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   तार-तार क़ानून
निचली अदालत
दंगों से पहले ही संघ ने आरोपियों को बचाने का इंतजाम कर लिया था. न्याय-अन्याय की कानूनी लड़ाई में न्याय के पक्ष में खड़े दिख रहे योद्धा असल में अन्याय की तरफ से लड़ रहे थे.
| जिन्होंने किया, उन्हीं की जुबानी |
नरसंहार की योजना बनाने और उसे अंजाम देने का ही नहीं, दंगाइयों को बचाने का इंतजाम भी पहले से ही कर लिया गया था. दंगे शुरू होने से पहले ही विश्व हिंदू परिषद ने ये योजना बनानी शुरू कर दी थी कि मारकाट के आरोपी हिंदुओं को कानूनी सहायता कैसे दी जाएगी.
बीजेपी की वडोदरा इकाई के सदस्यों धीमांत भट्ट और दीपक शाह ने तहलका को बताया कि साबरमती एक्सप्रेस की घटना वाली रात को संघ परिवार के प्रमुख सदस्यों ने एक बैठक कर दंगाइयों को बचाने के लिए वकीलों का एक पैनल तैयार किया. कई प्राइवेट और सरकारी वकील विश्व हिंदू परिषद के सदस्य थे जिससे ये काम आसान हो गया. महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी की एक्जीक्यूटिव बॉडी के सदस्य दीपक शाह ने वडोदरा के उन कई वकीलों के नाम भी बताए जो बैठक में मौजूद थे. इनमें राजेंद्र त्रिवेदी, तुषार व्यास और नीरज जैन शामिल हैं.
| सरकारी वकीलों ने दंगाइयों को अप्रत्यक्ष रूप से मदद पहुंचाई. इस तरह कई मामलों में ऐसा हुआ कि अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों आरोपियों के पक्ष में हो गए. उन आरोपियों के पक्ष में जिन्होंने हत्या, लूट और बलात्कार को अंजाम दिया. |
साबरकांठा जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों नरेंद्र पटेल और मोहन पटेल ने तहलका को बताया कि दंगों के बाद संघ ने संकलन के नाम से एक समूह बनाया जिसका काम हिंदू दंगाइयों को कानूनी सहायता देना था. प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे वकीलों ने आरोपियों का पक्ष ले लिया जबकी वीएचपी या संघ की तरफ झुकाव रखने वाले सरकारी वकीलों ने दंगाइयों को अप्रत्यक्ष रूप से मदद पहुंचाई. इस तरह कई मामलों में ऐसा हुआ कि अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों आरोपियों के पक्ष में हो गए. उन आरोपियों के पक्ष में जिन्होंने हत्या, लूट और बलात्कार को अंजाम दिया. ऐसे में पीड़ितों के पास न्याय की क्या उम्मीद बचती. पहले तो पुलिस उनके खिलाफ हो गई और फिर उनके लिए न्याय की लड़ाई लड़ने वाले.
अहमदाबाद के जाने-माने वकील और वीएचपी के सक्रिय कार्यकर्ता चेतन शाह नरोदा पाटिया मामले के आरोपियों का मुकदमा लेने वालों में पहले थे. बाद में सरकार ने उन्हें गुलबर्ग सोसाइटी केस में सरकारी वकील बना दिया. तहलका ने इस केस के एक आरोपी प्रहलाद राजू से मुलाकात की. राजू ने बताया कि फरार होने के दौरान शाह ने ही उसे बताया कि कब पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना है.
वीएचपी की गुजरात इकाई के महासचिव दिलीप त्रिवेदी मैसाणा जिले में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और लगभग एक दर्जन सरकारी वकील उनके नीचे काम करते हैं. ये जिला दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक था. त्रिवेदी का काम तो था आरोपियों की जमानत अर्जी का विरोध करना मगर उन्होंने किया ठीक उसके उलट. उन पर आरोपियों की जमानत के लिए मदद करने के आरोप लगे. काफी हो-हल्ले के बाद त्रिवेदी को दंगे के मामलों से हटा दिया गया.
