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   नया नेपाल नयी चुनौतियां
नेपाल के जनादेश से सभी हैरत में हैं. काठमांडू के पंडित, मुख्य राजनीतिक पार्टियां और यहां तक कि भारत सरकार भी. इन सभी के आकलनों को धता बताते हुए नेपाल की जनता ने संविधान सभा के लिए हुए चुनाव में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में अपना जबर्दस्त भरोसा जताया है. गौरतलब है कि ये वही पार्टी है जिसने हाल तक देश में सशस्त्र बगावत छेड़ रखी थी.
संविधान सभा में कुल 601 सीटें हैं. इनमें से 240 सीटों का फैसला सीधे मतदान के जरिये हुआ है जबकि 335 सीटों का बंटवारा अलग-अलग पार्टियों में उनके वोट प्रतिशत के अनुपात के आधार पर होगा. 26 सीटों पर विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित लोगों को नामांकित किया जाएगा. चुनाव नतीजों से साफ हो गया है कि पूर्व विद्रोही संविधान सभा में सबसे बड़ा दल होंगे. हालांकि ये अभी साफ होना है कि क्या वोट प्रतिशत के आधार पर उन्हें बहुमत के लिए पर्याप्त सीटें मिल पाएंगी?
पिछले तीन साल से नेपाल बदलाव के दौर से गुजर रहा है. ताजा घटनाक्रम देश में आ रहे बदलाव का एक अहम मोड़ है. राजसत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए माओवादियों और राजनीतिक पार्टियों ने हाथ मिलाया था. इससे राजनीति की मुख्यधारा का स्वरूप बदला. माओवादियों ने हिंसा छोड़ दी और सरकार में शामिल हो गए. इसके बाद आम सहमति बनी कि एक नई व्यवस्था बने और इस बदलाव के लिए एक संविधान सभा का गठन किया जाए. नेपाल नरेश के सारी शक्तियां हाथ में लेने से जनांदोलन तक, सशस्त्र विद्रोह से लेकर शांति प्रक्रिया तक और एक हिंदू राष्ट्र से धर्मनिरपेक्ष राज्य बनने तक का सफर बताता है कि भारत के उत्तर में स्थित इस पड़ोसी देश का इतिहास बहुत तेजी से बदल रहा है. नेपाल नरेश के सारी शक्तियां हाथ में लेने से जनांदोलन तक, सशस्त्र विद्रोह से लेकर शांति प्रक्रिया तक और एक हिंदू राष्ट्र से धर्मनिरपेक्ष राज्य बनने तक का सफर बताता है कि भारत के उत्तर में स्थित इस पड़ोसी देश का इतिहास बहुत तेजी से बदल रहा है.
मगर बदलाव का ये सफर आसान नहीं रहा है. अतीत में दो बार ऐसी स्थितियां बनीं कि चुनाव टाल दिए गए. क्षेत्रवाद की राजनीति खासकर दक्षिण की तराई में मधेशियों के आंदोलन से कई नए सवाल खड़े हुए. सीमित क्षमताओं और वैधता के संकट से गुजर रहे इस देश को कई मांगों से जूझना पड़ा. राजशाही समर्थकों ने बदलाव की इस प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश की. सेना ने जनतांत्रिक सरकार का मुखर विरोध किया. माओवादी नेतृत्व को हिंसा के आदी अपने कैडर को शांत रखने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी. चुनावी संभावनाओं को लेकर सभी पार्टियों को कई आशंकाएं रहीं और सभी चुनाव की तारीखों को आगे बढ़वाने के लिए तैयार थे.
मगर नौ सालों के बाद अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए नेपाली जनता का उत्साह और उसकी इच्छाशक्ति ने हर आशंका को पीछे छोड़ दिया. आखिरकार चुनाव का दिन आया और 10 अप्रैल को समूचे देश में लोग भारी संख्या में मतदान के लिए उमड़े. लोगों ने इस चुनाव को शांति प्रक्रिया के स्वाभाविक नतीजे के रूप में भी देखा. भारत की तरफ से पड़ रहे दबाव ने भी इसमें अपनी भूमिका अदा की. मददकर्ताओं की आशंकाओं और तराई के कुछ उग्रवादी गुटों की धमकियों के बावजूद चुनाव शांति से संपन्न हुआ.
