राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   "ये मेरा सबसे ईमानदार काम है"

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नसीरुद्दीन शाह, अपने ज़िंदगी की कई दूसरी बातों के साथ ये भी बताते हुए कि हाल ही में भारत में रिलीज़ होने वाली पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए, उनकी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म क्यों है? 

कई सालों तक मेरे मन में पाकिस्तानी फिल्मों के प्रति नकारात्मक धारणा रही। इसकी वजहें भी थी जिसकी जड़ें मेरे बचपन से जुड़ी हैं। एक युवक के तौर पर जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे ये एहसास होता है कि मेरे परिवार में (दादा, चाचा) कई अभिनेता थे जो कभी अभिनेता नहीं बने। हां मेरा एक ममेरा भाई ज़रूर था जिसने इससे अलग जाकर बॉम्बे फिल्म उद्योग में अपनी किस्मत आज़माई और और वहां नाकाम रहने के बाद वो पाकिस्तान चला गया। पाकिस्तानी फिल्मों में उसने ठीक-ठाक सफलता हासिल कर ली। उस समय तक ज्यादातर पाकिस्तानी फिल्में सी ग्रेड ही होती थीं और तकनीकी मामले में उनका स्तर भोजपुरी सिनेमा जैसा हुआ करता था। यहां की फिल्में बॉलीवुड की फिल्मों की भद्दी नकल होती थीं। इसलिए उनके बारे में मेरी धारणा अच्छी नहीं थी। 

मैंने उसकी कुछ फिल्में देखी थीं जो कि बिल्कुल बकवास थीं। मां का पत्र और ममेरे भाई की चुप्पी ने मेरे अंदर जबर्दस्त गुस्सा भर दिया। 

मेरी इस धारणा को एक छोटी सी घटना ने और बल दिया। अपने बड़े होने के दौरान मेरी मेरे माता-पिता से कम ही पटती थी। मुझे, यानी कि अपने नकारा बेटे, को लेकर बेहद निराशा के कुछ क्षणों में मेरी मां ने पाकिस्तान में मेरे ममेरे भाई को पत्र लिखकर मुझे मेरे पैरों पर खड़ा करने के लिए सहायता मांगी। मगर उसने इसका कोई जवाब नहीं दिया। इस बात का जब मुझे पता चला तो मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। मैंने उसकी कुछ फिल्में देखी थीं जो कि बिल्कुल बकवास थीं। मां का पत्र और ममेरे भाई की चुप्पी ने मेरे अंदर जबर्दस्त गुस्सा भर दिया। 

शायद ये सब मेरे अंदर ज्यों का त्यों भरा हुआ था इसलिए जब शोएब मंसूर ने पहली बार मुझसे "खुदा के लिए" में काम करने का प्रस्ताव दिया तो मैंने छूटते ही इनकार कर दिया। उन्होंने मुझसे स्क्रिप्ट के कुछ पन्ने पढ़ लेने की गुज़ारिश की। अंतत: मैं मान गया। और सिर्फ दो पन्नों ने ही मुझे मोह लिया। 

हम लोग कट्टरवादी नहीं थे लेकिन हमारा पालन-पोषण बहुत ही रूढ़िवादी माहौल में हुआ था। मेरी मां के मन बहलाव और आनंद का एकमात्र स्रोत था, प्रार्थना। बचपन में हम सभी को कुरान पढ़ना सिखाया गया लेकिन इसे समझना नहीं। मुझे याद है कि उस वक्त भी जब मौलवी पवित्र आयतों की व्याख्या करते थे तो मुझे वह निहायत ही बेवकूफाना लगता था। उनके व्याख्यान भड़काऊ चीज़ों से भरे होते थे। काफिरों को नरक में डालने की बातें होती थी। मेरे कई हिंदू और क्रिश्चियन दोस्त थे जिनके बारे में मुझे पता था कि वो बहुत ही अच्छे हैं। मुझे समझ नहीं आता था कि सिर्फ वही लोग नरक में क्यों जाएंगे जबकि हम मुस्लिम क्यों नहीं कुछ भी बुरा करके थोड़ी सी सज़ा पाने के बाद स्वर्ग के अधिकारी कैसे बन जाएंगे। उनके मुताबिक हर चीज़ हराम थी-- संगीत, फिल्में देखना, पश्चिमी परिधान पहनना, दाढ़ी बनाना, पीना, होंठ के ऊपर बाल बढ़ाना। 

