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   आखिर दूर हुई अस्पृश्यता
ऐसा विरले ही देखने को मिलता है कि 80 साल की उम्र में कोई नेता शिखर तक के कठिन सफर की एक नई शुरुआत कर रहा हो. मगर लालकृष्ण आडवाणी कोई आम नेता नहीं हैं. कैमरों की चमचमाती फ्लैशलाइटों के बीच जब पिछले महीने उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘माई कंट्री माई लाइफ’ का विमोचन किया तो ये उस शिखर के लिए उनकी नई यात्रा की शुरुआत थी जिसे छूने का सपना वो लंबे समय से देख रहे हैं यानी देश के प्रधानमंत्री का पद.
आडवाणी की आत्मकथा ‘माई कंट्री माई लाइफ’ को दो तरह से पढ़ा जा सकता है. पहला, आप इसे समकालीन इतिहास के प्राथमिक स्रोत के तौर पर पढ़ सकते हैं. वो इतिहास जो एक ऐसे व्यक्ति का आंखों देखा अनुभव है जिसने महत्वपूर्ण फैसले किए या जिसने 70 के दशक के शुरुआती वर्षों से देश में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों को काफी करीब से देखा.
दूसरी तरफ 942 पन्नों की इस भारी किताब को उस व्यक्ति की सोच के रूप में भी देखा जा सकता है जिसने भारत के राजनीतिक परिदृश्य को एक नया आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
जिन्होंने इस आत्मकथा को इस उम्मीद में पढ़ा होगा कि उन्हें भारतीय राजनीति की कुछ सनसनीखेज जानकारियां हाथ लगेंगी उनकी निराशा को समझा जा सकता है. कहा भी जा रहा है कि किताब में आडवाणी कई मुद्दों पर सावधानी से बचते हुए आगे निकल गए हैं. बीजेपी के अंदरुनी झगड़ों, अयोध्या आंदोलन, छह साल की एनडीए सरकार के दौरान गठबंधन का प्रबंधन कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर किताब में लिखे गए शब्दों के इतर कुछ लोग कई और जानकारियां जोड़ने का दावा कर सकते हैं.
मगर ये स्वाभाविक भी है. आमचुनाव के लिए अब एक साल से भी कम का समय बचा है और अपनी सेना की कमान संभालने वाले आडवाणी को बखूबी पता होगा कि एक भी गलत चाल का मतलब क्या हो सकता है. अपनी आत्मकथा में उन्होंने इस बात का खूब ध्यान रखा है कि पुराने विवादों की ज्यादा गहराई में न जाया जाए. कंधार विमान अपहरण कांड के बारे में आडवाणी के जिन शब्दों पर हंगामा हुआ वो उनकी किताब के नहीं थे बल्कि किताब के सिलसिले में दिए गए एक साक्षात्कार के दौरान उनके मुंह से निकले थे.
| सवाल ये उठता है कि जिस आत्मकथा में न सनसनीखेज खुलासे हैं और न संघ परिवार को नाराज करने वाली कोई बात तो फिर कांग्रेस नेतृत्व और कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाला मीडिया क्यों हाथ धोकर इसके पीछे पड़ा है? |
तो फिर सवाल ये उठता है कि जिस आत्मकथा में न सनसनीखेज खुलासे हैं और न संघ परिवार को नाराज करने वाली कोई बात तो फिर कांग्रेस नेतृत्व और कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाला मीडिया क्यों हाथ धोकर इसके पीछे पड़ा है? उदाहरण के लिए कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी बीजेपी के बारे में बोलना छोड़कर किताब के बारे में कह रहे थे, “तथाकथित नेता की आत्मकथा एक सीधे से सिद्धांत का अनुसरण करती है—जो भी अच्छा हुआ उसका श्रेय मुझे और जो भी खराब उसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की.” उधर, राजस्थान के दुर्गापुर में एक रैली में सोनिया गांधी ने ये कहते हुए आडवाणी की खिल्ली उड़ाई कि कंधार संकट के दौरान वाजपेयी को आडवाणी पर भरोसा नहीं था. बीजेपी सदस्यों और समर्थकों को निशाना बनाकर चलाये गए एक एसएमएस कैंपेन में आडवाणी को एक ऐसे आत्ममुग्ध व्यक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश की गई जो हिंदू हितों को धोखा देने को तैयार है.
