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महिला आरक्षण का मूल
कौन समर्थक, कौन विरोधी, बात जाओ ये भूल. पूरा पढें... |
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   पढ़ें और पढ़कर डरें
आउसवित्स के नाज़ी कैम्प में ईंटों की बैरक कतारों में बड़ी सफाई से बनी हुई हैं. शान्ति इतनी गहरी कि सिर्फ़ मृत्यु में ही ढूँढी जा सकती है. साफ-सुथरे रास्ते एक-दूसरे को समकोण पर काटते हैं और पेड़ भव्य किंतु शांत हैं.
बक्सों जैसी ये इमारत आसानी से कुछ भी हो सकती थी. कोई स्कूल, अस्पताल या फ़िर आर्मी क्वार्टर्स. या फ़िर मौत के ऐसे कारखाने जो लोगों को पहले तो निगलते थे, फ़िर दहकती भट्टी में झोंक देते थे. कंक्रीट के खंभों के सहारे टिकी बिजली के कंटीले तारों वाली चाहरदीवारी अनजानी घुसपैठ को रोकने के काम आ सकती थी या फ़िर मजलूमों को कैद में भी रख सकती थी.
नाजी, व्यक्ति-व्यक्ति में भेद है ऐसा विश्वास करते थे और इस अन्तर को अपने तरीके से ख़त्म करने में भी. कल्पना कभी भी उस आउसवित्स की भयावहता का अंदाजा नहीं लगा सकती, जहाँ 3 साल से भी कम समय में 15 लाख के करीब आदमी, औरतों और बच्चों को मृत्युदायी गैस या भट्टियों के हवाले कर दिया गया था. स्मारकों से पटे पड़े इस विश्व में आउसवित्स अन्धकार का स्मारक है.
| हिन्दुस्तान में कहीं भी ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ आप अपनी बेटी को ले जाकर उसे बंटवारे, सिख दंगों या फ़िर 2002 के गुजरात में हुए नरसंहार के दानव की क्रूरता से दो-चार करा पायें. क्योंकि हम याद नहीं रखते इसलिए हम उन राक्षसों की करनी को दोहराते हैं. |
जब आप इस दैवीय शांति वाली दोमंजिला इमारत में विचरण करते हैं तो आपको अच्छी वेश-भूषा और फुसफुसाती आवाजों में बात करते कई बच्चे या किशोर भी मिलेंगे जो कि उस इतिहास के गलियारों की सैर पर हैं जिसका कि उनसे या हम सभी से भी गहरा नाता है. पूरे साल, बिना नागा, यहूदी(ज्यूज़) लोग दुनिया भर से अपने बच्चों को हम सभी के भीतर मौजूद दानव के दर्शन को यहां लाते हैं. ख़ुद को मिली प्रताड़नाओं और पीडा के कारण वो समझते हैं कि ज़िंदगी और मौत के बीच का संघर्ष, याद रखने और भूल जाने के बीच का ही संघर्ष है. वो जानते हैं कि राक्षस की आंखों में आँखें न डालना, उसे अपने ऊपर हमेशा हावी होने देने का मौका देना है.
हिन्दुस्तान में कहीं भी ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ आप अपनी बेटी को ले जाकर उसे बंटवारे, सिख दंगों या फ़िर 2002 के गुजरात में हुए नरसंहार के दानव की क्रूरता से दो-चार करा पायें. क्योंकि हम याद नहीं रखते इसलिए ये सब फ़िर से होता है. हम उन दानवों की आंखों में नहीं झांकते और उनके एक बार फ़िर से सर उठाने के ख़तरे को अपने आस-पास मंडराने देते हैं.
हमारे देश में कहीं भी हमने अपनी क्रूरता को प्रदर्शित नहीं किया है जिसे देखकर हम निराश और भयभीत हो सकें.
