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   आपसी लड़ाई से अकूत कमाई

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लड़ाई हमेशा नुकसान की जड़ होती है मगर अंबानी बंधुओं की चर्चित आपसी लड़ाई और प्रतिद्वंदिता दोनों के लिए फायदे का सबब बन गई है. ये फायदा दोनों भाइयों के साथ बाजार को भी हो रहा है... बता रहे हैं शांतनु गुहा रे.

आज के भारत की बात कीजिए और हर कोई आपको विकास की ऊंची उड़ान के बारे में बताएगा. भारत में आंकड़ों के उछाल और देश के तेजी से बढ़ते सकल घरेलू उत्पाद की पूरी दुनिया में चर्चा है. दुनिया के लिए भारत निवेश का मक्का बन गया है. परमाणु ऊर्जा, पर्यावरण, सूचना-तकनीकी, उद्योग और संचार जैसे मुद्दों पर आत्मविश्वास से भरपूर इस देश की राय अब मायने रखती है और अब भारतीय भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को एक बदले हुए आत्मविश्वास से लबालब नजरिये के साथ देखते हैं.

विकास की चर्चा के बीच जटिल बदलावों के इस परिदृश्य में इस साल दो शख्सियतों की कहानी सुर्खियों में छाई रही. ये कहानी है मुकेश और अनिल अंबानी की. दोनों भाइयों की राहें अब अलग-अलग हैं और ये बात इस कहानी को और भी खास और रहस्यमय बनाती है. बिजनेस पत्रिकाओं में अक्सर उनके फोटो छपते रहते हैं. अहम बैठकों में भी वे हिस्सा लेते नजर आते हैं. अंतरराष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर भी वे दिखते हैं. लेकिन शायद ही कोई ये कह सके कि वो उन्हें सही-सही जानता है. उनके इर्द-गिर्द सैकड़ों अफवाहें घूमती हैं, मसलन पर्दे के पीछे किस तरह वे समानांतर सरकार चलाते हैं, कैसे वे विभिन्न सौदे हासिल करते हैं और कैसे विरोधियों से निपटते हैं. लेकिन उनके बारे में आधिकारिक रूप से बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता.जो करता है वो भी ज्यादा से ज्यादा उनकी फीकी तारीफ ही करता है. लोगों के लिए वो जादुई व्यक्तित्व हैं जो दूसरों की किस्मत जगा रहे हैं. उनकी निजी जिंदगी की कहानी में किसी को भी खास दिलचस्पी नहीं. उनके आंकड़ों की कहानी ही काफी है.

उनके इर्द-गिर्द सैकड़ों अफवाहें घूमती हैं, मसलन पर्दे के पीछे किस तरह वे समानांतर सरकार चलाते हैं, कैसे वे विभिन्न सौदे हासिल करते हैं और कैसे विरोधियों से निपटते हैं. लेकिन उनके बारे में आधिकारिक रूप से बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता. 

महज दो साल पहले यानी 2005 तक दोनों भाइयों की चर्चा बिल्कुल अलग कारणों से हो रही थी. तब दोनों अपने पिता की अभूतपूर्व विरासत के उत्तराधिकार को लेकर लड़ रहे थे. दोनों के बीच कड़वाहट इतनी बढ़ गई थी कि मां कोकिलाबेन को बीच में आना पड़ा था. फिर 2006 का मध्य आते-आते भारी-भरकम रिलांयस इंडस्ट्रीज में बंटवारे की रेखाएं साफ-साफ खींच दी गईं. उस वक्त उद्योग जगत के विश्लेषक भविष्यवाणियां कर रहे थे कि अब दोनों या कम से कम एक भाई की तो कश्ती डूबना तय है. उस एक में भी अनिल अंबानी का नाम लिया जा रहा था जिन्हें बंटवारे में कम हिस्सा मिला था. जानकारों का कहना था कि धीरूभाई तो जादूगर थे मगर उनके बेटों में वो बात नहीं. अब ये अनुमान लगाना मुश्किल है कि वो जानकार किस हद तक गलत साबित हुए हैं.