आडवाणी पर लगातार हमला करने और उन्हें विवाद में घसीटने के पीछे कांग्रेस की एक योजना है. इसका पहला मकसद ये है कि यूपीए सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन, खासकर महंगाई को रोक पाने में इसकी नाकामयाबी से लोगों का ध्यान हटाया जाए. इससे भी अहम लक्ष्य ये है कि पुरानी घटनाओं को लेकर बीजेपी के भीतरी खेमों और संघ परिवार के साथ उसके रिश्तों में पुराने मतभेदों को फिर से जीवित किया जाए. इनमें कंधार में आतंकवादियों की रिहाई और 2005 में पाकिस्तानी दौरे के दौरान जिन्ना पर आडवाणी का बयान शामिल है. कांग्रेस का ये गणित अपनी जगह सही है कि अगर आडवाणी को लेकर बीजेपी के भीतर ही टकराव हो जाए तो एनडीए द्वारा उन्हें वाजपेयी के योग्य उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने की संभावनाएं कमजोर हो सकती हैं.
1999 के आम चुनावों में सत्तासीन होने के बाद वाजपेयी सरकार अतिआत्मविश्वास की शिकार होती चली गई. बीजेपी का अनुमान था कि राजनीति और पार्टी संचालन के लिहाज से सोनिया गांधी अकुशल हैं और ये बात उसके लिए फायदेमंद साबित होगी. बीजेपी ने अपने प्रतिद्वंदी की ताकत को कमतर आंकने की भूल की और उसे 2004 में इसका खामियाजा उठाना पड़ा. कांग्रेस को डर है कि कहीं वो भी यही गलती न कर बैठे.
आडवाणी को लेकर कांग्रेस का डर जायज भी है. निजी तौर पर किए गए चुनाव पूर्व सर्वेक्षण बताते हैं कि दिसबंर 2007 में वाजपेयी के रिटायरमेंट के बाद उन्हें मिलने वाले समर्थन का उत्तराधिकार लगभग आडवाणी के हिस्से आ गया है. वाजपेयी की सक्रियता के दिनों में ये दो या तीन फीसदी लोग ही प्रधानमंत्री पद के लिए आडवाणी का समर्थन करते थे. अब उनके पीछे सोनिया गांधी जितना ही समर्थन है. उधर, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित बीजेपी के दूसरे दिग्ग्जों में से कोई भी अभी सही मायनों में राष्ट्रीय नेता के स्तर तक नहीं पहुंच पाया है. आडवाणी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वो हर तरह के मतदाताओं के लिए एक स्वीकार्य चेहरा बन चुके हैं.
ये भी दिलचस्प है कि स्वीकार्यता का ये आभामंडल आडवाणी को हाल के वर्षों में ही मिला है. 1990 में राम रथयात्रा से पहले आडवाणी का नाम संघ परिवार और राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों तक ही सीमित था. मगर रथयात्रा ने उन्होंने लोकप्रिय नेताओं की पांत में खड़ा कर दिया. जिस आंदोलन के तहत उन्होंने ये रथयात्रा शुरू की थी उसने वी पी सिंह सरकार की बलि ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस को हाशिये पर धकेला और राजनीति में नया ध्रुवीकरण पैदा कर दिया. ये आडवाणी की हिम्मत ही थी जिसकी बदौलत बीजेपी भारतीय राजनीति के वैकल्पिक ध्रुव के रूप में उभरी.
आक्रामक हिंदुत्व वाले तेवरों ने बीजेपी के आधार का विस्तार किया. इससे आडवाणी का कद तो बढ़ा मगर उनके लिए छवि का एक ऐसा संकट पैदा हो गया जिसके प्रति वो हमेशा सचेत रहते थे. आडवाणी जहां मध्यवर्ग के चहेते बन गए वहीं प्रबुद्ध वर्ग ने उन्हें परित्यक्त कर दिया. उन पर कट्टरता का लेबल चस्पा हो गया और कहा जाने लगा कि जिन्ना की तरह उन्होंने भी संकीर्ण स्वार्थों के लिए धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल किया. ये याद रखना अहम है कि 1990 से 1998 के इस दौर में आडवाणी की छवि काफी कुछ वैसी ही थी जैसी आज मोदी की है. जो बीजेपी के समर्थक थे वो आडवाणी को हाथोंहाथ लेते थे मगर बीजेपी से मतभेद रखने वाले उन्हें अस्पृश्य मानते थे और डरकर उनसे दूर भागते थे.
