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   भेदभाव की फसल
अनाज का कटोरा कहे जाने वाले पंजाब में एक ही चीज़ की दो फसलें पैदा की जा रही हैं...एक खुद और संपन्न तबके के लिए और दूसरी सामान्यजन के लिए, क्यों? जानने की कोशिश कर रही हैं तुषा मित्तल .
दक्षिण पंजाब के मेथागांव में राजकुमार की 11 एकड़ जमीन दो हिस्सों में बंटी हुई है. एक हिस्सा वो है जिसमें राजकुमार 1,500 किलो रासायनिक खाद और एक लीटर कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं. इस हिस्से में गेहूं की घनी फसल उगती है. एक बीज से कई बालियां पैदा होती हैं जिनकी बदौलत हर एकड़ में 12 क्विंटल गेहूं उगता है और दानों की चमक देखते ही बनती है.
मगर राजकुमार अपने परिवार के भोजन के लिए इस गेहूं का इस्तेमाल नहीं करते. वो कहते हैं, “जिस फसल पर कीटनाशकों का छिड़काव होता है वो देखने में अच्छी लगती है. मगर जहर तो जहर है. मैं इसे खाकर खुद को बीमारी की तरफ क्यूं धकेलूं. ये केवल बेचने के लिए है.”
जमीन के दूसरे हिस्से में भी गेहूं ही उगता है मगर वो पहले हिस्से जितना घना नहीं होता. इसमें राजकुमार वही बीज बोते हैं जो उनके दादा दशकों पहले इस्तेमाल किया करते थे. इस हिस्से के लिए उन्हें 50 फीसदी कम पानी की जरूरत होती है. हर बीज से सिर्फ एक बाली उगती है और इसलिए हर एकड़ में बस छह क्विंटल गेहूं पैदा होता है. राजकुमार का परिवार जिस आटे की रोटी खाता है वो इसी गेहूं से बनती है. कारण पूछने पर वो कहते हैं कि जैविक तरीके से उगाया गया ये गेहूं स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है और इसलिए अपने बच्चों को वो यही खिलाते हैं.
सवाल उठता है कि ये फर्क क्यूं?
जवाब है व्यावसायिक मजबूरी. जहां तक व्यावसायिक फसलों का सवाल है तो उनके लिए राजकुमार प्राकृतिक तरीके से खेती नहीं कर सकते. वजह साफ है. ऐसा करने से उत्पादन कम होता है और विशेषज्ञ कहते हैं कि उत्पादन को रासायनिक खेती वाले स्तर तक पहुंचने में दो-तीन साल लग जाते हैं. राजकुमार कहते हैं, “मंडी में दोनों किस्मों के गेहूं की कीमत बराबर है. मैं फर्टिलाइजर्स का इस्तेमाल करता हूं क्योंकि मुझे कर्ज चुकाना है.” विडंबना देखिए कि जिस कर्ज को चुकाने के लिए राजकुमार रासायनिक खाद के इस्तेमाल पर ज़ोर दे रहे हैं वो कर्ज़ रासायनिक खाद और कीटनाशकों को खरीदने के लिए ही लिया गया था.
विडंबना देखिए कि जिस कर्ज को चुकाने के लिए राजकुमार रासायनिक खाद के इस्तेमाल पर ज़ोर दे रहे हैं वो कर्ज़ रासायनिक खाद और कीटनाशकों को खरीदने के लिए ही लिया गया था.
राजकुमार को अपनी जमीन के रासायनिक खाद और कीटनाशकों वाले हिस्से में उगे 120 क्विंटल गेहूं से हर सीजन में एक लाख रूपये की आय होती है. उनका कहना है कि अगर सरकार इस आय की सुनिश्चितता का प्रबंध कर दे तो वो अपनी पूरी फसल के लिए जैविक खेती के तरीकों को प्राथमिकता देंगे. वो कहते हैं, “अगर शुरुआत में कम उत्पादन से होने वाले नुकसान की भरपाई कर दी जाए तो निश्चित रूप से हम रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करना चाहेंगे. तब हमें इस जहर की जरूरत ही भला क्यों होगी?”
