राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   नंदीग्राम फिर बना बंदीग्राम

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नंदीग्राम में आग एक बार फिर सुलग उठी है. पंचायत चुनावों को अपनी राजनीतिक साख का सवाल बनाकर सीपीएम ने इसे लड़ाई के मैदान में तब्दील कर दिया है. नंदीग्राम के सच से पर्दा हटाती और इस मुद्दे के दूसरे पहलुओं की पड़ताल करती रघु कर्नाड की रिपोर्ट .  

पंचायत चुनावों की पूर्वसंध्या पर नंदीग्राम किसी लड़ाई के मैदान जैसा नजर आ रहा है. सभी दल अपना काम पूरी तरह से निपटा चुके हैं. सड़क पर लगे दिशा संकेतों, गाड़ियों, घरों... जिस तरफ देखिए पार्टियों के प्रतीक चिन्ह नजर आ रहे हैं. तामलुक में स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस की मूर्ति पर तृणमूल कांग्रेस का पोस्टर भी लगा है और सीपीएम का भी. लाल झंडों की तो इतनी अधिकता है कि लग रहा है जैसे यहां बहुतायत में मिलने वाले किसी फूल के खिलने का मौसम चल रहा हो. 

देखा जाए तो राजनीतिक परिदृश्य में पंचायत चुनाव की गिनती सबसे बड़े चुनावी आयोजनों में नहीं होती. इसके बावजूद यहां परिस्थियां तनावपूर्ण हैं. अप्रैल की शुरुआत में पंचायत चुनावों की घोषणा होने के बाद से ही नंदीग्राम में हिंसा का दौर फिर से लौट आया है. वाम मोर्चा सरकार द्वारा विशेष आर्थिक जोन यानी सेज़ के लिए इस इलाके की जमीन के अधिग्रहण के फैसले के बाद निरंकुश राजनीतिक हिंसा की ये तीसरी लहर है. यहां हरमद नाम का एक शब्द काफी चलन में है. मूल रूप से पुर्तगाली हमलावरों के लिए इस्तेमाल होने वाले इस शब्द का मतलब है गांवों में हमला कर लोगों को मारने और लूटपाट करने वाले. नंदीग्राम में लोग सीपीएम की गुण्डा वाहिनी को हरमद वाहिनी कहते हैं. लोगों को लगता है कि उनके चारों तरफ हरमद मौजूद है. 

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यहां हरमद नाम का एक शब्द काफी चलन में है. मूल रूप से पुर्तगाली हमलावरों के लिए इस्तेमाल होने वाले इस शब्द का मतलब है गांवों में हमला कर लोगों को मारने और लूटपाट करने वाले. 

46 वर्षीय राधारानी का नाम सबसे पहले अप्रैल 2007 में तब सुर्खियों में आया था जब भूमि अधिग्रहण के खिलाफ विरोध की लहर अपने चरम पर थी. राधा और उनके पति उन किसानों में शामिल थे जो अधिग्रहण के खिलाफ बने संगठन भूमि उच्धेद प्रतिरोध कमेटी (बीयूपीसी) में शामिल हो गए थे. 14 मार्च, 2007 को दूसरे लोगों के साथ राधारानी जब भांगबेरिया पुल पर शांतिपूर्ण तरीके से रास्ता रोको अभियान पर थीं तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग शुरू कर दी. इसमें 14 लोगों की मौत हो गई थी. फायरिंग से मची अफरा-तफरी के बीच राधारानी एक गड्ढ़े में छिप गईं. मगर चेहरे पर नकाब ओढ़े कुछ लोगों की उन पर नजर पड़ गई. उन्होंने पहले तो राधारानी को पीट-पीटकर अचेत कर दिया, फिर उन्हें घसीटते हुए एक खेत मे ले गए और उनके साथ बलात्कार किया.

एक महीना अस्पताल में गुजारने के बाद राधारानी ने सीपीएम की बर्बरता को लोगों के सामने लाने का फैसला किया. वो मुखर होकर लोगों को इस बारे में बतातीं थीं. वो बताती हैं कि चुनावों की घोषणा के बाद सीपीएम कैडर हर रात रैलियां करते थे और नोट करते रहते थे कि कौन नहीं आया. चुनावों से एक महीना पहले 11 अप्रैल को जब राधारानी का परिवार खाने की तैयारी कर रहा था तो लाल पट्टियां बांधे लोग उनके घर में जबरदस्ती घुस आए. एक बार फिर उन्हें घसीटकर खेतों में ले जाया गया और उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया.

