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   गुलबर्ग सोसाइटी : खौफ की पनाहगाह
गुजरात नरसंहार की पांच महीने लंबी तहकीकात में कई दंगाइयों और षडयंत्रकारियों ने नरसंहार में अपनी भूमिका के बारे में विस्तार से बताया. लेकिन एक जगह फिर भी अनछुई रह गई थी. ये जगह थी अहमदाबाद के पूर्वी हिस्से में स्थित गुलबर्ग हाउसिंग सोसाइटी जहां कभी कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी रहा करते थे. पुलिस की मौजूदगी के बावजूद हिंदुओं की भीड़ ने 28 फरवरी को सोसाइटी को घेर लिया. पांच घंटे तक जाफरी मदद के लिए पुलिस कमिश्नर, मुख्यमंत्री ऑफिस, दिल्ली में कांग्रेस नेताओं और अपने मित्रों को फोन करते रहे. इन दौरान सोसाइटी में रहने वाले तीस मुस्लिम परिवार इस उम्मीद के साथ दुआ करते रहे कि कोई उन्हें बचाने आएगा. आस-पड़ोस के कई मुसलमानों ने भी गुलबर्ग में ये सोचकर शरण ली थी कि कांग्रेस नेता के असर के चलते सोसाइटी में कोई नहीं घुसेगा. लेकिन आखिरकार दिन के ढाई बजे भीड़ सोसाइटी में घुस गई और जो भी हाथ लगा उसे मार डाला. मौतों का आधिकारिक आंकड़ा 39 बताया गया लेकिन जो लोग जिंदा बच गए उनके मुताबिक ये संख्या कहीं ज्यादा थी. जाफरी को जिंदा जला दिया गया. उनके शरीर के अवशेष कभी बरामद नहीं हो पाए. गुलबर्ग और नरोदा में मारे गए लोगों को सामूहिक रूप से छह मार्च 2002 को अहमदाबाद में दफना दिया गया.
| तीनों आरोपियों के मुताबिक पुलिस ने न सिर्फ उन्हें रास्ता दिया बल्कि दंगाइयों को मुसलमानों की हत्या करने के लिए भी उकसाया. मांगीलाल जैन के अनुसार मेघनीनगर पुलिस थाने के इंचार्ज के जी एर्दा ने दंगाइयों से कहा कि उनके पास काम खत्म करने के लिए तीन से चार घंटे का वक्त है. |
एक सितंबर 2007 को तहलका के साथ हुई मुलाकात में बाबू बजरंगी ने जिक्र किया था कि वह गुलबर्ग नरसंहार मामले में आरोपी कई विहिप कार्यकर्ताओं को जानता है. बजरंगी के मुताबिक विहिप उनका ठीक तरह से ख्याल नहीं रख रही है और अगर जरूरत पड़े तो वह उनके साथ हमारी मुलाकात करवा सकता है. आठ सितंबर को मैं अहमदाबाद पहुंचा. बजरंगी का एक ऑफिस सहयोगी मुझे मेघनीनगर ले गया. ये वही इलाका है जहां गुलबर्ग सोसाइटी स्थित थी. हमने सोसाइटी के सामने वाली सड़क पर मिलने का फैसला किया. भीड़ भरे इलाके में निर्जन पड़ी सोसाइटी एक डरावना अहसास पैदा कर रही थी. लोहे का गेट, दीवारें, खिड़कियां, दरवाजे और छत, सबका रंग एक ही था- कोयले की तरह काला. 20 मिनट के इंतजार के बाद विहिप के दो वरिष्ठ नेता पहुंचे. उनमें से एक महेश पटेल की पास में ही एक दुकान थी. ये दोनों नेता मुझे उन आरोपियों से मिलाने वाले थे जिनका नाम पुलिस की चार्जशीट में था. महेश पटेल मुझे अपने घर ले गया और आरोपियों को बुलाने के लिए संदेश भेज दिया. पटेल ने मुझे जानकारी दी कि विहिप ने जेल में खाना पहुंचाने से लेकर कानूनी मदद देने तक आरोपियों की हर तरह से सहायता की. (पटेल के लिए मैं संघ का आदमी था जो दिल्ली से ये आकलन करने आया था कि दंगे के हिंदू आरोपियों की क्या दशा है) करीब 40 मिनट बाद प्रहलाद राजू, मांगीलाल जैन औऱ मदन चवल नाम के आरोपी पहुंचे. शुरूआत में ही उन्होंने पटेल के इन दावों को खारिज कर दिया कि विहिप ने उनका अच्छा ध्यान रखा है. उनकी शिकायतें बहुत कड़वी और लिस्ट बहुत लंबी थी. मैंने उनका नंबर ले लिया और उनसे वादा किया कि मैं ये सुनिश्चित करूंगा कि उनकी समस्याओं पर ध्यान दिया जाए और उन्हें भविष्य में विहिप और संघ से और मदद मिले. वापस लौटते हुए मैंने मांगीलाल जैन को फोन किया और उससे बाकी दोनों आरोपियों के साथ अपने होटल के कमरे में आने के लिए कहा.
