जोधा-अकबर या जोधा-जहांगीर
इतिहास पर आधारित बॉलीवुड फिल्मों और विवादों में चोली-दामन का साथ रहा है. आखिर क्या हैं इसकी वजहें, जानने के लिए हमने बात की कुछ इतिहासकारों और दूसरे जानकारों से .
1960 में जब के आसिफ ने मुगले आज़म बनाई तो प्रचलित जानकारियों को आधार मानकर उन्होंने जोधाबाई को मुगल बादशाह अकबर की राजपूत रानी के रूप में दिखाया. अकबर के बेटे सलीम और दरबारी नर्तकी अनारकली के चर्चित प्यार की ये कहानी सुपरहिट रही. उस वक्त फिल्म को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ. शायद मुगले आजम की भव्यता और लोकप्रियता से चकाचौंध लोगों का फिल्म की ऐतिहासिक गड़बड़ियों की तरफ ध्यान ही नहीं गया.
अब लगभग आधी सदी बाद जब अकबर और जोधाबाई की प्रेम कहानी को लेकर बनी ‘जोधा-अकबर’ रिलीज होने को है तो इस पर विवाद खड़ा हो गया है. राजस्थान में राजपूतों का एक वर्ग ये कहकर इसका विरोध कर रहा है कि फिल्म में जो बातें दिखाई गई हैं वो ऐतिहासिक रूप से सही नहीं हैं. उन्होंने राज्य में इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने की धमकी तक दे डाली है. आशुतोष गोवारीकर की इस फिल्म में सिने स्टार हृतिक रोशन और ऐश्वर्या रॉय ने अकबर और जोधाबाई की भूमिकाएं निभाई हैं.वैसे इतिहासकारों की मानें तो फिल्म का विरोध कर रहे लोग शायद गलत नहीं. उनमें से ज़्यादातर के मुताबिक जोधाबाई से अकबर ने नहीं बल्कि उसके बेटे शहजादे सलीम ने शादी की थी. |
वैसे इतिहासकारों की मानें तो फिल्म का विरोध कर रहे लोग शायद गलत नहीं. उनमें से ज़्यादातर के मुताबिक जोधाबाई से अकबर ने नहीं बल्कि उसके बेटे शहजादे सलीम ने शादी की थी. सलीम बाद में बादशाह जहांगीर बना. इसके बाद जहांगीर और जोधाबाई के बेटे शहजादे खुर्रम ने शाहजहां के नाम से दिल्ली की सल्तनत संभाली.
जैसा कि 1857 की आजादी की लड़ाई पर एक पुस्तक लिख रहे महमूद फारुकी कहते हैं, “इससे यही साबित होता है कि बीते हुए कल के बारे में हर पीढ़ी के अपने मिथक होते हैं और इस तरह इतिहास में हमेशा बदलाव की गुंजाइश होती है.”
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुगल इतिहास के प्रोफेसर दिलबाग सिंह कहते हैं, “फिल्म का विरोध कर रहे लोगों के पास ऐतराज की दो वजहें हैं. पहली तो ये कि अकबर ने जोधाबाई से नहीं बल्कि किसी और से विवाह किया था और दूसरी ये कि उन दोनों के बीच कोई प्रेमसंबंध नहीं था.”
जाने-माने इतिहासकार और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े इक्तिदार आलम खान के मुताबिक अकबर ने एक राजपूत राजकुमारी से विवाह तो किया था लेकिन वो आमेर के राजा भारमल की बेटी हरकाबाई थी. खान कहते हैं, “जोधाबाई के अकबर की पत्नी होने का गलत पारंपरिक उल्लेख लिखित रूप से सबसे पहले अट्ठारहवीं शताब्दी में मिलता है.” दिल्ली के जाकिर हुसैन कालेज में इतिहास के शिक्षक शाह नदीम भी कहते हैं कि आगरा के पास अकबर द्वारा बसाए गए शहर फतेहपुर सीकरी में बने महलों में से एक को जोधामहल कहा जाता है और इसलिए भी लोग ये मानते हैं कि जोधाबाई अकबर की पत्नी थीं.
लेकिन आखिर अकबर की राजपूत पत्नी का नाम गलत दिखाए जाने पर विवाद खड़ा क्यों हो रहा है? क्या विरोध के पीछे कुछ जातिगत कारण छिपे हो सकते हैं? राजपूतों को मुगलों से शिकायत की कोई पारंपरिक वजह सिंह को समझ नहीं आती. उनके मुताबिक शासक घरानों के बीच विवाह संबंधों के जरिये राजनीतिक स्थिरता हासिल करने और नए गठबंधन बनाने की परंपरा पुरानी थी. मुगल काल से पहले भी राजपूत राजकुमारियों की शादियां दिल्ली और गुजरात की मुस्लिम सल्तनतों में होती थीं. जैसा कि सिंह कहते हैं, “मुगलों ने तो इस परंपरा को सिर्फ आगे बढ़ाया. अकबर किसी राजपूत राजकुमारी से शादी करने वाला पहला मुगल शासक था. मुगलों ने इन संबंधों के जरिये राजनीतिक स्थिरता हासिल की. राजपूतों को भी मुगल घराने से संबंध जोड़ने में कोई दिक्कत नहीं थी.”