नंदीग्राम ब्लॉक अस्पताल के गलियारे में हमारी मुलाकात राधारानी से होती है जहां वो अपने पति के साथ दिन गुजार रही हैं. घर जाने की कल्पना से ही उन्हें दहशत होने लगती है. फिलहाल उन्हें मांगे हुए कपड़ों से काम चलाना पड़ रहा है. उनकी मेडिकल जांच में शरीर के निचले हिस्से में चोटों की बात तो कही गई है मगर वीर्य के अंश पाए जाने की बात से इनकार किया गया है. पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है मगर कोई गिरफ्तारी नहीं की है. राधारानी कहती हैं, मैं इस बलात्कारी सरकार को बदलने के लिए जो बन सकेगा करूंगी.

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2007 को सीपीएम के लिए एक और मोर्चे पर फतह का साल बनना था. तीन दशक से प. बंगाल में निर्बाध शासन करती आ रही पार्टी ग्रामीण इलाकों में औद्योगीकरण का एक प्रयोग करना चाहती थी. इसके लिए नंदीग्राम को चुना गया था. जैसा कि सीपीएम सेक्रेटरी बिमान बसु कहते हैं, हम नंदीग्राम को पूरे राज्य के लिए ट्रंप कार्ड बनाना चाहते थे.

मगर हुआ इसका उलटा. और देश ने देखा कि 14,000 एकड़ उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण करने की सरकार की कोशिश उल्टी पड़ गई. पीढ़ियों से सीपीएम का समर्थन करते आ रहे स्थानीय किसानों और दूसरे लोगों ने ही पार्टी के विरोध में मोर्चा खोल दिया. विरोधी दलों और कुछ दूसरे संगठनों के समर्थन से इन गांववालों ने बीयूपीसी का गठन किया. जनवरी 2007 में उन्होंने अतिवादी कदम उठाते हुए अपने इलाकों में सड़कें खोद दीं, पुल तोड़ डाले और खुद को राज्य सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर डाला. जो लोग अब भी सीपीएम का समर्थन कर रहे थे अचानक ही गद्दार हो गए. सीपीएम की मानें तो ऐसे 3500 लोगों को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया.

पार्टी इसे भला कैसे बर्दाश्त करती. 14 मार्च 2007 को इलाके पर फिर से कब्जा करने की पहली कोशिश पार्टी कैडर और पुलिस द्वारा भांगबेरिया पुल पर गोलीबारी के रूप में सामने आई. मगर बीयूपीसी की किलेबंदी इतनी सशक्त थी कि नवंबर तक वो मोर्चा संभालने में कामयाब रहा. सीपीएम के मुंह पर ये एक करारा तमाचा था. छह नवंबर 2007 को भारी संख्या में हथियारबंद सीपीएम कार्यकर्ता नंदीग्राम में घुस गए और जैसा कि राधारानी के शब्दों में इसे एक श्मशान बना दिया. केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को बुलाया गया मगर तीन दिन तक उसे नंदीग्राम में घुसने नहीं दिया गया. 10 नवंबर तक नंदीग्राम पर फिर से सीपीएम का कब्जा हो चुका था. सीपीएम के जोनल सेक्रेटरी अशोक गुरिया का कहना था, नंदीग्राम में सेज बनाने का निर्णय वापस ले लिया गया है. भविष्य में नंदीग्राम में कोई औद्योगिक निवेश नहीं होगा. नंदीग्राम जैसा है हमेशा वैसा ही रहेगा. बीयूपीसी का अभियान सफल हो गया था. 

मगर पंचायत चुनावों की तैयारी के दौरान चली हिंसा की तीसरी लहर से साफ  हो गया है कि सरकार से पंगा लेने वाले नंदीग्राम के लोगों को अभी इसकी कीमत चुकानी बाकी है. पान के पौधों और लाल झड़ों की तरह राजनीतिक हिंसा भी यहां के परिदृश्य का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है. 

