कैसे मानें वो हैं हमारे?
जब बात चले हमारी, वो सोएं पांव पसारे.
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   ‘वीज़ा तो दिया पर आज़ादी नहीं’

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भारत छोड़ने से ठीक पहले विवादित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने हरिंदर बवेज़ा से बात की...

आपने हमेशा भारत को अपना घर कहा है तो अब जाने का फैसला क्यो?

मेरा असली घर कोलकाता में है, ये केवल प्रतीकात्मक नहीं है. लेकिन मुझे कौन कोलकाता जाने और रहने दे रहा है? मेरे लिए अकेले कैद में रहना असंभव है. मुझे डॉक्टरों से मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई. पिछले दो महीनों से में तनाव से जुड़ी परेशानियों की वजह से विशेषज्ञ डॉक्टर से मिलने के लिए कह रही थी मगर मुझसे कहा गया कि सुरक्षा कारणों से ये संभव नहीं है. अंत मैं मेरे ज़िद करने पर उन्होंने मुझे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जाने दिया, मगर मेरा ह्रदय और आंखें खराब हो गए हैं. 

आपके वीज़ा की अवधि बढ़ा दी गई थी, क्या इसके बाद भी आप पर देश छोड़ कर जाने के लिए दबाव था?

उन्होंने मेरे वीज़ा की अवधि तो बढ़ाई लेकिन मुझे आज़ादी नहीं दी. स्थितियां अभी भी वैसी ही हैं. मेरे ऊपर ये दबाव पिछले सात महीनों से है. मैं विश्वास नहीं कर सकती थी कि बिना किसी दोष के पश्चिम बंगाल की सरकार मुझे नज़रबंदी में रखेगी. और अब यही केन्द्रीय सरकार कर रही है. मैंने कोई अपराध थोड़े ही किया था. मैंने किसी को कत्ल थोड़े ही किया. मुझे अब इसलिए जाना पड़ रहा है क्योंकि मेरे पास कोई और विकल्प नहीं है. मेरा स्वास्थ्य खराब हो चुका है क्योंकि मुझे इतने लंबे समय से कैद में रखा गया है. बहुत से मेरे दोस्त जो राजनीतिक विश्लेषक हैं, उन्होंने मुझे बताया कि मुझे आज़ाद न करके यहां इतनी बुरी हालत में इसलिए रखा गया जिससे कि में खुद ही ये जगह छोड़ कर चली जाऊं.

आपके करीबी दोस्तों जैसेकि इंदिरा जयसिंह औऱ रीतू मेननजो आपके पब्लिशर हैं--ने विदेश मंत्रालय से आपसे मिलने की अनुमति ले ली थी, आपने उनसे मिलने से मना क्यों कर दिया?

मैं उनसे मिलना चाहती हूं मगर मेरे पास समय ही नहीं है. मुझे तुरंत कोई फैसला लेना है. मुझे मेरी मेडीकल रिपोर्ट्स हाल ही में मिली हैं और मुझे जल्दी से जल्दी अपना इलाज कराने की ज़रूरत है.

आप जा कहां रही है?

देश कोई मायने नहीं रखता. मैं नॉर्वे भी जा सकती हूं और जर्मनी भी. मैने आपको बताया न कि मुझे जिंदा रहने की ज़रूरत है. मुझे जो कुछ मुझमें बच गया है उसे बचाने की ज़रूरत है.

आप भारत के बारे में कैसे खयालात लेकर जा रही हैं?

मैं इसके बारे में जल्दी ही लिखूंगी. ये ऐसी चीज़ नहीं है जिसे चंद पंक्तियों में समझाया जा सके.

क्या आप भारत छोड़ने को लेकर दुखी हैं?

बेशक मैं दुखी हूं. मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं. मैं एक लेखक हूं. मैं राजनीति नहीं करती. मैं कोलकाता में रहना चाहती हूं क्योंकि मेरी भाषा बंगाली है. मैं राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं होना चाहती. मैं एक साधारण प्राणी हूं. मैं मानवता और मानवाधिकारों के लिए लिखती हूं और महिलाओं के अधिकारों के लिए लिखते रहना चाहती हूं. मैं जैसे चाहूं वैसे रहना और जो चाहूं वो लिखना चाहती हूं. मैं समाज के लिए कतई नुकसानदेह नहीं हूं. मैं समाज के लिए कुछ अच्छा करना चाहती हूं. मैं महिलाओं के लिए लिखना चाहती हूं जिससे कि उन्हें आत्मविश्वास और शक्ति मिल सके. मैं यहां तब तक शांति से रह रही थी जब तक मुझे राजनीतिक स्वार्थों के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया. मैं यहां जीने के लिए आई थी मगर मुझे यहां रुकने ही नहीं दिया जा रहा.

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 2

  • प्रेषक : Kumar Dev
    Tasleema mam ke bare me main kahna chahta hoon ki unke saath jo bhi hua oh unke kya kisi bhi writer ke saath nahi hona chahiye tha, In sabke liye dharm ke contractor responsible to hai hi isse bhi jyada hamari goverment hai jo aise logon ki khilaf silence rahti hai. Kisi bhi writer ko itni freedom mili hoti hai ki woh social issue ko dunia ke samne rakh sake, Main Tasleema mam ka sport karta hue ki unhe aur bhi jayada likhna chahiye aur aise system ke oppose mein.
  • प्रेषक : sunil srivastava
    taslima nasreen ne bhale hi bharat chor diya ho lekin bharat ne unhey nahi chora hia.aaj nahi to kal bharat ko unhey apnana hi parega.bharat loktantra ka praneta raha hai,sarv dharm sambhav ka jeewan darshan sadiyo se raha hai.aisey me kuch headless chiken sansado ki vajah se kisi prominent writer ko es tarah ka beijjat karkey nahi nikala ja sakta jisney jatey jatey aakhir kah hi diya ho ki bharat ne mujhey aandhata(blindness) aur heart problem se grasit kar diya.