डूबने की बात तो दूर रही, दोनों भाइयों ने तो जैसे उद्योग जगत की धारा को ही अपने हिसाब से ढाल दिया है. मुकेश और अनिल अंबानी ने आपसी लड़ाई को आपसी प्रतिद्वंदिता में बदल कर डेढ़ साल में ही विकास की वो फर्राटा दौड़ लगाई है कि बड़े-बड़े हैरान हैं. जुलाई 2002 में जब धीरूभाई अंबानी का देहांत हुआ था तो उनके बेटों की कुल संपत्ति 2.8 अरब डॉलर थी. 2005 में बंटवारे के समय दोनों की कुल दौलत का आंकड़ा सात अरब डॉलर था. इस साल फोर्ब्स पत्रिका ने दुनिया के धनकुबेरों की जो सूची छापी है उसमें अकेले मुकेश की संपत्ति 49 अरब डॉलर है जबकि अनिल की 45 अरब डॉलर. पत्रिका के मुताबिक लड़ाई से दोनों को फायदा ही हुआ है. हाल ही में मुंबई में हुए एक आयोजन के दौरान वित्तमंत्री पी चिदंबरम का भी कहना था कि दोनों भाइयों की लड़ाई की फिक्र किसे है जब उनकी आपसी होड़ का बाजार पर सकारात्मक असर पड़ रहा हो.

बात सही भी है. इस साल शेयर बाजार में आई तेजी का 30 प्रतिशत श्रेय दोनों भाइयों को जाता है. यानी मोटे तौर पर देखा जाए तो देश की विकास तालिका का एक तिहाई. 364 म्यूचल फंड योजनाओं का पैसा मुकेश और अनिल अंबानी की मुख्य कंपनियों क्रमश: रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) और रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) में लगा है. ये अब तक का रिकॉर्ड आंकड़ा है. जाने-माने ब्रोकर रमेश दमानी अंबानी बंधुओं को वो सूनामी बताते हैं जिसने सेंसेक्स को रिकॉर्ड 20,000 अंकों तक उछाला है और जो अपने साथ लाभ लेकर आती है.

अंबानी बंधुओं की इस ताकत का राज है शेयर बाजार पर उनका वर्चस्व. आंकडों पर गौर करें तो 25 फीसदी भारतीय निवेशकों के पास रिलायंस के शेयर हैं और बाकी उन्हें खरीदने की इच्छा रखते हैं. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक मध्यवर्गीय भारतीय के मन में रिलायंस की छवि कैसी है.

अनिल अंबानी के साथ अक्सर नरीमन प्वाइंट के समुद्र तट पर दस किलोमीटर की दौड़ लगाने वाले दमानी बताते हैं कि पिछले साल मुकेश अंबानी की आरआईएल में 170 म्यूचल फंड योजनाओं का पैसा लगा था. इस साल ये आंकड़ा बढ़कर 201 पर पहुंच गया. इसी तरह अनिल अंबानी की आरकॉम में पिछले साल 109 म्यूचल फंड्स का पैसा लगा था जबकि इस साल ये संख्या बढ़कर 163 हो गई है.

कुछ और हैरान करने वाले आंकड़ों पर गौर फरमाएं. पिछले तीन महीनों में सेंसेक्स ने 30 फीसदी की छलांग लगाई है. इसी अवधि में मुकेश अंबानी की रिलायंस पेट्रोलियम के शेयरों में 90 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. अनिल अंबानी की रिलायंस एनर्जी के लिए ये आंकड़ा 130 और उन्हीं की रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज के लिए 250 फीसदी रहा. पिछले तीन महीने में अनिल अंबानी की फ्लैगशिप कंपनी आरकॉम के शेयरों में भी 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और इसका बाजार पूंजीकरण 35 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. आरआईएल के शेयरों में 60 फीसदी की उछाल आई है और अब 100 अरब डालर के बाजार पूंजीकरण के साथ यह भारत की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनी बन गई है. 

