कर्नाटक का चुनावी रंगमंच
पूरे कर्नाटक का चक्कर लगाने के बाद भी वहां चुनावों की कोई सरगर्मी नज़र नहीं आती। पार्टियों के झंडे, बैनर, पोस्टर और चुनाव सामग्री दूर-दूर तक नहीं दिखती। इस तरह के चुनावी अभियानों पर इस बार चुनाव आयोग ने शिकंजा कस दिया है। पार्टियों को सिर्फ चुनाव अभियान के लिए निर्धारित वाहनों और समारोह स्थलों पर ही झंडा-पताका लगाने की छूट है। बाकी किसी भी तरह के पोस्टर, टी-शर्ट, टोपी, आदि पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। पार्टियों के कार्यकर्ता इसे रंगहीन चुनाव कहते हैं इसके बावजूद कर्नाटक में चुनावी बुखार चरम पर है।
जनता की चुनावी दिलचस्पी न्यूज़ चैनलों और अख़बारों की तरफ केंद्रित हो गई है। चैनलों और अख़बारों में पार्टियां अपने विरोधियों के खिलाफ प्रचार अभियान चला रही हैं। बीजेपी ने अख़बारों में कांग्रेस के खिलाफ मंहगाई, विकास की अनदेखी और साथ ही राज्य में आतंकवादी हमलों की बाढ़ को मुद्दा बनाकर आक्रामक प्रचार अभियान छेड़ रखा है। बीजेपी का संदेश साफ है-- वही अकेली पार्टी है जो परिस्थितियों पर नियंत्रण कर सकती है, अगर उसे बहुमत मिले तो।
जेडी-एस द्वारा मुख्यमंत्री पद सौंपे जाने को लेकर हुए विश्वासघात का जिक्र पार्टी ने सिर्फ एक विज्ञापन में किया है। दूसरी ओर कांग्रेस का प्रचार अभियान बीजेपी-जेडी-एस गठबंधन की अस्थिरता को उजागर करने पर केंद्रित है। उसके मुताबिक गठबंधन के दोनों साझीदारों का ध्यान विकास की बजाय सिर्फ सत्तासुख लूटने पर लगा हुआ था। लाल कृष्ण आडवाणी ने एंकल में उपस्थित जन समुदाय के सामने एलान किया कि वो स्पष्ट बहुमत की उम्मीद कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता है तो वो विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे। तो फिर जेडी-एस क्या करेगी?
इन विज्ञापनों पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया है? विज्ञापनों के सांप्रदायिक स्वरूप से लोगों में गुस्से की भावना है। "बीजेपी के प्रचार अभियान का संदेश यही है कि आतंकवाद हर जगह घात लगाए बैठा है। पार्टी ने मुंबई ट्रेन धमाके, हैदराबाद मस्जिद में हुआ धमाका, बंगलोर के आईआईएस में हुआ हमला, और हाल ही में कर्नाटक के हुबली में मिले आतंकी कैंप सबको एक साथ जोड़ दिया है। हालांकि मामले अभी कोर्ट में लंबित हैं मगर उन्होंने बिना किसी प्रमाण के इसके लिए मुसलमानों को दोषी ठहरा दिया है। बीजेपी के पूर्वाग्रह इतनी मुखरता से पहले कभी नहीं दिखे थे," बंगलोर के विजया कॉलेज में लेक्चरर वीएस श्रीधर कहते हैं। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ की कर्नाटक इकाई के अध्यक्ष प्रोफेसर हसन मंसूर भी इससे सहमति जताते हैं, "इन सभी हमलों के लिए कांग्रेस द्वारा पोटा और टाडा क़ानूनों को वापस लेने को जिम्मेदार ठहराना हास्यास्पद है। और इन क्रूर कानूनों को लेकर मानवाधिकारवादियों ने जो तर्क दिए थे वो कहां हैं?"
