अमेरिका को सर्दी, भारत को छींक
अमेरिका में मंदी का डर जोर पकड़ रहा है. आशंकाएं जताई जा रही हैं कि इसका नुकसान भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को भी झेलना पड़ सकता है. इन आशंकाओं में कितनी सच्चाई है? अमेरिकी मंदी का भारत पर क्या और कितना असर पड़ सकता है? ऐसे ही कुछ सवालों की पड़ताल करती विसि तिलक, शांतनु गुहा रे और विवेक सिन्हा की रिपोर्ट.
दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक महासागर में रिक्टर स्केल पर आठ की तीव्रता का भूकंप आ रहा है. क्या इससे जल्द ही ऐसी सुनामी पैदा हो सकती है जिसमें छोटी अर्थव्यवस्थाओं को तबाह करने और बाकियों को गंभीर नुकसान पहुंचाने की क्षमता हो?
अमेरिकी अर्थव्यवस्था संकटों का सामना कर रही है और दुनियाभर में अनिश्चितता का माहौल बन रहा है. अर्थशास्त्री हों या नेता, इस पर सभी एकराय हैं कि एक बड़ा तूफान आने को है. मगर ये कितना भयानक होगा, किसे कितना नुकसान होगा और कौन इसे झेल पाएगा जैसे सवालों पर सबकी अलग-अलग राय है. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस के उपाध्यक्ष ए शक्तिवेल चेताते हुए कहते हैं कि निर्यातकों के व्यापार में 15 फीसदी की गिरावट आ चुकी है और अगर अमेरिकी मंदी का हमला भारत पर और तेज होता है तो ये आंकड़ा दोगुना हो सकता है.
डॉलर के लुढ़कने, कर्ज की वसूली न हो पाने और इसकी उपलब्धता में कमी जैसे हालात तूफान बनकर पहले ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था के जहाज से टकरा रहे हैं. हालांकि ये कहना अभी जल्दबाजी होगी कि ये जहाज इस तूफान में डूब जाएगा या फिर इसे झेल जाएगा मगर चिंताएं साफ देखी जा सकती हैं.
ब्लूम्सबर्ग न्यूज की एक टिप्पणी देखिए, “अमेरिकी कंपनियों का मुनाफा घट रहा है और वो वक्त दूर नहीं जब पूरी अर्थव्यवस्था ही इस (मंदी) की चपेट में आ जाए.” यही वजह थी कि आनन-फानन में फेडरल रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती और बुश प्रशासन द्वारा 156 अरब डॉलर के राहत पैकेज की घोषणा की गई.
सवाल उठता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वो अमेरिका से सीधा प्रभावित होती हैं, पर इस तूफान का असर कितना होगा. हमारे लिए इससे भी अहम बात ये है कि क्या हमारी अर्थव्यवस्था अपने आप में इतनी मजबूत है कि अमेरिकी संकट से उठे तूफान को बगैर ज्यादा मुश्किलों के झेल जाए.
ऐसा नहीं है कि सरकार इससे अनजान हो. हाल ही में एक निजी चैनल के कार्यक्रम में वित्त मंत्री पी चिंदबरम ये कहते नजर आए कि अमेरिकी मंदी यहां पर भी मुद्रास्फीति से जुड़ी चिंताएं जगा रही है. चिदंबरम का ये भी कहना था कि अगर डॉलर का रुपये के मुकाबले कमजोर होना जारी रहता है तो इसका मतलब होगा भारतीय निर्यातकों के लिए मुश्किलें.
वैसे मुश्किलें तो पहले ही शुरू हो चुकी हैं. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस के उपाध्यक्ष ए शक्तिवेल चेताते हुए कहते हैं कि निर्यातकों के व्यापार में 15 फीसदी की गिरावट आ चुकी है और अगर अमेरिकी मंदी का हमला भारत पर और तेज होता है तो ये आंकड़ा दोगुना हो सकता है.
