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   दो जहां के बीच का मुसाफिर
छ महीने तक गुजरात में अपनी असलियत के उलट एक उग्र हिंदूवादी कट्टरपंथी का चोला ओढ़कर रहने वाले आशीष खेतान, गुजरात नरसंहार के पीछे के सच की उनकी खोज में आने वाले उतार-चढावों को याद करते हैं...
नाश्ता खत्म कर मैं अखबार पढ़ने की तैयारी कर ही रहा था कि दूसरे कमरे में मोबाइल की घंटी बजी. जब तक वहां पहुंचता फोन कट चुका था. फोन करने वाले ने एक एसएमएस छोड़ा था जिसमें लिखा था कि मुझे फोन करो. ये मेरे एडिटर तरुण तेजपाल का संदेश था. मैं कुछ दिन पहले ही गुजरात से लौटा था जहां मैंने फर्जी मुठभेड़ों के सिलसिले में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया था. इससे पर्दाफाश हुआ था कि गुजरात पुलिस ने सुनियोजित तरीके से इन मुठभेड़ों में मुसलमानों को मारा था. सोचने लगा कि आखिर तरुण के मुझे इतनी सुबह (हालांकि 11 बज चुके थे पर ज्यादातर पत्रकारों के लिए ये तड़के सुबह का वक्त ही होता है) फोन करने की क्या वजह हो सकती है. मुझे लगा कि हो सकता है बात मेरी हालिया खबर से जुड़ी हो. हो सकता है कि स्टिंग ऑपरेशन में जिनका पर्दाफाश हुआ है उन्होंने कोई कानूनी नोटिस भेज दिया हो. 2004 की तरह ही मुझे एक स्टोरी पर काम करना था और मेरे पास कुछ खुफिया कैमरों और साहस के अलावा और कुछ भी नहीं था. सबसे बड़ा सवाल था कि शुरुआत कहां से की जाए. पिछली बार की तरह ही इस बार भी मैं इस अनजान जगह पर किसी को नहीं जानता था.
दिमाग में उठ रहे सवालों के बीच मैंने तरुण को फोन मिलाया. तरुण ने पूछा, “आशीष क्या तुमने वडोदरा में हुई तोड़-फोड़ के बारे में सुना है?” बेशक मैंने सुना था. पिछले कुछ सालों से गुजरात कई गलत वजहों से सुर्खियों में रहा था. ये हिंदुत्व के नाम पर तोड़फोड़ मचाने वाले कुछ उन्मादी लोगों की खबर थी. इस बार उनका निशाना वडोदरा के महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी की फाइन आर्ट्स फैकल्टी बनी थी. तरुण ने कहा, “ ये बहुत बुरा हुआ है". तोड़-फोड़ करने वाले कई टीवी चैनलों आकर अपनी अजीबोगरीब विचारधारा का बखान करने के साथ चिल्ला-चिल्ला बता चुके थे कि हिंदू देवी-देवताओं के अश्लील चित्रण ने उनकी भावनाओं को चोट पहुंचाई है. ” तरुण का कहना था कि फाइन आर्ट्स के कुछ छात्रों और प्रोफेसरों को निशाना बनाने के पीछे एक बड़ा मकसद प्रतीत होता है. उन्होंने मुझसे ये पता करने को कहा कि ये कौन लोग हैं, क्या करते हैं और सबसे ऊपर, सार्वजनिक जीवन में ऐसा बर्ताव करने वालों की वास्तविकता क्या है?
जैसे ही मैंने फोन नीचे रखा मुझे महसूस हुआ कि निराशा का एक घेरा मुझे अपने आगोश में ले रहा है. एक के बाद एक तीन इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स ने मुझे कुछ थका सा दिया था. अपनी पत्नी क्रिस से छुट्टियों के दौरान उसे कहीं घुमाने ले जाने का वादा कई बार टूट चुका था. मुझे नौ महीने की अपनी बच्ची के साथ वक्त बिताए भी एक अर्सा हो चला था.