इस साल शेयर बाजार में आई तेजी का 30 प्रतिशत श्रेय दोनों भाइयों को जाता है. यानी मोटे तौर पर देखा जाए तो देश की विकास तालिका का एक तिहाई. 364 म्यूचल फंड योजनाओं का पैसा मुकेश और अनिल अंबानी की मुख्य कंपनियों क्रमश: रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) और रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) में लगा है.

ये सब बंटवारे के मात्र डेढ़ साल के भीतर ही हो गया है. अब कोई दोनों भाइयों के बीच मनमुटाव की बात नहीं करता. न उनके हर रविवार अपनी मां के साथ नाश्ता करने की चर्चा होती है. व्यापार योजनाओं को लेकर मुकेश की धीमी प्रतिक्रिया और अनिल अंबानी की तीर्थयात्राओं में भी किसी को खास दिलचस्पी नहीं. जैसाकि कंपनियों को रेटिंग देने वाली संस्था क्रिसिल के कृष्णन सीतारमन कहते हैं, “अफवाहों की जगह तरक्की ने ले ली है. फंड मैनेजर पैसा उन शेयरों में लगाना पसंद करते हैं जिनमें जोखिम कम हो और इन दोनों कंपनियों का प्रदर्शन लगातार अच्छा रहा है. लंदन स्थित बीएनपी परीबाज एसेट मैनेजमेंट से जुड़े छारी लोकप्रिय कहते हैं, दोनों भाइयों की बाजार पर पकड़ अद्भुत है. उन्होंने लगातार विकास के नए क्षेत्रों की पहचान की है और उस दिशा में अपना व्यापार विकसित किया है.”

तरक्की के नए क्षेत्रों की पहचान कर उनसे पैसा कमाने के मामले में दोनों भाइयों की प्रतिभा वाकई लाजवाब है. व्यापार की बिसात में पहली चाल चलने के लिए अंबानी परिवार मशहूर रहा है. फोनकॉल की दर को घटाकर 65 पैसे या पोस्टकार्ड की कीमत तक लाना धीरूभाई का ही सपना था. उन्हें अहसास हो गया था कि दूरसंचार उद्योग का भविष्य आम आदमी में ही छिपा है. चोटी तक पहुंचने की दौड़ में आपके उपभोक्ताओं को फायदा होना चाहिए, ये मंत्र उन्होंने ही दिया था. उनके बेटों ने इस मंत्र का पूरी तरह से पालन किया. मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए खास दरें घोषित करने में अनिल अंबानी सबसे आगे रहते हैं. पिछले डेढ़ साल में उन्होंने ऊर्जा, मनोरंजन, होटल, रियल स्टेट और संचार जैसे क्षेत्रों में अपने व्यापार का लगातार विस्तार किया है. दूसरी तरफ मुकेश ने ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी दौड़ जारी रखी है. एक ओर उन्होंने करोड़ों रुपये अपने तेलशोधक कारखानों में निवेश किए हैं तो दूसरी ओर कृष्णा-गोदावरी बेसिन में गैस और तेल के भंडार खोजे हैं. साथ ही वो दुनिया भर में कई अन्य जगहों पर भी तेल की खोज में लगे हुए हैं. खुदरा क्षेत्र में भी उन्होंने छह अरब डालर का निवेश किया है और रिलायंस फ्रेश के नाम से उनके 1500 रिटेल स्टोर्स उपभोक्ताओं के लिए कम दामों की सौगात लेकर आए हैं.