90 के दशक के कट्टर चेहरे से लेकर आज के सर्वस्वीकार्य नेता की छवि तक आडवाणी की ये यात्रा काफी दिलचस्प रही है. इस सफर के दौरान उन्होंने जीत, हार, ठुकराव, अलगाव और फिर सम्मानजनक बहाली के कई मंजर देखे. बीजेपी के लिए भी ये सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा. 1996 तक पार्टी और इसकी दिशा को तय करने वाले सिद्धांत निश्चित थे. पार्टी को यकीन था कि वो भारत की छवि को नया आकार देगी और राष्ट्रवाद का पुनरुत्थान करेगी. मगर गठबंधन के अनुभव ने उसे कुछ जमीनी और कड़वी हकीकतों से दो चार होना पड़ा . फिर भी कम से कम पार्टी को कुछ सिद्धांतों की बलि देने के एवज में सत्ता का स्वाद चखने का संतोष था. मगर 2004 की हार से इसे करारा झटका लगा. सिंद्धातों से भटकी और सत्ता से हाथ धो बैठी पार्टी असमंजस में थी कि वो 90 के दशक के कट्टर हिंदुत्व के एजेंडे पर वापस जाए या उसी नए रास्ते पर चले. ऐसे हालात में एक संपूर्ण और सुसंगठित राजनीतिक बहस की जरूरत थी जो दुर्भाग्य से कभी नहीं हुई. पार्टी नेतृत्व ने संघ के साथ कई बार संवाद किया मगर इसके ज्यादा सार्थक परिणाम नहीं निकल सके. केंद्र और राज्यों में सत्ता का स्वाद चखने के बाद पार्टी का राजनीतिक नेतृत्व, गैरराजनीतिक संघ की गतिविधियों से खुद को जोड़ पाने में मुश्किल महसूस कर रहा था. उधर संघ चाहता था कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में उसकी उपस्थिति को और बढ़ाया जाए.
| बीजेपी का अनुमान था कि राजनीति और पार्टी संचालन के लिहाज से सोनिया गांधी अकुशल हैं और ये बात उसके लिए फायदेमंद साबित होगी. बीजेपी ने अपने प्रतिद्वंदी की ताकत को कमतर आंकने की भूल की और उसे 2004 में इसका खामियाजा उठाना पड़ा. कांग्रेस को डर है कि कहीं वो भी यही गलती न कर बैठे. |
फिर 2005 में आडवाणी पाकिस्तान गए. अपने इस दौरे को उन्होंने बीजेपी की दृष्टि के विस्तार की जरूरत पर जोर देने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की. लेकिन जिन्ना पर बयान ने आडवाणी को मुश्किलों में डाल दिया. उनकी चारों तरफ से आलोचना हुई और इसके बाद वो हाशिये पर जाते दिखने लगे. संघ ने आडवाणी के पार्टी की सोच से अलग जाने की इस घटना को बीजेपी पर अपनी पकड़ बढ़ाने के लिए मौके के तौर पर इस्तेमाल किया. इसके चलते बीजेपी में कई स्तरों पर संघ के कार्यकर्ताओं की नियुक्तियां हुईं. 2005 की गर्मियों से लेकर आडवाणी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने तक दिशाहीन बीजेपी ने कई झटके खाए.