हमेशा की तरह मंदी के इस तूफान का दोषी वही शब्द है जो कुछ समय से सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों का चहेता रहा है. ये है ग्लोबलाइजेशन या वैश्वीकरण. वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने कच्चे माल, उत्पाद, सेवाओं और पूंजी के लेनदेन के जरिये धीरे-धीरे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को आपस में जोड़ दिया है. शुरू के वर्षों में इसके अपने फायदे देखे गए. अब यही वैश्वीकरण मुसीबत का सबब बन गया है. एक अर्थव्यवस्था में भूकंप आता है तो बाकी में भी इसके झटके महसूस किए जाते हैं.
आज वैश्वीकरण के बजाय इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है कि अमेरिकी मंदी से पैदा हुए बर्बादी के तूफान से कोई देश कितना सुरक्षित रह सकता है. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी के जोशी कहते हैं, “भारत का अमेरिका और बाकी दुनिया के साथ व्यापार बढ़ा है लेकिन इसके साथ हमारी अपनी मजबूती भी बढ़ी है और हमारे विकास का इंजन काफी मजबूत है.” जोशी को यकीन है कि भारतीय बाजार की मजबूत और लगातार बढ़ रही क्रय क्षमता अमेरिकी और यूरोपीय बाजार में पैदा हुई मंदी से हुए नुकसान को बेअसर कर सकती है. आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी) के अध्यक्ष सी रंगराजन भी कहते हैं कि भारतीय कंपनियां अमेरिकी मंदी से पैदा हुए नुकसान की भरपाई घरेलू बाजार से कर सकती हैं.
मगर सारे विशेषज्ञ आशान्वित ही हों ऐसा नहीं है. कुछ के मुताबिक अगर मंदी पूरी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को चपेट में ले लेती है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका तगड़ा असर पड़ सकता है. भले ही भारतीय बाजार दुनिया में निवेश पर सबसे ज्यादा लाभ देने वाले बाजारों में से हो पर इसके बावजूद अमेरिका में मंदी के चलते भारतीय बाजार में आने वाली विदेशी पूंजी पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. आज वैश्वीकरण के बजाय इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है कि अमेरिकी मंदी से पैदा हुए बर्बादी के तूफान से कोई देश कितना सुरक्षित रह सकता है.
भारतीय अर्थव्यवस्था का एक मजबूत बिंदु ये है कि निर्यात पर इसकी निर्भरता दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले कम है. निर्यात भारत के सकेलू घरल उत्पाद का 33 प्रतिशत है. दूसरी तरफ चीन के लिए ये आंकड़ा 70 फीसदी है. शायद यही वजह है कि सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव्स के अध्यक्ष मोहन गुरुस्वामी कहते हैं, “यहां पर उथल-पुथल ज्यादा नहीं होगी.”
उधर, कई विशेषज्ञ अमेरिकी मंदी से जुड़ी चिंताओं पर ही सवाल खड़े करते हैं. फिक्की के महासचिव अमित मित्रा का मानना है कि मंदी का डर बेवजह है. वो कहते हैं, “पिछले दो दशक से उन्होंने मौद्रिक और वित्तीय उपायों द्वारा स्थिति को नियंत्रण में रखा है. फेडरल बैंक पहले ही ब्याज दरें घटा चुका है और वित्तीय पैकेज भी तैयार है.” ईएसी को भी विश्वास है कि अमेरिकी मंदी हल्की ही रहेगी और इसका असर भी.
उम्मीदों के बावजूद कई दूसरे जानकार कहते हैं कि भले ही भारत दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले सुरक्षित हो लेकिन बाजार के व्यवहार में भावनाएं भी एक मजबूत भूमिका निभाती हैं. इसलिए नकारात्मक मूड घरेलू बाजार को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है. जैसा कि निवेश सलाहकार अर्जुन केजरीवाल कहते हैं, “ ऐसा कहीं हो सकता है कि अमेरिकी बाजार धराशाई हो रहा हो और घरेलू बाजारों में उछाल आ रहा हो.”
