• print प्रिंट करें

   नरौदा पाटिया : हैवानियत का चश्मदीद

फॉन्ट आकार Decrease font Enlarge font
image

नरोदा पाटिया में नरसंहार शुरू करने में भी तेजी दिखाई गई और उस पर पर्दा डालने का अभियान चालू करने में भी. दोषी अब भी बगैर किसी सजा के डर के बेपरवाह घूम रहे हैं.

साबरमती एक्सप्रेस त्रासदी के कुछ घंटों बाद ही बीजेपी और इसके सहयोगी संगठनों-विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बजरंग दल-ने देश के इतिहास में सबसे जघन्य नरसंहारों में से एक की तैयारियां शुरू कर दी थी. साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड के एक दिन बाद 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद में खून की ऐसी होली खेली गई जिसके बारे में सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए. भगवा ब्रिगेड के हथियारबंद कार्यकर्ता गलियों में घूम रहे थे और हर तरफ आगजनी, लूट, बलात्कार और हत्या का खौफनाक मंजर दिखाई दे रहा था. जिन गलियों में सबसे ज्यादा खून बहा वे नरोदा की थीं. अहमदाबाद के बाहरी हिस्से में बसे इस इलाके में हिंदुओं और मुसलमानों की मिली-जुली आबादी रहती थी.

नरोदा को नरविहीन करने के लिए बीजेपी, विहिप और बजरंग दल ने बेहद सुनियोजित तरीके से एक टीम बनाई. इस टीम ने 28 फरवरी की सुबह 10 बजे से लेकर रात के अंधेरे तक नरसंहार को अंजाम दिया. हमला करने के लिए जल्दी से जो कुछ भी साधन मिल सकता था- बंदूक, त्रिशूल, तलवार, ईंट, गैस सिलिंडर और यहां तक कि डीजल टैंकर भी- जुटाया गया. फिर शुरू हुआ मुसलमानों की बस्तियों पर हमला. ज्यादातर लोगों को हत्या के बाद जला दिया गया. आग के हवाले करने से पहले उनके जिस्म के कई टुकड़े किए जा रहे थे. महिलाएं तो इससे भी ज्यादा बर्बरता की शिकार हुईं. कइयों की हत्या से पहले उनके साथ बलात्कार किया गया.

आग के हवाले करने से पहले उनके जिस्म के कई टुकड़े किए जा रहे थे. महिलाएं तो इससे भी ज्यादा बर्बरता की शिकार हुईं. कइयों की हत्या से पहले उनके साथ बलात्कार किया गया.

नरसंहार के दौरान दंगाइयों के मोबाइल फोन लगातार बज रहे थे और वे अपने साथियों या फिर आकाओं को ये बता रहे थे कि उनका स्कोर कितना हुआ. स्कोर यानी हत्याओं की संख्या. 28 फरवरी 2002 की सुबह तक जिंदगी की चहल-पहल से भरा नरोदा पाटिया और नरोदा गांव शाम होने तक लाशों के खेत में तब्दील हो चुका था.

नरोदा कोई दूर-दराज का अनजान इलाका नहीं था. अहमदाबाद पुलिस के मुख्यालय से इसकी दूरी चार किलोमीटर से भी कम थी और लोकल पुलिस कंट्रोल रूम इससे बस पांच किलोमीटर के फासले पर था. लेकिन घातक हथियारों से लैस भीड़ 10 घंटे तक हत्याओं का खूनी खेल खेलती रही और उसे रोकने के लिए कोई कार्रवाई नहीं हुई. सभ्य समाज में इसे लेकर कभी कोई दोराय नहीं रही कि ये सब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की छत्रछाया में हुआ. नरसंहार में जिंदा बचे लोगों ने आरोप लगाया कि पुलिस दंगाइयों के साथ मिली हुई थी. इसके जवाब में पुलिस ने कहा कि दंगाइयों की भीड़ के आगे पुलिस की कुछ नहीं चली. सरकार ने इससे इनकार किया कि उससे कोई चूक हुई है.

पांच साल बीत चुके हैं और नरोदा पाटिया और नरोदा गांव हत्याकांड मामले में सुनवाई अब भी शुरू होने का इंतजार कर रही है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और कुछ गैर सरकारी संगठनों ने इस मामले की फिर से जांच करने और इसकी सुनवाई गुजरात से बाहर कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी. इस बात को भी तीन साल हो चुके हैं. आरोपी जमानत पर जेल से बाहर आ गए. नरेंद्र मोदी को विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत मिली और अब वो एक बार फिर इसकी तैयारी कर रहे हैं. जिंदा बच गए ज्यादातर लोग अहमदाबाद के बाहरी इलाकों की बस्तियों में दिन काट रहे हैं. जिन लोगों नें अपने घरों में लौटने की हिम्मत की उनकी जिंदगी भी अपने हिंदू पड़ोसियों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार के चलते मुश्किल हालात में है.