इस विशेष संस्करण को पढ़ें और ऐसा करें. आशीष खेतान की 6 महीने लम्बी ये असाधारण पड़ताल--भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के सबसे बेहतरीन उदाहरणों में से एक--हर मुखौटे को नोंच देती है और हमें हमारा दानवी रूप दिखा देती है. नरसंहार के बाद पाँच सालों में हमने कई आरोप और प्रत्यारोप सुने हैं. हमने पीडितों को, पुलिस को, न्याय व्यवस्था को और मानवाधिकारवादी गुटों, सभी को सुना है. पहली बार हम हत्याओं की दास्ताँ उन्ही से सुनेंगे जिन्होंने इन्हें अंजाम दिया था. चाहे एक औरत का पेट चीर कर उसके अजन्मे बच्चे को बाहर निकालने की बात हो या एहसान जाफरी को टुकड़े-टुकड़े कर आग के हवाले करने की. औरतों के बलात्कार के या औरतों और बच्चों को काटने और जलाने के वीभत्स किस्से, सभी पर जमी संदेह की परत हट जायेगी. ये भी पता चलेगा कि कैसे क़ानून के रखवालों ने ही इसे बुरी तरह तार-तार कर दिया.
इसे पढ़ें और डरें.
एक समस्या ये है कि आज का दौर सनसनी फैलाने और तिल का ताड़ बनाने वाला है. एक ऐसा दौर जिसमें खेल और सिनेमा ही सब कुछ है. दिल दहलाने वाला, चौंकाने वाला, अमानवीय, अनोखा और पहली बार जैसे शब्द अपना अर्थ खो चुके हैं. जेट की रफ़्तार वाले मीडिया ने हम सभी को एक असंवेदनशील दर्शक बना दिया है. धुआंधार रफ़्तार से एक के बाद एक आती तस्वीरों ने सब कुछ पीछे छोड़ देने की प्रवृत्ति को जन्म दिया है नहीं तो शायद हम फट ही जाएं. तहलका का ये संस्करण एक तरह से लिटमस टेस्ट है. आगे के पेजों को पढ़ें और देखें, शायद आप कुछ शब्दों के मतलब दोबारा से खोज पायें. बर्बरता इन्हीं में से एक है.
पढ़ें और अंदाजा लगाएं कि क्या आपको इसके बाद भी डराया जा सकता है.
| कैसे शांत दिमाग वाले लोगों में खून की प्यास पैदा हो गई? क्या सम्पन्नता, लूटमार और क्रूरता को रत्ती भर भी कम नहीं करती? क्या शिक्षा कट्टरवादिता में कोई भी बदलाव नहीं ला पाती? क्या बहु-प्रचारित हिंदू धर्म के सिद्धांत भी लोगों में उठते क्रूरता के झोंकों की तीव्रता कम नहीं करते? |
गुजरात के बारे में भौचक्का करने वाली कई चीजों में से से तीन चीज़ें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली हैं. पहला, कि ये नरसंहार शहरी भारत के दिल में, मीडिया की बेतहाशा मारामारी के दौर में भी सम्भव हो सका. दूसरा, कि जो व्यक्ति नरसंहार के केन्द्र में था वही कुछ ही दिनों के बाद चुनाव जीत कर फ़िर से गुजरात का भाग्यविधाता बन गया. और ऐसा उसके अपराधों के बावजूद नहीं बल्कि किए गए अपराधों के कारण ही हुआ था. और तीसरी चुभन ये कि पछतावे की एक हल्की सी शिकन तक, करने वालों के माथे पर नहीं दिखाई देती.
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जर्मनी और इटली की तरह गुजरात के सामने भी कई सवाल खड़े हैं, कैसे शांत दिमाग वाले लोगों में खून की प्यास पैदा हो गई? क्या सम्पन्नता, लूटमार और क्रूरता को रत्ती भर भी कम नहीं करती? क्या शिक्षा कट्टरवादिता में कोई भी बदलाव नहीं ला पाती? क्या बहु-प्रचारित हिंदू धर्म के सिद्धांत भी लोगों में उठते क्रूरता के झोंकों की तीव्रता कम नहीं करते? और सहनशीलता और बुद्धिमत्ता का पौधा अगर गांधी के देश में ही नहीं पनपेगा तो फ़िर कहीं और के बारे में तो सोचा ही कैसे जाय?