मतदान के नतीजों ने सबको हैरत में डाल दिया. देश की सबसे पुरानी पार्टी और काठमांडू में सरकार चलाती आ रही नेपाली कांग्रेस को अपनी अब तक की सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा. प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला का अपनी पुत्री सुजाता को उत्तराधिकारी घोषित करने का सपना चूर हो गया. सुजाता तराई के अपने संसदीय क्षेत्र में एक मधेशी नेता से हार गईं. पार्टी के कई दूसरे दिग्गजों को भी मुंह की खानी पड़ी. इनमें पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष सुशील कोईराला, शांति प्रक्रिया के महत्वपूर्ण मध्यस्थ शेखर कोईराला और गृह मंत्री कृष्ण प्रसाद सितौला शामिल हैं. दरअसल देखा जाए तो तराई में नेपाली कांग्रेस का परंपरागत आधार खिसककर स्थानीय मधेशी पार्टियों के पास पहुंच गया है. लोगों ने 1990 से 2002 के दौरान अलग-अलग समय के लिए सरकार चलाने वाली नेपाली कांग्रेस के खराब रिकॉर्ड को देखने हुए इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया. पार्टी के भ्रष्ट और जनता की मुश्किलों से बेखबर नेता, अंदरूनी कलहें, ज्यादातर निष्क्रिय रहने वाली संगठनात्मक व्यवस्था और हालात के हिसाब से खुद को बदल पाने में असमर्थता जैसे कारक इसे ले डूबे.
उधर, मुख्यधारा की राजनीति में वामपंथ का प्रतिनिधित्व करने वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी(यूएमएल) के बारे में ये अनुमान लगाए जा रहे थे कि संविधान सभा में ये सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी. पार्टी की छवि न तो नेपाली कांग्रेस की तरह परंपरावादी पार्टी की ही थी और न माओवादियों की तरह चरमपंथी वाली. शायद इसीलिए पार्टी महासचिव माधव कुमार नेपाल को लगा था कि उनकी जीत तय है और निजी रूप से उन्होंने एक बार कह भी दिया था कि वही देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे. मगर दुर्भाग्य देखिए कि दो जगहों से खड़े होने के बावजूद वो चुनाव हार गए. यूएमएल के वोटर माओवादियों के पाले में चले गए और पार्टी के सभी बड़े नेताओं—जिनमें पूर्व उपप्रधानमंत्री बामदेव गौतम व के पी ओली, स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य रघूजी पंत, प्रदीप नेपाल, ईश्वर पोखरेल भी शामिल हैं---को मुंह की खानी पड़ी. अब पार्टी को खतरा ये है कि जल्द ही उनका जमीनी स्तर का कैडर पाला बदलकर माओवादियों के साथ न चला जाए. पार्टी को इस बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा कि वो एक विस्तृत वाममंच में छोटी हैसियत के साथ काम करे या नेपाली कांग्रेस के साथ रहकर माओवादियों का सामना करे. राष्ट्रपति बनने की चाह रखने वाले प्रचंड को अभी कुछ समय तक रुकना पड़ सकता है क्योंकि अंतरिम संविधान में अभी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. संविधान में कहा गया है कि नए संविधान का गठन होने तक सभी दलों की गठबंधन सरकार का देश पर शासन जारी रहेगा.
पर ये कहना कि माओवादियों को मिली ऐतिहासिक जीत सिर्फ सत्ता के खिलाफ जनता के गुस्से का नतीजा है न्यायसंगत नहीं होगा. माओवादी इसलिए भी जीते क्योंकि वे जनता के एक बड़े हिस्से, खासकर उपेक्षितों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनके संगठन की जड़ें पूरे देश में फैली हुई हैं. उनके पास एक समर्पित कैडर और एक ऐसा नेतृत्व है जिसने भूमिहीनों, दलितों, वंचितों और महिलाओं के हक में आवाज उठाई और चतुराई से उम्मीदवारों का चयन किया. दरअसल पूर्व बागी सभी राजनीतिक दलों में सबसे चतुर साबित हुए. अब चुनौती न सिर्फ ये है कि वो अपने वादों को कैसे पूरा करेंगे बल्कि ये भी कि वो उन अलग-अलग वर्गों के अलग-अलग हितों में सामंजस्य कैसे बिठाएंगे जिन्होंने उन्हें वोट दिया है. यही वो मुख्य और दीर्घकालिक चुनौती है जो नेपाली राजनीति के भविष्य को निर्धारित करेगी.