लेकिन कुशाग्रबुद्धि होना ही दोनों भाइयों की कामयाबी का एकमात्र कारण नहीं है. ये कहने की जरूरत नहीं कि इतनी अकूत संपत्ति तब तक नहीं कमाई जा सकती जब तक आप दुनिया को अपने हिसाब से चलाना न सीख लें. दोनों भाई इस मामले में भी बेहद चतुर खिलाड़ी हैं. दो साल पहले जब अंबानी साम्राज्य का बंटवारा हो रहा था तो अफवाहें गर्म थीं कि राजनीतिक पहुंच का बंटवारा करना सबसे मुश्किल मुद्दा है. लोकहित के बजाय निजहित को ज्यादा तरजीह देने वाले इस देश में इसका सही-सही अनुमान लगाना तो मुश्किल है लेकिन इस बंटवारे की कई सीमाओं की झलक समय-समय पर दुनिया को मिलती रही. जब आंध्र प्रदेश में स्थित गैस भंडारों की कीमत के निर्धारण में मुश्किलें खड़ी हुईं तो मुकेश की कंपनी ने इसका दोष कथित तौर पर अनिल के शुभचिंतक माने जाने वाले मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी पर मढ़ा. इसी तरह जब अनिल को हवाई अड्डों, उर्जा और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में अपनी परियोजनाओं में मुश्किलें आई तो कहा गया कि नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल, पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा और दूरसंचार मंत्री ए राजा मुकेश के पाले में हैं. खुद अनिल सार्वजनिक रूप से मुलायम सिंह यादव, सीपीआई नेता ए बी वर्द्धन और सीपीएम के सीताराम येचुरी के साथ दिखते रहते हैं. उधर, मुकेश के बारे में माना जाता है कि वह दस जनपथ के करीबी हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिंदबंरम से उनके अच्छे संबंध हैं.

कुछ के मुताबिक मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह के साथ अनिल की दोस्ती ही मुकेश के साथ उनके संबंधों में कड़वाहट की वजह बनी. इस बारे में पूछने पर अनिल के एक करीबी नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताते हैं, “अनिल दोस्तों के दोस्त हैं. वह या तो पांच मिनट में ही आपके हो जाएंगे या ऐसा कभी नहीं होगा. अगर आप कभी उनसे उनके दोस्तों के बारे में सवाल करेंगे तो उनका भी सवाल होगा, ‘क्या मैंने आपसे पूछा है कि आप किससे मिलते हैं और क्यों मिलते हैं.’” काम और दोस्ती के सहारे आगे बढ़ने वाले भाईयों की छाया देश के राजनीतिक पटल पर साफ महसूस की जा सकती है. उनके बारे में अक्सर कहा जाता है कि वो पर्दे के पीछे व्यापार नीति को अपने हितों के हिसाब से ढलवाने में माहिर हैं. ये आदर्शवादियों और प्रतिस्पर्द्धियों को भले ही नागवार गुजरे मगर उनके शेयरधारकों की खुशी का एक बड़ा सबब दरअसल यही है.

फोनकॉल की दर को घटाकर 65 पैसे या पोस्टकार्ड की कीमत तक लाना धीरूभाई का ही सपना था. उन्हें अहसास हो गया था कि दूरसंचार उद्योग का भविष्य आम आदमी में ही छिपा है. चोटी तक पहुंचने की दौड़ में आपके उपभोक्ताओं को फायदा होना चाहिए, ये मंत्र उन्होंने ही दिया था. उनके बेटों ने इस मंत्र का पूरी तरह से पालन किया.