तहलका ने 15 जून 2007 को मैसाणा कोर्ट परिसर में त्रिवेदी के ऑफिस में उनसे मुलाकात की. उन्होंने बताया कि वीएचपी का महासचिव होने के नाते गुजरात में दंगे के सभी मामलों का संयोजन वही कर रहे हैं. त्रिवेदी को ये शिकायत भी थी कि सरकारी वकीलों और बचाव पक्ष के वकीलों के बीच तालमेल से लेकर दंगों की फिर से जांच कर रहे पुलिसवालों से बातचीत तक सारे काम उन्हीं को करने पड़ रहे हैं. उन्होंने आगे बताया कि मैसाणा में दंगों के 74 मामलों में से केवल दो में अब अपराध साबित हुआ है. त्रिवेदी के शब्दों में इनमें से एक मामले में सत्र न्यायालय में अपील के बाद रिहाई का आदेश मिल गया. दूसरे मामले में हाईकोर्ट में अपील की जा चुकी है और आरोपी जमानत पर हैं.
त्रिवेदी ने फिर विस्तार से बताया कि गोधरा के बाद किस तरह मैसाणा में जघन्य तरीके से लूट और मारकाट को अंजाम दिया गया. उन्होंने कहा कि ऐसे एक केस सरदारपुरा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्थगन आदेश दे दिया है लेकिन चूंकि आरोपियों को जमानत मिल चुकी है इसलिए उन्हें कोई चिंता नहीं है. त्रिवेदी ने ये भी कहा कि मैसाणा अदालत ने जब सरदारपुरा मामले में आरोपियों को जमानत दे दी तो पीडि़तों ने इतना हंगामा मचाया कि टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार ने इसे मुखपृष्ठ पर जगह दी और खबर में दंगों के मामलों में पक्षपात का आरोप लगाया. ये बताते हुए उनके चेहरे पर गर्व साफ झलक रहा था कि आरोपों की सच्चाई जग जाहिर होने पर भी उनके खिलाफ कुछ साबित नहीं किया जा सका. त्रिवेदी के मुताबिक सब जानते थे कि दंगों के बाद उन्होंने हर जिले में सरकारी वकीलों, कार्यकर्ताओं और पुलिस अधिकारियों के साथ बैठकें की थीं.
साबरकांठा में तहलका ने सरकारी वकील भरत भट्ट से मुलाकात की जो वीएचपी के जिलाअध्यक्ष भी हैं. भट्ट ने कहा कि वो आरोपियों की मदद करने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं. तहलका को पता चला कि न्याय के लिए लड़ने की बजाय ये सरकारी वकील दरअसल एक दलाल बन गया है और पैसे का सहारा लेकर कोर्ट के बाहर समझौते करवा रहा है.
नानावती-शाह कमीशन
नानावती-शाह कमीशन के सामने सरकार का बचाव कर रहे वकील का कहना है कि अगर मोदी न होते हिंदू गोधरा में हुई मौतों का बदला कभी न ले पाते.
| जिन्होंने किया, उन्हीं की जुबानी |
ये बात हमेशा से साफ थी कि गोधरा हत्याकांड के बाद गुजरात में घूम रहे हत्यारे झुंडों के सिर पर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की छत्रछाया थी. इस मामले की आधिकारिक जांच नानावती-शाह आयोग को सौंपी गई है. लेकिन एक गंभीर सच्चाई का खुलासा करते गुजरात सरकार के वकील अरविंद पंड्या ने बताया कि वह आयोग की कार्रवाई को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं.