मगर इन अनपेक्षित चुनाव नतीजों से कुछ फौरी चुनौतियां भी पैदा हुई हैं. पहली चुनौती ये है कि काठमांडू में शक्ति संतुलन बदलेगा और प्रधानमंत्री कोईराला को कुर्सी बाबूराम भट्टाराई को सौंपनी होगी. राष्ट्रपति बनने की चाह रखने वाले प्रचंड को अभी कुछ समय तक रुकना पड़ सकता है क्योंकि अंतरिम संविधान में अभी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. संविधान में कहा गया है कि नए संविधान का गठन होने तक सभी दलों की गठबंधन सरकार का देश पर शासन जारी रहेगा. मगर एक माओवादी प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती भरे सवाल खड़े करता है, खासकर अमेरिका के लिए जो माओवादियों को अब भी चरमपंथी कहता है.
उधर, नौकरशाही, सुरक्षा बल, सेना और व्यापारिक समुदाय नई व्यवस्था में असहज महसूस करेंगे मगर उनके पास अब ज्यादा विकल्प हैं भी नहीं. संविधान सभा की पहली बैठक में राजशाही को औपचारिक तौर पर खत्म कर दिया जाएगा. राजशाही समर्थक इसे ये कहकर टालने की भरसक कोशिश कर रहे हैं कि ये फैसला आज से दो साल बाद नए संविधान की घोषणा के समय लागू हो. राजा ज्ञानेंद्र भी अपने लिए किसी भूमिका की तलाश में चुनाव समर्थक बयान देते रहे हैं और माओवादियों के साथ पिछले दरवाजे से बातचीत करने की कोशिश भी कर रहे हैं. मगर उनका खेल लगभग खत्म हो चुका है और आज नहीं तो कल उन्हें नारायणहिति छोड़ना ही होगा.
संविधान सभा और इसके बाहर इससे भी अहम चर्चाएं और फैसले संघवाद और नई संघीय इकाइयों के स्वरूप को लेकर होंगे. माओवादियों की जन मुक्ति सेना के 19,000 सिपाही फिलहाल संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में चल रहे शिविरों में रह रहे हैं. शांति समझौते के मुताबिक उनका विलय राष्ट्रीय सेना में किया जाना है. मगर राजनीतिक महत्वकांक्षाएं रखने वाले सैन्य मुखिया रुकमंगत कटुवाल ने साफ कर दिया है कि वो सुरक्षा क्षेत्र के सुधारों के पक्ष में नहीं हैं. ये देखना अहम होगा कि माओवादियों और सेना का ये रिश्ता कैसा स्वरूप लेता है.
भारत ने चुनाव सफलता से संपन्न होने पर 10 अप्रैल की शाम को खुशी जताई थी. मगर जब अगले दिन परिणाम आने शुरू हुए तो उसने इन्हें लेकर चिंता व्यक्त की. असल में वहां कोई भी माओवादियों की जीत के लिए तैयार नहीं था. दिल्ली में बैठे कुछ लोगों के मन में चुनाव नतीजों में धांधली करवाने की मंशा जरूर उभरी होगी पर लगता है कि आखिर में उनमें से अच्छे इरादे रखने वालों की जीत हुई. प्रणब मुखर्जी ने नतीजों को एक सकारात्मक घटनाक्रम बताया और राजदूत ने भी कहा है कि काठमांडू में जो भी सत्ता में आए, भारत उसके साथ काम करने के लिए तैयार है. ये बहुत जरूरी है कि भारत नेपाल की शांति प्रक्रिया को आगे भी समर्थन देता रहे. माओवादियों और भारतीय नक्सलियों के बीच के रिश्तों के बारे में भारत के दक्षिणपंथी और खुफिया एजेंसियां बढ़ा-चढ़ाकर बताते रहे हैं. नेपाल के माओवादी अपने आंदोलन को बाहर कहीं भी नहीं भेज रहे और भारत को इस बारे में चिंतित होने की जरूरत नहीं है.
देश अब एक नया संविधान लिखने के रोमांचकारी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है. अब जिम्मेदारी माओवादियों पर है कि वो अहिंसात्मक तरीके से, बुनियादी लोकतांत्रिक आजादी का सम्मान करते हुए और क्षेत्रीय व वैश्विक सच्चाइयों को पहचानकर देश की बागडोर थामें और एक नये नेपाल का निर्माण करें.
प्रशांत झा
(लेखक नेपाली पत्रकार हैं)
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प्रेषक : Anand ChoudharySuch a nice artical. Prashant jha is very experianced writer. writer have strong Knowlage about Nepali politics. congratulation
