लेकिन इसके बावजूद तरुण के फोन के कुछ ही घंटे बाद मैं गुजरात जाने के लिए एक बार फिर से तैयारी कर रहा था. गुजरात--एक ऐसी जगह जहां जाते हुए हर बार ऐसा लगता है कि कुछ बहुत बुरा सामने आने वाला है.
मेरा पहली बार वडोदरा जाना 2004 की सर्दियों में हुआ था. उस समय तक बेस्ट बेकरी केस की अहम गवाह जाहिरा शेख कोर्ट में एक बार फिर अपने बयान से पलट गई थी. ऑटो जब मुझे वडोदरा एयरपोर्ट से शहर के केंद्र में स्थित अलकापुरी तक ले गया तो मैं उन सभी जगहों से गुजरा जहां मैं पहले भी आ चुका था-स्टेशन, गोल चक्कर, रेस्टोरेंट. मुझे याद आया कि कितनी असाधारण यात्रा थी वो. लेकिन जगह से मेरी इस जान-पहचान ने मेरी गंभीरता को घटाने की बजे कुछ और बढ़ा दिया. मैंने सोचा कि 2004 की तरह ही मुझे एक स्टोरी पर काम करना था और मेरे पास कुछ खुफिया कैमरों और साहस के अलावा और कुछ भी नहीं था.
अब सबसे बड़ा सवाल था कि शुरुआत कहां से की जाए. पिछली बार की तरह ही इस बार भी मैं इस अनजान जगह पर किसी को नहीं जानता था. 2004 में किसी जादुई या यों कहें कि किसी दैवीय हस्तक्षेप से पंद्रह दिन के भीतर ही मैं जाहिरा नाम की कठपुतली के के तारों को खींचने वाले मुख्य व्यक्ति, बीजेपी विधायक और स्थानीय बाहुबली मधु श्रीवास्तव के साथ घरेलू गार्डन में बैठा हुआ था. मधु श्रीवास्तव झूले पर और मैं एक प्लास्टिक की टूटी-फूटी कुर्सी पर अपने गुप्त कैमरे से लैस. तब भी मेरे पास जानकारी सीधी सी थी. तरुण का कहना था कि जाहिरा मामले में कोई नई चीज सामने नहीं आ रही है. मुझे बिखरी कड़ियां जोड़कर एक पूरी तस्वीर बनानी थी. जब ये तस्वीर बनकर पूरी हुई तो इसकी कीमत थी 18 लाख रुपये. ये वह रकम थी जो जबान बंद रखने के लिए मधु ने जाहिरा को दी थी. लेकिन ये तब की बात थी. चमत्कार रोज-रोज़ नहीं होते. बावजूद इसके मुझे एक कोशिश तो करनी ही थी.
एक ठीकठाक ठिकाने की मेरी तलाश होटल अदित इंटरनेशनल के कमरा नं 506 में पूरी हुई. नाम के अलावा होटल में कुछ भी इंटरनेशनल नहीं था. कमरे की दीवारों से उतरती पेंट की पपड़ी और स्याह रोशनी में ऐसा कुछ नहीं था जिससे मेरा उत्साह बढ़ता. सोचा कि शायद सिगरेट के कुछ कश से दिमाग कुछ साफ सोच पाए. धुएं के छल्लों के बीच एक विचार सूझा कि क्यों न हर गली में कुछ आगे बढ़कर, मुकाम तक जाने वाली गली की पहचान की जाए.