नरोदा

अहमदाबाद शहर के केंद्र से 15 किलोमीटर दूर स्थित नरोदा गांव और नरोदा पाटिया में एक वक्त करीब 2,000 मुसलमान रहा करते थे. इनमें से ज्यादातर कर्नाटक और महाराष्ट्र से यहां आये दिहाड़ी मजदूर थे. ये इलाका शहर के बाहरी हिस्से से गुजरते हाईवे के साथ लगा हुआ है. इसके सामने सड़क के एक तरफ स्टेट ट्रांसपोर्ट का गोदाम है. पास ही हिंदू बहुल गोपीनाथ और गंगोत्री हाउसिंग सोसाइटी हैं. एक किलोमीटर से भी कम के फासले पर बसे नरोदा गांव और नरोदा पाटिया 70 साल पहले वजूद में आये. संकरी गलियों की भूलभुलैया के बीच बसे इस इलाके में मुसलमान रहते हैं. नरोदा पाटिया के सामने छारानगर है जिसमें छारा जनजाति के लोगों की आबादी है. छारा एक डिनोटिफाइड जनजाति है जिसके बारे में सामाजिक धारणा है कि इस जनजाति के लोग आपराधिक कार्यों में शामिल होते हैं.

कौन थे आरोपी ?

नरोदा गांव और नरोदा पाटिया की घटनाओं के सिलसिले में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं. नरोदा गांव में हुई हत्याओं का आधिकारिक आंकड़ा आठ दर्ज किया गया. नरोदा पाटिया में कितनी मौतें हुईं ये हत्यारों के सिवाय शायद कोई नहीं जानता. प्रत्य़क्षदर्शियों के मुताबिक नरोदा पाटिया में सैकड़ों लोग मारे गए.

जिंदा बचे कई लोगों ने बीजेपी विधायक मायाबेन कोडनानी और बजरंग दल नेता बाबू बजरंगी की पहचान उन लोगों के रूप में की जो भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे. लेकिन चार्जशीट दाखिल करते वक्त पुलिस ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए मायाबेन का नाम उसमें शामिल नहीं किया. बाबू बजरंगी का नाम कुछ बीजेपी, विहिप और छारा जनजाति के लोगों सहित चार्जशीट में शामिल किया गया. कुल मिलाकर दोनों मामलों में अलग-अलग 49 आरोपी बनाए गए. बाबू बजरंगी सहित कुछ नाम दोनों मामलों में थे. तीन महीने तक फरार रहने के बाद बाबू बजरंगी को नाटकीय अंदाज में गिरफ्तार किया गया. गिरफ्तारी के पांच महीने बाद ही गुजरात हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी.

बाबू बजरंगी

पटेल परिवार से ताल्लुक रखने वाला बाबू बजरंगी नरोदा में जाना-माना नाम है. 22 साल से विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़े इस शख्स का नरोदा में आतंक है. नरोदा और खासकर छारानगर में बजरंगी का हुक्म चलता है.छारा उसका बहुत आदर करते हैं और बजरंगी भी उनकी आपराधिक योग्यताओं का कद्रदान है. छारा उसके हथियार हैं. अजंता एलोरा शॉपिंग कांप्लेक्स के सेकेंड फ्लोर पर बना बजरंगी का ऑफिस लोगों के लिए किसी अदालत से कम नहीं. वह यहां लोगों की फरियादें सुनता है और उनके मामलों का निपटारा करता है. हालांकि बजरंगी की मानें तो वह एक बड़ा बिल्डर है लेकिन असलियत में उसका मुख्य धंधा है मुसलमानों और ईसाइयों के साथ मारपीट. उसकी जिंदगी का सबसे अहम मिशन है मुसलमान युवकों के साथ भागी या शादी कर चुकीं हिंदू लड़कियों को बचाना. बजरंगी के पास आने वाले लोगों में एक बड़ी संख्या ऐसी ही युवतियों के मां-बाप की होती है. जैसा कि बजरंगी दावा करता है, जब वे पुलिस के पास जाते हैं तो पुलिस शिकायत दर्ज नहीं करती बल्कि उन्हें मेरे पास भेज देती है. मैंने अब तक 957 हिंदू लड़कियों को बचाया है. औसतन देखा जाए तो मुसलमान से ब्याही एक लड़की पांच बच्चों को जन्म देती है. इस तरह से मैंने 5,000 मुसलमानों को पैदा होने से पहले ही मार डाला.

