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   हवा-पानी-जमीन में घुला ज़हर
हमारे लोकतंत्र का एक चेहरा ऐसा भी है जो आपको सिर्फ तभी दिख सकता है जब आप 60 साल की एक ऐसी महिला से मिलें जो अपने सूजे हुए घुटनों की पीड़ा के साथ 800 किलोमीटर की यात्रा कर रही है. ये भोपाल से दिल्ली की दूरी है और उसे उम्मीद है अगर ट्रेन से एक रात के आरामदायक सफर के बजाय वो एक महीना पैदल चलकर दिल्ली पहुंचेगी तो शायद दिल्ली में बैठे बड़े लोगों का ध्यान भोपाल की एक त्रासदी की तरफ चला जाए. उस त्रासदी की तरफ नहीं जो दो दिसंबर 1984 को यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से गैस लीक होने से हुई थी और जिसने 15,000 जिंदगियां लील ली थीं. ये तो इतिहास की बात हो चुकी है. दिल्ली तक के इस सफर का मकसद दूसरा है.
कुछ लोगों को याद होगा कि उस रात ने न सिर्फ हजारों लोगों का जीवन लीला था बल्कि लाखों दूसरे लोगों की जिंदगी को नर्क भी बना दिया था. इस महिला के सूजे हुए घुटने, फेफड़ों का दर्द और उसे अचानक आने वाले चक्कर इस बात का प्रमाण हैं.
| 1984 में भोपाल की हवा को मौत बनाने वाली फैक्ट्री के जहर का कहर उसी दिन खत्म नहीं हो गया था बल्कि ये आज तक जारी है. ये जहर उस दिन से आज तक लगातार वहां के पानी और जमीन में रिस रहा है. |
उससे भी कम लोग ये जानते होंगे कि कोर्ट में सुनवाई और मुआवजे से इनकार के बाद गैस पीड़ितों का हाल क्या है. चिकित्सा, रोजगार और न्याय के बिना उनकी जिंदगी किस तरह गुजर रही होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं. मगर दिल्ली तक इस बूढ़ी महिला के पैदल सफर का मकसद ये भी नहीं.
और शायद ही कोई ऐसा हो जिसे ये पता हो कि 1984 में भोपाल की हवा को मौत बनाने वाली फैक्ट्री के जहर का कहर उसी दिन खत्म नहीं हो गया था बल्कि ये आज तक जारी है. ये जहर उस दिन से आज तक लगातार वहां के पानी और जमीन में रिस रहा है. कार्बाइड के कारखाने में कीटनाशकों का उत्पादन करने के लिए जिन जहरीले रसायनों का इस्तेमाल होता था उनके प्रति 23 साल से बरते जा रहे उपेक्षापूर्ण रूख का परिणाम ये हुआ है कि ये रिसकर भूमिगत जल में मिल गए हैं. यही पानी पड़ोसी इलाकों के ट्यूबवेलों और हैंडपंपों से बाहर आता है और करीब 25,000 लोगों की प्यास बुझाता है. जब दो दिसंबर को गैस लीक हुई तो इनमें से ज्यादातर उस इलाके के आसपास भी नहीं थे. ये अब पीड़ितों के नए वर्ग में आते हैं. पानी पीड़ित कहे जाने वाले इन लोगों की संख्या और उनकी बीमारियों के लक्षण हर साल बढ़ते जा रहे हैं मगर जिन्हें राहत पहुंचानी चाहिए वो ये मानने को तैयार ही नहीं कि ऐसे लोगों का कोई अस्तित्व भी है. ये तो सभी जानते हैं कि यूनियन कार्बाइड के कारखाने से लीक हुई गैस ने 15,000 लोगों की जान ले ली थी मगर शायद ही कोई ये जानता हो कि मौत का ये तांडव कभी रुका नहीं. तेज धूप में पैदल चलती इस महिला का मकसद यही है कि लोग इस बात को जानें और इस दिशा में कुछ करें.