क्या हम अब केवल मतभेदों और संख्याओं के जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं. क्या हम सिर्फ़ इसलिए कि हम संख्या में ज़्यादा हैं, क़ानून हमारे साथ हैं, उस हर व्यक्ति को खुशी-खुशी रौंद सकते हैं जो हमसे थोड़ी भी अलग राय रखता है या थोडा-सा भी अलग है. आज हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यही है क्योंकि गुजरात में तबाही मचाने वाली हिंसा आज हमारे भी चारों ओर है. हर आने वाला दिन एक नयी भीड़ के हमले की ख़बर लाता है. एक नई भीड़ द्वारा किया गया उन्मादी न्याय. हर मज़बूत अपने से कमज़ोर को धमकाएगा, बस क़ानून की नज़र ज़रा दूसरी ओर होनी चाहिए.
क्या ऐसा हो सकता है कि तमाम शोर-शराबे के उलट हमारा लोकतंत्र अपनी ऊंचाइयों को जी चुका है? तमाम भारतीय अमीर से अमीरतर होते जा रहे हैं लेकिन इंसानी तौर पर हम गरीब से गरीबतर हो रहे हैं? क्या ऐसा है कि महान लोगों की दूरदृष्टि की देन आज का भारत अब केवल छुद्र लोगों की छुद्र चिंताओं का ही ख़याल रखने वाला बन गया है? एक समय कुछ अच्छे लोगों ने एक उजड़े हुए उपनिवेश से एक आधुनिक समतामूलक समाज की स्थापना की थी.क्या आज ऐसा कोई नहीं जो हमारे अन्दर आती तेज़ सडांध को दूर कर सके?
तीन साल से ज़्यादा समय हुआ, केन्द्र में एक ऐसी सरकार है जो उन मूल्यों की विरासत को सहेजकर रखने का दावा करती है जिन पर हमारे देश की बुनियाद रखी गई थी. मगर आश्चर्य कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जिससे गुजरात के दर्द में ज़रा भी कमी आ सके. न तो कानून का भय ही कहीं दिखाई पडा और न ही शान्ति और भाईचारे को बढ़ाने के प्रयास करता कोई मरहम ही लगाया गया. सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह जैसे नामों का रिपोर्ट कार्ड भी इस मामले में बिल्कुल खाली है हालांकि वहाँ वोटों और गठबंधन का समूचा जोड़-तोड़ मौजूद है.
नियंत्रण और दूरदृष्टि का एक जटिल योग होता है महान नेतृत्व. मगर अफ़सोस आज के हमारे राजनेताओं में इनमें से या तो कुछ भी नहीं या केवल एक ही योग्यता मौजूद है.
आज के भारत में हजारों विद्रोह हिंसक होने के मौके के इंतज़ार में हैं मगर ये सबसे महत्वपूर्ण कहानी है क्योंकि गुजरात में पैदा हुई खाई भारत के विचार पर एक करारा थप्पड़ है. ये याद करना हमारे हित में होगा कि आज हम भले ही एक उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र हों मगर कभी एक सोच इसे अलग स्वरूप देने की भी थी. अगर हम ये याद कर पायें कि कोई भी चीज़ स्थाई नहीं, हमारा स्वरूप अभी भी बदल सकता है और हमारे अन्दर का राक्षस हमारे टुकड़े-टुकड़े कर सकता है--जैसा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ हुआ है-- तो हम ख़ुद पर ही एहसान करेंगें.
कोई भी चेहरा न तो गुस्से से लाल-पीला ही अच्छा लगता है और न ही दूसरों से अलग-थलग सजाधजा. और बिना मतलब की चमकीले भारत की मुस्कान छोड़ता तो बिल्कुल भी नहीं. ये पिछले अनुभव, दूसरों के प्रति चिंता और संवेदना का मिला-जुला रूप होना चाहिए.
