राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   महिला आरक्षण का मूल

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कौन समर्थक, कौन विरोधी, बात जाओ ये भूल. 

कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में कुल 953 उम्मीदवार अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं मगर इनमें महिलाएं केवल 40 ही हैं. चुनावों में महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन कर रहे दो प्रमुख राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस सभी 89 सीटों पर और थोड़ा जोड़ घटा कर इसका समर्थन करने वालीं मायावती की पार्टी बीएसपी 86 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसके अलावा अगर वर्तमान लोकसभा की स्थिति पर नज़र डालें तो कुल 537 सदस्यों में से 50 ही महिलाएं हैं यानी कि 10 प्रतिशत से भी कम. और अगर अलग-अलग पार्टियों पर नज़र डालें तो पता चलेगा कि महिला आरक्षण के अलंबरदारो के नारी उत्थान के दावे किस कदर खोखले हैं. लोकसभा में सबसे ज़्यादा मज़बूत पार्टी कांग्रेस के 152 सदस्यों में से मात्र 14 ही महिलाएं हैं. और न जाने कब से महिला आरक्षण का रुदन राग अलाप रही भाजपा के महिला सदस्यों की संख्या केवल 11 ही है. इसके अलावा जहां बीएसपी के 17 सदस्यों में से एक भी महिला नहीं है वहीं आरक्षण में भी आरक्षण यानी कि सामाजिक न्याय के भीतर सामाजिक न्याय की घुसड़पंच रचाने वाले मुलायम सिंह के 39 लोकसभा सदस्यों में से मात्र 3 ही महिलाएं हैं जिनमें से एक तो मशहूर सिने अभिनेत्री जयाप्रदा ही हैं. समझना मुश्किल नहीं कि जयाप्रदा को आगे बढ़ाकर सामाजिक और महिलाओं के प्रति किस तरह के न्याय को आगे बढ़ा रहे हैं सपा सुप्रीमो.

मुलायम सिंह के 39 लोकसभा सदस्यों में से मात्र 3 ही महिलाएं हैं जिनमें से एक तो मशहूर सिने अभिनेत्री जयाप्रदा ही हैं. समझना मुश्किल नहीं कि जयाप्रदा को आगे बढ़ाकर सामाजिक और महिलाओं के प्रति किस तरह के न्याय को आगे बढ़ा रहे हैं सपा सुप्रीमो. 

बचाव सामने रखा जा सकता है कि जब तक सामने वाली पार्टियां ऐसा नहीं करतीं तब तक महिलाओं और वो भी दबी कुचली महिलाओं को चुनावों में खड़ा करना घाटे का सौदा साबित हो सकता है और इससे धर्मनिरपेक्षतावादी या समाजवादी या दलित-ब्राह्मण वादी या फिर तथाकथित राष्ट्रवादी दलों को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ देश की धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक ताने-बाने, दलित कल्याण और खुद देश को ही काफी क्षति पहुंच सकती है. मगर सच तो ये है कि जिस तरह की राजनीति ज़्यादातर क्षेत्रीय दल और उनके जनप्रतिनिधि करते हैं उसमें आधी से ज़्यादा जगहों पर ये दल अगर चुनावों में अपनी पहचान देकर डंडे को भी खड़ा कर दें तो शायद वो भी चुनाव जीत जाए. फिर महिलाएं तो किसी भी मामले में पुरुषों से पीछे हैं ही नहीं. औऱ अगर इन तर्कों को मान भी लिया जाए तो इन दलों को राज्यसभा या राज्यों के उच्च सदनों में महिलाओं की संख्या बढ़ाने से किसने रोका है. उल्लेखनीय है कि वर्तमान में राज्यसभा में मात्र 23 महिला सदस्य हैं जो कि फिर से 33 फीसद की तो बात ही क्या, कुल संख्या के 10 फीसद से भी कम हैं.

दरअसल महिला आरक्षण की राजनीति के हम्माम में सभी नंगे हैं. जो आरक्षण चाहते हैं वो असल में ऐसा बिलकुल नहीं होने देना चाहते हैं और जो आरक्षण को ऐसे नहीं वैसे चाहते हैं वो सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे वाला खेल खेल रहे हैं. वर्ना क्या कारण है कि पोटा को संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सम्मेलन बुलाकर पारित करवाने वाली बीजेपी, इस मामले में कांग्रेस के खुद के साथ खड़े होने के बाद भी आम सहमति का राग अलापती रही और न्यूक्लियर डील पर साथियों और विरोधियों दोनों के चौतरफा वारों के बाद भी इस पर अड़ी कांग्रेस भी महिला आरक्षण पर अब तक वही खेल खेल रही थी.