गुलबर्ग की घेराबंदी
प्रहलाद राजू का कहना था कि विहिप और बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने उस दिन सुबह से ही मेघनीनगर में जमा होना शुरू कर दिया था. विहिप ने बंद का आह्वान किया था और ये कार्यकर्ता दुकानें बंद करा रहे थे. उसने बताया कि वह साढ़े आठ बजे भीड़ में शामिल हो गया था. राजू के मुताबिक कई कार्यकर्ता अपने साथ त्रिशूल लिए हुए थे. मांगीलाल जैन के अनुसार भीड़ में कईयों के पास लाठियां थीं और कुछ लोग कारों में पेट्रोल रखकर भी चल रहे थे. मदन छवल के मुताबिक विहिप कार्यकर्ताओं के पहुंचने के फौरन बाद किसी ने एक मुस्लिम व्यापारी की दुकान में आग लगा दी. इसके बाद किराने की दुकान चलाने वाले चवल भी भीड़ में शामिल हो गए.
भीड़ की अगुवाई किसने की ?
चवल, जैन और राजू के मुताबिक भीड़ का नेतृत्व अतुल वैद्य और भारत तेली नाम के दो विहिप नेताओं और एक स्थानीय कांग्रेस नेता मेघ सिंह ने किया.
कैसे हुई एहसान जाफरी की हत्या ?जल्द ही भीड़ ने गुलबर्ग सोसाइटी को घेर लिया. सोसाइटी में 30 से 35 मुस्लिम परिवार रहते थे. इसके अलावा आसपास की बस्तियों के कई गरीब मुसलमानों ने भी सोसाइटी के कंपाउंड में शरण ले रखी थी. क्योंकि मेन गेट और बाउंड्री वॉल बहुत ऊंची थी इसलिए भीड़ में से कुछ ने दीवार को उड़ा दिया.
| योजना ये थी कि जिंदा बचे लोगों को ले जा रही वैन पर दंगाई पथराव करेंगे. इससे गाड़ी में मौजूद कांस्टेबल को भागने का बहाना मिल जाएगा. इसके बाद भीड़ वैन को आग के हवाले कर सकती है. लेकिन छवल के मुताबिक समय रहते एक मुस्लिम पुलिस इंस्पेक्टर पठान के हस्तक्षेप से ये योजना कामयाब नहीं हो पाई. |
जैसाकि चवल ने बताया, भीड़ ने कुछ घरों से सिलेंडर लेकर उन्हें बाउंड्री वॉल के साथ रख दिया और फिर उनमें आग लगा दी. इससे हुए धमाके से दो फीट मोटी दीवार का कुछ हिस्सा टूट गया. चवल के मुताबिक कुछ लोग बीस फीट ऊंची दीवार को रस्सी की सहायता से फांदने में कामयाब हो गए थे.
कांप्लेक्स में भीड़ को घुसता देख घबराए जाफरी ने पुलिस अधिकारियों और नेताओं को फोन करना शुरू किया. लेकिन जब कुछ नहीं हुआ तो जाफरी ने भीड़ पर गोलियां चलाईं और कुछ लोगों को जख्मी कर दिया. इसके बाद उन्होंने भीड़ को अपनी और सोसाइटी में मौजूद और मुसलमानों की जान बख्शने के एवज में पैसा देने की पेशकश की. इस पर भीड़ ने उन्हें पैसा लेकर नीचे आने को कहा.
जैन के मुताबिक जैसे ही जाफरी बाहर निकले और जमीन पर पैसे गिराकर वापस जाने लगे, भीड़ उन पर टूट पड़ी. चवल के शब्दों में पांच-छह लोगों ने जाफरी को पकड़ लिया. फिर किसी ने उन पर तलवार से वार किया. इसके बाद उनके हाथ-पांव काटे गए. फिर शरीर के कई टुकड़े किए गए. इसके बाद उन्हें जला दिया गया.
जाफरी को मारने के बाद भीड़ ने दूसरे मुसलमानों को भी बाहर निकाला और उनकी हत्या कर उन्हें जला दिया. शाम के साढ़े चार बजे पुलिस ने आखिरकार भीड़ को हटाया और जिंदा बचे लोगों को सुरक्षित जगह पर भेजा गया.
पुलिस की मिलीभगततीनों आरोपियों के मुताबिक पुलिस ने न सिर्फ उन्हें रास्ता दिया बल्कि दंगाइयों को मुसलमानों की हत्या करने के लिए भी उकसाया. मांगीलाल जैन के अनुसार मेघनीनगर पुलिस थाने के इंचार्ज के जी एर्दा ने दंगाइयों से कहा कि उनके पास काम खत्म करने के लिए तीन से चार घंटे का वक्त है. तहलका को मिली जानकारी के मुताबिक इतना वक्त इसलिए दिया गया था कि उस शाम अहमदाबाद में अतिरिक्त बल पहुंचने वाला था. जैन ने बताया कि कुछ पुलिसकर्मी दूर खड़े रहे. ये इस बात का संकेत था कि कुछ घंटे के लिए भीड़ को खुली छूट है. इससे पूरे अहमदाबाद में भीड़ का उन्माद और भी बढ़ गया और मौतों की संख्या भी.