मैंने तुरंत उन सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को फोन लगाए जो यूनिवर्सिटी में हुई घटनाओं के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे. मैंने मुंबई के अपने एक संपर्क को भी फोन किया जिसके गुजरात में कुछ मित्र थे. मैंने अपने संपर्क से कहा कि वह मुझे वडोदरा में बीजेपी के कुछ लोगों से मुलाक़ात कराए वो भी बिना ये बताए कि मैं एक पत्रकार हूं. मैंने कहा, “उन्हें ये बताना कि मैं गुजरात के हिंदुत्व पर रिसर्च कर रहा दिल्ली यूनिवर्सिटी का एक छात्र पीयूष अग्रवाल हूं. ” उसने मुझे अगले दिन सुबह कुछ लोगों के नाम बताने का वादा किया. अगले दिन मैंने दस बजे उसे फोन किया. लेकिन कई बार फोन करने के बाद भी उधर से फ़ोन नहीं उठाया गया. उसने मुझे कुछ ऐसी बाते बताई जिसने न सिर्फ मेरी स्टोरी का रुख मोड़ दिया बल्कि जिस नज़र से पूरा देश गुजरात के दंगों को देखता रहा है उसे भी बदल दिया।
इसके बाद मैंने कुछ कार्यकर्ताओं से मिलने का फैसला किया. उनमें से एक ने मुझे प्रोफेसर इफ्तिखार से मिलवाया जो कि उन कुछ लोगों में शामिल थे जिन्होंने यूनिवर्सिटी में गुंडागर्दी का खुले तौर पर विरोध किया था. इफ्तिखार ने मुझे बताया कि कैसे बीजेपी ने एक तरह से महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी की प्रशासकीय इकाइयों-- सीनेट और सिंडीकेट--में अपने लोग भर रखे हैं. उन्होंने बताया कि इनमें ज्यादातर विहिप या संघ से ताल्लुक रखने वाले लोग हैं. नियुक्ति से लेकर प्रमोशन तक हर चीज आपकी विचारधारा के झुकाव पर निर्भर करती है. देखा जाता है कि आप दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी या वामपंथी किस तरह की विचारधारा से ताल्लुक रखते हैं.
फिर मेरे मुंबई संपर्क से आखिर मेरी बात हो ही गई. पहले सम्पर्क न हो पाने के कारण बताए गए लेकिन मेरी दिलचस्पी स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ताओं के नाम और नंबर जानने में ज़्यादा थी. वो मुझे दे दिए गए. इस बारे में आश्वस्त होकर कि मेरा परिचय पत्रकार की बजाए रिसर्च स्कॉलर के रूप में दिया गया है, मैंने मिस्टर ए को फोन किया. मिस्टर ए ने पड़ताल करते हुए मुझसे मेरी रिसर्च की प्रकृति और उसके मकसद पर कई सवाल पूछे. उनकी बातों से नहीं लगा कि वह मुझसे आश्वस्त हो गए हैं लेकिन उन्होंने मुझे मिस्टर बी तक पहुंचा दिया जिन्होंने मुझे धीमंत भट्ट से मिलवाया. मुझे बताया गया कि भट्ट वडोदरा से बीजेपी सांसद के पीए हैं और मुझे सही लोगों से मिलवा देंगे.
खबरों से मुझे पता चल ही गया था कि बीजेपी के कार्यकर्ता नीरज जैन ने यूनिवर्सिटी में हंगामे की अगुवाई की थी. मैंने भट्ट को फोन मिलाया और बताया कि मैं नीरजभाई जैन से मिलना चाहता हूं. तय समय के मुताबिक मैं वडोदरा बीजेपी के ऑफिस में पहुंच गया. आधा घंटे बाद जैन का आगमन हुआ. छोटे कद और नई-नई तोंद वाले जैन की उम्र चालीस साल के करीब होगी. वह इस बात से चिपके हुए थे कि सारी समस्या की जड़ मुसलमान हैं. लेकिन मुसलमानों के लिए उनकी नफरत अपने आप पैदा हुई नहीं प्रतीत हो रही थी बल्कि लग रहा था कि ऐसा उनकी राजनीतिक ज़रूरतों की वजह से है. साधारण बजरंग दल कार्यकर्ता से लेकर वडोदरा बीजेपी के महासचिव तक के सफर में जैन को पता चल गया था कि राजनीतिक सफलता का मतलब है मुसलमानों से नफरत. पेंटिग्स को हिंदुत्व के नाम पर फाड़ने से उनकी ख्याति में और इजाफा कर दिया था.
