राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   अपना-अपना नजरिया

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न तो नैतिकता का आडंबर और न ही त्रासदी का विलाप. कोलकाता के मशहूर या यूं कहें कि बदनाम लालबत्ती इलाके सोनागाछी के यौनकर्मियों के साथ बिताये कुछ दिनों ने लेखक दिलीप डिसूजा और फोटोग्राफर टॉम पीट्रेसिक का उनके प्रति पूरा नज़रिया ही बदल डाला. 

रेखा के छोटे से कमरे के बाहर पड़े कूड़े के डब्बे में ऊपर ही कॉन्डम का एक खाली पैकेट पड़ा है। अंदर उसके बड़े से बिस्तर के पीछे भी कुछ कॉन्डम्स रखे हुए हैं। जैसे ही हम बिस्तर पर बैठकर बातचीत में मशगूल हुए तभी ऊंची एड़ी की चप्पलें, सफेद स्कर्ट और काले रंग का टॉप पहने एक लड़की कमरे में दाखिल हुई, और चुपचाप एक कॉन्डम उठाकर वहां से चलती बनी। पंद्रह मिनट बाद वो फिर से वापस आई और गुस्से में कुछ बड़बड़ाने लगी।

हालांकि उसकी बंगाली मेरी समझ में नहीं आई लेकिन किसी तरह से मुझे उसके गुस्से की वजह का अंदाज़ा हो गया। दरअसल उसने अपने ग्राहक से दो बार कॉन्डम पहनने के लिए कहा था। जब वो इसके लिए तैयार नहीं हुआ तो उसने ग्राहक को धकिया कर बाहर निकाल दिया था। इतना कहने के बाद वो सांस लेने के लिए चुप हुई और फिर हमारी तरफ मुड़कर मुस्करा दी। उसे हमसे बातचीत करने में तो कोई परेशानी नहीं थी लेकिन फोटो खिंचवाने के लिए वो तैयार नहीं हुई। हालांकि रेखा को इस तरह की कोई झिझक नहीं थी। "जितनी चाहो उतनी फोटो खींच लो," वो कहती है।

ये पहली बार था जब मैंने यौनकर्मियों के बीच इतना बढ़िया वक्त बिताया था। मैंने कभी इस बात की कल्पना तक नहीं की थी कि उनमें से कुछ अपने पेशे के प्रति इतनी ईमानदार होंगी।

टॉम ने छत पर चढ़कर डूबते सूरज की नर्म सुनहरी किरणों से नहाए सोनागाछी और अंधेरे में समाए रेखा के घर की ढ़ेर सारी तस्वीरें खींचीं। जर्जर सीढ़ियों से चढ़कर छत पर पहुंचने पर हमें घर के बाहर मूंछोंवाला एक दुबला-पतला सा आदमी दिखाई दिया। उसके हाथ में मोबाइल फोन और चेहरे पर बेचैनी की रेखाएं साफ थीं। रेखा ने आहिस्ता से मुझे बताया कि वो उनका नियमित ग्राहक था। ये जानकर मैंने पहले तो उनसे माफी मांगी क्यों कि मैं नहीं चाहता था कि हमारी वजह से उन्हें अपना काम रोकना पड़े। मैं बस इतना कह पाया, "आप जाइए ना", इसके बाद मेरी आवाज़ ही नहीं निकली। मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि आगे क्या कहूं। रेखा मेरी असहजता को भांप कर हंसने लगीं।

"कोई बात नहीं," उसने मोबाइल फोन की तरफ इशारा करते हुए कहा। "मैंने उसे फोन करके कह दिया है कि अभी मैं उससे नहीं मिल सकती।" मैंने पूछा, "और वो मान गया?" "बिल्कुल!" रेखा कहती हैं, "मैं उससे बाद में मिल लूंगी।" अपने काम को लेकर 31 साल की एक औरत के इस खुलेपन से मैं हैरान था। आपको ये बात अजीब लग सकती है। हो सकता है आप इस पर विश्वास भी न कर पाएं, लेकिन ये पहली बार था जब मैंने यौनकर्मियों के बीच इतना बढ़िया वक्त बिताया था। मैंने कभी इस बात की कल्पना तक नहीं की थी कि उनमें से कुछ अपने पेशे के प्रति इतनी ईमानदार होंगी।

