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   लखटकिया चमत्कार, रहेगा बरकरार?
रतन टाटा को उम्मीद है कि एक लाख की नैनो को दोपहिया वाहनों के पांच करोड़ खरीददारों का एक हिस्सा हाथों-हाथ लेगा. लेकिन बढ़ती कीमतें और वक्त पर आपूर्ति ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे दुनिया की इस सबसे सस्ती कार को पार पाना ही पाना होगा. शांतनु गुहा रे और विवेक सिन्हा की रिपोर्ट.
टाटा की लखटकिया कार नैनो की धूम किस कदर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऑटो एक्सपो में हुए इसके लांच में छह कैबिनेट मंत्री और कई बड़े नौकरशाह आना चाहते थे. इतना ही नहीं फिल्म स्टार संजय दत्त आए तो थे मशहूर कार डिजाइनर दिलीप छाबड़िया की लग्ज़री कार एंबीरॉड को लांच करने, मगर नैनो को देखकर कहे बिना नहीं रह सके कि चार करोड़ रुपये कीमत वाली एंबीरॉड की बजाय वो नैनो को तरजीह देंगे. ऑटो एक्सपो में आए आम लोग भी नैनो को देखकर अभिभूत थे. पेशे से मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव विजय संजानी का कहना था, “मैं ये कार लेना पसंद करूंगा, ये अच्छी दिखती है और इसका माइलेज भी बढ़िया है. बात रही प्रदूषण की तो ये किसी मोटरसाइकिल जितना ही है इसलिए मुझे नहीं लगता कि इसे लेकर कोई समस्या होगी.”प्रभावशाली दिखने वाली नैनो भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग की एक और उपलब्धि है. मुझे लगता है कि नैनो का असर केवल कार बाजार पर ही होगा, दोपहिया वाहनों पर नहीं क्योंकि उनकी मौजूदा कीमतें वैसे ही काफी कम हैं. दीर्घावधि में हालांकि महंगे दोपहिया वाहनों की बिक्री पर नैनो जरूर असर डालेगी. अरुण फिरोदिया, चेयरमैन, काइनेटिक ग्रुप |
विशेषज्ञों की मानें तो दुनिया की सबसे सस्ती ये कार एक अरब से ज्यादा आबादी वाले इस देश में एक नया बाजार पैदा करेगी. सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल्स से जुड़े दिलीप शेनॉय कहते हैं, “भारतीयों की बढ़ती आय, नौ प्रतिशत की वृद्धि दर और कार लेने की लालसा इसे कामयाब उत्पाद बनाएगी.” अगुवा रेटिंग एजेंसी क्रिसिल पहले ही कह चुकी है कि नैनो की जो कीमत रखी गई है उसका मतलब है कार खरीदने की सामर्थ्य रखने वाले परिवारों में 65 फीसदी की बढ़ोतरी. हैरानी की बात नहीं कि ये करिश्मा कर दिखाने वाले रतन टाटा की तुलना विशेषज्ञ हेनरी फोर्ड से कर रहे हैं जिनके द्वारा विकसित मॉडल टी अमेरिकी कार बाजार में क्रांति ले आया था. संयोग ही है कि टी, नैनो से ठीक एक सदी पहले यानी 1908 में लांच हुई थी.
खचाखच भरी प्रेस वार्ता में रतन टाटा ने बताया कि नैनो की प्रेरणा उन्हें स्कूटर पर यात्रा कर रहे एक परिवार को देखकर मिली. उनके शब्द थे, “पिता स्कूटर चला रहा था, एक बच्चा उसके आगे खड़ा था, पत्नी पीछे वाली सीट पर एक बच्चे को गोद में लिए बैठी थी.” और तभी उन्होंने फैसला किया कि वो ऐसे लोगों के लिए एक ज्यादा सुरक्षित वाहन बनाएंगे. इसकी परिणति नैनो के रूप में अब पूरी दुनिया के सामने है.
पिछले कुछ समय से भारत में छोटी कारों के बाजार ने दुनिया भर के वाहन निर्माताओं को अपनी तरफ खींचा है. कुशल और सस्ते श्रम की प्रचुरता के चलते कंपनियां भारत में ही ऐसी कारों को बनाने और उन्हें निर्यात करने की सोच रही हैं. दक्षिण कोरिया की ह्यूंदेई, जापान की होंडा, फ्रांस की रेनॉल्ट, जर्मनी की फोक्सवागन और अमेरिका की फोर्ड ऐसी ही कुछ कंपनियां हैं.