राजू ने तहलका को बताया कि इलाके में तैनात पुलिसकर्मी न सिर्फ पीछे हट गए बल्कि उन्होंने भीड़ को हत्या करने के लिए भी उकसाया.
जिंदा बचे लोगों को बचाने के लिए एर्दा जब गुलबर्ग पहुंचे तो नरसंहार लगभग खत्म हो चुका था. चवल के मुताबिक दंगाइयों ने विरोध जताते हुए एर्दा से कहा कि जीवित बचे लोग उनकी पहचान कर सकते हैं. इस पर एर्दा ने एक जघन्य योजना बनाई. योजना ये थी कि जिंदा बचे लोगों को ले जा रही वैन पर दंगाई पथराव करेंगे. इससे गाड़ी में मौजूद कांस्टेबल को भागने का बहाना मिल जाएगा. इसके बाद भीड़ वैन को आग के हवाले कर सकती है. लेकिन चवल के मुताबिक समय रहते एक मुस्लिम पुलिस इंस्पेक्टर पठान के हस्तक्षेप से ये योजना कामयाब नहीं हो पाई.
पर्दा डालने का अभियानतीनों आरोपियों ने तहलका को बताया कि मौतों की संख्या आधिकारिक आंकड़े से कहीं ज्यादा थी लेकिन पुलिस ने भीड़ से लाशों को दफना देने को कहा ताकि अपराध की विकरालता को कम किया जा सके. जांच शुरू होने के बाद भी पर्दा डालने का ये अभियान जारी रहा. तीनों आरोपियों ने ये भी बताया कि किस तरह मामले की जांच कर रही क्राइम ब्रांच द्वारा उन्हें राजसी ठाठ-बाट के साथ रखा गया. उन्होंने बताया कि पुलिस हिरासत में पूछताछ की बात तो दूर उल्टे उनकी हर मुमकिन आवभगत की गई. तीनों के मुताबिक पुलिस हिरासत महज एक कानूनी औपचारिकता ही थी. चवल के मुताबिक उस वक्त डीसीपी (क्राइम) डी जी वंजारा गुलबर्ग मामले की जांच कर रहे थे जिन्होंने कभी भी उससे नरसंहार के बारे में कुछ बताने को नहीं कहा. तीनों ने माना कि उन्होंने पुलिस हिरासत में झूठ बोला और पुलिस ने भी उन पर कभी सच बोलने का दबाव नहीं बनाया.
इस नरसंहार में जिंदा बच गए दर्जनों लोगों ने अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर गुहार लगाई कि पुलिस ने उनके बयान गलत रिकार्ड किए हैं. इनमें से एक मोहम्मद रफीक द्वारा दिए गए शपथपत्र के मुताबिक उसने चार हमलावरों की शिनाख्त कर उनके नाम पुलिस को बताए थे लेकिन उसके अंतिम बयान से ये नाम हटा दिए गए. एक दूसरे पीड़ित मोहम्मद सईद का कहना था कि उसके द्वारा लिए गए नौ हमलावरों के नाम बयान से गायब थे. ऐसे दर्जनों उदाहरणों के बावजूद पुलिस ने इन अनियमितताओं को दूर करने से इनकार कर दिया.
कई पीड़ितों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने विहिप नेताओं भरत तेली और अतुल वैद को भीड़ में देखा था. तहलका के खुफिया कैमरे में रिकार्ड बातचीत में गुलबर्ग केस के तीनों आरोपियों ने भी पुष्टि की कि ये दोनों नेता भीड़ में मौजूद थे. लेकिन अभी तक पुलिस ने इनका नाम चार्जशीट में शामिल नहीं किया है.
आशीष खेतान
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कुल टिप्पणियां: 48
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प्रेषक : GiriTejubhai and team It is very easy to critisize. todna asan he aur tum vohi kam karte ho. modi sab ne jo gujrat ka bhala kiya he vo koi nahi kar sakta. Narendra modi is honest, hardworking and great cm
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प्रेषक : AFROZ RAJnafrat failane wale, khoon ki holi khelne wale, bhai se bhai ko ladane wale..inka koi imaan-dhram nahi hota chahe wah hindu,muslim,sikh ya isai ho kyunki koi bhi dhram nafrat ke rah par chalna nahi sikhata aur jo nafrat ke rah par chalte hain wo sirf aur sirf haiwan kahla sakte hain unhe insaan kahlane ka koi haq nahi hai...aaj logon ko ek dharm manne ki koshis karni chahiye aur wo hai 'insaniyat'....Jise Tarun Tejpal jee ne sabit kar dikhaya hai...Wish you all the best for rest of your life..........
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प्रेषक : JASMINMEDIA SHOULD BE NEUTRAL AFTER READING ALL ARTICLES ABOUT MODI I CONCLUDE MR. TEJPAL HAVE PROBLEM WITH MODI AND HIS PROGRESS
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प्रेषक : GIRITarun are you Hindu or Muslim?
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प्रेषक : miya bhaimr.tejpal is orignal hindu.he is a lion. mr.giri his not like you )
