बजरंगी के चर्चा में रहने के और भी कारण हैं. फिल्म परजानिया को अहमदाबाद में रिलीज होने से रोकने में उसकी प्रमुख भूमिका थी. उसने खुलेआम थियेटर के मालिक को फिल्म न दिखाने की चेतावनी दी थी. बजरंगी का कहना था कि ये हिंदू विरोधी फिल्म है. प्रशासन इस पर खामोश बैठा रहा. हिंदुओं के लिए बजरंगी अपना प्रेम मुसलमानों के प्रति अपनी नफरत से जताता है. उसका मानना है कि मुसलमानों को केवल एक विवाह और एक बच्चे की इजाजत दी जानी चाहिए. साथ ही उनसे वोट देने का अधिकार भी छीन लिया जाए.

नरसंहार की तैयारी

"मैंने अब तक 957 हिंदू लड़कियों को बचाया है. औसतन देखा जाए तो मुसलमान से ब्याही एक लड़की पांच बच्चों को जन्म देती है. इस तरह से मैंने 5,000 मुसलमानों को पैदा होने से पहले ही मार डाला.”

               बाबू बजरंगी

बजरंगी साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड वाले दिन यानी 27 फरवरी को गोधरा गया था. बजरंगी ने तहलका को बताया कि जब उसने इस घटना के शिकार लोगों की लाशें देखीं तो उसने संकल्प लिया कि गोधरा का बदला अगले ही दिन नरोदा पाटिया के मुसलमानों से लिया जाएगा. जैसाकि उसका कहना था, हमने उनको वही चैलेंज कर दिया था कि इससे चार गुना लाशें हम पाटिया में गिरा देंगे. इसके बाद वह अहमदाबाद लौटा और उसी रात अगले दिन के नरसंहार की तैयारी शुरू कर दी. हथियार और ज्वलनशील पदार्थ इकट्ठा किए गए. बंजरंगी के मुताबिक एक पेट्रोल पंप के मालिक ने उसे बिना पैसा लिए भारी मात्रा में पेट्रोल दिया जिसका इस्तेमाल उसने अगले दिन लोगों को जिंदा जलाने में किया.

कैसे दिया गया योजना को अंजाम

अगली सुबह करीब दस बजे विहिप और बजरंग दल कार्यकर्ता नरोदा पाटिया पहुंचे. नरोदा पाटिया हत्याकांड के प्रमुख आरोपियों में से एक सुरेश रिचर्ड के मुताबिक पहले हमले की अगुवाई उन्होंने की मगर मुसलमानों की तरफ से मजबूत जवाबी हमले के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा. इसके बाद बजरंगी के अनुयायी छारा भगवा ब्रिगेड के साथ शामिल हो गए और एक बार फिर ताजा हमला किया गया. रिचर्ड ने तहलका को बताया कि भीड़ ने एक तेल टैंकर को एक इमारत से भिड़ा दिया. इससे ये फट गया. टैंकर से निकले तेल का इस्तेमाल बाद में आगजनी के लिए किया गया. शाम के पांच से छह बजे के बीच भीड़ का उन्माद अपने चरम पर पहुंच गया. कई महिलाओं और लड़कियों का पहले बलात्कार किया गया और इसके बाद उन पर केरोसीन और पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई. कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने पास ही स्थित राज्य रिजर्व पुलिस बल के कैंप में शरण ली. बजरंगी ने तहलका को बताया कि कैंप के मुस्लिम कमांडेट ने अगर लोगों को शरण नहीं दी होती तो मरने वालों का आंकड़ा कहीं ज्यादा होता. नरोदा में एक खुला मैदान है जिसमें एक बड़ा गड्ढा बना हुआ है. कई लोग इसमें छिपे थे. भीड़ ने गड्ढे को घेर लिया और पेट्रोल उड़ेलकर इसमें आग लगा दी. नरोदा पाटिया में उस दिन हुई मौतों का आधिकारिक आंकड़ा 97 बताया गया है. लेकिन जिंदा बचे लोगों ने अपने गुमशुदा परिचितों या फिर उन लोगों की जो सूची बनाई है जिन्हें उनकी आंखों के सामने जलाया गया तो पता चलता है कि ये संख्या कहीं ज्यादा थी.