अपनी बहुमूल्य मध्यवर्गीय नैतिकताओं और इसकी जड़ों से जुड़े होने के कारण हमें उनके साथ पूर्वाग्रहरहित बर्ताव करने में खासी परेशानी हो रही थी। लेकिन उनके बीच इस बारे में बात करना उतना ही सहज था जितना कि खाने या फिर बच्चों की पढ़ाई का मामला। हालांकि ये सिर्फ एक पहलू भर है। रेखा एक यौनकर्मी है लेकिन साथ ही वो एचआईवी की रोकथाम के लिए काम करने वाली संस्था दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) की संयुक्त सचिव भी हैं। ये संस्था कोलकाता के लालबत्ती इलाके सोनागाछी की यौनकर्मियों के सामाजिक कल्याण के लिए काम करती है।

यहां वो कई तरह के कार्यक्रम चलाती हैं मसलन क्लीनिक, कॉन्डम वितरण, नुक्कड़ नाटक आदि। वहां कुछ दिन बिताने और उनके प्रयासों को देखने के बाद एक शब्द जो मेरे ज़ेहन में बार-बार आया वो है नज़रिया। सेक्स के धंधे को एक धंधे के रूप में देखें। न तो इस पर शर्म महसूस करें और न ही इस पर किसी तरह का निष्कर्ष दें। यौनकर्मियों को इस तरह से देखें जैसे कि दूसरे लोग आजीविका के लिए तमाम तरह की कोशिशें करते हैं। उन्हें खुद के बारे में सोचने का हक होना चाहिए। सब नज़रिए की बात है... बस।

देर शाम को हमारी मेजबान डीएमएससी की शुभ्रा हमें अपने एक कमरे वाले क्लीनिक ले गईं। क्लीनिक के बाहर गली में चुस्त और भड़कीले कपड़े पहने दर्जनों लड़कियां अपने ग्राहकों के इंतज़ार में बैठी थीं। अंदर भी कई महिलाएं मौजूद थी जो डीएमएससी को अपनी सेवाएं देना चाहती थी।

सबसे पहले एक महिला एक चार्ट के जरिए फीमेल कॉन्डम के उपयोग के बारे में बताती हैं। चार्ट कुछ इस तरह से बनाया गया है कि कल्पना के भरोसे

मैं उस वक्त आश्चर्य में पड़ गया जब मेरे हिलते हुए पैरों के नीचे कोई बालों वाली चीज़ आ गई। ये एक लड़की का सिर था जो बिस्तर के नीचे सो रही थी।
कुछ न छूटे। वो बड़ी सहजता से सारी बातें कह जाती है। मेरे भीतर का पत्रकारी जीव मुझे एक फीमेल कॉन्डम खरीदने के लिए प्रेरित करता है। शुभ्रा मुझसे कहती हैं, “तीन खरीदिए, एक शैंपू का पाउच मुफ्त मिलेगा। इसके बाद वो पास की एक अलमारी की तरफ मुड़ती है। उसके मुताबिक कोई चीज़ है जिसे पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें दिया है-- ये पुरुष यौनांग के आकार का लकड़ी का टुकड़ा (डिल्डो) है। इसकी मदद से वो पुरुषों के कॉन्डम के उपयोग का तरीका बाकी महिलाओं को बताती हैं। वो कहती हैं कि वो महिलाओं को खुद ही अपने ग्राहकों को कॉन्डम लगाने के लिए प्रेरित करती हैं। इसका मकसद एक तो ये सुनिश्चित करना होता है कि ये ठीक से लगा है या नहीं और दूसरे ये कस्टमर की यौन उत्तेजना बढ़ाने में भी सहायक होता है।