जब आप इन शब्दों पर नजर दौड़ा रहे होंगे तो 11 से 82 साल के बीच की उम्र के 50 पदयात्री नई दिल्ली में प्रवेश कर रहे होंगे. पिछले एक महीने से वो तड़के पांच बजे जागकर अपना सफर शुरू करते हैं. आग उगलती धूप में लगातार चलते रहते हैं और हर दिन दिल्ली के 25 किलोमीटर और नजदीक पहुंच जाते हैं. रात को सोने के लिए उनका आशियाना होती हैं स्कूलों की इमारतें या फिर खेत. जहरीले पानी का इस्तेमाल करने के कारण इनमें से ज्यादातर को अलग-अलग बीमारियां हैं. मगर उन्हें जो चीजें चलायमान रखती हैं वो हैं सुबह एक प्याली चाय, रात को दर्द निवारक दवाएं और अपने प्रधानमंत्री को जिम्मेदारी का अहसास करवाने की उनकी अदम्य इच्छा.
ये उनकी पहली पदयात्रा नहीं है. भोपाल त्रासदी के पीड़ित पहले भी ऐसा करते रहे हैं. 2006 में भी उनका एक दल पदयात्रा कर दिल्ली आया था और उसने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने अपनी मांगें रखी थीं. संक्षेप में ये मांगें थीं—हादसे में बच गए लोगों को सहायता देना, कारखाने में मौजूद जहरीले कूड़े की सफाई करना, जिन लोगों के पानी के स्रोत प्रदूषित हो गए हैं उन्हें पानी की आपूर्ति करना और 2001 में यूनियन कार्बाइड को खरीदने वाली डाउ कैमिकल्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना.
पीड़ित कहते हैं कि तीन मांगें सुनाए जाने के दौरान तो प्रधानमंत्री हामी में सिर हिलाते रहे मगर चौथी मांग सुनते ही उन्होंने अपने कानों पर हाथ रख लिए. इशारा साफ था कि वो डाउ पर किसी प्रतिबंध या फिर उसके खिलाफ किसी कार्रवाई का समर्थन नहीं करने वाले थे. 2006 के पदयात्रियों में से ज्यादातर इस बार भी दिल्ली आ रहे हैं ताकि प्रधानमंत्री को उनके वादों का ध्यान दिलाया जा सके. उनकी पहली तीन मांगों पर थोड़ी प्रगति हुई है मगर जैसा संभावित था, चौथी मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.
2001 से डाउ कैमिकल्स कहती रही है कि उसने सिर्फ यूनियन कार्बाइड की परिसंपत्तियों का अधिग्रहण किया है, उसके दायित्वों का नहीं. दूसरी तरफ भोपाल त्रासदी में जिंदा बचे लोग इस बात के लिए कृतसंकल्प हैं कि डाउ से इसकी जिम्मेदारी कबूल करवाई जाए जबकि केंद्र की पूरी कोशिश है कि कंपनी पर कोई आंच न आए. पिछले दो सालों से डाउ के उत्तरदायित्व के उलझे हुए सवाल ने सभी दूसरे मोर्चों पर प्रगति की रफ्तार को धीमा कर रखा है.
| भोपाल त्रासदी में जिंदा बचे लोग इस बात के लिए कृतसंकल्प हैं कि डाउ से इसकी जिम्मेदारी कबूल करवाई जाए जबकि केंद्र की पूरी कोशिश है कि कंपनी पर कोई आंच न आए. |
नत्थीबाई और उनके पति, अपने तीन साल के बेटे सोनू के साथ 1990 में अपना गांव छोड़कर अटल अयूब नगर में बस गए थे. ये मोहल्ला जर्जर पड़ी उसी फैक्ट्री की चाहरदीवारी के बाहर बसा हुआ है जो हजारों लोगों की मौत का सबब बनी थी. नत्थीबाई को अक्सर उस हादसे की भयावहता की कहानियां सुनने को मिलती रहती थीं. उनके पड़ोसियों में कई गैस पीड़ित थे और उनकी दशा दयनीय थी. फैक्ट्री अब भी उजाड़ और भुतहा लगती थी. इसके परिसर में जहां-तहां पानी इकट्ठा हो गया था और झाड़ियां उग आई थीं. सोनू का मानसिक विकास उसके शारीरिक विकास के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया. वो बोल नहीं पाता. न ही खुद पर काबू रख पाता है. उसके मुंह से लार बहती रहती है और शारीरिक क्रियाओं पर भी उसका कोई नियंत्रण नहीं है. आज वो 21 साल का हो चुका है मगर दिमाग से अभी भी वो एक बच्चा ही है. नत्थीबाई 50 वर्ष की हैं मगर 70 की नजर आती हैं. वो सोनू को अकेला नहीं छोड़ सकतीं. कभी-कभी सोनू का व्यवहार आक्रामक हो जाता है. वो उन पर हमला कर उन्हें घायल भी कर देता है. डॉक्टरों ने कभी इसकी वजह नहीं बताई.
