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   कैसे मानें वो हैं हमारे?
जब बात चले हमारी, वो सोएं पांव पसारे.
1993 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद सरकार ने एक आदेश जारी कर अन्य पिछड़े वर्गों के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण को लागू कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश पर इस आदेश में क्रीमी लेयर यानी मलाईदार तबके को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया था जिसमें हमारे जनप्रतिनिधि मतलब सांसद औऱ विधायक शामिल नहीं थे. मतलब साफ था कि हम मलाईदार नहीं बल्कि पिछड़े हैं, रोज़ी-रोटी चलना मुश्किल है और हमारे बाल-बच्चों को भी सकारात्मक भेदभाव का फायदा उठाने का पूरा अधिकार है. ये भी नहीं सोचा गया कि जिन लोगों को सालाना 1 लाख रुपये से ज़्यादा कमाने के लिए क्रीमी लेयर में रखा गया था, एक सांसद को उसकी सांसदी के दौरान, उससे कई गुना ज़्यादा सरकारी पैसा मिलता है.
हाल ही में कोर्ट ने उच्च शिक्षा में आरक्षण पर इन देश सेवकों को मलाईदारों में शामिल करने का जब सुझाव भर दिया तो मानो भूचाल आ गया. पहले तो क्रीमी लेयर के विचार को ही नकारने की कोशिश की गई, मगर जब इस पर ज़ोर नहीं चलता दिखा तो विधायिका के कई मज़बूत स्तंभों ने खुद को इससे बाहर रखे जाने की पुरज़ोर वकालत की. ये कैसा गरीब, गैरमलाईदार तबका है जिसे मंहगाई से कुछ लेना-देना ही नहीं, इस पर कुछ कहना-सुनना ही नहीं है ! ये कैसे किसानों के मसीहा हैं जो अपने भाइयों की दुर्दशा और आत्महत्याओं को चर्चा करने और समाधान ढ़ूंढ़ने लायक ही नहीं समझते !
उनकी इस बात से असहमत होते हुए भी शायद चुपचाप रहा जा सकता था मगर तभी अखबारों में एक खबर आई—16 अप्रैल को संसद में मंहगाई के मुद्दे पर बहस होनी थी और पिछले कुछ दिनों के धरने प्रदर्शनों, संसद के बहिष्कार और इसे चुनावी मुद्दा बनाए जाने की खबरों के बीच किसी को भी ऐसा लग सकता था कि संसद में उस दिन पक्ष, विपक्ष और सेमीपक्ष या सेमीविपक्ष अपने पूरे फौज-फांटे के साथ अपनी बात को पुरज़ोर तरीके से सामने रखने वाले हैं.
मगर हालत ये हो गई कि कार्रवाई जारी रखने के लिए ज़रूरी न्यूनतम 45 सांसद भी लोकसभा में उपस्थित नहीं थे--वो तो किसी ने इसकी तरफ ध्यान नहीं खींचा वरना जो थोड़ा-बहुत बहस हुई, वो भी नहीं होती. राज्यसभा का हाल लोकसभा से थोड़ा बढ़िया मगर क्या खाक बढ़िया था. यहां एक समय 239 में से बहस के दौरान मात्र 49 सदस्य ही मौजूद थे. कुछ ऐसा ही हाल, हाल ही में कृषि क्षेत्र की समस्याओं और किसानों की आत्महत्याओं पर हुई बहस के दौरान भी देखा गया.
सवाल ये है कि ये कैसा गरीब, गैरमलाईदार तबका है जिसे मंहगाई से कुछ लेना-देना ही नहीं, इस पर कुछ कहना-सुनना ही नहीं है ! ये कैसे किसानों के मसीहा हैं जो अपने भाइयों की दुर्दशा और आत्महत्याओं को चर्चा करने और समाधान ढ़ूंढ़ने लायक ही नहीं समझते !
अपने आपको क्रीमी लेयर से बाहर रखने वालों को समझना चाहिए कि पिछड़ों की तो बात ही छोड़िए बड़े-बड़े अगड़ों को भी अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए आज जंतर-मंतर तक पर जगह मुहाल नहीं. मगर अगर हमारे पिछड़े सांसदों के रिकॉर्डों पर नज़र डालें तो ये स्थाई कैमरों की मौजूदगी वाले इतने बड़े मंच को भी अपनी बात रखने लायक नहीं समझते. कैसे मान लिया जाए कि इनमें से कोई भी पिछड़ा है और आरक्षण का हकदार है? कैसे मान लिया जाए कि वे भूमिपुत्र हैं, ज़मीनी हैं और हमारे बीच के हैं...कैसे?
संजय दुबे
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कुल टिप्पणियां: 2
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प्रेषक : umesh kumarमहगाई और कृषि जैसे मुद्दे सांसदो के लिये बेमानी है ये लोग कुछ ऐसे है जैसे कुवाँरे लडके और लडकियाँ जो रहते तो एक छत के नीचे है पर कहलाते है अविवाहित। वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारी से बचते हुए स्वछन्द यौन सुख लूटते मजे से रहते है। हमारे ये नेता भी कुछ ईसी तरह है। लाखो रु बेतन और भत्ते के बाद् उन्हे अपनो की चिंता क्योँ होने लगी। उसके बाद कमीशन का खेल भी अलग से चलता है। खेत और हल से रिश्ता जोड ज्यादातर नेता किसान बनने का स्वांग रचते है जिन्हे किसानो की भूख और मौत से कोई वास्ता नही।
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प्रेषक : murtuzapata nahi kab jaagega apna hindustaan per jab jagega tab ek inqlaab aayega jo in chor beimaan netaao ko khatam kar dega
