एक अघोषित सी रणनीति रही है अब तक महिला आरक्षण पर सभी दलों की. जिस बात पर हम मान जाएं उस पर आपको नहीं मानना है और जो तुम चाहोगे वो हम मान कर नहीं देंगे. बस दोनों का हिसाब-किताब ठीक रहेगा.

दरअसल महिला आरक्षण के मामले में सभी दलों पर उनके सांसदों-विधायकों का ज़बर्दस्त दबाव है. पता नहीं किसकी सीट उससे छीनकर राजनीति में कल की बच्ची किसी महिला को दे दी जाए और ऐसा अगर अभी न भी हो तो भी बिल में कुछ ऐसा प्रावधान है कि इसके चलते अलग-अलग समय में अलग-अलग सीटें महिलाओं के नाम रहेंगी. मतलब दलों के बड़े-बड़े दिग्गजों को भी आगे अपने क्षेत्र छोड़कर इधर-उधर

एक अघोषित सी रणनीति रही है अब तक महिला आरक्षण पर सभी दलों की. जिस बात पर हम मान जाएं उस पर आपको नहीं मानना है और जो तुम चाहोगे वो हम मान कर नहीं देंगे. 
भागना पड़ सकता है. पहले से ही परिसीमन की मार झेल रहे राजनीतिकों के लिए ये दूसरा उससे भी कई गुना भयंकर झटका साबित होगा. इसीलिए आम सहमति इस बात पर भी नहीं बन पा रही है कि वर्तमान सीटों को छेड़े बिना यानी कि सीटों की संख्या बढ़ा कर ये आरक्षण लागू कर दिया जाए.

अब जबकि स्थायी और समझदार लोगों का सदन मानी जाने वाली राज्य सभा में इस बिल को पेश किया जा चुका है तो जिस तरह के दृश्य इसे पेश करते समय देश ने देखे उसको ध्यान में रखते हुए बिल को लेकर क्या संभावनाएं उपजती है? जानकार बताते हैं कि बिल को एक सोची समझी रणनीति के तहत आनन-फानन में राज्यसभा में पेश किया गया है. पहला तो ये संप्रग के कॉमन मिनीमम प्रोग्राम का हिस्सा था और इसे पेश न करना विरेधियों द्वारा जनता के साथ वादाखिलाफी की तरह पेश किया जाता. दूसरा वामदलों को उनके कहते ही महिला आरक्षण का चुग्गा डालकर उनसे परमाणु समझौते पर थोड़े कम आक्रामक रवैये के लिए मोलतोल की जा सकती है और तीसरा चुनाव सर पर हैं और चुनावी बजट से लेकर रोज़गार गारंटी योजना तक पर अपेक्षित सफलता न मिलने और महंगाई से परेशान कांग्रेस को अब महिला आरक्षण में तिनके का सहारा नज़र आने लगा है. तो हो ये सकता है कि अगर आम चुनाव तक परिस्थितियां अनुकूल नहीं होती हैं तो आरक्षण का ये एक और रामबाण चला दिया जाएगा फिर चाहे लालू जैसे एक दो समर्थक नाराज़ हों तो होते रहें. अगर रामबाण की वजह से कुछ अच्छा हो गया तो जहाज़ के पंछी की तरह ये फिर वापस आ जाएंगे नहीं तो चुनाव से ठीक पहले संसद के शीत सत्र में इसके पारित होने से नुकसान भी भला क्या होने वाला है.

आखिर में एक अलग सी बात और...महिला आरक्षण के समर्थन में तर्क दिए जा रहे हैं कि इससे राजनीति में थोड़ी शुचिता आयेगी और ये जनहितोन्मुखी हो जाएगी मगर अगर देश की अब तक की प्रमुख महिला राजनीतिकों पर एक नज़र डाली जाए तो ये विश्वास थोड़ा डिग सा जाता है. इंदिरा गांधी के साथ जिस तरह की राजनीति की शुरुआत हुई वो सभी के सामने है. जयललिता और मायावती के कारनामों के गवाह भी हम सब हैं ही. राजिंदर कौर भट्टल, शीला दीक्षित आदि किसी भी तरह से पुरुषों से कम नहीं. न इस तरह से और न उस तरह से !

संजय दुबे

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अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 1

  • प्रेषक : Rakesh
    बढ़िया आंकलन है। हमेशा की तरह