गोल्डमैन सैक्स द्वारा जारी किए गए एक अध्ययन में लेखक तुषार पोद्दार और प्रांजुल भंडारी कहते हैं, “हमारा सोचना है कि (भारतीय) अर्थव्यवस्था भीतर से पर्याप्त मजबूत है और इसे बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होगा. मगर इसकी गति में थोड़ी कमी जरूर आएगी. मंदी के कारण खासकर वस्त्र, सॉफ्टवेयर और दूसरी सेवाओं की निर्यात दर वित्तीय वर्ष 2009 में घटकर आधी रह जाएगी जिसका रोजगार पर नकारात्मक असर पड़ेगा. बुनियादी ढांचे में विकास की दर पर कोई असर नहीं पड़ेगा और इस क्षेत्र में निवेश के अवसरों की बहुतायत बनी रहेगी.”
जानकार मानते हैं कि रत्न और आभूषण, हस्तशिल्प, वस्त्र, चमड़ा और सूचना-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों पर मंदी का सबसे ज्यादा असर पड़ेगा. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस के महानिदेशक अजय सहाय के मुताबिक हस्तशिल्प क्षेत्र पर इसकी मार सबसे ज्यादा होगी. वो कहते हैं, “पिछले साल की तुलना में हस्तशिल्प निर्यात में 40-50 फीसदी की गिरावट आ गई है. ऐसा इसलिए है कि ये बाजार पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर है. रत्न और आभूषण के लिए 20 फीसदी विकास दर का पूर्वानुमान लगाया गया था लेकिन डॉलर के कमजोर होने और अमेरिकी मंदी की वजह से विकास दर में 10 फीसदी की कमी आ गई है. हालात और भी बदतर हो सकते थे अगर नुकसान की थोड़ी बहुत भरपाई यूरोपीय बाजारों से न होती.” सहाय आगे जोड़ते हैं कि वस्त्र और चमड़ा निर्यात की वृद्धि दर भी घटी है.
उधर, रुपये की मजबूती का सूचना-तकनीकी उद्योग पर असर साफ देखा जा रहा है. एशिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर सेवा कंपनी और भारत में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी रोजगारदाता टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने हाल ही में अपने कर्मचारियों को सूचित किया कि उनके वेतन के विभिन्न मदों में 20 फीसदी की कटौती की जाएगी.
दूसरे क्षेत्रों के निर्यातक खुद को आने वाले संकट का सामना करने के लिए तैयार कर रहे हैं. वॉलमार्ट, जे सी पेन्नी और टिंबरलैंड जैसी कंपनियों को जूते सप्लाई करने वाली दक्षिण भारत की कंपनी फरीदा शूज अमेरिकी बाजार पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है. इसके मालिक रफीक अहमद बताते हैं कि 2006 खत्म होते-होते उन्होंने अमेरिका को होने वाले निर्यात में 10 फीसदी की कटौती कर दी थी. अब 2008 के आखिर तक वो इसमें इतनी ही और कटौती कर यूरोपीय बाजारों पर ज्यादा ध्यान लगाना चाहते हैं. भारत में सूचना-प्रौद्योगिकी के जाने-माने चेहरों में से एक एन आर नारायणमूर्ति आशावान हैं कि अमेरिका में मंदी का दौर भारत में नए अवसर पैदा करेगा.
कार्पेट एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल के अध्यक्ष अशोक कुमार जैन के मुताबिक उद्योग कीमतों को सस्ता कर उन्हें प्रतिस्पर्द्धात्मक बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं. वो कहते हैं, “अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए हम लैटिन अमेरिका, पुर्तगाल व तुर्की जैसे नए बाजारों में शो आयोजित कर रहे हैं.”
