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   असाधारण कारनामे, साधारण अंत

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निचली रैंक के एक पुलिस अधिकारी को मंत्री जैसी सुरक्षा मिली हुई थी। अपराधियों और आतंकवादियों को मार गिराने के पुरस्कार स्वरूप उसे राष्ट्रपति पदक और बिना बारी के प्रमोशन भी मिले। लेकिन कई मुठभेड़ों में उसके ऊपर फर्जी हत्या के और निर्दोष लोगों को फंसाने के आरोप भी लगाए गए। और अंत में एक प्रॉपर्टी के मामले में हुई उसकी मौत बेहद साधारण सी रही। 

इसी हफ्ते एसीपी राजबीर सिंह की चौंकाने वाली हत्या के साथ ही एक विवादित करियर का पटाक्षेप हो गया। 48 साल की छोटी सी उमर में ही एनकाउंटर विशेषज्ञ के रूप में उनका दबदबा चहुंओर फैल गया था। अपने हाथों से उन्होंने कम से कम 56 अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया और ऐसा करते हुए उन्होंने अपने नियम खुद ही बनाए। उनके ऊपर ड्रग डीलरों और भू-मफियाओं से सांठगांठ के आरोप थे। देश के गृहमंत्री का विश्वास उन्हें हासिल था... और इस दौरान आए तमाम पुलिस कमिश्नर से कहीं ज्यादा ताकत भी उनके हाथों में थी। ज़मीन के कई संदिग्ध लेन-देनों में भी इनपर संलिप्तता के आरोप थे।

तहलका की जांच में ये बात सामने आयी कि सिंह ने इन दोनों मामलों की पड़ताल एक हफ्ते में ही पूरी कर दी। और जिन फोन रिकार्डों की उन्होंने दलील दी उनकी सत्यता पर भी सवाल उठे। सिंह एक बार फिर तब मुश्किल में फंसे जब एक ड्रग डीलर से फोन पर उनकी बातचीत नारकोटिक्स ब्यूरो ने रिकॉर्ड कर ली। 

सिंह की हत्या पर आए आधिकारिक बयान से लगता है कि मामला पानी की तरह साफ है। लेकिन दिल्ली पुलिस के अंदर और सिंह के नज़दीकी लोग इस बयान से इत्तेफाक नहीं रखते। गुड़गांव में एक प्रॉपर्टी डीलर विजय भारद्वाज ने 23 मार्च को सिंह के सर में काफी नजदीक से गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी। स्थानीय पुलिस के मुताबिक एक प्रॉपर्टी को लेकर भारद्वाज के ऊपर सिंह का कुछ बकाया था। इसी को लेकर तीन दिन पहले सिंह ने बकाया न चुकाने पर भारद्वाज को जान से मारने की धमकी दी थी। नतीजतन भारद्वाज ने ये अतिवादी क़दम उठाया। ये बात समझ से परे है कि सिंह ने कुछ समय पहले अपनी रिवॉल्वर भारद्वाज को दे दी थी जिससे बाद में भारद्वाज ने उसकी हत्या कर दी। "हमें सिंह की हत्या में और भी लोगों के शामिल होने का शक हैं," दिल्ली पुलिस में सिंह के एक नजदीकी सहयोगी ने नाम न छापने की शर्त पर तहलका को ये बात बताई। 

23 साल पहले दिल्ली पुलिस की सबसे निचली रैंक सब इंस्पेक्टर से सिंह ने अपने करियर की शुरुआत की। सिंह की बंदूक 1990 के शुरुआत से ही मुठभेड़ों में गरजने लगी थी। गैंगस्टर बब्लू श्रीवास्तव के नजदीकी सहयोगी को मारकर सिंह ने मीडिया में काफी सुर्खियां बटोरी। 13 सालों में ही सिंह असामान्य सफलता हासिल करते हुए एसीपी के पद तक जा पहुंचे। संदिग्ध आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने की शुरुआत करने के साथ ही उन्हें "ज़ेड" श्रेणी की सुरक्षा मिल गई। इसके तहत 22 सुरक्षाकर्मियों और एक एस्कॉर्ट कार का जत्था उनकी सुरक्षा के लिए तैनात रहता था। लेकिन जल्द ही उनके ऊपर अवैध कारनामों के आरोप भी लग गए। 2002 में दक्षिणी दिल्ली के शॉपिंग मॉल अंसल प्लाजा में दो संदिग्ध आतंकवादियों को मार गिराने पर मानवाधिकार समूहों ने उनके ऊपर हमला बोल दिया। इसकी वजह बना एक चश्मदीद जिसने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि मारे गए लोगों के पास कोई हथियार नहीं थे और उन्हें काफी नजदीक से गोली मारी गई। सिंह के ऊपर इसी तरह की दो और बहुप्रचारित मुठभेड़ों में निर्दोष लोगों की हत्या का आरोप लगा। इनमें से एक ऐतिहासिक हुमायूं मकबरे में हुई मुठभेड़ है और दूसरी प्रगति मैदान में। 

13 दिसंबर 2001 को संसद भवन पर हमला और लाल किले में सेना के ठिकाने पर आतंकी हमलों में सिंह की जांच रिपोर्ट पर भी कई सवाल खड़े हुए। तहलका की जांच में ये बात सामने आयी कि सिंह ने इन दोनों मामलों की पड़ताल एक हफ्ते में ही पूरी कर दी। और जिन फोन रिकार्डों की उन्होंने दलील दी उनकी सत्यता पर भी सवाल उठे। सिंह एक बार फिर तब मुश्किल में फंसे जब एक ड्रग डीलर से फोन पर उनकी बातचीत नारकोटिक्स ब्यूरो ने रिकॉर्ड कर ली और किसी ने इसे मीडिया में लीक कर दिया। दिल्ली पुलिस की विभागीय जांच में उन्हें क्लीन चिट मिलने के बाद हाईकोर्ट ने मामले की फिर से जांच के आदेश दिए। इसके बाद सिंह को कम महत्व वाले पद पर स्थांतरित कर दिया गया। 

लेकिन ये चर्चित व्यक्ति पिछले साल फिर से वापस आ गया। "एनडीए के शासन काल में उसे हटाना असंभव था, " ये कहना है सिंह के एक पूर्व अधिकारी का। सिंह के पीड़ितों में एक नाम है दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक एसएआर गिलानी का। सिंह ने अपनी जांच में गिलानी को संसद पर हमले के साजिशकर्ताओं में से एक माना था। बाद में गिलानी को सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया। अपने ट्रायल के दौरान सिंह से मिल चुके गिलानी का मानना है कि वो खुफिया एजेंसियों के लिए काम करता था। "मेरा हमेशा ये मानना था कि वो इतने महत्वपूर्ण पद के योग्य नहीं था," गिलानी ने तहलका को बताया।

अंतत: ऐसा लगता है कि सिंह प्रॉपर्टीज़ के अपने संदिग्ध लेनदेनों की ही भेंट चढ़ गए।

मिहिर श्रीवास्तव

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