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   तेल की बिसात पर रिश्तों की चाल
म्यांमार के साथ रिश्ते विकसित करते वक्त भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और चीन की चुनौती के चलते लोकतांत्रिक और व्यावहारिक तकाजों में संतुलन साधने के प्रयास कर रहा है...आदित्य बोरदोलोई की रिपोर्ट...
हर देश की कोशिश होती है कि पड़ोसियों के साथ उसके रिश्ते बेहतर हों। और अगर पड़ोसी हाइड्रोकार्बन यानी ऊर्जा के अकूत भंडार पर बैठा हो तो रिश्ता बनाना लाज़मी हो जाता है। भारत अपनी पूर्वी सीमा पर-- म्यांमार में-- जो तेल कूटनीति कर रहा है उस पर कुछ आलोचकों की राय है कि भारत सैन्य शासित म्यांमार से रिश्ते बनाकर लोकतंत्रिक आदर्शों का मखौल उड़ा रहा है। लेकिन इसकी वजह बिल्कुल साफ है-- म्यांमार के साथ कटुतापूर्ण रिश्ते सिर्फ और सिर्फ चीन को फायदा पहुंचाएंगे। म्यांमार से रिश्तों के चलते, तेल एवं गैस भंडारों तक पहुंच से लेकर भारत के समुद्री रास्तों तक पर चीन अपना कब्ज़ा जमा सकता है।
"तेल और युद्ध में सब जायज है," ये कहना है एनडीए सरकार की तरफ से जुंटा(सैन्य शासन) से वार्ता में शामिल रह चुके एक संयुक्त सचिव का। "म्यांमार में 2006 के अंत तक 19 खरब घन फीट गैस भंडारों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि एक बड़े क्षेत्र में अभी भी खोज होनी बाकी है। उधर भारत का उत्पादन इसके मुकाबले कुछ भी नहीं है।"
| "म्यांमार में 2006 के अंत तक 19 खरब घन फीट गैस भंडारों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि एक बड़े क्षेत्र में अभी भी खोज होनी बाकी है। उधर भारत का उत्पादन इसके मुकाबले कुछ भी नहीं है। |
लिहाजा पिछले हफ्ते भारत यात्रा पर आए जनरल मुंग आए का बीजिंग की तरह ही दिल खोलकर स्वागत हुआ। आए म्यांमार के दूसरे सबसे कद्दावर नेता हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी और तमाम शीर्ष नौकरशाहों से मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों ने एक महत्वपूर्ण यातायात समझौते पर दस्तखत किए। इसके जरिए भारत का पूर्वोत्तर इलाका म्यांमार के एक बहुत ही महत्पूर्ण बंदरगाह से सीधे जुड़ जाएगा।
"नया सड़क और नदी मार्ग बांग्लादेश से नहीं गुजरेगा" प्रधानमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी कहते हैं। भारत दालों का सबसे बड़ा आयातक है। हम इसे सिंगापुर के रास्ते म्यांमार से मंगाने की बजाय अब सीधे वहीं से मंगा सकेंगे-- वाणिज्य राज्यमंत्री जयराम रमेश कहते हैं। वो आगे जोड़ते हैं, "भारत का पूर्वोत्तर इलाका म्यांमार से व्यापार बढ़ाने में सक्षम हो जाएगा। हम मिजोरम, अरुणांचल प्रदेश और नगालैंड में व्यापारिक केंद्र खोलने पर भी विचार करेंगे। फिलहाल हमारे पास एकमात्र केंद्र मणिपुर के मोरेह में है।"
लेकिन निशाना कहीं और ही है। ये मार्ग भारत की पहुंच सित्वे तक सुनिश्चित करेगा जो कलादान नदी के पास स्थित है। ये इलाका म्यांमार के गैस हब के रूप में विकसित हुआ है। एक बार जब बंगाल की खाड़ी में मौजूद स्वे फील्ड का विशाल गैस भंडार खत्म होने लगेगा तब भारत यहां पर बंदरगाह विकसित करने में मदद करेगा। यहां पर भारत और चीन विशाल गैस परियोजना के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। पिछले साल म्यांमार ने चीनी कंपनी पेट्रोचाइना को 30 सालों तक 6.5 खरब घन फीट प्राकृतिक गैस बेचने का फैसला किया था जिससे भारत को गहरी निराशा हुई थी।
चीन ने इसके अलावा भी भारत के लिए चिंताएं पैदा की हैं। उसने पेशकश की है कि यदि भारत त्रिपक्षीय ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस परियोजना से अपने हाथ पीछे खींचता है तो वह ईरान से गैस खरीदने के लिए तैयार है। चीन की योजना म्यांमार से अपने दक्षिण-पश्चिमी प्रांत युनान तक तेल और गैस पहुंचाने के लिए पाइपलाइन बिछाने की है। "चीन आधारभूत परियोजनाओं में पैसा लगा रहा है और बदले में खुद के लिए गैस और तेल सुनिश्चित कर रहा है। जब आप किसी विकासशील देश की सड़कें और बंदरगाह बनाते हैं तो उसे इस एहसान को चुकाने का दायित्व निभाना होता है," कहते हैं सिंगापुर के तेल विश्लेषक ब्रूस कॉलिनवर्थ।
इसलिए अगर आपने जुंटा द्वारा मई में जनमत संग्रह और 2010 में चुनाव के निर्णय लेने के समय पर साल की शुरुआत में हुई विदेश सचिव की म्यांमार यात्रा को खारिज कर दिया था तो आपने चीज़ों को सही संदर्भों में नहीं देखा।
कलादान समझौता भारत की "पूरब की ओर देखो" नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है जिसके नायक और कोई नहीं बल्कि खुद विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी हैं। अपने हालिया दौरे पर 'आए' ने म्यांमार के लिए एक उपग्रह हासिल करने के लिए भारत से सहयोग मांगा था। ये भी हो जाएगा?