दरिंदगी के इस तूफान की चपेट में आने वाली एक महिला कौसर बानो भी थी. नौ महीने की गर्भवती इस महिला का पेट फाड़कर उसके बच्चे को बाहर निकाला गया. इसके बाद दंगाइयों ने मरे हुए बच्चे को तलवार की नोक पर रखकर घुमाया और फिर उसे आग में झोंक दिया. बजरंगी उस दिन को याद करते हुए कहता है, एक वो प्रेगनेंट....बहन###.....साला.

जो लोग अपनी जान बचाने में सफल रहे वे घर छोड़कर भाग गए. उनके घरों को लूटा गया और फिर उनमें आग लगा दी गई. बहुत से लोगों को अस्पताल में भर्ती किया गया और कई अपने परिवार से बिछड़ गए. कई ऐसी महिलाएं थी जिनके बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था और उन्हें राहत शिविरों तक नग्न अवस्था में ही पहुंचाना पड़ा. सुरेश रिचर्ड ने तहलका को बताया कि बलात्कार की कई घटनाएं हुई जिनमें से एक में वह भी शामिल था. रिचर्ड के शब्द थे, हजारों भूखे घुसे तो कोई न कोई तो फल खायेगा ना...ऐसे भी फल को कुचल के फेंक देंगे. रिचर्ड ने तहलका को ये भी बताया कि नरसंहार के दिन बीजेपी विधायक मायाबेन कोदनानी ने अपनी गाड़ी में सवार होकर दंगाइयों को उकसाया. उधर, बजरंगी का ये कहना था कि वह विहिप महासचिव जयदीप पटेल को मोबाइल फोन पर लगातार हत्याओं का आंकड़ा बताता जा रहा था और उसके और पटेल के बीच फोन पर 11 बार बात हुई. शाम को उसने राज्य के गृहमंत्री जी जड़पिया को फोन करके बताया कि उसने कितने लोगों को मारा है. बजरंगी के मुताबिक उस दिन रात को सोते वक्त उसे ऐसा लगा कि जैसे वह महाराणा प्रताप है.

पुलिस की भूमिका 

बजरंगी ने जोरदार तरीके से दावा किया कि अगर पुलिस का सहयोग न मिलता तो इतनी भयानक मारकाट मुमकिन ही नहीं थी. उसके मुताबिक नरोदा पाटिया में घुसने का एक ही रास्ता था और वहां पर पुलिस के 50 जवान तैनात थे जो अगर चाहते तो भीड़ को छलनी कर देते. लेकिन उन्होंने अपनी आंखें और जबान बंद रखी. रिचर्ड ने तो यहां तक कहा कि पुलिस ने भीड़ को रोकने की बजाय मुसलमानों पर ही फायरिंग की. उसने ये भी बताया कि देर रात जब दंगा थम चुका था तो कुछ पुलिसकर्मियों ने छाराओं को  गड्ढे में छिपे लोगों की जानकारी देकर उन्हें मारने के लिए कहा.

पर्दा डालने का अभियान

तहलका ने एडवोकेट सोमनाथ वत्स के साथ मिलकर नरोदा पाटिया और नरोदा गांव हत्याकांड मामले में पुलिस जांच का गहरा विश्लेषण किया. गौरतलब है कि वत्स का एनजीओ एक्शन एड गुजरात नरसंहार के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ रहा है. हमने पाया कि अपराधियों को सजा देने की बात तो दूर, पुलिस उल्टे इस नरसंहार की सच्चाइयों पर ही पर्दा डालने में जुटी है.

अपराध को हलका करने के लिए शवों को नष्ट किया गया.

नरसंहार खत्म होने के बाद पुलिस के सामने पहला काम था हत्याओं का आंकड़ा कम करना. ज्यादा मौतों का मतलब था ज्यादा आलोचना. बजरंगी के मुताबिक पुलिस ने नरोदा पाटिया में पहले शवों को इकट्ठा किया और फिर उन्हें शहर में अलग-अलग जगहों पर दफना दिया. बजरंगी का कहना था कि दूसरी बार में इकट्ठा किए गए शव पोस्टमार्टम के लिए सिविल हॉस्पिटल ले जाए गए और फिर उन्हें मौतों का आंकड़ा बताने के लिए गिना गया. इस तरह से ये संख्या बनी 105. इनमें से 97 मौतें नरोदा पाटिया में दिखाईं गईं और आठ नरोदा गांव में. पोस्टमार्टम रिकार्ड बताता है कि इन 105 शवों को भी हॉस्पिटल में एक-एक करके लाया गया जिनमें से कुछ शव तो घटना के चार दिन बाद लाए गए.

