राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   ढही जाति की दीवार

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दक्षिणी तमिलनाडु स्थित उथापुरम गांव के 500 दलित परिवारों के लिए 6 मई की सुबह एक नई आज़ादी लेकर आई। दो दशक पहले सवर्ण हिंदुओं द्वारा बनायी गई एक दीवार को राज्य सरकार ने ढहा दिया। लोगों ने पटाखे चलाकर अपनी खुशी का इजहार किया। 60 मीटर लंबी और 15 फीट ऊंची इस दीवार का निर्माण पिल्लईमार्स के सवर्ण हिंदुओं ने 1989 में इसलिए किया था ताकि वो अछूतों को खुद से दूर रख सकें। ये क़ानूनन अवैध था। दीवार बनने के बाद दोनों तरफ के लोगों के बीच हुए संघर्षों में अब तक सात जानें जा चुकी थीं। दलितों को इस बात की खुशी है कि सरकार उनकी सहायता के लिए आगे आयी। "बीस साल पुराना सरदर्द खत्म हो गया," कहते हैं खुशी से भावविभोर दलित सेल्वाराजा। 

सड़कों के किनारे चाय की दुकानों में दलितों के लिए अलग से गिलास रखे होते हैं और उन्हें इनसे ही चाय पीने के लिए बाध्य किया जाता है।

तमिलनाडु की आबादी के 20 फीसदी दलित वर्ग का किसी न किसी रूप में उत्पीड़न आज भी जारी है। तमाम सरकारों के बदलने और दलितों के उत्पीड़न को रोकने के दावों के बावजूद ऐसा हो रहा है। इसमें दलितों के साथ निर्दयतापूर्वक होने वाली हिंसा से लेकर सामाजिक बहिष्कारों तक की लंबी श्रृंखला है। उदाहरण के लिए सड़कों के किनारे चाय की दुकानों में दलितों के लिए अलग से गिलास रखे होते हैं और उन्हें इनसे ही चाय पीने के लिए बाध्य किया जाता है। तीन महीने पहले ही चेन्नई के पास पुलिस ने एक दलित युवक को सिर्फ इसलिए यातनाएं दी क्योंकि उसने एक सवर्ण लड़की के साथ घर से भागने का दुस्साहस किया था। एक महीने पहले ही तंजौर ज़िले में आठ दलितों को सिर्फ इसलिए बुरी तरह से पीटा गया क्योंकि उन्होंने सांड़ों की दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था और उनके जानवर दौड़ जीत गए थे।

पिछले नवंबर में मदुरै ज़िले में लॉ के एक छात्र को मल खाने के लिए मजबूर किया गया। उसे ये सज़ा एक रोड कॉन्ट्रैक्ट को लेकर एक सवर्ण हिंदू के साथ झगड़ा करने के लिए मिली थी। "पुलिस बमुश्किल एक हज़ार दलित उत्पीड़न के मामले दर्ज करती है। और इनमें महज तीन फीसदी मामलों में अपराध का निर्धारण हो पाता है," ये कहना है काथिर का जो मदुरै के एक दलित समर्थक कार्यकर्ता है। उनका आरोप है कि 1989 के दलित उत्पीड़न एक्ट को राज्य में गंभीरता से लागू नहीं किया जा रहा है। कुछ साल पहले दलितों के लिए सुरक्षित मदुरै की तीन पंचायतों और विरुधुनगर ज़िले की एक सीट पर सवर्ण हिंदुओं के विरोध के चलते चुनाव ही नहीं कराए जा सके। ये एक परंपरा थी कि चुनाव तो हमेशा होते थे लेकिन इसके तुरंत बाद सवर्णों के दबाव के चलते उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ता था। 2006 में जाकर एम करुणानिधि की सरकार ने इन पंचायतों के चुनाव कराए और इस नाटक का अंत किया।

तमिलनाडु जैसे राज्य में छुआछूत को शर्मनाक कहा जा सकता है क्योंकि राज्य की दो प्रमुख पार्टियों  डीएमके और एआईएडीएमके की विचारधारा का स्रोत पिछली सदी के दलित उद्धार का वो महान अभियान है जिसे जाने-माने समाजसुधारक ई वी रामास्वामी यानी पेरियार ने चलाया था। एक व्यापारी से स्वतंत्रता सेनानी और फिर समाज सुधारक बने पेरियार ने छुआछूत उन्मूलन को स्वतंत्रता आंदोलन से भी ज्यादा प्राथमिकता दी। उन्होंने जाति के बंधनों का मुखर विरोध किया और अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा दिया। केरल के सवर्ण हिंदू मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए चलाया गया उनका अभियान काफी लोकप्रिय हुआ था। पेरियार ने 1944 में समाज सुधार संस्था द्रविदर कझगम की नींव डाली। उनके कुछ समर्थकों ने 1949 में अलग होकर डीएमके के नाम से अलग संगठन बना लिया। आगे चलकर 1972 में एमजी रामचंद्रन ने इससे अलग होकर एआईएडीएमके की स्थापना की। बीते चार दशकों से यही दो पार्टियां लगातार राज्य में शासन करती आ रही हैं। लेकिन कोई भी पार्टी दलितों के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करने का पेरियार का सपना पूरा नहीं कर सकी है। अपने पूर्व के कार्यकाल में डीएमके ने ऐसी कॉलोनियां विकसित कीं थी जिनमें दलितों सहित सभी वर्गों के लोगों को मुफ्त मकान दिए गए थे। इन कॉलोनियों को समुतवपुरम नाम दिया गया था। हाल ही में सरकार ने आदेश दिया कि ग़ैर ब्राह्मण भी मंदिरों के पुजारी हो सकते हैं।