फिलहाल दोनों के बीच एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी है. उनके सहकर्मियों और जानकारों के मुताबिक दोनों भाइयों की तरक्की के अंधड़ को एक-दूसरे से बेहतर साबित होने की ये होड़ ही सबसे ज्यादा हवा दे रही है. जब बंटवारा हुआ था तो दोनों भाइयों में सहमति हुई थी कि पांच साल तक वे एक-दूसरे के व्यापारिक क्षेत्रों में अपने हाथ नहीं आजमाएंगे. ये सहमति एक साल में ही हवा हो गई. दोनों भाईयों ने हाईप्रोफाइल ‘मुंबई ट्रांस हार्बर सी प्रोजेक्ट’ के लिए बोली लगाई है. भारत में अपनी तरह की इस पहली परियोजना के तहत समुद्र में बनने वाले पुल द्वारा सेवरी आईलैंड को नवी मुंबई से जोड़ा जाएगा. मुंबई हवाई अड्डा विकास परियोजना के लिए भी दोनों ने बोली लगाई है. साथ ही अनिल दुनिया भर मे तेल के क्षेत्रों को खरीदने में भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं.

साल की शुरुआत में मुकेश अपने सिपहसालारों के साथ जब रात के नौ बजे किसी चर्चा में लीन थे, तभी खबर आई कि अनिल ने एक महीने के अंदर मुकेश और उनके कर्मचारियों को धीरूभाई अंबानी नॉलेज सेंटर (डीएकेसी) से बेदखल करने का फैसला किया है. बंटवारे में डीएकेसी अनिल को मिला था लेकिन इसे पूरी तरह से खाली करने के लिए 2008 तक की समयसीमा दी गई थी. अब अनिल जल्दबाजी में थे. जगह की मारामारी वाले मुंबई शहर में एक महीने के भीतर 1200 कर्मचारियों के लिए जगह का बंदोबस्त नामुमकिन जैसा था. मुकेश का खुद का कॉर्पोरेट पार्क, जो यहां से आधा किलोमीटर की दूरी पर था, अभी निर्माणाधीन ही था. लेकिन दोनों में से कोई भी हार का आदी नहीं है. मुकेश उस रात देर तक ऑफिस में रुके. तीन हफ्तों के अंदर- ठीक 22 दिन में- 1200 रिलायंस कर्मचारी छह किलोमीटर दूर एक नए ऑफिस में पहुंचा दिए गए.

लेकिन इस होड़ के कई सकारात्मक पहलू भी देखने को मिलते हैं. महीने भर पहले मुकेश की कंपनी ने गोदावरी बेसिन में गैस के एक नए कुएं की खोज की और उसके अगले ही दिन अनिल न्यूयॉर्क के होटल स्टारवुड होटल्स एंड रिज़ॉर्ट्स के साथ अपने बहुचर्चित ब्रांड ‘सेंट रेजिज़’ की लांचिंग के लिए बातचीत कर रहे थे. अनिल की रिलायंस कम्युनिकेशन अगले दो सालों के दौरान अपने बीपीओ कार्यक्रम को विस्तार देने जा रही है- वर्तमान 7,800 कर्मचारियों से बढ़ाकर 30,000 कर्मचारी करने का लक्ष्य है. (नैस्कॉम के मुताबिक वर्तमान में 5,53,000 कर्मचारियों वाले भारतीय बीपीओ उद्योग का निर्यात वर्तमान के 6.3 बिलियन डॉलर से बढ़कर 11 बिलियन डॉलर होने की उम्मीद है)

दोनों भाई अपने पिता के ही नक्शे क़दम पर हैं- दोनों में ही मुसीबत से निपटने की अद्भुत क्षमता है--जिसकी वजह से ये होड़ और भी जटिल हो गई है. 2007 दोनों भाइयों की मुसीबतों से जंग का गवाह बना. मुकेश यूपी और झारखंड में अपनी रिटेल चेन को लेकर परेशान हैं तो अनिल जीएसएम मार्केट में वोडाफोन और एयरटेल से जूझ रहे हैं. मजे की बात ये है कि दोनों के तौर-तरीके भी कमोबेश एक जैसे ही हैं. कोई भी समूह अगर एक दिन तनाव से घिरा दिख रहा हो तो ये पक्का जान लीजिए कि अगले दिन दुनिया के किसी और हिस्से में वो एक बड़ी डील को अंजाम दे रहे होंगे.