42 शवों की ऑटोप्सी हुई ही नहीं

नरोदा पाटिया में घुसने का एक ही रास्ता था और वहां पर पुलिस के 50 जवान तैनात थे जो अगर चाहते तो भीड़ को छलनी कर देते. लेकिन उन्होंने अपनी आंखें और जबान बंद रखी.

सबूत मिटाने के पहले चरण के बाद पुलिस आगे बढ़ी. ऐसे शव जिन पर प्रहार, बलात्कार या किसी और यातना के निशान थे, नरसंहार से जुड़ी जानकारियों का अहम सबूत हो सकते थे. लेकिन 41 शवों का पोस्टमार्टम ही नहीं किया गया. इस गंभीर लापरवाही के पीछे कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया.

अहम सबूतों का खात्मा

अपराध की जगह किसी भी जांच एजेंसी के लिए सबूत जुटाने का अहम जरिया होती है. लेकिन नरोदा पाटिया और नरोदा गांव में आरोपियों ने जो निशान छोड़े थे उन पर गौर करने की बजाय उनकी अनदेखी की जा रही थी. जिस गड्ढे में बड़ी संख्या में लोगों को जलाया गया उसका परीक्षण ही नहीं किया गया. न तो मिट्टी के कोई नमूने लिए गए और न मानव टिश्यू या जलाने में इस्तेमाल किए गए ईंधन के अवशेष. और तो और, नरसंहार के पुलिस संस्करण में इस गड्ढे का कोई जिक्र ही नहीं है. मरने से पहले दिए गए सात लोगों के बयान रिकॉर्ड ही नहीं किए गए. इनमें से दो लोगों की मौत लंबे इलाज के बाद 11 मार्च को हुई थी लेकिन चार्जशीट में इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि बयान रिकॉर्ड क्यों नहीं किए गए.

बीजेपी विधायक का नाम चार्जशीट में शामिल नहीं किया गया

नरोदा हत्याकांड में जिंदा बचे लोगों ने भीड़ को उकसाने का आरोप बीजेपी विधायक मायाबेन कोदनानी पर लगाया था. लेकिन चार्जशीट दाखिल करते वक्त पुलिस ने ये कहते हुए आरोपियों की लिस्ट से उनका नाम निकाल दिया कि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है. लेकिन पुलिस की बात में कितनी सच्चाई है ये रिचर्ड की बातों से साफ हो जाता है. रिचर्ड के मुताबिक मायाबेन ने पूरे दिन नरोदा पाटिया में घूम-घूमकर लोगों को और हत्याओं के लिए उकसाया.

फरार आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई.

दबाव बढ़ने के बाद जब पुलिस को मजबूरन एफआईआर दर्ज करनी पड़ी तो कई मुख्य आरोपी फरार हो गए. बाबू बजरंगी, किशन कोरानी, प्रकाश राठौड़ और सुरेश रिचर्ड को एफआईआर दर्ज होने के तीन महीने बाद गिरफ्तार किया गया जबकि विपिन पांचाल को डेढ साल बाद. लेकिन पुलिस ने इनके मामले में ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की जो किसी आरोपी के फरार होने पर की जाती है. उदाहरण के लिए आरोपी के घर पर उसके फरार होने का नोटिस चस्पा करना, उसकी संपत्ति जब्त करना आदि.

अपराध स्वीकारोक्ति रिकॉर्ड नहीं की गई.

नरोदा पाटिया और नरोदा गांव हत्याकांड मामले में हिरासत में लिए गए आरोपियों को रिमांड में लिया गया. ये समय अदालत आरोपियों से पूछताछ करने के लिए पुलिस को देती है. लेकिन रिमांड और पूछताछ का मजाक बनाकर रख दिया गया. नरोदा हत्याकांड के सिलसिले में दाखिल आरोपपत्रों में अपराध कबूल करने वाला एक भी बयान नहीं जोड़ा गया.