साफ था कि कुछ ऐसा था जो इन लोगों की जिंदगी में जहर घोल रहा था. कई साल स्वस्थ रहे बच्चों में तंत्रिका संबंधी विकार पैदा हो रहे थे. कई तो मंदबुद्धि हो गए थे. आसपास के इलाकों के नवजात शिशुओं का वजन बहुत कम होता था और उनका विकास बहुत धीमा था. कई शारीरिक विकृतियों के साथ भी पैदा हो रहे थे. स्वस्थ बच्चे अचानक डरावने रूप से असाधारण व्यवहार करना शुरू कर देते. वो मिट्टी, चॉक, हड्डियां और कांच जैसी चीजें खाना शुरू कर देते (चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस रोग को पिका कहा जाता है)। ये वो लोग थे जो कभी गैस के संपर्क में नहीं आए थे. वो बीमार हो रहे थे और कभी-कभी उनकी मौत भी हो जाती थी. दो वार्डों के 18 समुदायों में एनीमिया, त्वचा रोग और कैंसर जैसी बीमारियों में धीरे-धीरे वृद्धि हो रही थी. 17-18 साल की उम्र तक आ चुकी लड़कियों का मासिक चक्र शुरू नहीं हो रहा था और 35 के आसपास पहुंच चुकी महिलाओं में रजोनिवृत्ति हो रही थी. हर किसी को थकावट, मितली और बदन दर्द की शिकायत हो गई थी. जैसा कि नत्थीबाई कहती हैं “कोई राहत नहीं थी.”
यूनियन कार्बाइड के कंपाउंड के भीतर हमें जंगली फूल नजर आते हैं. पलाश के पेड़ पर फूल खिले हैं और ऐसा लग रहा है जैसे पेड़ आग की लपटों में घिरा हो. इन सब के बीच खड़ा है लोहे के गर्डरों, पाइपों और मशीनों से मिलकर बना ढांचा. जंग खा रहे इस ढांचे में से अब भी रसायनों की तीखी दुर्गंध आती है. कंपाउंड में रखे विशाल ड्रमों में अब भी ये रसायन मौजूद हैं. यहां तैनात गार्ड बताता है कि गर्मी के दिनों में जब हवा चलती है तो घरों के भीतर रहने पर भी उनके नथुने तीखी दुर्गंध से भर जाते हैं जिसकी वजह से उन्हें सिरदर्द और चक्कर आने जैसी समस्याएं हो जाती हैं. तैनाती के वक्त उसे इस जगह की विषाक्तता के बारे में कुछ नहीं बताया गया था मगर अब वो जानता है कि उसकी समस्याओं की वजह डाइक्लोरोबेंजीन है. वो हमें यहां से जल्दी जाने का सुझाव देते हुए कहता है, “यहां लंबे समय तक ठहरना ठीक नहीं है.” उसकी बात की सच्चाई का अहसास हमें तब होता है जब एक घंटे तक इमारत में चहलकदमी करने के बाद हमें भी चक्कर आने लगते हैं.
तीन साल पहले परिसर में जहां-तहां बिखरे विषैले रसायनों को इकट्ठा करके एक बड़े भंडारगृह में तालाबंद करके रख दिया गया. गार्ड हमें उस तरफ ले जाता है और दीवार में बना एक छेद दिखाता है जिसके जरिये इस विशाल स्टोरनुमा कमरे में झांका जा सकता है. मद्धम रोशनी में हमें नजर आता है कि बड़ी संख्या में इन रसायनों के बोरे घास के गट्ठरों की तरह एक पर एक करके रख दिए गए हैं और फिर उन्हें तिरपाल से ढक दिया गया है.