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अप्रैल में चुनावों की घोषणा के साथ ही नंदीग्राम में ताजा हमलों की शुरुआत हो गई थी. इनकी तीव्रता बढ़ती गई. चुनाव से एक दिन पहले मालती जना नाम की एक महिला को सड़क पर नंगा किया गया और सीपीएम की रैली में घुमाया गया. तामलुक अस्पताल में पहुंचने पर हमें यहां भर्ती तीन लोग दिखते हैं जिनके शरीर पर गोलियों के घाव हैं. नंदीग्राम अस्पताल में तृणमूल कांग्रेस के एक उम्मीदवार के दो भाइयों को भर्ती कराया गया है. उन्हें सरियों से पीटा गया था. अपने घरों से विस्थापित किए गए सैकड़ों लोग या तो राहत शिविरों में पड़े हैं या फिर उन्होंने बड़े शहरों का रुख कर लिया है. हिंसा का सही-सही अनुमान लगाना मुश्किल है क्योंकि बलात्कार, मारपीट या विस्थापन के कोई भरोसेमंद आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. 

यही वो माहौल है जिसमें चुनाव हो रहे हैं. मगर मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुताबिक स्थिति शांतिपूर्ण है. हां, चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक जरूर हालात को खराब करार देते हैं. 

पंचायत चुनावों की तैयारी के दौरान चली हिंसा की तीसरी लहर से साफ  हो गया है कि सरकार से पंगा लेने वाले नंदीग्राम के लोगों को अभी इसकी कीमत चुकानी बाकी है.

चुनाव से दो दिन पहले विरोधी दल निराश हैं. उन्हें लगता नहीं कि सीपीएम विरोधी वोट मतपत्र तक पहुंच भी पाएगा. गरछकरबेरिया जैसे गांवों का तो ये हाल है कि विरोधी उम्मीदवार गांव में घुस तक नहीं सकता. फिर नौ मई की शाम को एक अच्छी खबर आती है—आलोक राज वापस आ गए हैं. आलोक राज वो शख्स हैं जिन्हें स्थानीय मीडिया नंदीग्राम का हीरो कहता है. वो सीआरपीएफ के डीआईजी हैं और उन पर दूसरी बार नंदीग्राम में शांतिव्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है. पहली बार तब थी जब नवंबर 2007 में उन्होंने सीपीएम की मोटरसाइकिल ब्रिगेड की जवाबी हिंसा को काबू किया था और हथियारों के जखीरे पकड़े थे. वो नंदीग्राम वापस आ गए हैं और अब की बार उनके साथ सीआरपीएफ की दो अतिरिक्त कंपनियां भी हैं. 

10 मई की शाम चार बजे जब राज यहां पहुंचते हैं तो कस्बे के माहौल में घुला तनाव कुछ हद तक ही सही पर तुरंत छंट जाता है. बीयूपीसी के विस्थापित कार्यकर्ताओं को उनके घरों में वापस पहुंचाया जाता है और नंदीग्राम की सीमाएं सील कर दी जाती हैं ताकि घुसपैठ न हो सके. राज सबसे पहले अस्पताल में बलात्कार पीड़ितों से मिलने जाते हैं जिनमें राधारानी और मालती शामिल हैं. वो पत्रकारों, चुनाव अधिकारियों और पर्यवेक्षकों को बेहिचक अपना मोबाइल नंबर देते हैं. राज वो सब करते हैं जो स्थानीय पुलिस करने में नाकाम रही है. वो अपने कर्तव्य के पालन में कुशल और निष्पक्ष हैं और लोगों की बात ध्यान से सुनते हैं. नंदीग्राम के ज्यादातर लोगों, चाहे वो किसी भी पार्टी के प्रति निष्ठा रखते हों, की आंखों में उनके प्रति प्रशंसा का भाव दिखाई देता है. 

इसके उलट हैं स्थानीय पुलिस के अधिकारी जो सीआरपीएफ का मजाक उड़ाते हैं. स्वाभाविक भी है क्योंकि चुनाव के लिए जो उनकी योजनाएं हैं उनके पूरा होने में राज एक बाधा हैं. 

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2007 में नंदीग्राम जमीन के मुद्दे पर हुई टकराव से हिला था. 2008 में ये लड़ाई राजनीतिक साख की हो गई है. 11 मई को हुए पंचायत चुनाव नंदीग्राम में सेज़ के मुद्दे पर हुए टकराव के बाद पहली चुनावी परीक्षा हैं. 18 महीनों की इस लड़ाई के दौरान वाममोर्चा और विरोधी दल दोनों ही खुद को जनता का सच्चा प्रतिनिधि बताते रहे हैं और एक-दूसरे की वैधता को चुनौती देते रहे हैं. कोलकाता स्थित सीपीएम मुख्यालय में बसु कहते हैं, चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद देश को समझ में आ जाएगा कि कि नंदीग्राम के लोग वाममोर्चे के साथ हैं या फिर गुंडों की एक भीड़ के साथ. 