केवल एक हथियार की बरामदगी

बिपिन पांचाल से बरामद एक तलवार को छोड़ दें तो पुलिस ने न अपराध स्थल और न आरोपियों से कोई हथियार बरामद किया है. लेकिन नरसंहार के दौरान जिंदा बचे लोगों ने साफ कहा कि हमला करने वाले लोग भारी संख्या में तलवारों, त्रिशूलों, गैस सिलिंडरों और बंदूकों जैसे हथियारों से लैस थे. एक ऐसी घटना जिसमें पुलिस के खुद के मुताबिक 105 लोग मारे गए हों, एक भी हथियार की बरामदगी न होना जांच की गंभीरता को अपने आप ही दर्शा देता है. एक गैस एजेंसी के मालिक ने तो अपने लिखित बयान में कहा भी था कि 20 लोग एक मारूति वैन लेकर उस दिन उसके गोदाम में आये थे और बड़ी संख्या में सिलिंडर लूटकर ले गए थे. बयान के मुताबिक गोदाम का चौकीदार उस समय वहां मौजूद था. लेकिन न तो चौकीदार का बयान रिकॉर्ड किया गया और न ही उन लोगों या फिर वैन का पता लगाने की कोशिश की गई.

किसी भी आरोपी को वैज्ञानिक परीक्षण के लिए नहीं भेजा गया.

चूंकि किसी भी आरोपी का बयान रिकॉर्ड नहीं किया गया था तो इससे ये संकेत मिलता था कि पुलिस आम तरीके से आरोपियों से कोई जानकारी नहीं जुटा पाई थी. इसके बाद अगला चरण होता आरोपियों का पॉलीग्राफ, नारको एनालिसिस या फिर ब्रेन मैपिंग जैसे किसी वैज्ञानिक परीक्षण करवाना. लेकिन पुलिस ने इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की.

बलात्कार का कोई जिक्र नहीं

बजरंगी के मुताबिक दोनों बार मोदी ने हत्यारों की तारीफ करते हुए उनका उत्साह बढ़ाया. मोदी ने दंगाइयों से कहा कि उन्होंने जो भी किया अच्छा किया और उन्हें और भी कुछ करना चाहिए. सुरेश रिचर्ड ने भी इस बात की पुष्टि की

नरोदा गांव और नरोदा पाटिया मामले में तीन आरोपपत्र दाखिल किए गए. इनमें से किसी में भी हत्याकांड के दौरान हुए बलात्कार के मामलों का जिक्र नहीं किया गया. इसके बावजूद कि जिंदा बच गए दर्जनों लोगों ने बयान दिए थे कि कई महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ. न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बलात्कार पुष्टि होने के बावजूद इस दिशा में जांच शुरू की गई.

घटनास्थल से मिले मोबाइल फोन की जांच नहीं की गई

नरसंहार वाले दिन जिंदा बच गए मिर्जा हुसैन नाम के व्यक्ति को नरोदा पाटिया में अपने घर के पास एक मोबाइल पड़ा मिला. एक आरोपी से ये मोबाइल अनजाने में गिर गया था. जांच करने पर क्राइम ब्रांच के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त ए के सुरोलिया ने पाया कि ये अशोक सिंधी नाम के एक आरोपी का था. सुरोलिया ने गहन जांच शुरू की और बाबू बजरंगी और सिंधी सहित कई आरोपियों के कॉल रिकार्ड इकट्ठा करना शुरू किया. लेकिन इससे पहले कि वह और आगे बढ़ते उनका ट्रांसफर कर दिया गया. उनके जाने के बाद पुलिस ने सिंधी के कॉल रिकार्ड्स में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. नरोदा पाटिया मामले में दाखिल आरोपपत्रों में भी घटनास्थल से बरामद किसी आरोपी के मोबाइल फोन की बरामदगी का कोई जिक्र नहीं किया गया.

आरोपियों के मोबाइल फोन रिकार्ड्स चार्जशीट में शामिल नहीं किए गए

केस क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर किए जाने के बाद तत्कालीन डीसीपी राहुल शर्मा ने सारे आरोपियों के मोबाइल फोन रिकार्ड्स जुटाने की कार्रवाई शुरू की. लेकिन कुछ ही हफ्ते बाद जांच की जिम्मेदारी उनसे हटाकर डीसीपी डी जी वंजारा को दे दी गई. फिर भी शर्मा ने सारे कॉल रिकार्ड्स की एक कॉपी बनाकर नानावती-शाह कमीशन को दे दी. ये कॉल रिकॉर्ड्स बताते हैं कि नरोदा हत्याकांड के दौरान सारे आरोपी न सिर्फ एक दूसरे के संपर्क में थे बल्कि घटना की जगह पर मौजूद भी थे. लेकिन कॉल रिकार्ड्स को आरोपपत्र में सबूतों के दौर पर शामिल नहीं किया गया.