इन विज्ञापनों को लेकर मालेश्वरम में हाई स्कूल की शिक्षिका वीना सीएस का नज़रिया थोड़ा अलग है, "विज्ञापन असल में एक भावनात्मक चाल भर हैं। बीजेपी भले ही केंद्र की कांग्रेस सरकार को महंगाई आदि के लिए जिम्मेदार ठहरा रही हो लेकिन कर्नाटक में तो 2006 से वही सत्ता में थी।"
ये चुनाव (नए परिसीमन के संदर्भ में) 2009 में होने वाले लोकसभा चुनावों के पूर्व परीक्षण के रूप में देखे जा रहे हैं। कांग्रेस, बीएसपी और सीपीएम की ओर से सोनिया गांधी, प्रणव मुखर्जी, राहुल गांधी, मायावती, प्रकाश करात, वृंदा करात स्टार प्रचारक रहे हैं तो वहीं बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और सुषमा स्वराज भी बीजेपी की ओर से राज्य के विभिन्न ज़िलों में मतदाताओं को संबोधित चुके हैं।
बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी ने एंकल में उपस्थित जन समुदाय के सामने एलान किया कि वो स्पष्ट बहुमत की उम्मीद कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता है तो वो विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे। तो फिर जेडी-एस क्या करेगी? नैतिक रूप से भ्रष्ट और सत्ता की भूखी पार्टी की छवि के बावजूद ये किंगमेकर की भूमिका में होने का दावा कर रही है। अगर एचडी कुमारस्वामी की जनसभाओं में उमड़ रही भीड़ को संकेत माने तो देवेगौड़ा का घमंड-- "देखता हूं जेडी-एस के बिना कौन सरकार बनाता है"-- सच होता दिख रहा है। लाल कृष्ण आडवाणी ने एंकल में उपस्थित जन समुदाय के सामने एलान किया कि वो स्पष्ट बहुमत की उम्मीद कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता है तो वो विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे। तो फिर जेडी-एस क्या करेगी?
हालांकि कांग्रेस भी चुनाव में स्पष्ट बहुमत की उम्मीद कर रही है। साप्ताहिक अख़बार "लंकेश" के वरिष्ठ राजनीतिक विचारक शिवसुंदर का मानना है कि कांग्रेस जोड़-तोड़ करने की बेहतर हालत में हैं और अंतत: गठबंधन सरकार चला सकती है। "इस स्तर पर कांग्रेस-जेडी-एस के बीच गठबंधन की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। अगर हम इन पार्टियों द्वारा कुछ मुख्य निर्वाचन क्षेत्रों (रामनगरम, कनकपुरा) में उतारे गए प्रत्याशियों पर निगाह डालें तो ये विश्वास और पुक्ता हो जाता है। रामनगरम में कांग्रेस ने एचडी कुमारस्वामी के मुकाबले पहली बार चुनाव लड़ रहीं ममता हेगड़े निचानी को उतारा है। बदले में कनकपुरा में जेडी-एस ने कांग्रेस के दिग्गज डीके शिवकुमार के सामने कमज़ोर उम्मीदवार उतारा है," शिवसुंदर बताते हैं। सिमोगा ज़िले के शिकारीपुरा निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी बीएस येदुरप्पा और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एस बंगारप्पा के बीच मुकाबला देखने लायक होगा। जहां जेडी-एस ने बंगारप्पा को खुला समर्थन किया है और उनके खिलाफ अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा किया है वहीं कांग्रेस ने कमज़ोर उम्मीदवार खड़ा करके बंगारप्पा को और मजबूती दी है। शिकारीपुरा में मतदान 16 मई को होना है।
जिन दिग्गजों को उनके परंपरागत निर्वाचन क्षेत्रों से हटा दिया गया हैं उनमें प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व उपमुख्यमंत्री एमपी प्रकाश और कर्नाटक अभियान समिति के चेयरमैन सिद्धारमैया प्रमुख हैं।
परिसीमन प्रक्रिया के तहत 80 निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया गया है। शायद बदलाव का सबसे ज्यादा असर बंगलुरु पर ही हुआ है। 16 सीटों के मुकाबले अब यहां 28 निर्वाचन क्षेत्र हो गए हैं। बंगलोर में आधारभूत ढांचे की आवश्यकता को महसूस करते हुए बीजेपी ने बंगलोर मास्टर प्लान शुरू करने का फैसला किया है। बीजेपी इन मुद्दों को हल कर पाने में कांग्रेस की विफलता को लगातार उजागर करती रही है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस एस एम कृष्णा की "बंगलुरु का मुख्यमंत्री" की छवि को भुनाने की फिराक में है।
लेकिन आधारभूत ढ़ांचे से जुड़े मुद्दों के इतर बंगलुरु कुछ और अहम मुद्दों पर भी जवाब मांग रहा है-- पेयजल की कमी का मुद्दा सबसे ऊपर है। नगर निगमकर्मी भाग्या जो झुग्गियों में रहते हैं, ने कहा, "हमारे इलाके में वोट मांगने आने वाले नेताओं का इंतज़ार कीजिए। हम उन्हें अपनी खाली बाल्टियों से मार कर भगाएंगे।" सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़, नई दिल्ली के आंकड़ों के मुताबिक 2004 के विधानसभा चुनावों में 60 प्रतिशत मतदान हुआ था, ये देखना दिलचस्प होगा कि इस बार भी मतदान इतने ही जोरशोर के साथ होता है कि नहीं!
संजना
07.05.08






