सेज़ की घोषणा से पहले नंदीग्राम से सीपीएम को अपार समर्थन मिलता था. 2003 के पंचायत चुनावों में नंदीग्राम ब्लॉक 1 में ग्राम पंचायत की 10 में से सात, पंचायत समिति की 23 में से 20 और जिला परिषद की दोनों सीटें वाममोर्चे की झोली में गई थीं. गौरतलब है कि यही वो इलाका है जहां अधिग्रहण के लिए जमीन ली जानी थी. पार्टी की बेचैनी बताती है कि सेज़ के मुद्दे पर ये कितना राजनीतिक समर्थन खो चुकी है. सीपीएम के लिए पंचायती ढांचे में बहुमत गंवाने का मतलब होगा एक और अपमान का घूंट. 

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ये 11 मई की सुबह है. सात बजे चुनाव शुरू होता है. रात को बम धमाकों की खबरों के बावजूद मतदान शांति से आगे बढ़ता है. नंदीग्राम में सीआरपीएफ की चार कंपनियां तैनात हैं जिनमें एक कंपनी महिला जवानों की है. आलोक राज 14 गश्ती दलों पर नजर रखे हुए हैं. हर मतदान केंद्र पर जवान तैनात हैं. 11 बजे के करीब जब हम राज से मिलते हैं तो हर चीज असाधारण रूप से नियंत्रण में नजर आती है. हमारे साथ साक्षात्कार के दौरान राज को खबर मिलती है कि सीपीएम की दो महिला कार्यकर्ताओं ने उनके खिलाफ दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई है. कुछ ही मिनट बाद उनका फोन फिर से बजता है. दूसरी तरफ हल्दिया से सीपीएम सांसद लक्ष्मण सेठ हैं जिनका इलाके में सिक्का चलता है. राज स्पीकर फोन ऑन कर देते हैं. ये अच्छा ही है क्योंकि हम अब सब कुछ अपने कानों से सुन सकते हैं. 

सेठ राज पर आरोप लगाते हैं कि वो स्थानीय पुलिस के बिना पेट्रोलिंग कर रहे हैं. वो कहते हैं कि स्थानीय प्रशासन को पूरी तरह से दरकिनार किया जा रहा है. राज उन्हें बताते हैं कि उनके साथ स्थानीय पुलिस भी है और एक मजिस्ट्रेट भी. सेठ उन्हें निर्देश देते हैं, आप अपने कैंप की हद में ही रहें. राज जवाब देते हैं, सर, आप मुझे कैंप तक सीमित नहीं रख सकते. आप ये बात ऑन रिकॉर्ड कह रहे हैं. दूसरी तरफ से आवाज आती है, मैं आपसे कह रहा हूं...ये सरकारी कानून है!” राज फोन बंद कर देते हैं. वो कहते हैं, यकीन नहीं आता, हमारा पहला काम इलाके में गश्त लगाना है. यहां निश्चित रूप से उपद्रवी और हथियारबंद लोग हैं मगर कोई हमें चुनौती नहीं देगा. मुझे लगता है इसीलिए सांसद हमें रोकने की कोशिश कर रहे हैं. 

सेज़ की घोषणा से पहले नंदीग्राम से सीपीएम को अपार समर्थन मिलता था. 2003 के पंचायत चुनावों में नंदीग्राम ब्लॉक 1 में ग्राम पंचायत की 10 में से सात, पंचायत समिति की 23 में से 20 और जिला परिषद की दोनों सीटें वाममोर्चे की झोली में गई थीं.

एफआईआर की खबर से राज को निराशा होती है. वो कहते हैं, ये मुझे काम से रोकने का एक तरीका है. मैं कल अस्पताल में कई महिलाओं से मिला था जिनका कहना था कि उनके साथ बलात्कार हुआ है मगर पुलिस ने आरोपियों पर आरोप लगाने से मना कर दिया. सरकार को इसका जवाब देने की जरूरत है कि यहां कितनी वास्तविक एफआईआर दर्ज नहीं की जा रहीं और कितनी झूठी एफआईआर लिखी जा रही हैं. एक तरफ वो संसद में ज्यादा महिलाओं की बात करते हैं. दूसरी तरफ नंदीग्राम में खुलेआम महिलाओं को नंगा करके घुमाया जा रहा है. नबा सामंत को ही लीजिएउसके खिलाफ बलात्कार और हत्या के मामले हैं मगर पुलिस उसे छूती भी नहीं. सामंत सीपीएम के सबसे कद्दावर स्थानीय नेताओं में से एक है. हताशा में राज अपना सिर हिलाते हैं और फिर गश्त जारी रखने का निर्देश देते हैं. 