परिसर के उत्तरपूर्वी कोने में खाली जमीन है. यहां से आबादी इतनी पास है कि अगर आप एक पत्थर उठाकर किसी दिशा में फेंके तो वो किसी न किसी घर की छत पर जाकर गिरेगा. 90 के दशक के मध्य में कार्बाइड ने कारखाने में उत्पादन के बाद निकले जहरीले कचरे को इसी जगह पर गड्ढ़ा खोदकर उसमें दफन कर दिया था. समय के साथ मिट्टी की ऊपरी परत हट गई और आज ये तारकोल जैसा द्रव फिर से सतह पर उभर आया है. ये काफी गहरा है और अगर आप एक बड़ा सा पत्थर इसमें फेंके तो वो धीरे-धीरे इस दलदल में धंसता जाता है और आखिर में गायब हो जाता है. ये कैसे संभव है कि दुनिया की सबसे भयंकर औद्योगिक त्रासदी की इस जगह पर अब भी इतना जहर मौजूद हो?
| 1984 के बाद कार्बाइड मैनेजमेंट का सारा ध्यान इसी पर था कि उसकी कानूनी जिम्मेदारी के पूरे आकलन से पहले किस तरह भारत से बोरिया-बिस्तर समेट लिया जाए. |
1984 के बाद कार्बाइड मैनेजमेंट का सारा ध्यान इसी पर था कि उसकी कानूनी जिम्मेदारी के पूरे आकलन से पहले किस तरह भारत से बोरिया-बिस्तर समेट लिया जाए. इसके लिए उन्हें दो चीजों की जरूरत थी—एक, नुकसान किस हद तक हुआ है इसे दर्शाने वाले सबूतों को पहुंच से बाहर करना और दूसरा, जितनी जल्दी हो सके अपनी परिसंपत्तियों से मुक्ति पाना. उन्होंने दोनों ही कामों को निर्दयतापूर्वक अंजाम दिया. उदाहरण के लिए कार्बाइड ने अपनी उस रिसर्च का खुलासा करने से इंकार कर दिया जिससे डॉक्टरों को ये जानने में मदद मिलती कि गैस का लोगों के शरीर पर क्या असर होता है और उनका इलाज किस तरह से किया जाना चाहिए. कंपनी ने सोडियम थायोसल्फेट जैसी दवाइयों पर चल रहे स्वतंत्र शोध में भी रुकावट डाली. गौरतलब है कि सोडियम थायोसल्फेट से पीड़ितों के इलाज में तो मदद मिलती मगर इससे ये भी साबित हो जाता कि गैस, सांस के जरिये मरीजों के खून में घुल गई थी और इस वजह से उनके कई अंगों को नुकसान पहुंचा था. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने आने वाली पीढ़ियों पर इस दुर्घटना के दुष्प्रभावों की जांच के लिए एक अध्ययन शुरू किया था. मगर जब परिणाम ये संकेत देने लगे कि ये नुकसान बहुत ज्यादा होगा तो इस अध्ययन को रहस्यमयी तरीके से बीच में ही रद्द कर दिया गया.
54 साल के सतीनाथ सारंगी भोपाल गैस पीड़ितों के आंदोलन की अगुवाई करने वाले मुख्य लोगों में से एक है. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से धातु विज्ञान में डॉक्ट्रेट कर रहे सतीनाथ पढ़ाई बीच में ही छोड़कर गैस दुर्घटना के एक दिन बाद भोपाल पहुंच गए थे. वह उस क्लीनिक के सहसंस्थापक भी थे जो सोडियम थायोसल्फेट पर ट्रायल्स कर रहा था. मगर एक दिन पुलिस ने छापा मारा और इस ट्रायल के सभी दस्तावेज जब्त कर लिये. मजबूरी ने उन्हें डॉक्टर, वकील और जासूस, तीनों बना दिया है. वो कहते हैं, “अगर चुनौती नुकसान को कम से कम दिखाने की हो तो आप जितना सोच सकते हैं कार्बाइड के पास इसके लिए उससे भी बेहतर व्यवस्था थी. ऐसा लगता था मानो उनके पास एक ऐसा विभाग था जिसका काम बस इसी तरह के घृणित कामों को अंजाम देना था. ये हमेशा तैयार रहता था और इसमें वैज्ञानिक और शोधकर्ता भी शामिल थे जो इस तंत्र को और भी शैतानी स्वरूप प्रदान करते थे.”