कई दूसरे भी अहमद और जैन की राह पर हैं. उदाहरण के लिए तीन साल पहले तक सत्यम कंप्यूटर्स का 70 फीसदी राजस्व अमेरिकी बाजार से आता था. इसे घटाकर अब 57 फीसदी कर दिया गया है. कंपनी के चीफ स्ट्रेटेजी ऑफिसर शैलेश शाह कहते हैं, “दुनिया के बाकी हिस्सों में भी संभावनाएं हैं जिनका फायदा उठाया जा सकता है.”
लेकिन दूसरी तरफ ये सारी कवायदें ये दर्शाती हैं कि सारी दुनिया में अमेरिकी बाजार की क्या हैसियत है और भारतीय निर्माता भी इस सिद्धांत के परे नहीं कि जब अमेरिका छींकता है तो सारी दुनिया को ज़ुकाम हो जाता है.
न्यूयार्क स्थित एशिया सोसाइटी में फेलो और प्लैनेट इंडिया की लेखक मीरा कामदार इस पर सहमति जताती हैं कि अमेरिकी मंदी का असर भारतीय बाजार पर निश्चित रूप से पड़ेगा. वो कहती हैं, “सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा क्योंकि अमेरिका अभी तक भारतीय आउटसोर्सिंग सेवाओं का सबसे बड़ा बाजार रहा है. भारतीय शेयर बाजार में और यहां प्रत्यक्ष निवेश के लिए पूंजी के प्रवाह में भी कमी आएगी.”
कामदार के मुताबिक जो जानकार ये कहते थे कि विकासशील अर्थव्यवस्थाएं चूंकि एक दूसरे में निवेश कर रही हैं और अमेरिका पर उनकी निर्भरता घट रही है, इसलिए उन पर अमेरिकी मंदी का असर नहीं होगा, वो गलत साबित हो गए हैं. हाल ही में सेंसेक्स में जो भयानक गिरावट आई वो अकेली नहीं थी बल्कि दुनिया के सभी बाजारों का यही हाल था.
नुकसान के बारे में तो हर कोई कह रहा है लेकिन क्या इस बात की भी कोई संभावना है कि आशंकाओं के उलट अमेरिकी मंदी भारत के लिए फायदेमंद साबित हो? भारत में सूचना-प्रौद्योगिकी के जाने-माने चेहरों में से एक एन आर नारायणमूर्ति आशावान हैं कि अमेरिका में मंदी का दौर भारत में नए अवसर पैदा करेगा. गुरूस्वामी भी मानते हैं कि मंदी अमेरिका में बैंकों को अपने स्टाफ में कटौती के लिए मजबूर करेगी जिससे भारत जैसे देशों में बीपीओ सेवाओं का विस्तार होगा. कामदार के मुताबिक भी मंदी का दीर्घकालिक असर भारतीय निर्माताओं द्वारा अमेरिका पर अपनी भारी निर्भरता घटाने और दुनिया के दूसरे हिस्सों में अपनी गतिविधियों का विस्तार करने के रूप में सामने आ सकता है.
केंब्रिज एनर्जी रिसर्च के चेयरमैन डैन येर्गिन कहते हैं, “अगर अमेरिकी मंदी के बावजूद उभरते बाजार अपने विकास की रफ्तार जारी रखते हैं तो इसका मतलब है कि हम वैश्विक आर्थिक इतिहास के एक नये चरण में प्रवेश कर चुके हैं.”
फिर भी अगर ये बातें व्यावहारिकता के बजाय महज आदर्शवादी लगें तो भी इस बात में सच्चाई तो है ही कि हर नया संकट अपने साथ नया अवसर भी लेकर आता है. यद्यपि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आने वाला तूफान कुछ न कुछ नुकसान देकर जरूर जाएगा फिर भी ये देखना दिलचस्प होगा कि भारत इसके लिए खुद को किस तरह तैयार करता है ताकि वो न सिर्फ इसे झेल सके बल्कि और भी मजबूत होकर उभर सके.
मॉर्गन हेरिंग्टन के योगदान के साथ.





