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सवाल ये है कि हरमद के पीछे है कौन?

अगर सीपीएम की मानें तो ये तृणमूल और बीयूपीसी है. उसका कहना है कि नंदीग्राम में पहली मार स्थानीय सीपीएम समर्थकों पर पड़ी थी जिन्हें बीयूपीसी ने 11 महीनों तक अपने कब्जे के दौरान अपने घर से निकाले रखा. इससे गांव के माहौल में हमेशा के लिए जहर घुल गया. इन महीनों के दौरान बीयूपीसी ने कथित रूप से माओवादी विद्रोहियों से सांठगांठ की और उनका गठजोड़ अब भी जारी है. बसु कहते हैं, उनको खदेड़ने के बाद नंदीग्राम में हथियार बनाने वाली एक फैक्ट्री मिली. बसु का मानना है कि बीयूपीसी को तृणमूल के ही एक मोर्चे के रूप मे देखा जाना चाहिए. उनके मुताबिक तृणमूल कांग्रेस जहां वाममोर्चा समर्थकों को डरा रही है वहीं बीयूपीसी सत्ताधारी दल को बदनाम करने के लिए सीपीएम कैडर द्वारा हिंसा की झूठी कहानियां गढ़ रही है. 

ये सही है कि शारीरिक प्रतिरोध खत्म होने और चुनावी चुनौती सामने आने के बाद बीयूपीसी के भीतर तृणमूल कांग्रेस की स्थिति मजबूत हुई है. बीयूपीसी सदस्यों की सीधी सोच ये है कि जो भी पार्टी सीपीएम को हटाने में समर्थ होगी वही उनका समर्थन पाएगी और फिलहाल इसके लिए तृणमूल कांग्रेस के अलावा कोई और विकल्प नजर नहीं आता. बीयूपीसी कार्यकर्ता देबोजीत दत्त कहते हैं, ""अगर वो (तृणमूल कांग्रेस) जीत जाते हैं तो हो सकता है कि अगले दिन से हम उनका विरोध शुरू कर दें. मगर ये सीपीएम से तो कम बुरी है."

ये बात भी सही है कि बीयूपीसी के पास अब भी हथियार हैं जैसा कि उनके नेता सुबेंद्र अधिकारी स्वीकार भी करते हैं. लेकिन इनमें से ज्यादातर नवंबर में हुई मुठभेड़ के बाद जब्त हो चुके हैं. अधिकारी बताते है कि जो थोड़ा बहुत हथियार बचे हैं वो देसी स्तर पर बनने वाले हथियार हैं. आलोक राज के मुताबिक नवंबर के बाद से यहां माओवादी गतिविधियों के कोई संकेत नहीं मिले हैं. सीपीएम घटनाओं का जिस तरह वर्णन करती है उसे पूरी तरह से तो खारिज नहीं किया जा सकता पर इसके समर्थन में कोई खास सबूत भी नहीं मिलते. 

स्टेट्समैन संवाददाता सुकुमार मित्रा कहते हैं. "सीपीएम हमेशा कहती रहती है कि 20 यहां घायल हुए, 25 वहां घायल हुए लेकिन अस्पताल में आपको एक भी सीपीएम कार्यकर्ता नज़र नहीं आता. कोलकाता के निजी अस्पतालों से लेकर स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक बीयूपीसी कार्यकर्ताओं से भरे पड़े हैं." विस्थापितों के कैंपों में भी किसी सीपीएम समर्थक को ढूंढना मुश्किल है. 