कुछ उदाहरण देखिए- बेंगलौर के एक वकील द्वारा मुकेश के व्यापारिक मूल्यों पर सवाल खड़ा करने वाली किताब लॉन्च होने के 24 घंटे बाद ही आरआईएल के वाइस प्रेसीडेंट ईवीएस राव ने घोषणा की कि उनकी कंपनी अगले पांच सालों के दौरान तेल और गैस की खोज में 1700 करोड़ रूपए का भारी भरकम रकम निवेश करेगी. बाज़ार ने पहली ख़बर को नज़रअंदाज़ किया लेकिन दूसरी ख़बर के आते ही हरकत में आ गया. इसी तरह अनिल ने नवंबर में पहले से ही जारी स्पेक्ट्रम वार को संचार मंत्री ए राजा को पत्र लिखकर और भी मजबूती दी. उन्होंने जीएसएम ऑपरेटरों पर स्पेक्ट्रम के अतिक्रमण का आरोप लगाया. देश की नंबर दो टेलीकॉम कंपनी--जो देश के 23 में से 21 ज़ोन में सीडीएमए सेवा प्रदान कर रही है--ने इसके कुछ ही दिनों बाद ये घोषणा की कि कंपनी अगले कुछ सालों में सात करोड़ नई जीएसएम लाइनें बिछाने का ऑर्डर दे रही है जिसकी कीमत 5.6 अरब डॉलर है और वो इसकी कीमत--जो वर्तमान में 80 डॉलर प्रति लाइन है--से घटा कर 50 डॉलर प्रति लाइन करने की कोशिश में है. जाहिर है शेयरों में इससे उछाल आना ही था.

लेकिन दोनों में से कोई भी हार का आदी नहीं है. मुकेश उस रात देर तक ऑफिस में रुके. तीन हफ्तों के अंदर- ठीक 22 दिन में- 1200 रिलायंस कर्मचारी छह किलोमीटर दूर एक नए ऑफिस में पहुंचा दिए गए. 

आश्चर्य की बात नहीं कि तमाम रिलायंस कंपनियों के शेयरों में जबर्दस्त उछाल है और इससे दोनों अंबानी बंधुओं की कुल संपत्ति का आंकड़ा 100 अरब डॉलर के काफी करीब पहुंच गया है. वरिष्ठ विश्लेषक एसपी तुलसियन कहते हैं, "इन कंपनियों के शेयरों की कीमत मूलभूत बाज़ारी सिद्धांतों को दरकिनार कर बढ़ रही है. लेकिन ये तेज़ी अच्छे मुनाफे की अफवाहों और विस्तार की योजनाओं की वजह से दोनों के लिए बढ़ रही है." 

"ये लोग व्यवस्था को अपने हिसाब से, अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने में माहिर हैं. बदलती सरकारों ने अविभाजित रिलायंस को फायदा पहुंचाने के लिए नीतियां बदली, और अब यही काम बंटे हुए रिलायंस के लिए भी हो रहा है. बिरला परिवार का मामला अभी भी अदालत में है, बजाज परिवार में तनाव अक्सर सुर्खियों में रहता है लेकिन आप इन दोनों भाइयों के बैरभाव से जुड़ी एक लाइन भी नहीं देखेंगे. हो सकता है किसी ने उन्हें ये सलाह दी हो कि भले निजी स्तर पर लड़ते रहो मगर व्यापार करते रहो," कहते हैं जनहित मामलों के वकील प्रशांत भूषण जो सालों से कंपनी के क्रियाकलापों पर नज़र रखते आ रहे है और उनकी कई योजनाओं पर सवाल भी खड़े कर चुके हैं. उन्होंने आज तक कभी ऐसा नहीं देखा कि अंबानी पर आरोप लगाने वालों के खिलाफ उन्होंने कभी कोई मानहानि का मामला दायर किया हो. प्रशांत के मुताबिक शायद इस तरह की परेशानियों से निपटने के लिए उनके पास कोई और बेहतर तरीका हो.

