देसी फिल्में, फिरंगी दीवाने
भारत की अपनी यात्रा के दौरान जर्मन पत्रकार बर्गिट पेस्टल एक ऐसी जगह पहुंचती हैं जहां किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है. वो वियना में मौजूद बारबरा स्कोडा को फोन कर पूछती हैं, “यहां पर एक गाना फिल्माया जा रहा है. फिल्म का नाम है शादी के आफ्टर इफेक्ट्स जिसमें अरबाज खान और मलाइका अरोड़ा हैं. क्या हम उन्हें जानते हैं?”
“हां! हम जानते हैं. वो सलमान के भैया और भाभी हैं. अगर तुमने 'हलचल' देखी होगी तो तुम अरबाज को पहचान सकती हो और मलाइका वही है जो एसआरके के साथ ‘काल’ में आइटम गर्ल बनी थी,” बारबरा जवाब देती हैं. एक मीडिया टेक्नोलॉजी कॉलेज में मैनेजर 36 वर्षीय बारबरा को ऑनलाइन दुनिया में बाबास्को के नाम से जाना जाता है जहां वो बाबा और बॉलीवुड नाम का लोकप्रिय ब्लॉग चलाती हैं. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से अपने जैसे कई दूसरे ब्लॉगर्स के साथ मिलकर उन्होंने बॉलीवुड ब्लॉगर्स डॉट कॉम नाम का एक सामूहिक ब्लॉग बनाया है और ये सभी इंटरनेट पर नजर आने वाले भारतीय सिनेमा के विदेशी फैन्स हैं. इन विदेशी ब्लागर्स में से कई ऐसे हैं जो करीब 100 भारतीय फिल्में देख चुके हैं. ग्रेटा तो अलग-अलग दौर की कुल मिलाकर 600 से भी ज्यादा फिल्में देख चुकी हैं.
यशराज फिल्म्स को शायद ही पता हो कि 2008 की उनकी बड़ी रिलीज ‘टशन’ पर फिनलैंड की एक 20 वर्षीय बाला दो साल से बहुत करीबी नजर रखे हुए है. सन्नी नाम की इस लड़की की दिलचस्पी उन फिल्मों में है जिनमें सैफ अली खान और अक्षय कुमार साथ-साथ होते हैं. इन फिल्मों को उसने ‘सैक्षय’ नाम दिया है. वो अपने ब्लॉग में इन फिल्मों के बारे में लिखती रहती है और मानती है कि ‘टशन’ सबसे अच्छी सैक्षय होगी.
सन्नी और बारबरा उन लोगों में से नहीं हैं जिनकी बॉलीवुड में दिलचस्पी पिछले साल बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में शाहरूख खान के जाने से पैदा हुई है. उन जैसे कई लोग हैं जिनको बॉलीवुड से प्रभावित हुए लंबा समय हो गया है. अब ग्रेटा केमर को ही लीजिए जो बोस्टन में अमेरिकन एक्सप्रेस बैंक के लिए काम करती हैं. वो हर हफ्ते तीन से पांच भारतीय फिल्में देखती हैं, मेमसाबस्टोरी नाम के ब्लॉग पर लिखती हैं और शम्मी कपूर से मिलने के लिए कुछ भी कर सकती हैं. उनकी पसंद हैं 60 और 70 के दशक की रोमांटिक कॉमेडीज और बचकानी जासूसी फिल्में. ग्रेटा कहती हैं, “ज्यादातर दोस्त मेरे इस शौक को थोड़ा सनकभरा मानते हैं. हालांकि कभी-कभार उत्सुकता के मारे वो कोई भारतीय फिल्म देखने के लिए तैयार हो जाते हैं.” अपने ब्लॉग के जरिये ग्रेटा बॉलीवुड के दूसरे प्रशंसकों के संपर्क में आईं हैं जो बॉलीवुड के बारे में ग्रेटा की व्यापक समझ से लाभान्वित हुए हैं.
दूसरी तरफ बारबरा और जर्मन एडवोकेट मिशाएल लांगहांस जैसे लोग हैं जिन्हें तमिल और तेलगू फिल्में देखने का शौक है. बारबरा कहती हैं कि 2006 में रिलीज हुई हिंदी फिल्मों से किसी ने भी उनके दिल को उस तरह से नहीं छुआ जिस तरह से सिलुनू ओरू काढल में सूर्या के अभिनय ने. रजनीकांत की तो बारबरा दीवानी हैं.