वैसे पंजाब की मिट्टी में ये जहर हमेशा से नहीं था. सदियों तक फसल के इस सुनहरे कटोरे में खेती का मतलब था देसी बीज, बैलगाड़ियां, गोबर की खाद और एक साथ कई फसलें. आज ये फॉर्मूला पूरी तरह बदल चुका है. ज्यादा से ज्यादा उत्पादन की होड़ और 60 के दशक में हुई हरित क्रांति अपने साथ रासायनिक खाद, कीटनाशक और संकर बीज लेकर आई. फसलों की विविधता खत्म हो गई और ज्यादातर किसान सिर्फ गेहूं व चावल उगाने लगे. पंजाब के 20 लाख किसानों में से ज्यादातर इन नई तकनीकों को अपना चुके हैं. राज्य की 90 फीसदी जमीन में रसायन घुले हैं और देश में गेहूं उत्पादन का आधा फीसदी हिस्सा यहीं से आता है.
इसके बावजूद यहां एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिलता है. जिन लोगों के पास कम जमीन है और जिनकी जीविका का फसल के ज्यादा उत्पादन से कोई संबंध नहीं है, उनमें से कई अब भी खेती के लिए वही पुराने तरीकों का ही इस्तेमाल करते हैं. यानी रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जगह जैविक खाद का इस्तेमाल. ये वो भोजन है जिसे शहरी दुनिया जैविक भोजन या ‘ऑर्गेनिक फूड’ कहती है.
कुछ ऐसे भी किसान हैं जिनकी जोत बहुत बड़ी है और वो उसका एक छोटा सा हिस्सा जैविक खेती के लिए रखते हैं. अमृतसर से पांच घंटे की दूरी पर स्थित जीरा नाम के गांव में 60 साल के कुंदन सिंह इन्हीं लोगों में से एक हैं. अपनी एक एकड़ जमीन के टुकड़े पर वो सब्जियां उगाते हैं जो सीधा उनकी रसोई में जाती हैं. वो कहते हैं, “मुझे मालूम है कैमिकल्स सेहत के लिए नुकसानदेह होते हैं और मैं चाहता हूं कि मेरा परिवार अच्छा भोजन खाए.” उधर, सड़क के दूसरी तरफ उनकी 25 एकड़ जमीन पर खेती के नये तौर-तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं.
खेती के इन नए तरीकों का पैरोकार करोड़ों रुपये का वो उद्योग है जिसे फर्टिलाइजर्स और कीटनाशक बनाने के लिए सरकार से भारी सब्सिडी मिलती है. कीटनाशकों की खपत के हिसाब से भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा बाजार है. सब्सिडी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि स्थानीय विक्रेताओं के मुताबिक यूरिया का 50 किलो का एक बैग 2300 रुपये में आयात किया जाता है और फिर इसे 480 रुपये में बेचा जाता है.
पिछले कुछ दशक के दौरान भारत में कैमिकल फर्टिलाइजर्स का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है. 1980-81 में जहां इनकी खपत करीब 55 लाख टन थी वहीं वर्ष 2000 में ये आंकड़ा दो करोड़ टन पर पहुंच गया. इसका कारण ये था कि किसान ज्यादा से ज्यादा नकदी फसलें उगाने लगे थे. इसके अलावा ज्यादा उत्पादन देने वाले बीजों की किस्मों को ज्यादा खाद और कीटनाशकों की जरूरत होती थी.
मगर अब कहा जा रहा है कि पंजाब के खेतों की उर्वरा शक्ति पहले जैसी नहीं रही और इन जहरीले रसायनों का जादू तेजी से खत्म हो रहा है. द इकॉलॉजिकल फाउंडेशन के निदेशक और भू विज्ञानी डॉ. सुरेंद्र शर्मा कहते हैं, “पंजाब का उत्पादन अब उस स्तर पर पहुंच गया है जहां से आगे नहीं बढ़ा सकता. जमीनें बंजर होने लगी हैं. हर साल घटती उत्पादकता हमारे लिए झटका बनकर आती है. ये धारणा कि रसायनों से उत्पादन बढ़ता रहेगा, गलत थी.”
आंकड़े भी डॉ शर्मा की कही बातों का समर्थन करते हैं. राज्य सरकार के आंकडे़ बताते हैं कि पिछले कुछ सालों से कुल उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है. 2001-02 में गेहूं उत्पादन जहां 155.51 लाख मीट्रिक टन था वहीं 2004-05 में ये गिरकर 147.88 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच गया. 2001 में प्रति हेक्टेयर गेहूं उत्पादन 4563 किलो था जो 2004 में घटकर 4207 किलो रह गया. इसी अवधि में चावल का उत्पादन 91.57 लाख मीट्रिक टन से घटकर 88 लाख मीट्रिक टन रह गया. खेती के इन नए तरीकों का पैरोकार करोड़ों रुपये का वो उद्योग है जिसे फर्टिलाइजर्स और कीटनाशक बनाने के लिए सरकार से भारी सब्सिडी मिलती है. कीटनाशकों की खपत के हिसाब से भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा बाजार है.