एसोचैम का मानना है कि नैनो कार बाजार में कम कीमत की क्रांति का सूत्रपात कर सकती है. मौजूदा दौर में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की छोटी कारों की कीमतें चार लाख रुपये तक जाती हैं. नैनो की निकटतम प्रतिद्वंदी मारुति-800 के शुरुआती मॉडल की कीमत ही करीब 2,15,000 रुपये के करीब बैठती है. एसोचैम के मुताबिक दोपहिया वाहन के खरीददार अब कार लेने के लिए और भी ज्यादा इच्छुक होंगे और भविष्य में छोटी कारों के वर्ग में कई नए खिलाड़ी देखने को मिल सकते हैं.नैनो को विकसित करने के दौरान किए गए 34 उत्पाद आविष्कार दर्शाते हैं कि ऑटोमोबाइल उद्योग में रिसर्च किस तरह का चमत्कार पैदा कर सकती है. हमें शोध एवं विकास के क्षेत्र में और भी ज्यादा निवेश करना होगा और आम लोगों के लिए ऐसे उत्पाद विकसित करने होंगे जिनसे तीसरी दुनिया के दूसरे देश भी लाभ उठा सकें. जगदीश खट्टर, पूर्व प्रबंध निदेशक, मारुति उद्योग |
आलोचक पहले दावा कर रहे थे कि नैनो और कुछ नहीं बल्कि चार पहियों वाली बैलगाड़ी होगी मगर लांच के दिन इस दावे की धज्जियां उड़ गईं. फिर भी टाटा मोटर्स के प्रबंध निदेशक रविकांत मानते हैं कि नैनो की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वो कितनी तेजी से इसका उत्पादन कर पाते हैं.
यही वो मुद्दा है जिस पर सवाल खड़े हो रहे हैं क्योंकि सिंगूर में हाल ही में बने टाटा के कारखाने के खिलाफ अब भी विरोध प्रदर्शन जारी है. इस बारे में पूछे जाने पर रविकांत कहते हैं, “कार फैक्ट्री का मतलब है आसपास के इलाके की आर्थिक उन्नति. अगर सिंगूर के लोगों को नौकरियां नहीं चाहिए तो ये दुख और दुर्भाग्य की बात है. उत्तराखंड के पंतनगर में बने हमारे कारखाने में जाइये और देखिये कि उस शहर और वहां के बाशिंदों की जिंदगी में इससे क्या बदलाव आया है. लेकिन अगर (सिंगूर में) मुश्किलें जारी रहती हैं तो हमारे पास जगह बदलने के अलावा कोई और चारा नहीं होगा.”
विशेषज्ञों को अभी हालांकि कार चलाने का मौका नहीं मिला है लेकिन उनके मुताबिक कार रंग-रूप की पहली परीक्षा में पास हो गई है. बिजोय कुमार कहते हैं, “कार बाहर से शानदार दिखती है.” देश भर में टाटा के कार डीलरों के फोन की घंटी बंद होने का नाम नहीं ले रही. हर कोई नैनो के बारे में पूछ रहा है. ऐसे में गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा वाले भारतीय बाजार में सफलता के लिए कंपनी को नैनो की निरंतर आपूर्ति भी सुनिश्चित करनी होगी. बाजार विशेषज्ञ पी वी फानी कुमार के मुताबिक नैनो की व्यावसायिक सफलता भी उतनी ही अहम चुनौती है जितना कि फोर्ड के प्रतिष्ठित जगुआर और लैंडरोवर ब्रांडों का अधिग्रहण.