दूसरी ओर सीपीएम कैडर द्वारा बल प्रयोग साफ नजर ही नहीं आता बल्कि इसका प्रदर्शन गर्व के साथ भी किया जाता है. नवंबर में हुए संघर्ष के दौरान हमलावर सीपीएम कार्यकर्ताओं ने असॉल्ट राइफल्स और बारूदी सुरंगो का इस्तेमाल किया और सीपीएम के बड़े नेताओं ने उनका उत्साहवर्धन किया. मुख्यमंत्री का कहना था, "खतरनाक ताकतों ने नंदीग्राम में कब्जा जमा लिया था. उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब दे दिया गया है." सीपीएम कैडर से हथियार जब्त ही नहीं किए गए. नवंबर के बाद से वो जिस पर चाहें हमला कर रहे हैं चाहे वो इलाके का दौरा करने आए बुद्धिजीवी हों, ममता बनर्जी का चुनावी काफिला या फिर सीआरपीएफ. कोलकाता के अख़बारों में चेहरा ढके और हथियार लहराते मोटरसाइकल जलूस निकालने वाले कैडरों की तसवीरें देखी जा सकती हैं. 

स्थानीय पुलिस भी सीपीएम के प्रभाव में है. अमूमन हर ग्रामीण के पास पुलिस इंचार्ज देबाशीष चक्रवर्ती के भेदभाव से जुड़ी कोई न कोई कहानी है जो कि 14 मार्च 2007 को हुई गोलीबारी पर चल रही सीबीआई की जांच में मुख्य आरोपी हैं. रफीक उल इस्लाम, जिन्हें उसके घर से जबर्दस्ती खींच लाया गया था, का कहना था कि जब मालती को नंगा किया गया उस वक्त देबाशीष वहां मौजूद थे और इस घटना को हैंडीकैम में रिकॉर्ड कर रहे थे. अपने घर से बेदखल शेख फाज़िले कहते हैं, " उन लोगों को रोकना पुलिस की जिम्मेदारी है मगर ऐसा कैसे हो जब उनका नेता खुद चक्रवर्ती है.

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"सीपीएम हमेशा कहती रहती है कि 20 यहां घायल हुए, 25 वहां घायल हुए लेकिन अस्पताल में आपको एक भी सीपीएम कार्यकर्ता नज़र नहीं आता. कोलकाता के निजी अस्पतालों से लेकर स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक बीयूपीसी कार्यकर्ताओं से भरे पड़े हैं."

सेठ द्वारा राज को फोन करने के एक घंटे बाद हमारा सामना एक ऐसी अजीब घटना से होता है जो दर्शाती है कि नंदीग्राम में असल में हालात कैसे हैं. 

सीआरपीएफ के एक छोटे से दल के साथ, जिसका नेतृत्व हीरासिंह ठाकुर कर रहे हैं, हमारा गरुपाड़ा जाना होता है. यहां टीएमसी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने सीपीएम द्वारा रास्ता रोकने और वोटरों को धमकाने की शिकायत की है. यहां हमें एक बुजुर्ग महिला मिलती है जो बताती है कि गुंडों ने उसे रोका और उसके कपड़े फाड़ दिए. ठाकुर भाग रहे एक आदमी को पकड़ लेते हैं. पता चलता है कि वो सीपीएम का स्थानीय प्रत्याशी स्नेहांशु दास है. ठाकुर उसे एक किनारे ले जाते हैं और उससे शांति व्यवस्था बनाए रखने में मदद करने की अपील करते हैं. दास मुस्कराता है और सहमति में सिर झुकाकर चला जाता है. ठाकुर आशंका भरे स्वर में कहते हैं, "हम उसे गिरफ्तार करके थाने ले जा सकते थे. लेकिन हमारी आंखों के सामने ही उसे मछली-भात खिलाकर वापस घर भेज दिया जाता.

लेकिन फिर पता चलता है कि शांति बनाए रखने में मदद करने की बजाय दास ठीक इसका उल्टा करता है. वो गांव के सीपीएम के प्रभाव वाले हिस्से में जाता है और कहता हैं कि टीएमसी ने सीआरपीएफ को उसे पीटने के लिए उकसाया. मिनट भर में ही सीपीएम के समर्थकों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है और छोटा-मोटा संघर्ष शुरू हो जाता है. महिलाओं, युवकों और छोटी-छोटी लड़कियों की भीड़ नारियल काटने वाले छुरे, चाकू और पत्थर लेकर टीएमसी के लोगों पर टूट पड़ती हैं. ऐसा लगता है कि वो खुद ही फैसला कर लेंगे. स्थिति बिगड़ते देख सीआरपीएफ के जवानों को लाठी चार्ज का आदेश मिलता है. भीड़ को खदेड़ने के बाद वो पूरे गांव में घूमते हैं और जो भी घरों के बाहर दिखता है उसकी पिटाई करते हैं. ठाकुर कहते हैं, "वो अपने ही गांव को तबाह कर रहे हैं. उन्होंने इसे भारत-पाकिस्तान बना दिया है." 