मुसलमानों के प्रति जैन के विचारों से मेरी स्टोरी का ताल्लुक नहीं था. धीमंत भट्ट से मिलने का फैसला करने में मुझे एक दिन का वक्त लग गया। भट्ट बीजेपी का सदस्य होने के अलावा एमएस युनिवर्सिटी का चीफ एकाउंटेंट भी था। 19 मई को 11.30 बजे मैं भट्ट के एमएस युनिवर्सिटी के प्रशासनिक भवन में स्थित ऑफिस में मिलने पहुंचा। फाइलों और मोबाइल पर आ रही कॉल्स में उलझे होने के बावजूद उसने मेरा स्वागत गर्मजोशी से किया। उसने पानी के लिए पूछा, फिर चाय के लिए और इसके बाद मुझे टॉयलेट का रास्ता दिखाया। यहां मैंने अपना खुफिया कैमरा चालू किया। पंद्रह मिनट की बातचीत में भट्ट को इस बात का यकीन हो गया कि मैं भी उसी की तरह कट्टर हिंदू हूं। इसके बाद उसने मुझे कुछ ऐसी बाते बताई जिसने न सिर्फ मेरी स्टोरी का रुख मोड़ दिया बल्कि जिस नज़र से पूरा देश गुजरात के दंगों को देखता रहा है उसे भी बदल दिया। उसके शब्द थे "प्रोफेसर बंदूकवाला और नौकरशाह पीरज़ादा के बंगले जलाने वालों में मैं शामिल था... शांतिदूत होने की आड़ में मैंने दंगों के दौरान हथियार सप्लाई किए।...हमें संघ की लाठी किनारे रखकर एके-56 उठा लेनी चाहिए।"
मेरा सर घूमने लगा। भले ही भट्ट एक एकाउंटेंट था लेकिन उसका असली धंधा धार्मिक अल्पसंख्यकों को किसी भी हद तक चोट पहुंचाना था। पेंटिंग्स को जलाना तो एक छोटा सा झगडा था। असली युद्ध तो पांच साल पहले साल 2002 में जीत लिया गया था। पांच साल पहले की असल कहानी का जिक्र मैंने अपनी बॉस हरिंदर बवेजा या शम्मी से किया। तरुन और शम्मी दोनों ने मुझे इसी स्टोरी पर आगे बढ़ने को कहा। "समय और संसाधनों की कोई चिंता नहीं है" ये वाक्य थे तरुन के और शम्मी ने कहा "गुजरात दंगो पर तुम्हारी ख़बर आखिरी सच होना चाहिए।" और इस तरह से छह महीनें लंबी यात्रा की शुरुआत हुई। एक ऐसी यात्रा जो मुझे साल 2002 की घटनाओं का इतिहास पुन: लिखने के लिए अतीत में में ले गई। एक ऐसी यात्रा जिसमें सिर्फ डर और उम्मीद ही मेरे सहयात्री थे। उम्मीद सच को पाने की थी तो डर इसकी खोज में ख़ुद की जान गंवाने का था। उम्मीद हत्यारों को उनके अंजाम तक पहुंचाने की तो डर इस दौरान खुद ही शिकार बना दिए जाने का। भट्ट को मेरी पहचान पर संदेह हो गया। मुसलमान गवाहों को धमकाने और खरीदने की बात स्वीकार करने के बाद जैसे ही मैंने उससे विदा ली उसने मुझे फोन किया और कहा कि उसे मेरे आरएसएस का आदमी होने पर शक है।