शर्मा कहते हैं, “मिट्टी में एक जैविक जीवन व्यवस्था होती है जिसे बीते दशकों के दौरान इनपुट-आउटपुट व्यवस्था में तब्दील कर दिया गया.” सालों तक रसायन उड़ेले जाने का परिणाम ये हुआ कि मिट्टी के जीवनदायी जीवाणु मर गए और उसकी उर्वरा शक्ति खत्म हो गई. इनमें से कई रसायन तो भूमिगत जल में भी घुल गए हैं जिसकी वजह से वो जहरीला हो गया है. जैविक खेती को बढ़ावा देने वाले 1500 किसानों के संगठन खेती विरासत मिशन के निदेशक उमेंद्र दत्त कहते हैं, “वास्तव में देखा जाए तो पंजाब की सारी जमीन बंजर हो गई है क्योंकि इसके प्राकृतिक पोषक तत्व खत्म हो चुके हैं. मिशन का एक सर्वे बताता है कि भारी सब्सिडी के बावजूद पंजाब का हर गांव रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर 40 लाख से छह करोड़ रुपये तक खर्च कर रहा है.
पर्यावरणविदों को चिंता सता रही है कि अगर सरकार रासायनिक खाद और कीटनाशकों को बढ़ावा देती रही तो वर्तमान खाद्यान्न संकट और बढ़ जाएगा. सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर से जुड़ीं कविता कुरुगंती कहती हैं, “प्राकृतिक संसाधनों को इस तरह से खत्म करने से उत्पादकता पर असर पड़ेगा. मगर रासायनिक खाद और कीटनाशक उद्योग की शक्तिशाली कंपनियों और उनके लिए नियम-कानून बनाने वालों का गठजोड़ ऐसे किसी भी तर्क को अनसुना कर देता है.” वो आगे जोड़ती हैं कि सरकार अगर मदद करे तो इस समस्या का इलाज मुमकिन है. मसलन आंध्र प्रदेश में 18 गांव ऐसे हैं जिन्होंने ग्रामीण विकास विभाग की मदद लेकर खुद को कीटनाशक मुक्त घोषित कर दिया है.
पंजाब के किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों की तुलना शराब से करते हैं. उनके मुताबिक ये एक ऐसा नशा है जिसे आप जमीन को जितना ज्यादा पिलाते हैं उसकी प्यास उतनी ही बढ़ जाती है और उत्पादकता उतनी ही कम होती जाती है. रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल मगर घटते उत्पादन और कीड़ों की बढ़ती प्रतिरोधकता का ये एक दुश्चक्र है. अधिकांश किसान जानते हैं कि बेहतर विकल्प हैं मगर उनके पास उन्हें अपनाने के लिए संसाधन नहीं हैं.
जीरा के एक छोटे से किसान सुरिंदर सिंह कहते हैं, ‘मुझे पता है कि ये कैमिकल्स अच्छे नहीं हैं मगर हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. कीड़े-मकोड़े मरते नहीं हैं इसलिए मैं कीटनाशक छिड़काव की मात्रा बढ़ाता रहता हूं” छिड़काव के दिनों में सुरिंदर के हाथ झुलस जाते हैं. उन्हें चक्कर आते हैं और कभी-कभी तो वो खेतों में ही उल्टी कर देते हैं. पांच एकड़ जमीन का ये टुकड़ा उन्होंने एक जमींदार से किराए पर लिया है और उनके पास ये विकल्प नहीं है कि वो अपने लिए अलग से रासायनिक खाद रहित अनाज उगा सकें. मगर सुरिंदर का कहना है कि वो किसी ऐसे विकल्प का स्वागत करेंगे. वो कहते हैं, “जब मैं 16 साल का था तो इस जमीन के एक एकड़ पर तीन क्विंटल अनाज उगता था. आज ये आंकड़ा 18 क्विंटल है. मगर तब मेरे गांव में कोई बीमारी नहीं थी. अब हर साल कीटनाशकों की वजह से 20-30 लोग मर जाते हैं.”
