महिला आरक्षण का मूल
कौन समर्थक, कौन विरोधी, बात जाओ ये भूल.
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   परमाणु पहेली का समाधान

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प्रणव मुखर्जी के रणनीतिक कौशल का कड़ा इन्तहान.

परमाणु ऊर्जा की पहेली में एक और आयाम जुड़ता नज़र आ रहा है, एक ऐसा आयाम जो बिना अगले आम चुनावों की समय सारिणी में बदलाव किए भारत को दुनिया के साथ परमाणु व्यापार करने की सहूलियत दे सकता है.

इसके बारे में सही तस्वीर तो विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी की अमेरिका यात्रा के बाद ही उभर पाएगी लेकिन वाम नेताओं के हालिया बयान इस ओर इशारा करते हैं कि उन्हें परमाणु ऊर्जा के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से समझौते करने पर कोई एतराज़ नहीं है. अगर कोई ऐतराज़ है तो वो केवल अमेरिका के साथ होने वाले द्विपक्षीय समझौते को लेकर है.

सीपीआई नेता एबी बर्धन ने हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू में कहा है कि भारत के परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(एनएसजी)—जिसका अमेरिका सबसे महत्पूर्ण सदस्य है--के पास जाने को लेकर कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. बर्धन के मुताबिक एनएसजी की स्वीकृति को अमेरिका के साथ 123 अनुबंध किए जाने के तौर पर कैसे देखा जा सकता है? क्या इसे(पहले) फ्रांस और रूस से परमाणु संबंध स्थापित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है?

इस तरह का तर्क पहली नज़र में ही हास्यास्पद है. आखिर ये अमेरिका ही था जिसने बिना परमाणु अप्रसार व्यवस्था का हिस्सा बने, दुनिया भर में परमाणु व्यापार करने की बाबत, भारत के पक्ष में माहौल बनाया. क्या इस सबके बाद अमेरिका ये स्वीकार करेगा कि दूसरे देश उसकी मेहनत का फायदा उठाएं? और ऐसा न होने देने के लिए वो एनएसजी में भारत के खिलाफ नहीं चला जाएगा, जहां ज़्यादातर फैसले सहमति के आधार पर होते हैं.

यही वो बिंदु है जिसपर आने वाले समय में अमेरिकी वार्ताकारों के समक्ष विदेश मंत्री का इम्तहान होगा. अगर भारत को परमाणु व्यापार करने देने के समर्थन में कही गईं वाशिंगटन की बातें सही हैं तो क्या उसे इस बात के लिए तैयार नहीं किया जा सकता है कि वो भारत को पहले दूसरे मुल्कों से परमाणु करार करने दे और फिर बाद में खुद ऐसा करे. यानी कि इस पूरे मामले में केवल क्रम ही बदलेगा बाकी सब वही होगा जो अमेरिका, भारत सरकार और यहां तक कि वाम दल चाहते हैं.

आनंद के सहाय

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