एक गर्म दोपहरी को हम गलियों के बीच मौजूद देवी के घर गए। 50 साल की इस विधवा के चेहरे पर झुर्रियों के बावजूद आकर्षण और आत्मविश्वास झलक रहा था। वो अब धंधे में नहीं है लेकिन कई मायनों में ये उनकी जिंदगी के लिए लिए अच्छा रहा है। खिड़की के पास पोर्टेबल टीवी पड़ा है। शेल्फ में एक कॉम्पैक्ट स्टीरियो है। बगल में फूलों से सजी उनकी मां की तस्वीर लगी है। लैंडलाइन और मोबाइल फोन अगल-बगल रखे हुए हैं। दीवाल पर बाबा आदम के ज़माने की घड़ी टंगी हुई है जो सालों पहले 8.30 पर अटक गई होगी और इसके पास ही रंगबिरंगा लैंप है। कमरा कमोबेश रेखा के कमरे जितना ही छोटा है। यहां भी हम बातचीत के लिए बिस्तर पर ही बैठे। सोनागाछी में हमने जितने भी बिस्तरों को देखा था ये बिस्तर भी उसी तरह का था यानी ये भी कार की पुरानी बैट्री के ऊपर टिका था। मैं उस वक्त आश्चर्य में पड़ गया जब मेरे हिलते हुए पैरों के नीचे कोई बालों वाली चीज़ आ गई। ये एक लड़की का सिर था जो बिस्तर के नीचे सो रही थी। उस थोड़ी सी जगह में जो बैट्री पर बिस्तर टिकाने से पैदा हो गई थी। वो बिस्तर के नीचे से निकलकर हमारे सामने खड़ी हो गई और थोड़ी देर बाद हमें चाय देकर फिर से सोने के लिए बिस्तर के नीचे चली गई। ये सीमित स्थान का अधिकतम उपयोग करने का सामान्य लेकिन रचनात्मक तरीका था। फिर मुझे अहसास हुआ कि कमरे में एक और भी बिस्तर है। अंदर आते समय हमने इस पर ग़ौर नहीं किया था। इसकी वजह ये थी कि ये छत के ऊपरी सिरे से लटक रहे एक पर्दे की आड़ में था। अब हमें कुछ आवाज़े सुनाई दे रही थीं। फुसफुसाहट वाली आवाज़ें-- एक पुरुष की आवाज़ जो नाराज़ लग रहा था, थोड़ी खींचातानी और बिस्तर के चरचराने की आवाज़ें और रह-रह कर हल्के से हंसने की आवाज़ें।

महज एक हाथ की दूरी पर, एक पतली चादर जो हवा के मंद झोंके से हिल रही थी, के पीछे बिस्तर पर एक जोड़ा मौजूद था। देवी ने हमें बताया कि औरतें यहां अपने ग्राहक को लेकर आती हैं और वो दूसरा बिस्तर घंटे के हिसाब से उन्हें किराए पर देती हैं। देवी को हमारी बेचैनी पर हंसी आ रही थी और मैं अपना ध्यान बातचीत पर केंद्रित करने की कोशिश कर रहा था। ये मुश्किल था, मैं बहुत असहज हो गया था क्योंकि मैंने कभी किसी जोड़े की अंतरंगता को इतने करीब से महसूस नहीं किया था। लेकिन कमरे में मौजूद चार महिलाओं के लिए ये कोई मुद्दा ही नहीं था।

इसे कहते हैं अपना-अपना नजरिया। 

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 7

  • प्रेषक : raish ahmad lali
    wakai apna apna nazaria hota hai. kolkata ke sonagachi par apki story bhi aise subject ke doosre pahlu ki taraf logon ka dhyan khinchti hai. aur wo hai manviya pahlu,jahan dard hai,sangharsh hai aur hai samaj se algao. tehelka ka wakai hamesha se apna nazaria raha hai. i salute the way you portray the picture of society and sins.
  • प्रेषक : TIRUPATI
    akhir o bhi insan hai, dukh aur dard her ek ka hota hai par kya kushi dena hamara kaam nahi hai? chehre ke piche chupi hui ye kahani hame antarmukh karti hai.
  • प्रेषक : nirala
    prabhavi lekh hai. nazaria badalna he hoga.kash ki aapki baato ko naitikata ke pahredaar samajh paate nirala
  • प्रेषक : अनिल यादव
    कोई भी महिला अपनी मर्जी से इस धन्धे को नही अपनाती है, ऐसे में हमें भी ऐसी महिलाओं के प्रति अपने नजरिये को बदलने की जरूरत है, लेखक इस लेख के लिए बधाई के पात्र हैं, ।
  • प्रेषक : sharmila
    Really great job done