दोनों भाइयों की कार्यशैली की अंदरूनी जानकारी रखने वाले एक और शख्स हैं सामाजिक कार्यकर्ता संजय कौल. ऐसे समय में जब टाटा जैसी नामी गिरामी कंपनियां अपनी योजनाओं को लेकर सामाजिक अवरोधों के लिए ख़बरों में थी रिलायंस ने आश्चर्यजनक रूप से खुद को ऐसे झमेलों से दूर रखा. हाल ही में जब एसईज़ेड के लिए ज़मीनों के अधिग्रहण पर हरियाणा और पंजाब के किसान विरोध पर उतर आए तब कमान आरआईएल के अधिकारियों ने संभाली. उन्होंने गांव के किसानों के साथ कई-कई घंटे बिताए और उन्हें आश्वस्त किया कि उन्हें अपनी ज़मीनों के लिए (जिसे किसानों को सरकार ने सस्ते दामों पर दी थी) चिंतित होने की जरूरत नहीं है, उनकी कीमतें बढ़ जाएंगी। "इसके बाद मैंने किसी विरोध के बारे में नहीं सुना। मुझे ये नहीं पता कि उन्होंने एसईज़ेड में सबको नौकरियां देने का वादा किया है या नहीं," कौल बताते हैं.

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि दोनों भाई उछाल, बाज़ार की भावना, और दुनिया को अपने हिसाब से कैसे मोड़ना है इन चीज़ों की अच्छी समझ रखते हैं. अभी तक दोनों ने कई मौकों पर अपने पिता के तमाम गुणों जैसे दृढ़ता, सही समय पर सही फैसले, दूरदृष्टि, सहज बुद्धिमत्ता और व्यापारिक मूल्यों के प्रति लचीले नज़रिए का प्रदर्शन किया है.

लेकिन उनकी व्यक्तिगत विशेषताएं क्या हैं? भविष्य में जब उनकी आपसी जंग से उन्हें मिलने वाली ऊर्जा थोड़ा कम हो जाएगी तो ऐसा क्या है जो उनमें उत्साह भरेगा? इसे ठीक-ठीक बताने का ख़तरा कोई शायद ही उठाए लेकिन कुछेक घटनाएं ज़रूर इस दिशा में इशारा करती हैं.

मुकेश, प्रफुल्ल पटेल के शब्दों में, "बेकार के कामों में अपना वक्त जाया नहीं करते और उनका ध्यान बस काम, काम और काम पर होता है." ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति द्वारा अर्जित की गई असंभव संपत्ति के पीछे यही नज़रिया काम कर रहा है. इस साल मुकेश बिल गेट्स, वारेन बफेट और कार्लोस स्लिम को पीछे धकेल कर दुनिया के सबसे बड़े धनकुबेर बनने के लिए चर्चा में रह चुके हैं. अपनी पत्नी को 250 करोड़ रूपए की कीमत वाला अत्याधुनिक जेट विमान उपहार में देने और दक्षिणी मुंबई में 27 मंज़िला इमारत (इसमें 370 नौकर, 6 मंज़िला कार पार्किंग, हेलीपैड होगा) के लिए भी सुर्खियों में हैं. अगर कोई उनके बारे में जानने के लिए ज्यादा उत्सुक है तो अगर मुकेश आज से हर दिन एक करोड़ रूपए खर्च करना शुरू करें तब भी उनकी सारी दौलत खर्च होने में कम से कम 400 साल लग जाएंगे. एड गुरू अलिक़ पद्मसी के मुताबिक, "मुकेश फैरो (मिश्र के राजा) की तरह है जो एक के बाद दूसरे पिरामिडों की श्रृंखला बनाता जा रहा है, ये इतने बड़े हैं कि लोग पिछले वाले को भूल जाते हैं." 