| खास बात ये भी है कि पंड्या आयोग के सामने सरकार का बचाव तो कर ही रहे हैं, साथ ही साथ निचली अदालत में कई आरोपियों की पैरवी भी कर रहे हैं...उनके मुताबिक जस्टिस शाह का झुकाव बीजेपी की तरफ है. जस्टिस नानावती के बारे में पंड्या का कहना था कि उनकी दिलचस्पी सिर्फ पैसे में है. |
गुजरात सरकार ने पंड्या को नानावती-शाह आयोग के सामने अपना बचाव करने के लिए अभियोजन पक्ष का विशेष वकील नियुक्त किया है. औरों की तरह पंड्या को भी यकीन है कि अगर मोदी न होते तो हिंदू गोधरा में हुई मौतों का बदला कभी न ले पाते.वकीलों की एक टीम के साथ मोदी और उनकी सरकार को बचाने की कोशिशें कर रहे पंड्या ने तहलका को बताया कि दंगों के दौरान मोदी ने पुलिस को हिंदुओं का साथ देने के लिए कहा था. पांड्या के मुताबिक जब गोधरा कांड हुआ तो इसकी प्रतिक्रिया के लिए गुजरात के लोग भी तैयार थे और सरकार भी जो एक सुखद संयोग था. उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर 2002 में बीजेपी की बजाय गुजरात में कोई और सरकार होती तो दंगे कभी नहीं होते. पंड्या के शब्दों में गोधरा हत्याकांड के बाद मोदी इतने परेशान थे कि अगर उनका बस चलता तो वह खुद अहमदाबाद की मुस्लिम बस्ती जुहापुरा पर बम गिरा देते. लेकिन मुख्यमंत्री होते हुए उनकी कुछ सीमाएं थीं. पंड्या का तो यहां तक कहना था कि गुजरात में मुसलमानों के इस नरसंहार को हर साल विजय दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए. उनके मुताबिक मुसलमानों को मारने की बजाय उन्हें अपाहिज बना देना चाहिए जिससे सजा भी कम मिले और ये भी पता चल जाए कि हिंदू क्या कर सकते हैं.
खास बात ये भी है कि पंड्या आयोग के सामने सरकार का बचाव तो कर ही रहे हैं, साथ ही साथ निचली अदालत में कई आरोपियों के मामलों की पैरवी भी कर रहे हैं. उन्होंने तहलका को बताया कि कई मामलों में जजों ने भी उन्हें पूरा सहयोग और मार्गदर्शन दिया है. जैसाकि पंड्या का कहना था, “हर जज मुझे अपने चैंबर में बुला रहा था और मेरे प्रति पूरी सहानुभूति प्रकट कर रहा था....मुझे पूरा सहयोग दे रहा था लेकिन दूरी बनाए रखते हुए...जरुरत पड़ने पर जज मुझे मार्गदर्शन भी दे रहे थे....कि केस को किस तरह पेश किया जाए.”
पंड्या ने कुछ ऐसी बातें भी कहीं जिससे नानावती-शाह कमीशन की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में खड़ी होती है. उनके मुताबिक नानावती के साथ आयोग की अध्यक्षता कर रहे के जी शाह का झुकाव बीजेपी की तरफ है. नानावती के बारे में पंड्या का कहना था कि उनकी दिलचस्पी सिर्फ पैसे में है.
आशीष खेतान
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कुल टिप्पणियां: 4
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प्रेषक : rahulmodi bolraha he mere picche koi nahi he nato ladka he na to ladki to kya guj. cm gay he
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प्रेषक : loveHamara khuda dhek raha hai sab kuch,Insa-allah sabhi ko wah duniya main hee saza deyga
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प्रेषक : LionHai Koi Mai Ka Laal Jo MODI Jese DARINDE Ko Kute Ki Mot Maare ? Aur Aisi Mot ki Sala Phir Koi MODI Banne ki Kosis na Kare.
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प्रेषक : would like to keep secreteI am govt school employee. Even in The service tribunal Ifeelthat The judge the govt pleaders are representing the govt.they deny the constitutional right,natural justice. the Judiciary need the change.
