बंदूकों के इस्तेमाल का कोई जिक्र नहीं

आरोपपत्रों में पुलिस ने सिर्फ ये कहा कि भीड़ तेज धार वाले हथियार लिए हुए थी. पुलिस ने भीड़ द्वारा गोलियां चलाए जाने की बात को खारिज कर दिया था. गोलियों से घायल हुए ज्यादातर लोगों के चोट प्रमाणपत्रों को आरोपपत्रों का हिस्सा नहीं बनाया गया.

शिनाख्त परेड नहीं करवाई गई.

दर्जनों गवाह ऐसे थे जिनका कहना था कि अगर उनसे आरोपियों की शिनाख्त करवाई जाती तो वे हमलावरों को पहचान लेते. लेकिन अशोक सिंधी को छोड़कर पुलिस ने किसी भी आरोपी के लिए शिनाख्त परेड नहीं करवाई. जबकि भीड़ द्वारा की गई हिंसा के मामले में शिनाख्त परेड की बड़ी अहमियत होती है.

किसके हाथ थी कठपुतलियों की डोर

तहलका के साथ बातचीत में कई आरोपियों ने दंगों में पुलिस की पक्षपातपूर्ण भूमिका की तारीफ की. उन्होंने नरसंहार में मदद करने के लिए संघ परिवार से जुड़े कई लोगों का नाम लिया. इनमें राज्य के गृह मंत्री जड़फिया शामिल हैं जिनसे बजरंगी ने नरसंहार के बाद बात की थी. अगर सरकार के इतने सारे महकमे इस घटना में शामिल थे तो सवाल उठता है कि क्या ये सब सरकार के ही मुखिया के इशारे पर हुआ.

तहलका ने बजरंगी से ये सवाल पूछा. जवाब में नरोदा हत्याकांड के इस मुख्य आरोपी का कहना था कि मारकाट के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार नरोदा का मुआयना करने गए थे. पहली बार उसी शाम मोदी वहां गए लेकिन इलाके के भीतर नहीं जा पाए. अगले दिन वह नरोदा पाटिया के भीतर गए. बजरंगी के मुताबिक दोनों बार मोदी ने हत्यारों की तारीफ करते हुए उनका उत्साह बढ़ाया. मोदी ने दंगाइयों से कहा कि उन्होंने जो भी किया अच्छा किया और उन्हें और भी कुछ करना चाहिए. सुरेश रिचर्ड ने भी इस बात की पुष्टि की और बताया कि नरसंहार की शाम मोदी छारानगर गए थे और उन्होंने दंगाइयों के गले में फूलमालाएं डालीं थीं. बंजरंगी ने कहा कि अगर मोदी ने पुलिस को चुपचाप तमाशा देखने के लिए नहीं कहा होता तो ये नरसंहार मुमकिन ही नहीं होता.

लेकिन मोदी केवल दंगाइयों को फूलमालाओं से सुशोभित करने पर ही नहीं रुके, बजरंगी का कहना था कि नरोदा हत्याकांड के बाद मोदी ने चार महीने तक छिपने में उसकी मदद की, फिर पूर्वनियोजित नाटकीय तरीके से उसे गिरफ्तार करवाया और इसके बाद उसकी जमानत करके उसे बाहर निकलवाने के लिए अनुकूल जज की नियुक्ति करवाई.