मुकेश ने दिल्ली के मशहूर एडमैन सुहेल सेठ को फोन करके दुख जताया, "अख़बार वाले कब जानेंगे कि ऐसी ख़बरों से मुझे खुशी नहीं होती? मैं चाहता हूं कि इसकी बजाय अख़बार वाले मेरे विचारों पर, मेरी योजनाओं को स्थापित करने में आ रही अड़चनों के बारे में लिखें।"

लेकिन अजीब ये है कि ये फैरो अपनी दौलत का भद्दा प्रदर्शन नहीं करता. जब बिल गेट्स और बफेट को पछाड़ कर दुनिया का सबसे बड़ा अमीर बनने की ख़बर सुर्खियां बन रही थी तो मुकेश ने दिल्ली के मशहूर एडमैन सुहेल सेठ को फोन करके दुख जताया, "अख़बार वाले कब जानेंगे कि ऐसी ख़बरों से मुझे खुशी नहीं होती? मैं चाहता हूं कि इसकी बजाय अख़बार वाले मेरे विचारों पर, मेरी योजनाओं को स्थापित करने में आ रही अड़चनों के बारे में लिखें।" एजेंसियों पर ख़बर प्रसारित होने के कुछ ही मिनटों के बाद, आरआईएल ने एक छोटा सा स्पष्टीकरण जारी किया जिसमें कहा गया था कि गणना करने में चूक हुई है. बाद में शेयरहोल्डर्स के साथ मीटिंग में भी मुकेश ने ये मुद्दा उठाया. मुकेश ने कहा, "मेरी व्यक्तिगत संपत्ति को लेकर मीडिया में कई तरह की ख़बरें उड़ रही हैं. सही कहूं तो मैं मज़ाक बन गया हूं। मेरे लिए ये बात कोई मायने नहीं रखती कि मेरी संपत्ति अरबों में है या फिर करोड़ों में."

छोटे भाई अनिल थोड़ा दूसरी मिट्टी के बने हैं. कुछ मायनों में उन्हें काफी कुछ साबित करना अभी बाकी है. पिता की पहचान छीने जाने के बाद वो अपनी अलग पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं--अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप. मैकन, जेडब्ल्यूटी, प्रॉफिट और अमेरिकन ब्रांड स्ट्रेटजी समूह के साथ कुल छह एजेंसियां उनकी पहचान स्थापित करने के काम में लगी हुई है. मेगास्टार अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन उनके ब्रांड अंबेसडर हैं. महेंद्र सिंह धोनी भी हैं. विश्लेषक कहते हैं अनिल की कंपनी अपने भीतर पुरानी कंपनी के सभी गुणों को समेटे हुए है- आकार, स्थायित्व और बेहतर प्रदर्शन की क्षमता. इसके साथ इसने जो अतिरिक्त विशेषता जोड़ी है वो है इसकी युवा उत्साही छवि जो दुनिया पर छा जाने की कोशिश में है. "बड़ा सोचो", कंपनी का जादुई मंत्र बन चुका है. अपने एफ एम चैनल की ब्रांडिग के लिए अनिल ने इसी जादुई मंत्र का सहारा लिया. एड एजेंसियों ने इसे “रेडियो मैंगो” नाम दिया था मगर अनिल ने इसे “बिग एफएम” बना दिया और इसके प्रसार अभियान की अगुवाई भी उन्होंने ही की. 'सुनो सुनाओ लाइफ बनाओ', इसकी टैग लाइन है, और लगता है कि ये लाइन दोनों भाइयों को ही बराबर फायदा पहुंचाए जा रही है.  

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 3

  • प्रेषक : the unholy grail
    is story me padane jaisa hai kya??
  • प्रेषक : yashu gandhi
    good n motivating story
  • प्रेषक : Awaaz
    kahin ka int kahin ka roda, Guha rey ne story joda. waise ye inki purani aadat rahi hai.