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   14 साल का 'गिल'वास
14 साल बाद आखिरकार केपीएस गिल को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. 1994 में जून की एक दुपहरी को जब पंजाब पुलिस के पूर्व डीजीपी गिल को भारतीय हॉकी फेडरेशन (आईएचएफ) की कमान सौंपी गई थी तो हम सभी ने इस कदम की तारीफ की थी. हमें भरोसा था कि ओलंपिक और विश्व कप में हमारे लिए पदकों का जो सूखा पड़ा हुआ है वो गिल जैसे सख्त प्रशासक के आने से खत्म हो जाएगा. 1994 में सिडनी में हुए विश्व कप में हम पांचवें स्थान पर रहे और हमारी उम्मीदें ये सोचकर बढ़ गईं कि अब हम सेमीफाइनल से सिर्फ एक कदम ही तो दूर हैं. फिर 1996 में अटलांटा में ओलंपिक हुए और टीम की कप्तानी परगट सिंह ने की. कम ही लोग जानते होंगे कि कोच सेड्रिक डिसूजा परगट को टीम में नहीं चाहते थे मगर गिल ने अपनी चलाई. सेड्रिक को उन्हें ले जाना पड़ा और बाद में उन्होंने माना कि फुल बैक पोजीशन, जिस पर परगट खेलते थे, टीम की सबसे कमजोर कड़ी रहा. भारत आठवें स्थान पर रहा और गिल ने अंपायरिंग को दोषी ठहराया.
तब तक आईएचएफ के मुखिया के तौर पर गिल हॉकी के लिए कुछ करने के अलावा बाकी सब कुछ करने लगे थे. पत्रकारों पर निशाना साधना, अपने परिवार के हॉकी प्रेम का वर्णन करना, एस्ट्रोटर्फ युग से पहले के खिलाड़ियों को टीम से बाहर करना और 1998 में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के मुख्य खिलाड़ियों और कोच को हटाना इनमें शामिल है. गिल आत्ममुग्धता का जीवन जीते रहे. 1997 के मिल्टन कीन्स जूनियर विश्व कप के फाइनल में जब भारत, आस्ट्रेलिया से 3-2 से हार गया तो गिल ने बरसते हुए कहा था, “भारत को जूनियर लीग की जरूरत नहीं है. 1998 के सीनियर विश्व कप में हम दुनिया की चोटी की चार टीमों में होंगे.” खिलाड़ियों को वो कुछ नहीं समझते थे औऱ जब उन्होंने पैसे की मांग की तो कई खिलाड़ियों के साथ-साथ कोच एम के कौशिक को भी हटा दिया गया. ये गिल का पुलिसिया अंदाज था.
मगर उनके दावों की धज्जियां उड़ गईं. 1998 में हालैंड में हुए विश्वकप में भारत चोटिल कप्तान धनराज पिल्ले के साथ उतरा और टीम ने मुंह की खाई. हालत बद से बदतर हो गई और हम नौंवे स्थान पर रहे. तब गिल की प्रतिक्रिया थी, “हम 2000 के सिडनी ओलंपिक की तैयारी कर रहे हैं.”
1998 में भारत ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता और पहले से आत्ममुग्ध रहे गिल की आत्ममुग्धता नई ऊंचाईयां छूने लगी. उन्होंने ये जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि भारतीय हॉकी को बचाने के लिए सबसे बड़ी लड़ाई वही लड़ रहे हैं. खिलाड़ियों को वो कुछ नहीं समझते थे औऱ जब उन्होंने पैसे की मांग की तो कई खिलाड़ियों के साथ-साथ कोच एम के कौशिक को भी हटा दिया गया. ये गिल का पुलिसिया अंदाज था. भास्करन को नया कोच बनाया गया और भारत ओलंपिक के सेमीफाइनल में जगह पाते-पाते रह गया. गिल का बिगुल फिर बजा, “हम बस 45 सेकेंड दूर थे.”
2001 में होबार्ट में हुए जूनियर विश्व कप में भारत विजेता बना. गिल ने फिर एक प्रयोग किया. उन्होंने सिडनी ओलंपिक में खेले ज्यादातर खिलाड़ियों को टीम से बाहर कर उनकी जगह जूनियर खिलाड़ियों को टीम में शामिल किया. इस प्रयोग का हश्र भी बुरा हुआ और 2002 के विश्व कप में भारत को दसवें स्थान से संतोष करना पड़ा. टूर्नामेंट के बीच में ही कोच सेड्रिक डिसूजा को हटा दिया गया. ऐसा हॉकी के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था.
फिर गेरहॉर्ड राख नाम के एक दोयम दर्जे के कोच ने कमान संभाली और 2004 के एथेंस ओलंपिक में भारत सातवें स्थान पर रहा. फिर हमेशा इस पद के लिए तैयार रहने वाले भास्करन को कोच बनाया गया और 2006 विश्व कप में टीम 11वें स्थान पर रही. इसके बाद हुए एशियाई खेलों में भी भारत का प्रदर्शन खराब रहा और टीम पांचवें स्थान पर पहुंच गई. कुछेक कांस्य पदक जीतने वाले जोआक्विम कारवाल्हो सोच रहे थे कि बीजिंग में वो भारत को कोई न कोई पदक जरूर दिलवा देंगे. मगर इंग्लैंड ने सैंटियागो में हमें हराकर हमारे ओलंपिक जाने की उम्मीदों पर ही तुषारापात कर दिया. हॉकी के इतिहास में ऐसा पहली बार है कि भारतीय पुरुष हॉकी टीम ओलंपिक में भाग नहीं ले पा रही है. इस पर गिल का जवाब था, “हम 2010 के विश्व कप की तैयारी करेंगे. हॉकी इंस्टैंट कॉफी नहीं है.”
गिल को बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी आईएचएफ सेक्रेटरी के ज्योतिकुमारन के कैमरे पर रिश्वत लेते दिखाए जाने के साथ ही हो चुकी थी. आखिरकार भारतीय ओलंपिक संघ को गिल को अध्यक्ष पद से हटाना ही पड़ा. मगर तब तक उनकी सनक 150 से भी ज्यादा खिलाड़ियों के करिअर और उनकी हिम्मत को तबाह कर चुकी थी. गिल के कार्यकाल में 18 कोच बदले गए. यही नहीं, पिछले कुछ समय से रिक चाल्सवर्थ जैसे एक दिग्गज के साथ इस तरह का सुलूक हो रहा था जैसा पहली नौकरी के लिए इंटरव्यू दे रहे किसी ग्रेजुएट के साथ होता है.
मगर सबसे बुरा ये है कि गिल भारतीय हॉकी को जिस हालत में छोड़ गए हैं उसकी तुलना काफी कुछ उस मरीज से की जा सकती है जिसके बदन के अनगिनत घावों से लगातार खून बह रहा है और जिसे सांस लेने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.
संदीप मिश्रा
(लेखक समाचार चैनल न्यूज एक्स के खेल संपादक हैं)























