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   70 का दशक...मगर कहां

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साल खत्म होने को था. हमसे कहा गया कि फराह खान की ओम शांति ओम, संजय लीला भंसाली की सांवरिया को टिकट खिड़की पर बुरी तरह से पछाड़ कर "भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे कमाऊ फिल्म" हो गई है।

तथ्यों की सत्यता परखने की जिज्ञासावश मैं व्यावसायिक जर्नलों की ओर मुखातिब हुआ। फिल्म के तीसरे सप्ताह की कमाई के आंकड़े कुछ यूं निकले--मुंबई 65%, दिल्ली 60%, कोलकाता 55%, इलाहाबाद 28.%, लखनऊ 48%, उदयपुर 28.%, उज्जैन 22% आदि... ये आंकड़े अनुमानित हो सकते हैं, लेकिन ये कहीं से भी उस उत्साह की कहानी नहीं कहते जिस उत्साह के साथ फिल्म का प्रचार किया जा रहा है। बांबे टॉकीज़ की किस्मत, के. आसिफ की मुगले आज़म, जीपी सिप्पी की शोले, मनमोहन देसाई की अमर अकबर एंथनी, राजश्री की मैंने प्यार किया या फिर यश चोपड़ा की डीडीएलजे इसकी तुलना में निश्चित तौर पर बेहतर फिल्में थीं। बहरहाल सिनेमा का बाज़ार पिछले एक दशक के दौरान काफी कुछ बदल चुका है और अब ये महज़ एक हफ्ते का मामला होकर रह गया है। लिहाजा फिल्म के चलने का समय अव इसकी सफलता का कोई निश्चित पैमाना नहीं रहा। ओम शांति ओम एक बड़ी सफलता है, और फिल्म की रिलीज़ से पहले ही शुरू हुए बाज़ारी हथकंडों को इसका श्रेय देना होगा।

70-80 के दशक में जवान हुआ, मनमोहन देसाई / प्रकाश मेहरा की सलीम-जावेद के संवादों और आरडी के दिलकश संगीत तथा अमिताभ की गरममिज़ाजी वाली फिल्मों की खुराक पर पला-बढ़ा मैं, सच्ची श्रद्धांजली के रूप में ये सब देखने की उत्कंठा पाले हुए था। लेकिन ये सब नदारद था।  

इस फिल्म की जबर्दस्त सफलता की पड़ताल करने के लिए मैं पास ही के मल्टीप्लेक्स पहुंचा। 60 रूपए के पॉपकॉर्न और 300 रूपए की टिकट से मेरी जेब ढ़ीली हो गई। फिल्म खत्म होने पर मैंने दर्शकों में मिलीजुली प्रतिक्रियाएं देखी। फिल्म को सबसे ज्यादा सफलता प्रदान की इसके भद्दे हास्य, दीपिका पादुकोण के ईमानदार अभिनय, शाहरुख खान के दक्षिण भारतीय अवतार औऱ शानदार तरीके से फिल्माए गए गानों ने जिन्हें फराह ने खुद ही निर्देशित किया है-- इनमें सबसे अनोखा है दीपिका का गुज़रे ज़माने के नायकों के साथ डिज़िटल तकनीक की मदद से फिल्माया गया नृत्य और बेहतरीन शीर्षक गीत जो आपको मनमोहन देसाई की तड़क-भड़क वाली फिल्म नसीब के गाने 'जॉन जॉनी जनार्दन' की याद दिलाता है। यानी फिल्म में सफल होने की योग्यता थी जिसे इसकी विश्वसनीय पटकथा (मुश्ताक शेख और फराह खान) ने कुछ और परवान चढ़ाया। मगर जिस चीज़ ने 70 के असल फिल्मप्रेमियों को गुस्सा दिलाया वो था फिल्म को  "70 के दशक को श्रद्धांजलि" कहे जाने का आडंबर।

70-80 के दशक में जवान हुआ, मनमोहन देसाई / प्रकाश मेहरा की सलीम-जावेद के संवादों और आरडी के दिलकश संगीत तथा अमिताभ की गरममिज़ाजी वाली फिल्मों की खुराक पर पला-बढ़ा मैं, सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में ये सब देखने की उत्कंठा पाले हुए था। लेकिन ये सब नदारद था। फिल्म कर्ज़ के गाने के साथ शुरू हुई जो सत्तर नहीं बल्कि अस्सी में रिलीज़ हुई थी। फिल्म में चरित्रों के हेयरस्टाइल लंबे हैं (शाहरुख और अर्जुन) लेकिन उनके कान फिर भी दिखते हैं जबकि 70 के दशक में बाल कानों को ढके हुए होते थे। इसके अलावा देव आनंद (पचास-साठ के दशक के), मनोज कुमार (साठ के दशक के) और सुनील दत्त( साठ के दशक के) जैसे दिग्गज सितारों की फूहड़ नकल, जो कि सत्तर के युग में कही से भी फिट नहीं होती।

और अंत में एक नज़र डाल लेते हैं 70 के दिग्गजों पर-जिन दो सितारों ने निर्विवाद रूप से 70 के दशक में राज किया वो थे राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन। 1970 से 1973 तक राजेश खन्ना हर ओर छाए रहे। 1973 में प्रकाश मेहरा की ज़ंजीर ने भारतीय सिनेमाघरों में दस्तक दी और सलीम जावेद का उग्र युवा तुर्क रूपहले पर्दे पर धमाका कर रहा था। अमिताभ बच्चन अपने अंदाज़ में प्रकट हुए और बिना समय गंवाए नंबर एक का ताज हासिल किया जिसे उन्होंने आज तक नहीं उतारा है। दीवार, त्रिशूल, कभी कभी, शोले, अमर अकबर एंथनी, डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, सुहाग, अदालत, मि. नटवरलाल, काला पत्थर, दो अजनबी, अभिमान, मिली, खून पसीना, हेराफेरी, मजबूर और चुपके चुपके- अमिताभ का जादू सत्तर के निर्णायक दशक में हरेक के सिर चढ़कर बोल रहा था। सत्तर के दशक के सिनेमा को श्रद्धांजलि देने का दावा करने वाली इस फिल्म में पूरे दशक पर राज करने वाले अमिताभ का नामोनिशान तक नहीं। शर्मनाक। मैं इस बात से भी चकित हूं कि समीक्षको ने इस बात की पूरी अनदेखी की कि इस फिल्म में 70 के दशक वाले भाग में कई ऐसे तत्व मौजूद हैं जो उस समय की पहचान ही नहीं थे।

एसएमएम औसजा

(लेखक जाने-माने फ़िल्म इतिहासकार हैं)

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 1

  • प्रेषक : Jai Shankar
    . . . Dho dala.