मगर असमंजस के भंवर में फंसी पार्टी को चुनावी नतीजों का सहारा मिला. बिहार, पंजाब और उत्तराखंड में बीजेपी और इसके सहयोगियों ने बेहतर चुनाव प्रबंधन, सत्ता विरोधी लहर और विकास को मुद्दा बनाकर कांग्रेस और इसके सहयोगी दलों को धूल चटा दी. गुजरात में मोदी को भीतर और बाहर दोनों ही तरह के दुश्मनों से लड़ना पड़ा. मगर उन्होंने भी खुद के करिश्मे की बदौलत और विकास को मुद्दा बनाकर विरोधियों को करारी शिकस्त दी. हालांकि उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ा. पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इस लचर प्रदर्शन पर किसी बहस की अनुमति देने से इनकार कर दिया मगर ये साफ था कि इस हार की असल जिम्मेदारी संघ की थी जिसने खर्चीले चुनावी अभियान का प्रबंधन किया था. उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों ने आडवाणी की बहाली के लिए दबाव पैदा किया. हालांकि पार्टी और संघ परिवार से आडवाणी पर अब भी छोटे-मोटे हमले होते रहेंगे मगर पूरी संभावना यही है कि बीजेपी 2009 का चुनाव उदारवाद, सुशासन और एक नए आडवाणी के चेहरे के साथ लड़ेगी.
आडवाणी का रूपातंरण पूरा हो चुका है. कभी राजनीतिक अस्पृश्यता का सबसे बड़ा प्रतीक रहे आडवाणी अब सर्वस्वीकार्य नेता बन चुके हैं. एक वक्त था जब अपनी सख्तमिजाज छवि के कारण उन्हें लौह पुरुष कहलाया जाना अच्छा लगता था. अब आडवाणी आम सहमति की बात करते हैं. वो इसे सबको साथ लेकर चलने की राजनीति कहते हैं.
जिस दौरान नेहरूवाद अपने चरम पर था, राजनीतिक और बुद्धिजीवी वर्ग निरंतर हिंदू राष्ट्रवादियों का उपहास किया करता था. जवाहरलाल नेहरू के इशारे पर काम करने वाली व्यवस्था में हिंदू समर्थक प्रवृत्तियों को पिछड़ेपन का प्रतीक और उन्नत समाज में पूरी तरह से अस्वीकार्य समझा जाता था. जैसाकि आडवाणी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उनके मार्गदर्शक दीनदयाल उपाध्याय ने राजनीतिक लचीलेपन का सहारा लेकर इस राजनीतिक कलंक को धोने की कोशिश की. दीनदयाल ने 1950 के दशक में दिल्ली नगर निगम के चुनावों में भाकपा के साथ चुनावी तालमेल का समर्थन तक किया जो कि उनकी विचारधारा वाली पार्टी के लिए एक असामान्य सी बात थी. बाद में उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ एक मोर्चा बनाने के लिए राम मनोहर लोहिया और सी राजगोपालाचारी से हाथ मिला लिया. इसके बाद वाजपेयी इस प्रक्रिया को आगे ले गए. 1984 में बीजेपी को बुरी तरह से शिकस्त का मुंह देखना पड़ा. फिर जब आडवाणी हिंदुत्व की ओर मुड़े तो इसमें उनकी आस्था से कहीं ज्यादा राजनीतिक मजबूरी का हाथ था क्योंकि पार्टी के लचर प्रदर्शन को देखते हुए तुरंत कुछ किया जाना जरूरी हो गया था. उनके लिए रामजन्मभूमि का मामला आंशिक रूप से ही एक धार्मिक मुद्दा था. इससे कहीं ज्यादा ये एक ऐसा हथियार था जिससे धर्मनिरपेक्षता के दोषों का खुलासा किया जा सकता था. बीजेपी का राजनीतिक आधार बढ़ाने के लिए आडवाणी हमेशा से ही कोशिश करते रहे थे मगर उन्हें ये भी अहसास था कि बीजेपी की राजनीतिक अस्पृश्यता तभी खत्म हो सकती है जब दूसरे भी इस बात से सहमत हो जाएं कि हिंदू राष्ट्रवाद के सहारे वोट भी मिल सकते हैं.