सतीनाथ घंटों तक आपको उन तरीकों के बारे में बता सकते हैं जो कार्बाइड ने इसलिए इस्तेमाल किये ताकि सरकार नुकसान के सबूतों को दबा दे. वो कहते हैं, “पहले ये मौतों के मामले में हुआ, फिर घायलों के मामले में और अब ये प्रदूषण के मामले में हो रहा है.” 47 करोड़ डालर हर्जाने के रूप में देने के बाद कार्बाइड को सारे उत्तरदायित्वों से मुक्ति दे दी गई. इसका मतलब था कि हर मृतक के परिवार को 63,000 और हर घायल को 25,000 रुपये की रकम. कार्बाइड के सीईओ वारेन एंडरसन को प्रत्यर्पित नहीं किया जा सका इसलिए जहां तक कंपनी की आपराधिक जिम्मेदारी का सवाल था उस संबंध में कोई बात ही करना बेकार है.
अब सवाल था फैक्ट्री का. गैस रिसाव के एक महीने बाद फैक्ट्री के गेट्स पर ताले लगा दिए गए और उसे उसी हाल में छोड़ दिया गया जिस हाल में वो गैस रिसाव वाले समय तक थी. हवा में जहरीला मिथाइल आइसोसाइनेट छोड़ने वाला टैंक ई-610, सेविन नामक कीटनाशक में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग रसायनों को रखने वाले ड्रम और बोरे, उन्हें संयंत्रों तक ले जाने वाले पाइप और जहरीले कचरे का शोधन करने के लिए बनाए गए खास तालाब....सब कुछ वैसे ही छोड़ दिया गया. वक्त के सिवा एक दशक तक इस इमारत से होकर कोई और नहीं गुजरा. इस दौरान बोरे फट गए और ड्रमों और पाइपों में जंग लग गया. इसका नतीजा ये हुआ कि इनमें रखे रसायन जमीन में समाने लगे. कीटनाशक जहर का ही एक रूप है इसलिए स्वाभाविक है कि पारे, डाइक्लोरोबेंजीन, हेक्साक्लोरोसाइक्लोहेक्सेन आदि जैसे जिन रसायनों से मिलकर ये बनता है वो भी विषैले ही होते हैं. जब भारी बरसात होती थी तो ठोस रसायन पानी में घुल जाते थे और फैक्ट्री में एक जहरीला दलदल जैसा बन जाता था. कार्बाइड को ये जमीन मध्यप्रदेश सरकार ने लीज पर दी थी और इसे वापस करने से पहले कंपनी के लिए मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) से ये प्रमाणपत्र लेना जरूरी था कि जमीन प्रदूषित नहीं है. 1989 और फिर 1994 में नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी शोध संस्थान (नीरी) से जमीन और पानी के प्रदूषण का आकलन करने के लिए कहा गया. कार्बाइड भी निजी रूप से इस काम के लिए अपने नमूनों का परीक्षण कर रही थी और इनमें नैफ्थॉल और सेविन की अत्यधिक मात्रा पाई गई थी. मगर नीरी की रिपोर्ट में कार्बाइड को क्लीनचिट दे दी गई.
| वक्त के सिवा एक दशक तक इस इमारत से होकर कोई और नहीं गुजरा. इस दौरान बोरे फट गए और ड्रमों और पाइपों में जंग लग गया. इसका नतीजा ये हुआ कि इनमें रखे रसायन जमीन में समाने लगे. |
मगर नीरी की अंतिम रिपोर्ट में इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. एमपीपीसीबी (ये इतनी भ्रष्ट संस्था थी कि तीन साल बाद इसके सदस्यों को सामूहिक रूप से बर्खास्त कर दिया गया और इसके निदेशक को गिरफ्तार कर लिया गया) ने इस खोखली रिपोर्ट के आधार पर कार्बाइड की लीज खत्म कर दी. अब ये जमीन मध्य प्रदेश की समस्या थी. तब से नीरी की ये रिपोर्ट कार्बाइड और सरकारी अधिकारियों के लिए कसौटी का काम कर रही है. दोनों इसे ये साबित करने के लिए इस्तेमाल करते हैं कि भूमिगत जल में कोई प्रदूषण नहीं है और अगर है भी तो ये फैक्ट्री के कचरे के कारण नहीं हुआ है. उन्होंने ऐसे कई दूसरे अध्ययनों की लगातार उपेक्षा की जो ये बताते थे कि प्रदूषण मौजूद है और बढ़ भी रहा है. ये अध्ययन बोस्टन स्थित सिटीजंस एनवायर्नमेंटल लैबोरेटरी और ग्रीनपीस जैसे संगठनों ने किए थे. 2002 में दिल्ली स्थित सृष्टि पर्यावरण शोध समूह ने इलाके से इकट्ठा किए गई मिट्टी, भूमिगत जल और सब्जियों में भारी धातुओं और विषैले तत्वों के अंश पाए. यही विषैले तत्व यहां की माताओं के दूध में भी पाए गए. मगर नीरी की रिपोर्ट में इन सभी पहलुओं की घोर उपेक्षा की गई. इस जहर को साफ करने का मुद्दा छोड़ दिया गया. सरकार की प्रतिक्रिया ये थी कि इन इलाकों में लोग बीमार जरूर हैं मगर गरीबों को तो हमेशा ही कोई न कोई बीमारी लगी रहती है.