बॉलीवुड पर लिखी जा रही सबसे अच्छी सामग्री में से कुछ इन ब्लॉग्स पर देखी जा सकती है. और हो भी क्यों न, इन विदेशी ब्लागर्स में से कई ऐसे हैं जो बॉलीवुड की करीब 100 फिल्में देख चुके हैं. ग्रेटा तो अलग-अलग दौर की कुल मिलाकर 600 से भी ज्यादा फिल्में देख चुकी हैं. पिछले महीने इन ब्लागर्स ने जर्मनी के म्यूनिख में एक बैठक की जहां पर उन्होंने ‘बंटी और बबली’ देखी और भारतीय खाने का लुत्फ उठाते हुए बॉलीवुड पर चर्चा की. कई ब्लॉगर्स जब फिल्म का फर्स्ट डे फर्स्ट शो नहीं देख पाते तो उन्हें बड़ा अफसोस होता है. जब ‘कभी अलविदा ना कहना’ भारत के साथ जर्मनी में रिलीज नहीं हुई तो मारता नाम की एक ब्लॉगर इसका पहला शो देखने के लिए फ्लाइट पकड़कर न्यूयार्क जा पहुंची.
इस समुदाय की सबसे विचित्र गतिविधि है मिनी खान के कारनामों को एक दूसरे के साथ बांटना. मिनी खान दरअसल शाहरूख खान से मिलता-जुलता एक गुड्डा है जो हर ब्लॉगर अपने दूसरे साथी को कूरियर करता रहता है. इस तरह से मिनी खान बारी-बारी से हर ब्लॉगर के पास रहता है और वो ब्लॉगर अपने देश में मिनी खान के दौरे की तस्वीरों को इंटरनेट पर अपलोड करता रहता है. सामूहिक ब्लॉग के जरिये कभी भी ये जाना जा सकता है कि मिनी खान किस वक्त कहां पर है. फिलहाल वो स्विटजरलैंड और फ्रांस की यात्रा पर है और वहां से उसे नाइजीरिया, भारत, जापान और फिर कनाडा जाना है. एक ब्लॉगर का कहना है कि शाहरूख खान ने ओम शांति ओम फिल्म के लिए सिक्स पैक बनाए मगर प्लास्टिक के मिनी खान के पास ये पहले से ही थे.
कई ब्लॉगर्स जब फिल्म का फर्स्ट डे फर्स्ट शो नहीं देख पाते तो उन्हें बड़ा अफसोस होता है. जब ‘कभी अलविदा ना कहना’ भारत के साथ जर्मनी में रिलीज नहीं हुई तो मारता नाम की एक ब्लॉगर इसका पहला शो देखने के लिए फ्लाइट पकड़कर न्यूयार्क जा पहुंची. ये भी दिलचस्प है कि भले ही कोई ब्लॉगर कभी किसी भारतीय सिनेमा हाल में नहीं गया हो मगर वो जानता है कि फिल्म का मजा लेने के लिए तालियां और सीटी बजाना या जोर-जोर से शोर मचाना काफी अहम है.
ब्लागर्स में से ज्यादातर फिल्में सबटाइटल्स के साथ देखते हैं. उनमें से कई हिंदी सीखने की कोशिश भी कर रहे हैं. ‘आजा नचले’ के बारे में बात करते हुए बारबरा खीझते हुए कहती हैं, ‘बस गुडविल खत्म.’
अपने देशवासियों को ये ब्लॉगर्स हैरान करते हैं तो भारतीयों को इनके बारे में सुनकर झटका लगता है. ऐसा शायद इसलिए है कि उन्हें उम्मीद ही नहीं होती कि कोई फिरंगी लगान के अलावा भी किसी और फिल्म के बारे में जानकारी रखता होगा.
मगर ये जुड़ाव सिर्फ जानकारी तक ही सीमित नहीं है. पैसिमिसिज्मो नामक एक ब्लॉगर कहते हैं, “मैं दिल से बॉलीवुड की फिल्मों का आनंद लेता हूं और उन्हें देखकर भावुक हो जाता हूं. उनके जैसे कई ब्लॉगर्स हैं जो फिल्मों में किसी किरदार की मौत पर अपने आंसू नहीं रोक पाते.” मिस बॉली नाम की एक ब्लॉगर कहती हैं, मुझे पूरा यकीन है कि (भारतीय फिल्मों की तरह) अगर हर कोई नियमित अंतराल के बाद नाचने-गाने लगे तो दुनिया काफी बेहतर जगह बन जाएगी.
ज्यादातर लोग इस बात से सहमत होंगे.
निशा सूज़न





















