राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   खुद के साथ प्रयोगों की शालाएं

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अंतरंगता. उग्रता. नई पहचान, अभिनव प्रयोग और न जाने क्या-क्या और है जो लड़कियों के छात्रावासों  के भीतर का जीवन दिलचस्प बनाता है। कुछ दिन यहां बिताने के बाद तुषा मित्तल इन्हें खुद के साथ प्रयोगों की अनोखी प्रयोगशालाओं जैसा पाती हैं।

महिला छात्रावासों के बारे में हल्की-फुल्की जानकारी रखने वालों के मन में यहां की छवि छोटे कमरे, गश्त लगाती वार्डेन, रंगीन दीवारें, आधी रात में बनने वाली मैगी और आपसी चटर-पटर तक ही सीमित है। लेकिन यहां की ज़िंदगी में जो दिखता है उससे कहीं ज्यादा होत हैं। यद्यापि ये लड़कियां ज्यादातर समय परखनलियों और बुंसन बर्नर के बीच या फिर कविताओं और थ्योरी की चीरफाड़ में बिताती हैं लेकिन इनकी असली प्रयोगशाला हॉस्टल का कमरा ही होता है। एक ऐसा निजी कोना जहां की गई खोजें और यहां के अनुभव ही भविष्य में उनके व्यक्तित्व को आकार देने का काम करते हैं।

दिल्ली में समय रात के आठ बजे से कुछ ऊपर हो चला है। महिला कॉलेज के लोहे के ऊंचे गेट के बाहर शहर की रोजमर्रा की आपाधापी अपनी नियत रफ्तार से चल रही है। परिसर के अंदर नज़र आ रहे खुले मैदानों में मंद रोशनी और शांति बिखरी पड़ी है। राजधानी की उथल-पुथल का कोई असर भीतर दिखाई नहीं देता। लेकिन बहुत जल्द जब रात का खाना खाने का वक्त खत्म होगा, पूरा परिसर नई नई गतिविधियों और चहल-पहल से सराबोर हो जाएगा। लड़कियां हर दिन की तरह अपने दैनिक जीवन का एक सबसे ज़रूरी काम निपटाने के लिए यहां इकट्ठा होंगी-- यानी साथ-साथ टहलना।

"हम हर दिन यहां टहलते हैं," लेडी श्रीराम कॉलेज की तृतीय वर्ष की छात्रा महिमा बताती हैं। "दरअसल मेरी ज़िंदगी में यही एकमात्र स्थायी चीज़ है," हंसते हुए महिमा कहती है और फिर लड़कियों के एक समूह में शामिल हो जाती है। कुछ लड़कियां आइसक्रीम खाने के लिए गेट से बाहर चली गई हैं। (आइसक्रीम वाले को भी पता है कि उसे कब गेट के बाहर खड़ा होना है)

जब लड़कियां टहल रही होती हैं उस वक्त ये किसी एक समुदाय का सा अहसास देती हैं। लेकिन ज्यादा नज़दीक से देखने पर इनके बीच की दरार दिखने लगती है। उनके बीच "बांग्ला समूह", "मल्लू समूह" और "लखनऊ समूह" बंटे हुए हैं। इनमें से कुछ इलीट समूह से संबंध रखती हैं जो सिर्फ अंग्रेज़ी बोलती हैं और डिज़ाइनर कपड़े पहनती हैं। ये "हिंदी भाषी समूह" के साथ अमूमन टहलने से परहेज करती हैं जो कि यहां हिंदी या संस्कृत ऑनर्स करने के लिए रह रहा हैं।

इसके बावजूद कुछ ऐसी सार्वभौमिक सच्चाइयां भी हैं जो इन लड़कियों को एकता के सूत्र में बांधती हैं-- कोई भी लड़की 7.30 के बाद बिना हस्ताक्षरित पत्र के बाहर नहीं जा सकती लेकिन ज़्यादातर जाती हैं और उनमें से भी ज्यादातर के पत्र और उनपर किए हस्ताक्षर फर्जी होते हैं, बहुत सी लड़कियां वाचमैन को बॉंन्ड कहती हैं, सभी खाने की बुराई और घर के खाने के लिए तरसा करती हैं और सब की सब नियमों को तोड़ती हैं या फिर ऐसी लड़कियों को जानती हैं जो नियम तोड़ती हैं। "मुझसे कहा गया था कि हॉस्टल के अंदर कोई इलेक्ट्रॉनिक्स की चीज़ें नहीं रख सकता," वसुंधरा सिंह कहती हैं। "मगर मैंने पाया कि सबके पास प्रेस और हेयरड्रॉयर था और कई तो जाड़ों में हीटर का भी इस्तेमाल करती हैं।" इसके अलावा उन्होंने बीयर की खाली बोतलें और जली हुई सिगरेट भी देखी। "वार्डन के चक्कर लगाने के बाद सब की सब पीने और सुट्टा मारने लगती हैं", वसुंधरा कहती हैं।