लेकिन ये क़दम दलितों के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करने में असफल रहे। "जाति की भावना तमिलनाडु में गहराई से घुसी हुई है," कहते हैं भारतीदासन विश्वविद्यालय में सेंटिर फॉर पेरियार स्टडीज़ के पूर्व विभागाअध्यक्ष एसवी राजादुरई। वो आगे जोड़ते हैं, "लोगों के दिमाग में मौजूद अदृश्य दीवार को गिराना बहुत मुश्किल है।"

आलोचक द्रविड़ पार्टियों पर वोटबैंक की राजनीति के चक्कर में दलितों के साथ धोखाधड़ी करने का आरोप लगाते हैं। "पार्टियां पिछड़ी जातियों के अपने मतदाताओं को नाराज़ नहीं कर सकती," ये कहना है पीडीके के महासचिव विदुथलायी राजेंद्रन का। राजेंद्रन का इशारा उन जातियों की ओर है जो जाति व्यवस्था में बीच की पायदान पर हैं और सबसे निचले पायदान वालों के ऊपर आने का विरोध कर रही हैं।

डीएमके का दलित चेहरा और केंद्रीय आईटी मंत्री ए राजा याद करते है कि किस तरह से द्रविड़ आंदोलन से पहले के दिनों में दलित बसों में यात्रा नहीं कर सकते थे।

पुथिया थामिझगम के मुखिया और दलित नेता के कृष्णास्वामी सभी द्रविड़ पार्टियों पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। वो कहते हैं, "द्रविड़ पार्टियों ने वादा किया था कि वो संपूर्ण द्रविड़ समुदाय की भलाई के लिए काम करेंगे। लेकिन उन्होंने सिर्फ पिछड़ों का भला किया, जो अब हमारे शोषक बन गए हैं।" स्वदेशी जागरण मंच के नेता एस गुरुमूर्ति द्रविड़ पार्टियों पर निशाना साधते हुए पेरियार के आंदोलन की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा करते हैं। वो कहते हैं, "पेरियार का आंदोलन ब्राह्मणों के खिलाफ था। द्रविड़ आंदोलन में दलितों के उत्थान की कोई योजना नहीं थी।"

लेकिन द्रविड़ राजनीति पर "कट आउट्स, कास्ट एंड सिने स्टार्स" जैसी किताब लिखने वाले लेखक वासंथी द्रविड़ आंदोलन को जाति व्यवस्था क्रम में श्रेष्ठता के संघर्ष के रूप में देखते हैं। वो कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं कि पेरियार जाति व्यवस्था को खत्म करना और छूत-अछूत को मिटाना चाहते थे," वासंथी कहते हैं। "लेकिन लोगों ने सिर्फ उसी को अपनाया जो उनके मुताबिक था। पिछड़ी जातियों ने आंदोलन का फायदा उठाया और ब्राह्मणों को सामाजिक व्यवस्था के उच्च पद से हटा दिया।"

लेकिन सवर्ण जाति के बुद्धिजीवियों द्वारा पेरियार की आलोचना तमिलनाडु में भावनाओं को भड़का देती है। पेरियार के विचारों पर काफी कुछ लिख चुके प्रोफेसर ए मार्क्स कहते हैं कि द्रविड़ पार्टियों की आलोचना तो ठीक है लेकिन पेरियार पर हमला दुर्भावना से प्रेरित है। डीएमके का दलित चेहरा और केंद्रीय आईटी मंत्री ए राजा याद करते है कि किस तरह से द्रविड़ आंदोलन से पहले के दिनों में दलित बसों में यात्रा नहीं कर सकते थे। वो कहते हैं, "इस बात पर स्वस्थ बहस होनी चाहिए कि क्या द्रविड़ आंदोलन दलित मुद्दों का प्रतिनिधित्व करने में नाकाम रहा है। द्रविड़ आंदोलन पर ये आरोप लगाना कि वो दलितों की जान बूझ कर उपेक्षा कर रहा है, सही नहीं है। ये दुष्प्रचार उन लोगों द्वारा किया जा रहा है जो निजी हितों के मकसद से दलितों और पिछड़ों को बांटना चाहते हैं।"

डीके नेता के वीरामानी तर्क देते हैं कि तमिलनाडु में दलितों की दशा दूसरे राज्यों के मुकाबले बहुत अच्छी है। वो कहते हैं, "उथापुरम की दीवार द्रविड़ आंदोलन के कारण ही गिरी है." वीरामानी डीएमके सरकार की इस फौरी कार्रवाई की तारीफ करते हैं। दलित लेखक एम पुनीथा पांडियन द्रविड़ आंदोलन से सहानुभूति जताते हुए कहते हैं, "द्रविड़ आंदोलन का मकसद 3000 साल पुरानी ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। आंदोलन जाति व्यवस्था के दुर्गुणों के प्रति लोगों में जागरुकता पैदा करने और समाज में ब्राह्मण प्रभुत्व को चुनौती देने में सफल रहा है। लेकिन अभी बहुत सा काम बाकी है।"

पीसी विनोज कुमार

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