त्रासदी के बाद के पहले बीस साल में इस जगह को पहुंचे नुकसान के उपचार की दिशा में ज्यादा गंभीरता नहीं दिखाई गई. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के मुताबिक इस दौरान मुख्य मुद्दा इस काम के लिए जरूरी पैसे का था. वह कहते हैं, “विशेषज्ञ गिने-चुने थे और जिन विदेशी कंपनियों से हमने संपर्क किया वो इसके लिए तीन करोड़ डॉलर की मांग कर रहीं थीं. सिंह की मानें तो प्रदूषण का मुद्दा विभिन्न संगठन प्रचार और पैसा पाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.” राज्य की बीजेपी सरकार में गैस त्रासदी राहत और पुनर्वास मंत्री अजय विश्नोई प्रदूषण की बात से स्पष्ट इनकार करते हुए कहते हैं, “अभी-अभी इस सारे इलाके का एक सर्वेक्षण पूरा हुआ है. अभी इसके परिणामों की घोषणा नहीं की गई है. हमें जो रिपोर्ट मिली है उसके मुताबिक इन इलाकों में भूमिगत जल में कोई प्रदूषण मौजूद नहीं है.” इसी मंत्रालय को संभालने वाले पूर्वमंत्री आरिफ अकील कहते हैं, “जब मैं मंत्री था तब भी स्थानीय लोगों ने ऐसी ही शिकायतें की थीं. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं खुद उस पानी को पीकर देखूं. मैंने मीडिया के सामने ही दो ग्लास पानी पिया. अगर कुछ गड़बड़ होती तो मुझे भी कोई समस्या होती मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.”
मगर सतीनाथ से इस घटना का जिक्र करने पर इसकी दूसरी ही तस्वीर उभरकर सामने आती है. अकील जब पानी पी रहे थे तो सतीनाथ भी वहां मौजूद थे. वो बताते हैं, “पानी पीने के तुरंत बाद मंत्रीजी फौरन पीछे की तरफ गए और उल्टी कर दी.”
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प्रेषक : mohan bhatt"Hawa pani or jamin main ghule takat war logo ke paap" bhetarin or kadwi story hai .. bhopal gass piteto ki ye ladayi ab kewal unki apni hi nahi balki ane wali pidiyo ke liye bhi hai, nischit tor pe ye report ek baar phir gass pideto ki wastavik sithiti or sarkari nagepan ko ujagar karti hai..is report se ek baat or samaj main aati hai ki HAMARE DWARA LI JANE WALI SAANS BHI POLITICES SE TAY HOTI HAI(yani us main kitni jahar ki matra hogi)..EaSE MAIN I HATE POLITICES KAHAN KITNA SAHI HAI YE LOGO KO SOCHNA hi PADEGA.. ( computer main hindi ke phont na hone ke karan roman main likh raha hu, umeed hai galtiya par dhayan na de kar bhaw par jayengi) mohan bhatt 9971818237
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प्रेषक : vinod insan1984 में भोपाल की हवा को मौत बनाने वाली फैक्ट्री के जहर का कहर में घुले ताकतवर लोगों के पाप के परिणामों की घोषणा करने पर दिल्ली में बैठे बड़े लोगों का ध्यान भोपाल की एक त्रासदी की तरफ चला जाए.
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प्रेषक : yashutehelka your this story is really great.
