आंकड़े बड़ी दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं. पंजाब में देश की 2.5 फीसदी जमीन है मगर देश में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों और रासायनिक खाद के क्रमश: 18 और 12 फीसदी हिस्से की खपत यहां होती है. पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क की मानें तो कीटनाशक हर साल दुनियाभर में करीब 2 लाख लोगों की मौत का कारण बनते हैं. पर्यावरण संगठन ग्रीनपीस द्वारा पंजाब में किए गए एक हालिया अध्ययन में लोगों के खून में छह से लेकर 13 कीटनाशकों के नमूने पाए गए. विडंबना है कि क्लास-1 कीटनाशकों पर जहां दुनिया के कई देशों ने पाबंदी लगा दी है वहीं भारत में इनका उत्पादन, प्रचार और इस्तेमाल बदस्तूर जारी है. भारत में जो 147 कीटनाशक पंजीकृत हैं उनमें से केवल 50 की ही सहन सीमा और उनके स्वास्थ्य व पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया गया है.
जैविक खेती के दीर्घकालिक फायदों को देखते हुए पंजाब में कुछ किसानों ने ये विकल्प अपना लिया है. भटिंडा के हरतेज मेहता इनमें से एक हैं. उनके पास 11 एकड़ जमीन है जिसमें प्रति एकड़ 8-10 क्विंटल गेहूं की फसल होती है. दिलचस्प ये है कि ये गेहूं सामान्य के मुकाबले दुगुने दाम पर बिकता है. मंडी में गेहूं का वर्तमान मूल्य 1000 रूपये प्रति क्विंटल है जबकि मेहता अपना गेहूं 2000 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर बेचते हैं. पुराने दिनों को याद करते हुए वो कहते हैं, “मैंने दो बार छिड़काव से शुरुआत की थी और धीरे-धीरे ये आंकड़ा 20 पर आ गया. मैं छिड़काव करता गया और कीड़ों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती गई. आखिरकार मैंने फैसला किया कि मैं कीटनाशकों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करूंगा.”
मेहता अब तनावमुक्त हैं. उन्होंने नशे का विकल्प पा लिया है जिसे वो जीवअमृत कहते हैं. ये 200 लीटर पानी, 10 लीटर गोबर, 10 लीटर गौमूत्र, दो किलो गुड़, दो किलो आटे और साफ मिट्टी से मिलकर बनता है. मेहता अब न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए भी सरकार पर निर्भर नहीं हैं. वो अपने गेहूं को जैविक या ऑर्गेनिक उत्पाद कहते हैं और ये हाथोंहाथ बिक जाता है. मेहता बताते हैं, फसल कटने से पहले ही मेरा गेहूं 2000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बुक हो चुका था. आंकड़े बड़ी दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं. पंजाब में देश की 2.5 फीसदी जमीन है मगर देश में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों और रासायनिक खाद के क्रमश: 18 और 12 फीसदी हिस्से की खपत यहां होती है.
जैविक खेती में प्रति एकड़ उत्पादन की लागत कम है. प्रति एकड़ उत्पादन भी कम है मगर इसे अपनाने वाले किसान कहते हैं कि इसमें लाभ निश्चित रूप से ज्यादा है. वो अपनी फसल को ज्यादा कीमत पर बेच सकते हैं. और लोग भी स्वास्थ्यकर भोजन के लिए ज्यादा पैसा खर्च करने में संकोच नहीं करते. दिल्ली के ड्यूबडेन ग्रीन स्टोर में पांच किलो जैविक गेंहू के आटे की कीमत है 135 रूपए. जबकि इतने ही आम आटे की कीमत होती है 50 से 75 रूपए के बीच.
विडंबना देखिए कि रासायनिक और कीटनाशक बेचने वालों को भी जैविक उत्पादों के फायदों की जानकारी है. फिरोजपुर के बीचोबीच भीड़भाड़ भरी पुरानी सब्जीमंडी में सुरिंदर शर्मा की दुकान यूरिया, डीएपी, पोटाश, सुपर फास्फेट और जिंक सल्फेट जैसी तमाम तरह की रासायनिक खादों से भरी पड़ी है. बड़े-बड़े प्लास्टिक के बोरों पर संकर और जेनेटिकली उन्नत बीजों के विज्ञापन छपे हुए हैं. दुकान में घुसते हुए कोई भी इस बात की उम्मीद कर सकता है कि वो अपने सामान की तारीफ में कसीदे पढ़ेंगे लेकिन वो इसका बिल्कुल उल्टा करते हैं.