खान के मुताबिक लोग अक्सर इस बात को भूल जाते हैं कि मध्यकालीन दुनिया हमारी दुनिया से काफी अलग थी. शादी के मामलों में जाति भी अहम भूमिका निभाती थी. उदाहरण के लिए राजपूत ऐसे घरानों से कभी संबंध नहीं जोड़ते थे जो उनके हिसाब से जातिगत श्रेष्ठता में उनसे कम हों.”आगरा के पास अकबर द्वारा बसाए गए शहर फतेहपुर सीकरी में बने महलों में से एक को जोधामहल कहा जाता है और इसलिए भी लोग ये मानते हैं कि जोधाबाई अकबर की पत्नी थीं. |
भारत में इतिहास पर आधारित फिल्मों को लेकर होने वाला विवाद नई बात नहीं है. मंगल पांडे, भगत सिंह या फिर सौ साल पहले के बनारस में विधवाओं की जिंदगी को दिखाती हालिया फिल्में विवादों से घिरी रही हैं. यही बात ऐतिहासिक चरित्रों पर लिखी गई किताबों पर भी लागू होती है. शिवाजी के वंश, नेहरू और एडविना माउंटबेटेन या नेताजी सुभाष चंद्र बोस और हिटलर के बीच संबंधों पर लिखी गई बातों को लेकर कई किताबें भी विवादों के घेरे में रही हैं.
शायद इससे इस बात की पुष्टि होती है कि भारत में जातिगत, सामुदायिक और क्षेत्रीय गुटों को कई वजहों से अपनी पहचान पर जोर देने की जरूरत महसूस होती रहती है और इतिहास पर आधारित रचनाएं ऐसा करने का एक ज़रिया बन जाती हैं. महमूद फारुकी कहते हैं, “इंग्लैंड में एक ऐतिहासिक एलिजाबेथ हैं और एक मशहूर एलिजाबेथ. वहां इसके बारे में एक आम सहमति है. लेकिन यहां ऐसी कोई सहमति नहीं. अगर आप अंबेडकर या भगत सिंह पर कोई फिल्म बनाएं तो गांधी के समर्थक उस पर ऐतराज कर सकते हैं और अगर गांधी पर फिल्म बनाई जाए तो भगत सिंह या अंबेडकर के समर्थकों को इस पर कुछ आपत्तियां हो सकती हैं.”
सिंह की मानें तो पश्चिम के मुकाबले भारत में किसी की व्यक्तिगत सोच में सामूहिक पहचान का रंग कहीं गहरा होता है. वो कहते हैं, “मुगल दरबार के इतिहासकारों ने जाटों का उल्लेख लूटमार करने वाले लोगों के तौर पर किया है. जबकि दरअसल वो महज़ किसान थे जिन्होंने मुगलों के खिलाफ आवाज उठाई थी.” फारुकी का सोचना है कि किसी रचनाकार को इन वास्तविकताओं का भी ध्यान रखना चाहिए. उनके मुताबिक खुद को व्यक्त करने की आजादी की भी एक सीमा होती है.
ज्यादातर इतिहासकारों को ये बात कचोटती है कि फिल्म और टीवी निर्माता इतिहास को अपनी सुविधा के हिसाब से तोड़-मरोड़ देते हैं. हालांकि वो इस बात से सहमत हैं कि कोई फिल्म इतिहास का सबक नहीं बल्कि मनोरंजन का माध्यम होती है. मगर फिर भी उनके मुताबिक इसे दिखाने के कुछ तरीके होते हैं. नाराजगी भरे सुर में सिंह कहते हैं, “टीवी सीरियल पृथ्वीराज चौहान सौ फीसदी कल्पना पर आधारित है.”
शाह ऐसे कई उदाहरण गिनाते हैं जहां प्रेम कहानियों के प्रति बॉलीवुड की सनक ने इतिहास का कचरा कर दिया है. मसलन दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाली एकमात्र महिला रजिया सुल्तान का यकूत नाम के किसी हब्शी के साथ प्रेम संबंध नहीं था जैसा कि फिल्म रजिया सुल्तान में दिखाया गया. शाह कहते हैं, “बुनियादी तथ्यों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि फिल्में और टेलीविजन लोगों में लोकप्रिय हैं और इसके जरिये लोगों की सोच सांचे में ढलती है.”
फिल्म निर्माता कुछ उदाहरणों से सीख ले सकते हैं. शाह कहते हैं, “प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर सत्यजीत रे ने फिल्म बनाई जिसे एक अच्छी ऐतिहासिक फिल्म कहा जा सकता है. अवध के पतन के दौरान दो दरबारियों के शतरंज खेलने की कथा भले ही काल्पनिक हो मगर उस समय को दर्शाते ऐतिहासिक तथ्य बिल्कुल सही दिखाए गए हैं. इस तरह से ये फिल्म 1856 की उथल-पुथल और नवाब वाजिद अली शाह के पतन की सही तस्वीर पेश करती है.”
इतिहास, किस्से-कहानियों और कल्पना का मेल काफी मनोरंजक हो सकता है. मगर प्रबुद्ध और संवेदनशील दर्शकों के विरोध की वजह से हो सकता है कि आने वाले दौर में किसी ऐतिहासिक प्रेम कहानी पर फिल्म बनाने से पहले निर्देशक दो बार नहीं बल्कि हज़ार बार सोचें.
हिमांशु भगत






