गुजरात की सच्चाई पढ़ें और जानें क्यों.
आगे के पन्नों को पढ़ें और डरें.
तरुण जे तेजपाल
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कुल टिप्पणियां: 49
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प्रेषक : maharshi kumar tiwaritanashah bagh par sawar hai or ab bagh bhukhe ho gay hai. kisi ne sahi kaha hai. yahi hall bharat ka hai.
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प्रेषक : Davinder Singh GrewalTejpal ji agar aap jaise media likhe to fir se aisa na ho. Sach likhne ki himat sabh mein nahi hoti.
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प्रेषक : कुमार मुकेशमित्र कवि अंशु मालवीय ने इस त्रासदी पर एक कविता लिखी थी - कौसर बानो की अजन्मी बिटिया की ओर से। इसे भी इस लेख के साथ पढ़ा जाना चाहिए कौसर बानो की बस्ती नरोदा पाटिया , अहमदाबाद पर 28 फरवरी 2002 को हमला हुआ। वह गर्भवती थी। हत्यारों ने पेट चीर कर गर्भस्थ शिशु को आग के हवाले कर दिया। इस कविता में शिशु को लडकी माना गया है कुछ अन्य संकेतों के लिए - सब कुछ ठीक था अम्मा ! तेरे खाए अचार की खटास तेरी चखी हुई मिट्टी अक्सर पहुँचते थे मेरे पास.....! सूरज तेरी कोख से छनकर मुझ तक आता था। मैं बहुत खुश थी अम्मा ! मुझे लेनी थी जल्दी ही अपने हिस्से की साँस मुझे लगनी थी अपने हिस्से की भूख मुझे देखनी थी अपने हिस्से की धूप । मैं बहुत खुश थी अम्मा ! अब्बू की हथेली की छाया तेरे पेट पर देखी थी मैंने मुझे उन का चेहरा देखना था मुझे अपने हिस्से के अब्बू देखने थे मुझे अपने हिस्से की दुनिया देखनी थी। मैं बहुत खुश थी अम्मा ! एक दिन मैं घबराई.... बिछली जैसे मछली..... तेरी कोख के पानी में पानी में किस चीज़ की छाया थी अनजानी.... मुझे लगा तू चल नहीं घिसट रही है अम्मा ! फ़िर जाने क्या हुआ मैं तेरी कोख के गुनगुने मुलायम अंधेरे से निकलकर चटक धूप फिर ....... चटक आग में पहुँच गई। वो बहुत बड़ा ओपरेशन था अम्मा। अपनी उन आखों से जो कभी नहीं खुलीं मैंने देखा बड़े-बड़े डॉक्टर तुझ पर झुके हुए थे उनके हाथ में तीन मुंह वाले बड़े-बड़े नश्तर थे अम्मा..... वे मुझे देख चीखे ! चीखे किसलिए अम्मा... क्या खुश हुए थे मुझे देख कर बाहर निकलते ही आग के खिलोने दिए उन्होंने अम्मा ! फ़िर मैं खेल में ऐसा बिसरी कि तुझे देखा नहीं.... तूने भी अन्तिम हिचकी से सोहर गाई होगी अम्मा ! मैं कभी नहीं जन्मी अम्मा ! और इस तरह कभी नहीं मरी अस्पताल में रंगीन पानी में रखे हुए अजन्मे बच्चे की तरह मैं अमर हो गई अम्मा ! लेकिन यहाँ रंगीन पानी नहीं चुभती हुई आग है ! मुझे कब तक जलना होगा .....अम्मा !!!
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प्रेषक : YOUNUSTejpal as a media person you can not be bias. Do not write lie and misguide people.
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प्रेषक : ROBERTHindu, Muslim, Shikh, Isai apas me he ham bhai bhai. I don't think media want unity.