"रासायनिक खाद मिट्टी में मौजूद फायदेमंद प्राकृतिक जीवाणुओं को खत्म कर देती हैं और मिट्टी की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है. हरित क्रांति मिट्टी की गिरती गुणवत्ता, लोगों के गिरते स्वास्थ्य और पानी व वायु प्रदूषण के रूप में बड़ी कीमत वसूल रही है," सुरिंदर कहते हैं. जो भी उत्पाद वो अपनी दुकान पर आज बेच रहे हैं उनमें से ज्यादातर हरित क्रांति की देन हैं. हो सकता है आजीवका के लिए शर्मा को मजबूरी में इन उत्पादों को बेचना पड़ता हो लेकिन जहां तक उनके अपने भोजन का सवाल है उसके लिए वो कतई रासायनिक खाद से उगे हुए अन्न का इस्तेमाल नहीं करते.
पंजाब किसान आयोग के चेयरमैन जीएस कालकट हालांकि जैविक खेती को बेहतर बताते हैं मगर उनका तर्क है कि अगर सारे लोग जैविक खेती करने लगे तो अकाल की नौबत आ जाएगी. ये पूछने पर कि वो किस खाने को वरीयता देंगे तो उनका जवाब था रसायन रहित खाना.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विभाग के अध्यक्ष डा. उजागर सिंह कहते हैं "सरकार को खाद्यान्न की जरूरत है। हमें ज्यादा अनाज की जरूरत है। गुणवत्ता इसके बाद आती है।"
अजब गोरखधंधा है. नीतिनिर्माताओं, कृषि विशेषज्ञों और विक्रेताओं सबकी पहली पसंद स्वस्थ भोजन ही है। मगर यही वो लोग भी हैं जो सबसे पहले कहते हैं कि ये सबके लिए संभव नहीं है।
2001 में कृषि मंत्रालय ने एक टास्क फोर्स का गठन किया था जिसने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। इनमें से एक था कि उत्पादकता को ध्यान में रखते हुए जैविक खाद की कीमत रासायनिक खादों के बराबर की जाय। इस टास्क फोर्स की तमाम सिफारिशें फाइलो में दब गईं। बहरहाल 2004 में एक सुझाव को स्वीकार करते हुए नेशनल सेंटर फॉर बॉयो फर्टिलाइज़र्स को नेशनल सेंटर फॉर ऑर्गैनिक फार्मिंग में तब्दील कर दिया गया। इसके लिए बाकायदा 57 करोड़ रूपए का बजट जारी हुआ। लेकिन अब तक किसानों को रासायनिक खेती से जैविक खेती की तरफ मोड़ने की कोई पुख्ता नीति सामने नहीं आ पाई है।
भारत में तकरीबन 15,000 पंजीकृत जैविक खेती करने वाले किसान हैं। साल 2002 में कुल 20 करोड़ टन अनाज उत्पादन में मात्र 14,000 टन अनाज जैविक खाद्यान्न था। उत्पादन का ज्यादातर हिस्सा या तो निर्यात कर दिया गया या फिर 20 से 30 प्रतिशत प्रीमियम पर बड़े-बड़े विक्रेताओं को बेच दिया गया। 2006-07 में भारत द्वारा निर्यात किए गए जैविक फूड की कीमत 300 करोड़ रूपए थी। फिलहाल 35 जैविक उत्पाद निर्यात किए जा रहे जिनमें बासमती चावल, गेंहू का आटा, चने की दाल, आम, मसाले, कॉफी, चाय, काजू और सब्जियां शामिल हैं।
ये एक तरह से नये विभाजन की एक खाई है-- अमीरों के लिए जैविक खाना और गरीबों के लिए ज़हरीला। पर्यावरणविद वंदना शिवा इस घटना को संक्षेप में इस तरह से समझाती हैं-- "खान पान में भेदभाव"। दुर्भाग्य से खाद्यान्न उत्पादन में प्राथमिकता पोषकता को नहीं बल्कि मात्रा को दी जा रही है।
तुषा मित्तल
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प्रेषक : rajender chauhanI am a secretary of amit khadi gramoudyog sansthan. a runing traning program of orgenic farming and harvesting by our institution in garwal mandal of uttra khand. i wise you for this site. thank you . Rajender secretary amit khadi gramoudyog distt. muzaffar nager
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प्रेषक : संजय तिवारीबहुत अच्छी रिपोर्ट. यही पंजाब की हकीकत है.
