मैंने ज्यादा से ज्यादा वीएचपी, बीजेपी और आरएसएस के लोगों से मिलने का फैसला किया। मैंने भट्ट से सघ परिवार के कुछ लोगों से संपर्क कराने को कहा--अहमदाबाद में सभी हिंदू संगठन सामुहिक रूप से परिवार के तौर पर पुकारे जाते हैं। भट्ट इसके लिए तैयार हो गया और यात्रा शुरू हो गई. अहमदाबाद में मेरी एक ने दूसरे से द्दोसरे ने तीसरे से जान-पहचान कराई और इस तरह से संपर्कों का एक पिरैमिड बनने लगा जो लगातार बढ़ता जा रहा था। कुछ दिनों के बाद मैंने बीजेपी के एक आदमी से खुद को गोधरा भेजे जाने की गुजारिश की- वो छोटा सा कस्बा जो भारतीय सियासत के शब्दकोश का सबसे अहम नाम बनने के लिए धुंधलके से एकाएक सामने आया था, एक दुखद पहेली जिसका हल निकलना अभी बाकी है।
अगले दिन मैं गोधरा में ककुल पाठक के सामने बैठा था जो कि बीजेपी सदस्य होने के साथ-साथ साबरमती एक्सप्रेस आगजनी का चश्मदीद भी था। उसने मुझे बजरंग दल के पूर्व अध्यक्ष और गोधरा के विधायक हरेश भट्ट के पास भेजा। भट्ट बड़बोले स्वभाव का आदमी था जो कि बातचीत के दौरान दूसरों की सुनने की बजाय खुद की सुनाने में यकीन रखता था। एक पत्रकार के नज़रिए से ऐसे आदमी-- विशेषकर ऐसा आदमी जिसके पास बताने के लिए बहुत कुछ हो-- का हमेशा स्वागत है। हिंदुत्व पर 45 मिनट की लंबी थकाऊ बातचीत के बाद मैंने एक सवाल दागा- हम (हम यानी हिंदू, भट्ट को ये विश्वास था कि जिस कट्टर धर्म की शिक्षा वो जीवन भर देता रहा है मैं उसका अंध समर्थक हूं) कभी हथियार नहीं रखते। फिर 2002 में हमने मुसलमानों को कैसे मारा? अगर मैं तुम्हें बताऊं तो तुम इसे अपनी किताब में शामिल नहीं करने का वादा करोगे? (मैंने कहा था कि मैं हिंदुत्व की वीएचपी की विचारधारा को बढ़ावा देने वाली एक किताब लिख रहा हूं)। "मैंने बम, रॉकेट लॉंन्चर, तलवारें बनाई और उन्हें पूरे गुजरात में बंटवाया। बम और तलवारें दूसरे राज्यों से भी तस्करी के जरिए लाई गई थी। ये पहली बार है जब मैं ये बात पार्टी से बाहर किसी आदमी को बता रहा हूं।" भट्ट के मुंह से निकली इस बात ने मुझे सन्न कर दिया।
ये 1 जून 2007 की बात थी। अगले कुछ महीनों के दौरान मैं तमाम ऐसे लोगों से मिला जिनके ऊपर दंगों में शामिल होने और हत्या के आरोप थे और ऐसे लोगों से भी जो पर्दे के पीछे से संचालन कर रहे थे। इस दौरान ऐसे भी मौके आए जब मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था। निराशा के पल भी आए और भयावह आतंक का अहसास भी हुआ। एक बार मैं भट्ट के साथ उनकी कार में बैठकर अहमदाबाद से गोधरा जा रहा था। बीच रास्ते में उन्हें एक कॉल आई। फोन काटने के बाद, वो मेरी तरफ घूमें और बोला, " किसी ने उसे सूचना दी है कि दिल्ली का कोई पत्रकार साबरमती एक्सप्रेस घटना पर स्टिंग ऑपरेशन कर रहा है। उसने मुझे सावधान रहने की हिदायत दी है।" मैंने चेहरे पर कोई भाव न लाते हुए कहा अच्छा!
