राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   "साफ है कि दाउद पाकिस्तान में है"

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अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित दाउद इब्राहिम को भारत को सौंपने के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी के बयान के निहितार्थ पर खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक एके डोवाल से तहलका संवाददाता मिहिर श्रीवास्तव की बातचीत। 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी ने कहा है कि अगर भारत दाउद इब्राहिम के खिलाफ पुख्ता सबूत मुहैया करवाता है तो पाकिस्तान उसे भारत को सौंप देगा।

मैं कहूंगा कि वो एक कदम आगे बढ़े हैं। प्रधानमंत्री के बयान से साफ है कि दाउद पाकिस्तान में है। लेकिन जब तक उनके पास दाउद को अपराधी साबित करने वाले पर्याप्त सबूत नहीं होते तब तक वो उसे भारत के हाथ नहीं सौप सकते। मेरे हिसाब से वो उन सबूतों की बात कर रहे हैं कि जिनसे भारत में हुई आतंकी कार्रवाइयों में दाउद के हाथ की पुष्टि होती हो, क्योंकि वो ऐसे किसी आदमी को सौंप नहीं सकते जिसे वो निर्दोष मानते हैं।

दाउद के खिलाफ हमारे पास 'पुख्ता सबूत' क्या हैं?

भारत ने उसके पासपोर्ट, आधिकारिक पहचान पत्र, उसके द्वारा खरीदी गई संपत्तियों और जहां वो रहता था, उन घरों के फोटो आदि पाकिस्तान को दिए हैं। इसके अलावा पाकिस्तानी मीडिया में उसके राजसी रहन-सहन को लेकर बड़ी संख्या में छपे लेख भी दिए गए हैं।

मगर इससे तो सिर्फ इतना ही साबित होता है कि वो पाकिस्तान में रह रहा है? क्या हमारे पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि मुंबई में हुए धमाकों और दूसरे हमलों के पीछे इसी व्यक्ति का हाथ है? 

हां, भारत सरकार अतीत में उन्हें सबूत दे चुकी है और उन्हें नकारा नहीं जा सकता।

क्या पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के इस बयान पर आपको हैरत हुई है?

ये बयान स्वीकार्य अंतरराष्ट्रीय नीतियों के तहत दिया गया है। हमारी पाकिस्तान के साथ कोई प्रत्यर्पण संधि तो है नहीं, लिहाजा दाउद को सौंपना पूरी तरह से राजनीतिक निर्णय होगा। दाउद इब्राहिम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वांछित अपराधी है। उसका नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वांछित आतंकवादियों की संयुक्त राष्ट्र की सूची में शामिल है। पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल है। इसके तहत हस्ताक्षर करने वाले हर सदस्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोषित आतंकवादियों के खिलाफ कुछ निश्चित क़दम उठाने पड़ते हैं। भारत को उम्मीद है कि पाकिस्तान दाउद के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करेगा।

यानी इस मामले में प्रत्यर्पण संधि का न होना कोई मायने नहीं रखता?

वो बिल्कुल अलग श्रेणी में आता है।

दाउद का प्रत्यर्पण कई स्वाभाविक कारणों से भारत के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन वो पाकिस्तान के लिए इतना अहम क्यों है?

(हंसते हुए) मुझे सोचना पड़ेगा कि इस मामले में मैं सच बोलूं या नहीं।

हम आपसे सही जवाब की उम्मीद करते है।

मुंबई ब्लास्ट और दूसरे आतंकवादी हमलों में मिले प्रमाण इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि दाउद के आईएसआई के साथ घनिष्ठ रिश्ते हैं और उसे भारत विरोधी तमाम आतंकी और हिंसक गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा रहा है। पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान को इस बात का डर है कि अगर उन्होंने दाउद को भारत के हाथ सौंपा तो उसके खुलासों से उन्हें शर्मिंदगी झेलनी पड़ सकती है। बहरहाल भारत की नीति पाकिस्तान को शर्मसार करने की नहीं होनी चाहिए। ये तो आतंकवाद से साझा लड़ाई का सवाल है।

लेकिन दाउद पाकिस्तान के हाथ में मौजूद एक मजबूत भारत विरोधी हथियार है, वो उसे गंवाना नहीं चाहते।

भारत इससे किसी तरह का राजनीतिक फायदा नहीं उठाना चाहता है। इसे इस तरह से देखिए- वो सोचते हैं कि दाउद इस तरह के खुलासे कर देगा जिससे पाकिस्तान द्वारा उसका इस्तेमाल कर भारत में चलायी जा रही गतिविधियां बेनकाब हो जाएंगी।

क्या आप को लगता है कि नई सरकार का नज़रिया अंतरराष्ट्रीय राय के प्रति ज्यादा सकारात्मक होगा?

असल में नई सरकार के लिए परिस्थितियां मुशर्रफ के मुकाबले ज्यादा कठिन होंगी। वो अंतरराष्ट्रीय मत के प्रति ज्यादा संवेदनशील होंगे।

मुशर्रफ की तुलना में?

हम मुशर्रफ की चर्चा नहीं करेंगे। अंतत: यह सरकार भी चली जाएगी। आधा हिस्सा तो पहले ही जा चुका है। इस सरकार को खुद को साबित करना होगा। किसी चुनी हुई सरकार के बारे में पर्याप्त समय और मौका दिए बिना हमें कोई पूर्वाग्रह नहीं दिखाना चाहिए। भुट्टो के रूप में वो आतंकवाद के हाथ एक बड़ा नेता खो चुके हैं।

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