थोड़ी देर बाद ही स्थानीय पुलिस वहां पहुंचती है जिसका नेतृत्व देबाशीष चक्रवर्ती कर रहे हैं. सरकार ने उन्हें चुनावी ड्यूटी से हटाने का वादा किया था मगर वो वर्दी और धूप का चश्मा पहने यहां नजर आ रहे हैं. उनके साथ दो और आदमी, जो मीडिया से नहीं हैं, हाथों में हैंडीकैम लिए हुए हैं. वो सीआरपीएफ के जवानों के पास आते हैं और कहते हैं, "क्या तुमने इन लोगों पर हमला किया? साले... मुझे अपना नाम बताओ." उनकी आवाज़ इतनी सर्द है कि सीआरपीएफ के जवान थोड़ा पीछे हट जाते हैं. हालांकि सीआरपीएफ के अधिकारी उन्हें चुनौती देने की मुद्रा में चक्रवर्ती के पास आ जाते हैं. चक्रवर्ती कहते हैं कि सीआरपीएफ के जवानों की शिकायत की जाएगी. तनातनी में चक्रवर्ती और सीआरपीएफ के एर अधिकारी एक दूसरे की गर्दन पकड़ लेते हैं. फिर माहौल गर्म होता देखकर अधिकारी एक दूसरे से अलग हो जाते हैं. सीआरपीएफ के जवान चिल्लाते हैं, "तुम गालियां दे रहे हो?" तुम इसी तरह अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हो?" सर्द स्वर में चक्रवर्ती कहते हैं, "मैं तुम्हें अपनी ताकत दिखाउंगा." 

गुस्साए सीआरपीएफ के जवान वापस अपने शिविर में चले जाते हैं. इधर चक्रवर्ती सीआरपीएफ के "घातक हमले" को लेकर गांव में पंचायत लगाकर बैठ जाता है. ये कहना असंभव है कि जो भी चोटें दिखायी जा रही हैं वो सही हैं. स्नेहांशु दास अपनी कुहनी और पीट पर खरोंच के निशान दिखाता है. एक महिला पागलों की तरह रो-रो कर बयान करती है कि किस तरह से वो अपने घर में सो रही थी और सीआरपीएफ के जवानों ने उसे लात मारना शुरू कर दिया. मीडिया के पहुंचने तक खुद चक्रवर्ती की बीच की उंगली में भी चोट नजर आती है जो निश्चित रूप से झगड़े के दौरान तो नहीं लगी थी. 

हमारे चलने की रफ्तार से कहीं ज्यादा तेज गति से बात गांव दर गांव तक पहुंच जाती है और इसका स्वरूप बिल्कुल बदल जाता है. हमें बताया जाता है कि कि सीआरपीएफ गरुपाड़ा गई और उसने लोगों से उनकी पार्टी के बारे में पूछा और गांववालों को धमकाया. सीआरपीएफ ने पुलिस इंचार्ज को पीट दिया. पुलिस इंचार्ज का हाथ टूट गया. फिर टीवी पर खबर आने लगी और यही सही खबर हो गई. दो दिन बाद सीआरपीएफ के हमले की जांच के आदेश जारी कर दिए गए. 

दोपहर होते-होते इलाके से सीआरपीएफ का नियंत्रण ढीला पड़ने लगता है. बीयूपीसी के गढ़ माने जाने वाले सोनाचुरा के मतदान केंद्र पर हथियारबंद लोग कब्जा कर लेते हैं और आधे घंटे तक मतदान पेटी को फर्जी वोटों से भरते हैं. किस पार्टी ने बूथ पर कब्जा किया इसके जवाब में वहां तैनात अधिकारी धीरे से हंसते हुए कहता है, "आपको पहले से ही पता है." हम मतदान केंद्र के भीतर घुसते हैं जहां फर्श पर फटे और मुड़े-तुड़े मतपत्र बिखरे पड़े हैं. यानी इस घटना को अंजाम देने वाले इतने बेपरवाह थे कि उन्होंने मतपेटी में सभी मतपत्रों को डालने की जहमत नहीं उठाई. 