1991 और 1996 में अपनी राजनीतिक ताकत दिखा देने के बाद भाजपा के साथ अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता था. 1996 से 2004 के बीच भाजपा कई ऐसे दलों के साथ गठबंधन में थी जो पहले वी पी सिंह के जनता दल के साथ जुड़े रहे थे, खासकर द्रविड़ियन पार्टियां जिन्होंने लंबे समय से चले आ रहे हिंदुत्व विचारधारा के अपने विरोध को ताक पर रख दिया था. वाजपेयी और आडवाणी के खुलेपन ने एक ऐसी परंपरा को समृद्द किया जिसकी जड़ें चुनावी अंकगणित में रची-बसी थीं. अंत में हिंदुत्व और गठबंधन के निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता सहायक सिद्ध हुईं.
भाजपा के कई वफादारों को, जो कांग्रेस विरोध की खुराक पर पले बढ़े हैं, आडवाणी का होली पर सोनिया गांधी के घर जाकर अपनी आत्मकथा भेंट करना बहुत ही नागवार गुज़रा. उनकी निगाहों में सोनिया एक अवांछित इतालवी महिला हैं जो भाजपा से हद दर्जे की बेवजह घृणा से ग्रसित हैं. लेकिन वो कैसा भी सोचें, आडवाणी के इस कदम और बार-बार ये कहने ने, कि राजनीतिक विरोधियों को एक दूसरे के साथ दुश्मनों जैसा पेश नहीं आना चाहिए, उन्हें ऐसे लोगों की नज़रों में ऊपर उठा दिया जिनका चुनावी समर्थन भाजपा और कांग्रेस के बीच झूलता रहता है.
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प्रेषक : Mekal Kesharwaniaadwani ji ko pata hai ki kisi ghatana ka rajnaitik labh kaise liya jata hai, wo kabhi bhi samaj sevak nahi rahe, Hindutwa ki kattarta ko bhoolne ke piche kuch aur nahi matra PM pad ki laalsa hai, samaj ko har dhara ke rajnetaon ki jaroorat hai, aadwani ji apne purane chehare me hi rahen to unka samman bana rahega, dharmanirpekhata ka mukhauta kewal pad k liye pahanana uchit nahi hoga, aadwani apne aap me alag hain, wo kabhi atal bihari bajpayee nahi ban sakte, usi prakar atalji kabhi aadwani nahi ban sakte.
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प्रेषक : kuldeepपहले आप मीडिया वालों ने वाज्पाई को उदार घोषित किया और उन्हें एक अश्प्रिश्य पार्टी का स्पृश्य नेता बताया आज आडवानी की आत्न्कथा आने के बाद आप उन्हें स्पृश्य बता रहें हैं.कुछ सालों बाद नरेन्द्र मोदी को बताएँगे उसके कुछ सालों बाद प्रवीण तोगडिया को.और धीरे धीरे भारत में फासीवाद का स्वागत करने लगेंगे.आडवानी की आत्मकथा झुतों का पुलिंदा भर है उसमें बाबरी मस्जिद विध्वंस को उन्होंने अपने जीवन का सबसे दुर्भाग्यशाली दिन बताया है और कहा है की वे उत्तेजित भीड़ को रोकने की कोशिश कर रहे थे .दस सालों बाद नरेन्द्र मोदी भी आत्मकथा लिखेगा और कहेगा की उसने गुजरात दंगों को रोक्न्र की पूरी कोशिश की थी और आप उसके पक्ष में लेख लिखेंगे की मोदी सत्तर वर्ष की उम्र में एक ने शुरुआत कर रहा है उम्र बढ़ने से आपके दुष्कर्म छुप नहीं जाते.
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प्रेषक : उमेश सोनीआडवांनी जी की आदत मे शुमार है कि वे मुद्दो को अपने लाभ और हानि के हिसाब से साचेँ मे ढालते है। राजनीतिक मंच से दिया गया भाषण हो या पत्रकारो को दिया गया जवाब,सब कुछ नपा तुला होता है। नकारात्मक जवाब से भी लाभ लेने की कोशिश के पर्याय है आडवानी। छत्तीसगढ के बिलासपुर शहर मे मै इनका प्रेस कांफ्रेस 3-4 बार ज्वाइन किया है ,मैने देखा कि किस तरह नकारात्मक प्रश्नो का जवाब अपने हित मे दिया जा सकता है। यह आत्म कथा भी इसी तरह का एक उदाहरण है। उमेश सोनी बिलासपुर्
