कुछ मिनट बाद भट्ट के ड्राइवर ने कार मुख्य रास्ते से एक संकरी, कच्ची सड़क पर उतार दी। जैसे ही कार एक सुनसान एकमंज़िला इमारत के बाहर रुकी वहां एक और कार भी आकर रुकी जिसमें से दो आदमी बाहर निकले। मुझे इंतज़ार करने का आदेश देकर भट्ट और दोनों आदमी घर के अंदर चले गए। मेरे पास दो खुफिया कैमरे थे और मेरा पर्दाफाश करने के लिए सिर्फ शरीर को स्पर्श करने भर की जरूरत थी। मैंने खुद को कयामत के लिए तैयार कर लिया था। बीस मिनट बाद भट्ट वापस आए और हम गोधरा के लिए चल पड़े। दोनों आदमी दूसरी दिशा में चले गए। भट्ट ने मुझे बताया कि वो उन दोनों के साथ कुछ बिजनेस कर रहा था।
एक और मौका आया जब सबराकान्था के पब्लिक प्रॉसीक्यूटर भरत भट्ट को मेरी पहचान पर संदेह हो गया। मुसलमान गवाहों को धमकाने और खरीदने की बात स्वीकार करने के बाद जैसे ही मैंने उससे विदा ली उसने मुझे फोन किया और कहा कि उसे मेरे आरएसएस का आदमी होने पर शक है। कुछ ही मिनट बीते थे कि एक और वीएचपी सदस्य, जिसका कुछ ही दिन पहले मैंने स्टिंग किया था, ने फोन किया और मेरा पता पूछा। बहरहाल इन संकरे पड़ावों से गुजरते हुए भी मेरी यात्रा जारी रही। जब भी तनाव हद से ज्यादा बढ़ जाता था तो मैं अपनी पत्नी और बेटी से मिलने के लिए मुम्बई की यात्रा पर निकल जाता था।
छह महीनो तक मैं दो जहां के बीच डूबता-उतराता रहा। एक मेरी दुनिया जहां मैं आशीष खेतान था, एक पत्रकार जिसकी कैथोलिक पत्नी थी, एक बेटी थी जिसका फ्रेंच नाम था और जिसका कोई स्थाई धर्म नहीं था, जो मुसलमान और ईसाई दोस्तों का मेजबान था। और एक दूसरी दुनिया भी थी जहां मैं पीयुष अग्रवाल था, "परिवार" का एक सदस्य, एक उग्र हिंदू, एक धार्मिक कट्टरपंथी जिसके मित्र सिर्फ हत्यारे और बलात्कारी ही थे।
आशीष खेतान
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कुल टिप्पणियां: 13
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प्रेषक : shamshadap ne bahut imandare se kam kiya .sachhe patrakar ke rup me ap ko hamesha yad kiya jayega
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प्रेषक : mohit azadu r great profashional, vakai oos six mahine ki jindgi ka aashash mujhe yahi baithe-baithe ho raha hai,sting ke samay ki manodasha ko apne jis tarha se nibhaya vo vakai kabile tarif hai. hum honge kamyab.
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प्रेषक : rahul singhaapne sahsik patrakarita ka utkrist namoona pesh kiya hai jaroorat hai aise kai sahsi patrakaro ki jo aise reports logo ki aankhe khole ummed he judiciary bhi is reoort ka sangyan lage
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प्रेषक : ABDULAPNA NEWSPAPER CHALANE KE LIYE JOOTHI PAR ACCHI KAHANI LIKHTE HO. PAPI PET KA SAWAL HE.
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प्रेषक : PdguptaHats off to both Ashis Khaitan and his teammates. more exposure of those HIndu-monopolists will bring back confidence to who dream happy progress of this multi-national, multi religious state. Thanks.
