तीन साल पहले देहरादून स्थित अपना घर छोड़ने के बाद से तमाम चीज़ों के प्रति सिंह का नज़रिया काफी हद तक बदल गया है यहां तक कि अपने प्रति भी उनकी सोच बदली है। "इस हॉस्टल में आने से पहले मेरे मन में तमाम पूर्वाग्रह थे। किसी लड़की को पीते या फिर समलैंगिक जोड़े को देखकर पहले मैं शायद अचंभे में पड़ जाती। इसके अलावा लोगों के मन में पूर्वोत्तर से आने वाले हर आदमी के बारे में पूर्वनिर्धारित घारणा होती है कि वो नशेड़ी होते हैं। अगर मैं उनके साथ नहीं रहती तो शायद मैं भी यही मानती। पर अब ऐसा नहीं है।"

हॉस्टल में आने का मकसद सिर्फ खुले विचारों वाली बिंदास लड़की बनना भर नहीं है। इसकी बजाय यहां कई उन लोगों के साथ रहना पड़ता है जिनके सामान्य और स्वीकार्य होने की परिभाषा बिल्ककुल भिन्न होती है। एकाएक सारी रेखाएं धुंधली पड़ जाती हैं।

"पहचान का संकट सबसे बड़ी समस्या है," तीसरे वर्ष की छात्रा नेहा कहती हैं। "यहां आने से पहले हम जो थे उसके प्रति पूरी तरह से आश्वस्त थे लेकिन अब हम दुविधा में है।"

इनमें से ज्यादातर लड़कियां ऐसे घरेलू परिवेश से आती हैं जहां अच्छे और बुरे बर्ताव की एक निश्चित परिभाषा तय होती है। वो खुद को ऐसे चश्मे से देखती हैं जिसे समाज ने रचा है। यहां वो ढांचा टूट जाता है। हर कोई शून्य से शुरुआत करता है। यहां क़ानून हैं लेकिन वो सबके ऊपर एक समान रूप से लागू होता है। कठोर नियमों के बावजूद या कहें कि शायद कठोर नियमों की वजह से ही हॉस्टल ऐसी जगह के रूप में स्थापित हुए हैं जहां कई, पुरानी मान्यताओं को चुनौती दे कर नईयों पर विचार करते थे। विडंबना है कि बड़ी-बड़ी दीवारों के बीच वार्डन की मौजूदगी में एक नई तरह की आज़ादी पनपती है।

पराजित पोद्दार के लिए अपने गृहनगर हुगली से कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय की यात्रा उनके मन में एक नयी आज़ादी की भावना लेकर आई। "यहां आपको खूब आज़ादी मिलती है जो घर पर नहीं हो सकता," पोद्दार कहती हैं। "उदाहरण के लिए आप आपने पसंद का पहन-ओढ़ सकते हैं।" वो ऐसा ही करती भी हैं, "हॉस्टल में पहली बार मैंने स्पेघेटी टॉप और शॉर्ट्स पहना। मैं दूसरे लोगों को इसे पहने देखती थी और सोचती थी कि ये बहुत आरामदेह होता होगा।"

आज़ादी एक बड़ा शब्द है जो अपनी कीमत भी वसूलता है। मगर एक बार कपड़े औऱ कमरा साफ हुआ नहीं कि बस मौजां ही मौजां। "लोग यहां नए-नए प्रयोग करते हैं और ऐसी चीज़ों को सामान्य बनाने की कोशिश करते हैं जो सामान्यत: ऐसी नहीं मानी जातीं," केरल से आयी लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्रा गायत्री बताती हैं। "जब आप दूसरों को वही सब करते देखते हैं तो वो सामान्य लगने लगता है।"

एक लड़की को दूसरी लड़की के साथ डेट करते देखने ने गायत्री को कई नई चीज़ों से रूबरू कराया। "स्कूल में मैं कुछ लड़कियों की तरफ आकर्षित तो हुई थी लेकिन इसे जाहिर करने का कभी मौका नहीं मिला क्योंकि वहां हम पूरी तरह से द्विलिंगी परिवेश में रहा करते थे।" गायत्री आगे कहती हैं, "अगर मुझे इतनी सारी लड़कियों के साथ रहने का मौका नहीं मिलता तो मैं कभी अपने समलैंगिक पक्ष को लेकर कोई प्रयोग नहीं कर पाती। इस हॉस्टल ने मुझे अपने यौन रुझानों की दिशा जानने का मौका दिया।"