सोनाचुरा का मतदान निरस्त कर दिया गया है. यहां दो और केंद्रों के साथ बाद में पुनर्मतदान होगा वो भी उस तारीख को जब आलोक राज यहां नहीं होंगे. इसके अलावा भी तमाम छोटी-मोटी घटनाएं होती हैं. लेकिन मतदान का दिन लोगों की आशंकाओं से कहीं ज्यादा शांति से गुजर जाता है. 

चुनाव कोई भी जीते, आशंकाएं जताई जा रही हैं कि 21 मई को नतीजे आने के बाद हिंसा और भी ज्यादा होगी, खासकर अगर सीपीएम जीतने में सफल रही तो. नंदीग्राम संघर्ष का अंत अभी दूर है. इसकी वजह ये है कि तीन दशक तक निर्बाध शासन के बाद सीपीएम सोचने लगी थी कि उसे हिलाने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता मगर बीयूपीसी और टीएमसी ने उसे तगड़ा झटका दिया है. सीपीएम को ये भी गुमान हो गया था कि वो हमेशा चुनाव में अपनी चला सकती है. इस सोच को आलोक राज ने चुनौती दी है. दत्त कहते हैं, "तीस साल तक सत्ता में रहने के बाद कोई भी इसे गंवाना नहीं चाहेगा, न सीपीएम न टीएमसी और ना ही कोई और. तीस साल बाद ऐसा होना अवश्यंभावी हो गया था. उन्होंने वामपंथियों को दक्षिणपंथी बना दिया है." 

नंदीग्राम के भविष्य पर आशंकाओं के बादल उमड़-घुमड़ रहे हैं. राजनीतिक हिंसा यहां के गांवों के भीतर दुश्मनी की खंदकें खोद रही है और इलाके की उपजाऊ ज़मीन में दुश्मनी के पौधे उग रहे हैं. 

फोटो : शैलेंद्र पांडेय

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 4

  • प्रेषक : sheela
    report wakai mein tathyoen par aadharit dekhati hai. Lekin Sarkar hai ki us par kisi bhi tarah ka koi phark nahi padta. Orissa, Chhatisgarh aur desh ke baki bhagoen mein kya ho raha hai use isse koi matlab nahi. Koi bhi sarkar jab tak rahti hai paisa kamane ki hi soachti rahti hai. Na to use apne hi logoen ki phikra hai na hi apne desh ki. China jaise desh mein kewal ek sez banaya gaya, jabki yahan itne saare sez bana rakhe hain. yahan logoen ki chinta khatam ho chuki hai.
  • प्रेषक : Niraj Dushyant
    report bahut kuchh batataa hai per kya ye sab aap(pura desh) pahle se nahi jantey the? agar nahi to aap hundustani ho hi nahi saktey karan CPM ke neta aur atankbadi dono ish ke prati bafadar nahi rahe. yeh baat ushi samay sabit ho gaye jish samay CHINA ne Hundistan per humla kiya tha. ek taraf jahan per aap bahri atankbadiyon se jujh rahey hain wahin per CPM ke neta under se atankbadi paida kar rahe hain aur ish desh ko todney ka kaam kar rahe hain. jahan inke neta (Somnath jee) sadan me achran aur pataa nahi kya kya sikhatey rahtey hain wahin per party ke dusrey neta atankbadi gatwidhime me jude hotey hain. Ho sakta hai hum ish mudde per galat hon per aap sabhi mere ek sawal ka jabab de dijiye ki - jab bhi CPM kader ke ye atankbadi desh me kahin bhi goli bari kar ke nirdosh logon ko martey hain to inke neta kabhi bhi ishka birod ya ush ghatna ko condemned nahi karte hain. ish samay desh me politics ka sabse bura pahlu ye hai ke ye ya aur bhi bahut political party paroksh taor per atank aur atankbadiyon ko samarthan karti hai. humare desh ke janbaaj sainik samne se aty atankbadiyon ko to mar saktey hain per pichh se war karney wale inka kya? ab aap hi batayen ki desh ko sabse jyada khatra kishse hai.
  • प्रेषक : pravin
    report ke sath kuch taza tasvire bhi lagae
  • प्रेषक : Prabhakar Mani Tewari
    रिपोर्ट बहुत अच्छी है. लेकिन सीआरपीएफ के डीआईजी आलोक राज का नाम अशोक राज कैसे हो गया?प्रूफ की गलती है या संवाददाता की?