किया। वो मुझसे प्यार करता है। मुझ पर विश्वास करता है। मैं अपनी फिल्म 50 से 55 दिन में पूरी कर लेता हूं, क्योंकि फिल्म शुरू करने से पहले मैं सारा होमवर्क कर लेता हूं। मैं किसी फिल्म पर दो साल तक काम नहीं कर सकता। मैं अपने कलाकारों से पहले ही कह देता हूं, "या तो मुझे थोक के भाव में डेट दो या फिर मुझे डेट ही मत दो।"
2008 में हम क्या उम्मीदें कर सकते हैं?
मैं शाहरुख के साथ अप्रैल में एक फिल्म शुरू करने जा रहा हूं। ये दो दोस्तों की कहानी है। शाहरुख और उनके बचपन के एक दोस्त की कहानी। ये एक मलयालम फिल्म की रीमेक है लेकिन इसका स्क्रीन प्ले मैंने लिखा है। मार्टिन स्कोर्सेज़ कभी अपनी फिल्मों के लिए ऑस्कर नहीं जीत सके। अंतत: उन्होंने हॉंन्गकॉंन्ग की फिल्म "इनफर्नल अफेयर" की रीमेक "द डिपार्टेड" के नाम से बनाई और ऑस्कर ले उड़े। भारत में 90 फीसदी रीमेक फ्लॉप हो जाती हैं। मैं अकेला हूं जो सफल रहा। इसकी वजह ये है कि मैं हमेशा स्टोरी का आइडिया लेने के बाद नए सिरे से उसका स्क्रीन प्ले लिखता हूं। इसके अलावा मैं अक्षय कुमार के साथ एक फिल्म कर रहा हूं। मैं सोचता था कि अब मैं कभी कॉमेडी नहीं बनाउंगा लेकिन फिल्म की कहानी बहुत अच्छी है।
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कुल टिप्पणियां: 2
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प्रेषक : vijay batraI have never seen anything so comic and funny stuff as in movies like Herapheri and Hungama. All credit goes to director Priyadarshan.We need more movies like these.
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प्रेषक : SURENDRAhera pheri is one of the best comedy film.fromwhere did u get the idea to make script like this?do u have any website from where we can get a copy of its script? kindly make more comedy films like this
