होमोसेक्शुएलिटी के प्रति गायत्री तो खुलकर बोलती हैं लेकिन उनकी ज्यादातर साथी इस पर चुप्पी साधे रहती हैं। गायत्री कहती हैं, "लोगों का सामने आना बहुत मुश्किल है क्योंकि समलैंगिकता कभी भी सारे लोगों को स्वीकार्य नहीं हो सकती।"

होमोसेक्शुएलिटी के साथ प्रयोग करने वालों में गायत्री अकेली नहीं हैं लेकिन वो उन बहुत कम लोगों में से हैं जो चाहरदीवारी के केवल एक तरफ ही रहना चाहती हैं। आजकल हॉस्टलों में बीयूजी(बाइसेक्शुअल टिल ग्रेज्युएशन) यानी कि स्नातक तक दोनों लिंगों के साथ प्रयोग करना भी आम सा हो चला है मगर गायत्री इससे खुश नहीं हैं। वो कहती हैं, "लोग यहां आते हैं हमारी भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं।...ग्रेजुएशन के बाद वो लड़कों के लिए आपको छोड़ देती हैं। वो सामान्य बन जाती हैं और आप मन मसोस कर रह जाते हैं।"

मगर बाहरी दुनिया की कुछ समस्याएं यहां भी हैं।

"विडंबना ये है कि हमारे ऊपर क़ानून थोपने वाली खुद महिलाएं ही हैं। औरतों की नज़र भी पुरुषों की तरह हो गई है। हमें कैसे चलना है, क्या पहनना है सब निर्धारित है। किसी ने अगर बैगी कपड़े पहन लिए या फिर महिलाओं के लिए निर्धारित ढांचे को तोड़ने की कोशिश की तो उसे लोग घूरने लगते हैं।" गायत्री गुस्से में कहती हैं,

पर शायद इसी असहजता के पीछे आज़ादी का अहसास भी छुपा है। "जब मैं ब्रा और जींस पहन कर घूमती हूं तो लोग मुझे घूरते हैं, पर मैं उनकी परवाह नहीं करती हूं," महिमा कहती हैं। "लड़की होने की झिझक ही खत्म हो गई है।" शुरुआत में फर्स्ट ईयर की तमाम छात्राओं को एक दूसरे के सामने कपड़े बदलने में अटपटा महसूस होता था लेकिन जल्द ही इस झिझक का स्थान अंतरंगता ने ले लिया। "जब मैं कपड़े बदलती थी तब मेरी सहेलियां मुझे परेशान करती थी। बदले में जब वो अपने कपड़े बदलती थी तब मैं उनके कपड़े छिपा देती थी," पोद्दार कहती हैं।

हॉस्टल परिसर के भीतर अंडरवियर पहन कर घूमना हॉस्टल लाइफ का अनिवार्य हिस्सा है। कुछ महिलाएं तो अंडरवियर पार्टियां भी देती हैं। इसमें फैन्सी अंतरवस्त्र, शराब, सिगरेट और तुरत-फुरत में चॉकलेट हॉर्लिक्स और बिस्किट्स की मदद से बनाया गया केक भी शामिल होता है। पुरुषों को यहां आने की इजाजत तो नहीं होती लेकिन उनकी अदृश्य मौजूदगी यहां होने वाले हर क्रियाकलाप में नज़र आती है।

चारदीवारियों और नियम-कानूनों के अलावा एक और चीज़ है जो हॉस्टल के इन वासियों को आपस में बांधती है और वो है अंदर की बातें बाहर न जाने देने की इनकी साझा समझ।

"बहुत सी लड़कियां धूम्रपान से परहेज करती हैं। कइयों को इससे एलर्जी होती है लेकिन हम दूसरों से इसके बारे में नहीं कहते," सिंह मुस्कुराते हुए कहती हैं। वो आगे जोड़ती हैं, "हम एक समुदाय के रूप में रहना सीख रहे हैं। हम समझौता करना और लोगों को उनके हिसाब से स्वीकारना सीख रहे हैं। दरअसल हम विकास की प्रक्रिया में हैं। ये ऐसा स्थान है जो आपका दिमाग खोल देता है।"

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 1

  • प्रेषक : umesh kumar soni
    यह आधुनिक हिन्दुस्तान की आधुनिक नारियोँ की तस्वीर है। जो महिलायँ शराब खोरी और धूम्रपान मे डूबी होँ उनकी संताने कैसी होगी इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। अभी तक पिता की शराब खोरी के दुष्प्रभाव का नतीजा संतानो को भोगना पडता था अब माताओ की स्वेच्छाचारिता का पाप भी संताने भुगतेगी। भारत मे अब अवैध संतानो की संख्या मे लगातार बढोत्तरी होगी क्योकी स्त्री शराब खोरी करके बेहोसी मे पुरुषो के साथ मौज करेंगी अवैध संतानो को जन्म देगी। ए समस्याएँ नई तरह की होगी जिससे समाज और सरकार को निपटना पडेगा।