राज का काज, प्रजा की सज़ा
कई और लोगों की तरह 40 साल के श्रीकिशन सिंह भी आजीविका के एक बेहतर विकल्प की उम्मीद में अपने राज्य बिहार से महाराष्ट्र गए थे. मगर हाल ही में महाराष्ट्र के कई शहरों में चले उत्तर भारतीय विरोधी अभियान के दौरान सिवान से पुणे गए इस गरीब की सारी उम्मीदें चूर-चूर हो गईं. राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कुछ समर्थकों के हुजूम ने फुटपाथ पर सो रहे श्रीकिशन पर हमला किया और उनके दोनों हाथ काट डाले.
सिवान के सदर अस्पताल में चारपाई पर पड़े श्रीकिशन हताश स्वर में कहते हैं, “मैं जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो गया हूं. मैं अपने परिवार को क्या खिलाऊंगा जब मैं खुद ही उन पर बोझ बन गया हूं. मैं खुद पर भी बोझ हूं क्योंकि मैं अपने जरूरी काम तक खुद नहीं कर सकता.”
इस हादसे ने श्रीकिशन को तोड़कर रख दिया है. वो ज्यादातर चुपचाप रहते हैं. अस्पताल में उनकी देखभाल उनकी पत्नी दुर्गावती देवी करती हैं जबकि 10 वर्षीय बेटी रजंती और आठ साल का बेटा धर्मेंद्र घर में रहते हैं.
श्रीकिशन करीब एक साल पहले पुणे गए थे. वो कहते हैं, “मैं भूंजा (भेलपूरी से मिलता-जुलता खाद्य पदार्थ) बेचा करता था. मैं मराठी बोल या समझ नहीं सकता था. पुणे में काम कर रहे दूसरे बिहार वालों ने मुझसे जल्द से जल्द शहर छोड़ने को कहा भी था मगर मैं रुक गया ताकि घर ले जाने के लिए कुछ और पैसे कमा सकूं.” पुणे में काम कर रहे दूसरे बिहार वालों ने मुझसे जल्द से जल्द शहर छोड़ने को कहा भी था मगर मैं रुक गया ताकि घर ले जाने के लिए कुछ और पैसे कमा सकूं.”
हमले वाली रात श्रीकिशन हमेशा की तरह फुटपाथ पर सोए हुए थे. आधी रात के करीब उन्होंने कुछ शोरगुल सुना. उनके शब्दों में “मैंने देखा कि एक भीड़ हमारी तरफ बढ़ रही थी. वो नारे लगा रहे थे—‘बिहारियों भाग जाओ.’ फुटपाथ पर सो रहे दूसरे लोगों ने भागना शुरू कर दिया. मैंने भी कोशिश की मगर जल्द ही उन्होंने मुझे पकड़ लिया और तब तक पीटा जब तक मैं बेहोश नहीं हो गया. होश आने पर मैंने पाया कि मेरे दोनों हाथ कटे हुए थे और बुरी तरह खून बह रहा था. एक बूढ़े आदमी ने मेरे हाथ की पट्टी की और मुझसे जितनी जल्दी हो सके पुणे छोड़ने को कहा. मेरा कसूर क्या था. मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया फिर मुझे किस बात की सजा दी गई?”
अगली सुबह कुछ उन्हीं की तरह से डरे लोगों की मदद से श्रीकिशन पहली ट्रेन पकड़, सिवान पहुंच गए. गांव में एक हफ्ते इलाज के बाद उनकी पत्नी ने उन्हें सदर अस्पताल में भर्ती कराया. यहां सिवान पुलिस ने उनका बयान दर्ज कर पुणे पुलिस को भेज दिया जिसके बाद पुणे अपराध शाखा की दो सदस्यीय टीम अस्पताल आकर श्रीकिशन से मिली.
फिर भी इस बात की संभावना कम ही है कि हमलावरों को सजा मिलेगी. श्रीकिशन को भी उनके बारे में कुछ पता नहीं और सदर अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट भी उस हमले में इस्तेमाल किए गए हथियारों के बारे में साफ तौर पर कुछ नहीं कहती जिसके चलते श्रीकिशन को दोनों हाथ गंवाने पड़े. अस्पताल के डिप्टी सुपरिटेंडेंट डॉ. सुधीर कुमार कहते हैं, “हमारे लिए पक्के तौर पर ये कहना मुश्किल हो रहा है कि हमला किस हथियार से किया गया मगर ये साफ है कि ये कोई मशीनी दुर्घटना नहीं बल्कि इंसानी हमला था. हम अपनी रिपोर्ट में ये बात कह भी चुके हैं और ये पुणे की पुलिस टीम को सौंपी जा चुकी है. इसमें कोई शक नहीं कि इस व्यक्ति पर हमला किया गया जिसके चलते उसे दोनों हाथ गंवाने पड़े.”
पुणे पुलिस की अपराध शाखा में एसीपी और श्रीकिशन से बयान लेने गई टीम के सदस्यों में से एक संग्राम सिंह निशानदार इस हादसे के बारे में बोलना नहीं चाहते. जब तहलका ने उनसे संपर्क किया तो उनका बस यही कहना था, “हमने अपनी रिपोर्ट विशेष शाखा को सौंप दी है.” उधर विशेष शाखा के डीसीपी रघुनाथ खेरे का कहना था कि जांच रिपोर्ट आ गई है मगर वो इसके बारे में कुछ नहीं कहना चाहते.
बिहार सरकार का रुख इस मामले में उदासीन ही रहा है. बिहार के गृह सचिव अफजल अमानुल्ला से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने इस मामले से अनभिज्ञता ज़ाहिर की और तहलका से इस मामले की विस्तृत जानकारी देने की अपील करते हुए कहा, “माफ कीजिए मुझे अब भी इस मामले के बारे में पता नहीं है. कृपया मुझे इस व्यक्ति के बारे में और बताइये.” उधर, अस्पताल जाकर श्रीकिशन से मुलाकात करने वाले नेताओं में से एक राष्ट्रीय जनता दल के राज्य उपाध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी का मानना है कि सरकार की इस मामले से अनभिज्ञता अक्षम्य है. वो कहते हैं, “उस पर हमला करने वाले लोगों को जल्द सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए और सरकार को फौरन इस दिशा में कोशिशें शुरू करनी चाहिए. मुझे नहीं मालूम वो दो वक्त की रोटी का इंतजाम कैसे करेगा.”
श्रीकिशन की पत्नी दुर्गावती सुबकते हुए बताती हैं, “मेरी बेटी ने स्कूल जाना बंद कर दिया था. अब बेटा भी स्कूल नहीं जा रहा. हमें उनकी देखभाल भी करनी है और जिंदा रहने के लिए काम भी करना है. मेरे पति ने किसी का कोई नुकसान नहीं किया. वो कुछ नेताओं और अपराधियों का शिकार बने हैं. मैं सरकार से प्रार्थना करती हूं कि मेरे पति के मामले की जांच करे और अपराधियों को सजा दे.”
सवाल ये उठता है कि लोकतंत्र में राजनीति तो होनी ही है मगर ऐसी क्यों जो किसी की जान ले ले, किसी परिवार की रोटी छीन ले और किसी श्रीकिशन को अपने परिवार का सहारा बनने के बजाय ज़िंदगी भर के लिए दूसरों का मोहताज बना दे.
अनंत एस टी दास





