आशीष खेतान

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 11

  • प्रेषक : anshika
    aap ye kyu dekhte ho ki ye musalman ke sath hua ya hindu ke sath---ye kyu nahi dekh rahe ki itna julm sahne wala insaan tha----hindu ya musalman nahi
  • प्रेषक : miya bhai
    MR.RAHUL THAUSAND OF HINDU KILL BY SHIKH PEOPLE IN 84. WHEAR WAS THE THAT TIME VHP.SHIV SENA OR RSS BAJRANGI(BANDER)
  • प्रेषक : aman
    hi...doston garv se kaho hum hindooostani hain.....kiyonki hum apne hi bhaiyon ke dusman hain apne hi maa baap ke katil hain...apne hi maa bahno ki izzat lootne wale hain.....hame koi bhi bahka sakta hai...hum kisi bhi gair majhab ko bardaast nahin kar sakte....hum kabhi sharminda bhi nahin hote.hum criket me austreliya se bhale hi booree tarah har jain koi gam nahin...lekin pakistan se haar hame bardaast nahin....kiyonki pakistan se harna yani hindu dharm ka apmaan..hum garib kiyon hain hume sochne ki jarorat nahin..hum arbon ki tadat me hain..lekin world me kamzor aur gareeb samjha jata hai hame koi farak nahin padta..kiyonki hum hindoostaani hain...lekin mere dost jara insaniyat ke nate socho...kya hum ne gujraat me kiya wo sahi tha ...babu bajrangi modi rss bajrang dal inhone kon si hinduon ki khidmat ki...kitno ko inhone pyar se hindu banaya kitno ko inhone raam ke bataye raaste par chalne ko kaha...kitni jung inhone hindu ko bachane ki ladee....sayad koi nahin....kya bajrangee togadiya aur aise logon ki wajah se koi gair hindu ne hindu dharm kabool kiya? jawab apke pass hai..tehela ne sachchai samne lai to aapne kaha ye pakistani agent hai...agar yahi sachchai koi musalmaan lata to wo kom hi gaddar hotee....ab baat sochne ki agar 50 aadmi milkar 5 aadmi ko maren ya ooske maa bahen ki izzat loote oose kat kar jala de..to kya wo maharana partaap huwa..jung brabree walon se hotee hai....kahne ko bahoot kooch hai..par sayad likhna mumkin nahin..agar baboo bajrangee aur modi rss bajrang dal sahi me hinduon ke rakhwale hain to inhe kashmir bheza jaye pakistaan bheja jaye..chaina border par bhejen....kya ye mumkin hai?hazaron gundon ke beech me baithne wale mahana partaap nahin ho sakte...raam ke desh me aurton ko izzat nahin loti jatee onhe jinda nahin jalaya jaata..agar koi insaan galtee kare to ooske majhab ko badnaam nahin kiya jata..sochne ko bahoot hai marna ek din sabhi ko hai..hum ne jo duniya me kiya..ooska hisaab bhi dena hai..mandir ya masjid banane se koi hindu ya musalmaan nahin hota..iske liye ooske dil bhagwaan ya allah ke liye dar hona chahiye..bhagwaan dil me hoten hain..dil saaf to aap khood hi ek mandir ho...kahin jaane ki jaroorat nahin...ab jara socho ki hum ne jo kiya wo sahi tha ya galat jo jindagee mili hai ose lad kar gujaarni hai ya mahabbat se..katilon ko chand log hi yaad karte hain par mohaabaat bantne walon ko poori duniya yaad kartee hai sayad ye baat hum sab jante hain..magar amal nahin karte...jo aapne kiya ye aapke hisaab me likha ja chooka hai marne ke baad iska hisaab aapko bhagwaan ko dena hai jawab aapke pass hai to thik hai.nahin to soche jawab hame kaise milega..kya jwaab wo log hame denge jinhone hame oksaya ya jinhone hame ladaya...sayad iska jwaab to aapke pass hi hoga...aakir me ek baat ki agar train musalmano ne jalaya to wo musalman nahin raha..kiyonki agar kisee musalmaan ne ek bhi insaan ko be wajah mara wo musalmaan nahin..hume khosee hotee jinhone train jalaya onko pakad kar sare aam jinda jlaya jata...taki onhen ahsaas ho ki jo humne kiya wo kitna ghinouna aur taklif deh tha...bahaisiyat ek hindustaani musalmaan hone ke naate hume aap se mohaabbat ke siwa kooch nahin chahiye..aapki bahan bhi hamari bahan hai aapki maa hamari maa hai..par kya hamaree bahan bhi aapki bahan hai hamaari maa bhi aapki maa hai?jawab aapke dil me hoga..majhab nahin shikhata aapas me bair rakhna....hindu muslim hain hum hindustaan hamara.......aakhir me ek baat main koi lekhak ya kavi nahin hoon..agar kisi bhai behan ko mere iss massege se taklif ho to main maafi ka talabgaar hoon..chota bhai samajh kar maaf kar dena..maine jitna mujhe dimaag tha aur jo dil me baat thi wahi likhi hai....jai hind....allah hafiz....
  • प्रेषक : ashish bhadiyadra
    hindu ho ya muslim magar chunav jitne ke liye jo aisa kar sakta he usko hame kabhi apna neta nahi chunna chahiye aur usko bhi aisi mot deni chahiye jaise ye kand me log mare the.
  • प्रेषक : Raja
    Ek Hindu.....sabse pahle tere maa bahan ke sath esha hona chahiye jo gujrat main musalman ladies ke sath huwa....tab kahega tu narendra modi jindabad haina...ulu ke pathe