राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   भारत की चीन नीति

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तिब्बतियों का विरोध और तुष्टीकरण की चली आ रही रीति.

सत्रह अप्रैल को जब ओलिंपिक मशाल भारत में लाई गई तो बहुत कुछ अभूतपूर्व घटा...मशाल की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी थी जैसे किसी राष्ट्राध्यक्ष की की जाती है. बल्कि शायद इससे भी कहीं ज़्यादा क्योंकि मशाल पर होने वाले बवाल से बचने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर रक्षा मंत्रालय तक में आवाजाही कई घंटों के लिए बंद कर दी गई औऱ पत्रकारों तक को राजपथ पर प्रवेश करने के लिए खासी जद्दोजहद करनी पड़ीकई तो सफल भी नहीं हो पाए. तमाम दूसरे निजी कमाऊ आयोजनों की तरह ये भी एक टेलीविज़न के लिए आयोजित कार्यक्रम बन के रह गया क्योंकि इसको पास से देख कर आनंदित और गौरवान्वित होने वाले लोग तो वहां थे ही नहीं और भाग लेने वाले विशिष्ट लोग देखने वालों से कहीं ज़्यादा थे. मगर शायद ये कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि करीब दो किलोमीटर लंबी मशाल दौड़ के चप्पे-चप्पे पर करीब ढाई हज़ार सुरक्षाकर्मियों की पांच हज़ार निगाहें तो उन पर थी हीं.

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं इस नाते भी हमारे कुछ कर्तव्य हैं तो क्या इस वजह से भी हमें कई और दूसरे देशों की तरह तिब्बतियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन के ज़रिए अपनी पीड़ा को दुनिया के सामने रखने के सुनहरे मौके को इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए था...

ठीक है कि चीन हमारा पड़ोसी देश है और उसके साथ हम बरसों से संबंध अच्छे बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं इसलिए इस मामले में सरकार ने ये अतिरिक्त सतर्कता दिखाई मगर ये इतनी ज़्यादा अतिरिक्त महसूस होती थी कि जैसे भारत चीन का अनुचर हो गया हो. ऐसे समय में जब हम विश्व के आर्थिक परिदृश्य से लेकर तमाम दूसरे स्थानों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा 2020 तक एक महाशक्ति बनने का सपना मन में पाले हों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की दावेदारी मज़बूत करने के प्रयास कर रहे हों क्या इस तरह की एकतरफा सोच जायज़ है. हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं इस नाते भी हमारे कुछ कर्तव्य हैं तो क्या इस वजह से भी हमें कई और दूसरे देशों की तरह तिब्बतियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन के ज़रिए अपनी पीड़ा को दुनिया के सामने रखने के सुनहरे मौके को इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए था, ये सुनिश्चित करते हुए कि इससे मशाल दौड़ में कोई बाधा न हो. मगर हमने उन्हें ही नहीं बल्कि खुद के देशवासियों तक को मशाल के इर्द-गिर्द तक नहीं फटकने दिया. इसके अलावा भारत की जनता के हृदय में भी दलाई लामा के लिए एक विशेष स्थान है और बुद्ध को विष्णु का अवतार मानने वाले भारतीय उनके ही अनुयायी तिब्बतियों को खुद से अलग नहीं मानते...इस नाते भी केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी थोड़ी और बढ़ जाती है. 