लेकिन इससे पहले कि नैनो की सफलता कार उद्योग में कोई बड़ा बदलाव लाए, टाटा मोटर्स को कुछ मुश्किलों के हल तलासने की जरूरत होगी. मसलन उसे ये सुनिश्चित करना होगा कि नैनो के साथ वो दिक्कतें न हों जैसी दस साल पहले इंडिका के बाजार में आने के साथ आई थीं. कोई भी कार विशेषज्ञ आपको बता सकता है कि इंडिका के साथ शुरुआती दौर में काफी दिक्कतें आईं थी जिन्हें बाद के मॉडलों में दुरुस्त किया जाता रहा. यद्यपि नैनो इंडिका की तुलना में काफी सस्ती कार होगी लेकिन इसे खरीदने की चाह रखने वाले ज्यादातर भारतीयों के जीवन में शायद ये घर खरीदने या बेटी की शादी के बाद सबसे महत्वपूर्ण घटना होगी. यही वजह है कि सस्ती कार में बड़ी तकनीकी गड़बड़ियां कंपनी के लिए मंहगी साबित हो सकती हैं.नैनो उनके सपनों को पूरा करेगी जो दोपहिया वाहनों से आगे निकलना चाहते हैं. देखा जाए तो बेहद कम कीमत की वजह से लंबी अवधि में ये भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग का चेहरा ही बदलकर रख सकती है. दिलीप छाबड़िया, ऑटोमोबाइल डिजाइनर |
दरअसल टाटा के लिए असली चुनौती अब शुरू हुई है. कम कीमत में बढ़िया कार लेने का सपना देखने वाले खुश तो हैं लेकिन उनके मन में कुछ चिंताएं भी हैं. जैसा कि धनबाद के राजेश वर्मा कहते हैं, “मुझे पता नहीं कि कीमत कम रखने के चक्कर में गुणवत्ता के साथ किस हद तक समझौता किया गया है. हम आश्वस्त सिर्फ इसलिए हो सकते हैं कि टाटा का नाम मन में भरोसा जगाता है.” वर्मा जैसे कई लोगों के लिए सुरक्षा भी एक मुद्दा है. सामने की टक्कर के लिए नैनो के परीक्षण हो चुके हैं और किनारे से होने वाली टक्कर के लिए परीक्षण चल रहे हैं. इस बात की भी संभावना है कि जब इसका निर्यात होने लगेगा तो इसमें सुरक्षात्मक एयर बैग्स भी लगे होंगे.
एक बड़ा मुद्दा सड़कों पर बढ़ते बोझ का भी है. जाने-माने स्तंभकार थॉमस फ्रीडमैन न्यूयार्क टाइम्स अखबार में लिखते हैं, “भारत को सस्ती कारों की नहीं बल्कि एक अच्छी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की जरुरत है और इसके अभाव में सस्ती कारों से भारत की यातायात समस्या और गंभीर ही होगी.” हैदराबाद में नए-नए बने एक फ्लाइओवर पर ट्रैफिक जाम की घटना का उदाहरण देते हुए फ्रीडमैन हैरानी जताते हैं कि नैनो के आने पर हालात क्या होंगे.
दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट की निदेशक सुनीता नारायणन भी इससे सहमति जताती हैं. वो कहती हैं, “इससे सड़कों पर और भी अव्यवस्था फैल जाएगी. नैनो का मतलब है कि मोटरसाइकिल लेने वाले कई लोग चार पहियों की सवारी में सड़कों पर निकलना चाहेंगे जिसके लिए और भी ज्यादा जगह की जरूरत होगी.” पर्यावरण संगठन ग्रीनपीस का मानना है कि कार उत्पादकों के लिए अहम है कि अपने उत्पाद को बाजार में उतारने से पहले वो प्रदूषण मानकों की अच्छी तरह से जांच करें.
एस्बेस्टस विरोधी लॉबी भी कार के विरोध में सुर उठा रही है. उसकी मांग है कि टाटा ये साफ करें कि क्या वो भी दूसरे भारतीय कार उत्पादकों की तरह नैनो के ब्रेक शू बनाने के लिए एस्बेस्टस का इस्तेमाल कर रहे हैं. जैसाकि एक कार्यकर्ता का कहना था, “दुनिया भर की ऑटो कंपनियां पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए ब्रेक शू में एस्बेस्टस की जगह खास फाइबर ग्लास का इस्तेमाल कर रही हैं और टाटा को इस बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.”
लेकिन फिलहाल तो टाटा ने ये कहकर सबका मुंह बंद कर दिया है कि वो सड़कें भी बनाते हैं और भारत के सबसे बड़े बस निर्माता भी हैं. मारुति उद्योग के पूर्व प्रबंध निदेशक भी अपने इस कट्टर प्रतिद्वंदी के बचाव में कहते हैं, “ये सही है कि बुनियादी ढांचे के स्तर पर हम गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं और ज्यादातर वक्त सड़कों पर जगह नहीं मिलती. मगर ये बताइये कि क्या ट्रैफिक जाम की समस्या से निपटना कार उत्पादक का काम है.”
इस सवाल का जवाब कोई दे या न दे मगर फिलहाल तो लोगों ने दुनिया की सबसे सस्ती कार खरीदने के लिए लाइन लगाना शुरू कर दिया है.
(मॉर्गन हैरिंग्टन के योगदान के साथ)
























