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   मंत्रिमंडल विस्तार
कइयों को पुरस्कार, कुछ को इंतज़ार और राहुल का इनकार
बहुप्रतीक्षित कैबिनेट विस्तार आखिर हो ही गया...काफी कुछ अपेक्षाओं के अनुरूप हुआ मगर काफी कुछ नहीं भी हुआ. मसलन ये तय था कि युवाओं को मंत्री बना कर जवान देश को एक संदेश दिया जाएगा. मध्य प्रदेश की ज़िम्मेदारी मिलने के बाद सुरेश पचौरी जैसे नेताओं का भी हटना तय था. इसके अलावा लोकसभा चुनावों से ठीक पहले पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद प्रियरंजन दास मुंशी के कंधों पर से भी अतिरिक्त बोझ हटाने की बात काफी समय से चल ही रही थी. बजट सत्र के महत्वपूर्ण हिस्से के निपट जाने के बाद संसदीय कार्यमंत्री का उनका बोझ अपेक्षाकृत हल्के फुल्के आप्रवासी मामलों के मंत्री व्यालार रवि को दे दिया गया. इसके अलावा खेल के मामलों में अपनी अरुचि कई बार सार्वजनिक कर देने, मंत्रालय के ज़रूरी मसलों के प्रति हद दर्जे तक उदासीन रहने और 2010 में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों के मद्देनज़र मणिशंकर अय्यर से भी खेल मंत्रालय लिया जाना लगभग तय था.
हवा तो राहुल गांधी के बारे में भी बनाई गई थी मगर अब सोनिया गांधी के इस बयान से कि राहुल ने संगठनात्मक ज़िम्मेदारियों के चलते मंत्री बनने से इनकार कर दिया, कयास लगाए जाने लगे हैं कि वे भी अपने पिता और एक और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की तरह सीधे प्रधानमंत्री ही बनेंगे. उनके अलावा सचिन पायलट भी अपनी योग्यता, राजस्थान के गुर्जर आंदोलन, राहुल गांधी से नज़दीकी और अपने पिता का पुत्र होने के नाते मंत्रीपद के ज़बर्दस्त दावेदार थे...मगर राजस्थान में अपनी स्थित मज़बूत करने के लिए गुर्जरों के आंदोलन में उनकी अति सक्रियता ही उनके गले का फंदा बन गई. आखिर चुनावी वक्त में कांग्रेस मीणाओं की नाराज़गी कैसे मोल ले सकती है.
सात नये मंत्रियों में से कुछ ऐसे भी हैं जिनके आने से पहले तुरही की हल्की सी भी तान नहीं सुनाई दी...मगर शायद अखिलेश दास की मंत्रिमंडल से रवानगी के बाद वैश्य मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए और राजस्थान के चुनाव तथा मीणा-गुर्जरों के वर्चस्व की लड़ाई में पायलट के पिछड़ जाने की वजह से राजस्थान से राज्यसभा सांसद संतोष बागरोडिया को कोयला मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया गया.
केंद्रीय मंत्रिमंडल में अप्रत्याशित रूप से शामिल किए गए पूर्व चुनाव आयुक्त और वर्तमान में राज्य सभा सांसद एम एस गिल को लेकर विवाद के स्वर भी उभर रहे हैं. उनको मंत्री बनाए जाने पर समाजवादी पार्टी से लेकर विपक्ष के अन्य कई दल और कानूनविद नाराज़गी ज़ाहिर कर चुके हैं. कहा जा रहा है कि एक बहुत ऊंची संवैधानिक संस्था के मुखिया रह चुके किसी भी व्यक्ति की राजनीति के सर्वोच्च गलियारे में स्थापना—फिर चाहे वो कितना भी योग्य क्यों न हो, और वो योग्य तो होगा ही तभी तो इतने बड़े पद तक पहुंच सका-- इस तरह के पदों पर बैठे वर्तमान अधिकारियों के लिए एक गलत उदाहरण और विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए एक गलत परंपरा का निर्माण करेगी. ऐसे समय में ये और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब एक वर्तमान चुनाव आयुक्त के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने पहले ही मोर्चा तान रखा है.
सत्ताधारी पक्ष की तरफ से इस संबंध में एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज के. एस. हेगड़े का उदाहरण दिया जा रहा है जो सुप्रीम कोर्ट से अपने इस्तीफे और आपातकाल के ठीक बाद न केवल लोकसभा में पहुंचे बल्कि निर्विरोध लोकसभा अध्यक्ष भी चुने गए...मगर उनके पहले जनता द्वारा और फिर निर्विरोध संसद द्वारा अध्यक्ष चुने जाने तथा गिल को राज्यसभा के पिछले दरवाज़े से सत्ताधारी दल द्वारा लाने और प्रधानमंत्री द्वारा अपने अधिकार का इस्तेमाल कर मंत्री बनाए जाने में फर्क तो है ही.
संजय दुबे
