और भी कई चीज़ें हैं जो चीन के प्रति हमारे रवैये को थोड़ा अजीब बनाती हैं...मसलन शायद ही पहले ऐसा कभी हुआ हो कि किसी देश के राजदूत ने भारत के गृहमंत्री और दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से मिलकर मशाल के सुरक्षा इंतज़ामों पर विस्तृत चर्चा की हो. साथ ही विदेश मंत्री का ये बयान कि दलाई लामा हमारे सम्मानित अतिथि हैं और उन्हें ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे कि भारत औऱ चीन के संबंध बिगड़ें, भी कुछ अजीब सा रहा क्योंकि दलाई लामा तो पहले से ही न तो ऐसा कुछ कह रहे थे और न ही कर रहे थे. साफ था कि संदेश चीन को खुश करने के मकसद से ही था. इससे पहले भी पिछली साल अक्तूबर में जब अमेरिकी संसद ने दलाई लामा को सम्मानित किया था तो इसके पहले और बाद में चीन ने इसपर कडी़ प्रतिक्रिया दी थी. हालांकि अमेरिका पर तो इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा पर भारत इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. दलाई लामा के भारत आने पर जब उनके सम्मान में गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया तो कैबिनेट सेक्रेटरी ने सभी मंत्रियों को लिखित में इस समारोह का आमंत्रण स्वीकार न करने की हिदायत दी थी.

इसके उलट चीन ने क्या किया. तिब्बतियों के चीनी दूतावास में घुस जाने पर नाराज़ होकर भारतीय राजदूत को रात को दो बजे तलब कर डाला. इसके बाद मशाल दौड़ के भारतीय हिस्से को खत्म करने की धमकियां भी दी गईं और जब विदेशी राजनयिकों को तिब्बत के हालात से वाकिफ कराने के लिए ल्हासा ले जाया गया तो भारतीय राजदूत निरुपमा राव को वहां ले जाने की ज़रूरत ही नहीं समझी गई. हाल ही में प्रधानमंत्री के अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर भी उसने इसे एक विवादित क्षेत्र बताकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी.

भारत को याद होना चाहिए कि तिब्बत पर खामखयाली और ढ़ुलमुलपने के चलते ही चीन के साथ सीमा विवाद में उसका पक्ष कमज़ोर हुआ है. अगर प्रधानमंत्री नेहरु अपनी हिंदी चीनी भाई-भाई की नीति पर अतिविश्वास रखकर 1954 में तिब्बत को चीन का एक हिस्सा न मानते तो अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और लद्दाख के एक बड़े हिस्से पर हमारा दावा कमज़ोर न पड़ता. ठीक वैसी ही तुष्टीकरण की नीति लग रहा है कि जैसे फिर अपनाई जा रही है. मगर कुछ लोगों का मानना है और ऐसा सोचने की वजहें भी हैं कि इस बार शायद ऐसा खामखयाली की वजह से कम और भारतीय वामदलों की बैसाखी पर सरकार के टिके होने की वजह से ज़्यादा है. क्योंकि अमेरिका से परमाणु करार के मसले पर स्वतंत्र विदेश नीति का राग अलापने वाले वामपंथियों को चीन का भारत के मामलों में हस्तक्षेप, तिब्बतियों पर हो रहे जुल्म और विदेश नीति के तकाज़ों के नाम पर भारत का चीन के सामने घुटने टेकना कतई नज़र नहीं आता.

संजय दुबे

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अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 3

  • प्रेषक : p
    ai sunder ap ka lekh at
  • प्रेषक : उमेश कुमार सोनी
    संजय दुबे जी... किस किस को याद कीजिये, किस किस को रोइए। आराम बडी चीज है मुह ढक कर सोईए। ....... शायद यही कडी है जो मै इस सन्दर्भ मे याद कर रहा था । भारत की विदेश नीत पर चर्चा करना,चौकना अब बीते दिनो की बात मान ली जाय तो अच्छा होगा क्योंकी अब न तो ठोस इरादे वाले राज नेता बचे न ही उनके सलाहकार। अब तो दूरदर्शिता जैसे विषय से भी परहेज है। हमारे पडोसी एक एक कर दूर हो रहे है और नतीजा क्या होगा यह आपके लेख से स्पष्ट दिखाई दे रहा है । आपकी चिंता देश के हित मे है लेकिन जब "बाड ही खेत खाए" तो किसान असहाए हो जाता है।
  • प्रेषक : संजय तिवारी
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