इन चीज़ों से मुझे बहुत कुढ़न होती थी। अज़ान क्या है, संगीत है? क़ुरान का पाठ क्या है, संगीत? क्या वास्तव में पवित्र कुरान ने हमारी औरतों को आकारहीन, काले बुर्के में रहने की सज़ा दी थी। मौलवी के 13 बच्चे थे और उनका पालन पोषण कैसे होगा इस बारे में सोचने की बजाए वो ज़िंदगी के बाद की शिक्षाएं देने में मशगूल था। 

इन चीज़ों से मुझे बहुत कुढ़न होती थी। अज़ान क्या है, संगीत है? क़ुरान का पाठ क्या है, संगीत? क्या वास्तव में पवित्र कुरान ने हमारी औरतों को आकारहीन, काले बुर्के में रहने की सज़ा दी थी।

"खुदा के लिए" के उन दो पन्नों ने मुझे अपनी ओर खींचा। इन दो पन्नों ने मेरे मजहब, मेरी संस्कृति से जुड़ी मेरी सारी सोच को जैसे एक ज़ुबान दे दी थी। ये न तो धार्मिकता थी और न ही धर्म की उपेक्षा। 

ये, मैं जिसमें विश्वास रखता था उसके समर्थन में एक दलील थी। इसके बाद मैंने तुरंत हां कर दी। जिस मौलवी की भूमिका मैंने निभाई है वो फिल्म का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है और ये भूमिका अदालत में दिए गए उसके लंबे भाषण पर केंद्रित है। इसको सफलता से अंजाम देना मेरी ज़िंदगी की सबसे महान संतुष्टि है। इस पूरी भूमिका के दौरान मैं इस्लाम के बारे में जो कुछ सोचता हूं उसे अपनी आवाज़ देने में सक्षम था। अपनी बात के दौरान, अपने उदारवादी और मानवतावादी पक्ष को मज़बूत करने के लिए मौलवी कुरान के अध्यायों और आयतों का सहारा लेता है। ये कुरान की उस व्याख्या के बिल्कुल उलट थी जो कि कुरान का एक औसत जानकार हमारे सामने रखता है। 

"खुदा के लिए" एक हिम्मतवर फिल्म है। हालांकि इसे करते हुए मैं बिल्कुल सुरक्षित था क्योंकि मैं पाकिस्तान में नहीं रहता हूं और अपनी बात कहके शांति से अपने घर वापस आ सकता था। इसके अलावा फिल्म में मेरे दावे भी कुरान की आयतों और कथनों पर आधारित थे इसलिए उन्हें ग़लत नहीं कहा जा सकता। लेकिन बाकी दल के साथ ऐसा नहीं था। एक युवा अभिनेता जिसे छोटे भाई सहमद का रोल करना था उसने मेरे पहले सीन की शूटिंग देखकर ही फिल्म छोड़ दी। ये घटना इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि जो लोग फिल्म से जुड़े रहे वो कितने हिम्मती थी। 

मेरे पिता ने इस्लामी राष्ट्र के विचार का मुखरता से विरोध किया था, इसीलिए हालांकि पाकिस्तान में हमारे चचेरे भाई-बहन तो थे लेकिन हम उनसे कभी मिले नहीं। इन तमाम कारणों से ये फिल्म मेरे लिए दरवाजे खोलने जैसी रही। आज मुझे लगता है कि 'खुदा के लिए' मेरे फिल्मी सफर की सबसे बेहतरीन फिल्म है। मुझे इस पर बहुत गर्व है। ये तकनीकी रूप से संपूर्ण नहीं थी, ये त्रुटिहीन नहीं थी, लेकिन अगर मैं अपनी पूरी ज़िंदगी में कोई और फिल्म न बना सकूं तो ये अकेली ही पर्याप्त है। ये मेरा सबसे ईमानदार प्रयास है। 

(शोमा चौधरी से बातचीत पर आधारित) 

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 1

  • प्रेषक : GAURAV TAMRAKAR
    BINA GHUMA FIRA KE KAHI GAI BAT ACHCHI LAGI. KOI BHI DHARM HO USKA THEKEDAR NAHI HONA CHAHIYE. INSANIYAT SABSE PAHLE HAI. AUR AAP KI JINDGI HAI...APNE TARAH SE JIYE