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विजय का विश्वास

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सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं, भारत में क्रिकेट के प्रशंसक भी एक अहम मनोवैज्ञानिक बाधा के पार निकल आए हैं, बता रहे हैं सुरेश मेनन

1971, लॉर्ड्स का मैदान. भारत-बनाम इंग्लैंड टेस्ट. पहली पारी में इंग्लैंड पर बढ़त लेने के बाद भारत को दूसरी पारी में जीतने के लिए 38 रन चाहिए थे. दो विकेट उसके हाथ में थे जिनमें फॉर्म में चल रहे एकनाथ सोल्कर भी थे. याद नहीं कि कमेंटेटर कौन था पर बेंगलुरू में अपने मर्फी रेडियो सेट के आसपास बैठे हम लोगों को उसने सूचना दी कि बारिश शुरू हो गई है. हमारे यहां हजारों लोगों ने सड़कों पर निकल कर खुशियां मनानी शुरू कर दीं. जनता इंद्र देवता से प्रार्थना कर रही थी कि बारिश जारी रहे. हमारी मुराद पूरी हुई. मैच बारिश में धुल गया. अगले दिन अखबारों ने एक कार्टून प्रकाशित किया जिसमें लंदन में एक बस ड्राइवर बस चलाने से इनकार कर रहा था क्योंकि उस बस का रूट नंबर 38 था. हमें यह देखकर मजा आया. हार टल जाने की वजह से हमारे चेहरे खिल उठे थे. वह दौर ऐसा था कि हार से बच जाना ही सबसे बड़ी जीत थी.

इसके कई साल बाद तक भी हालात ऐसे रहे. मुझे याद है कि ऐसे ही किसी एक मैच में ड्रेसिंग रूम में बैठे कप्तान अजित वाडेकर नाचे तो नहीं पर उन्होंने बारिश का शुक्रिया जरूर अदा किया था. खिलाड़ियों, मीडिया और प्रशंसकों, सभी का मानना था कि अगर बारिश नहीं होती तो भारत हार जाता. चार दशक बाद लगता है जैसे एक चक्र पूरा हो चुका है. इस विश्वकप के फाइनल में 31 रन पर अपने दो सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज गंवाने के बाद 70 का दौर देख चुके हमारी पीढ़ी के लोग जहां हार तय मान बैठे थे वहीं टीवी के सामने डटी नौजवान पीढ़ी का हाल इससे बिलकुल उलट था. मेरे बेटे ने तो शर्त लगाते हुए कहा कि भारत न सिर्फ जीतेगा बल्कि बेहद आसानी से जीतेगा. मेरा बेटा तेंदुलकर के जमाने का क्रिकेट प्रशंसक है- आत्मविश्वास से ओत-प्रोत और अपनी क्रिकेट टीम में पूरा भरोसा रखने वाला. वह अपने उस पिता से बिलकुल जुदा है जिसके जेहन में अनिश्चितता और मौके पर आकर चूक जाने की तमाम यादें भरी पड़ी हैं. संभावनाओं के बावजूद मौके पर ढह जाने की यादें.

भारतीय क्रिकेट से ज्यादा क्रिकेटरों के मुरीद हैं. किसी रणजी ट्रॉफी मैच में दर्शकों की उपस्थिति ही देख लीजिए

सवाल उठता है कि क्या वास्तव में वह युग बीत गया है. वह युग जब अच्छी स्थिति में होने के बावजूद मन में हार का डर बैठा रहता था.  वह दौर जब प्रशंसकों के मन में उम्मीदों की जगह चिंता हावी रहती थी, जब ऐसा होता था कि 10 ओवर में 10 रन बनाने हों और 10 विकेट हाथ में हों तो भी यह डर बना रहता था कि ये लोग कुछ न कुछ गड़बड़ कर ही देंगे.
1932 में भारत ने पहला टेस्ट मैच खेला था. इंग्लैंड के खिलाफ खेलते हुए उसने पहले आधे घंटे में ही 19 रन पर इंग्लैंड के तीन विकेट गिरा दिए थे. बावजूद इसके उन्होंने इंग्लैंड को खुद पर हावी होने का मौका दिया और नतीजा यह निकला कि भारत 158 रनों से हार गया. इसके अगले 20 साल में एक पीढ़ी आकर चली भी गई लेकिन भारत के खाते में कोई जीत दर्ज नहीं हुई. इस दौरान सीके नायडू, मोहम्मद निसार, अमर सिंह, विजय मर्चेंट जैसे कुछ खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत प्रदर्शन के जरिए जरूर चमक बिखेरी लेकिन टीम की उपलब्धियों के नाम पर दिखाने के लिए कुछ नहीं था.

यह ऐसा दौर था जब प्रशंसकों की उम्मीदें छोटी हुआ करती थीं- 'हे भगवान, मर्चेंट का पचासा बनवा दो' या 'सीके को कुछ छक्के मार लेने दो'. पचासे बन गए, छक्के लग गए और प्रशंसक खुश. भारतीय जीतने की उम्मीद ही नहीं रखते थे. मकसद ज्यादा से ज्यादा यही होता था कि हार सम्मानजनक हो. कभी-कभी वह भी मयस्सर नहीं होती थी. मैनचेस्टर में हुए एक टेस्ट में फ्रेड ट्रूमैन और एलेक बेडसर की जोड़ी ने एक ही दिन में भारतीय टीम को दो बार निपटा दिया था. पहली बार 58 और दूसरी बार 98 के स्कोर पर. सुनील गावस्कर नाम की अद्वितीय प्रतिभा के आगमन के साथ स्थितियां बदलनी शुरू हुईं. हम उन मैचों को ड्रॉ करवाने के स्वप्न देखने लगे थे जिन्हें हम अतीत में आसानी से हार जाते थे.
अब हम तीसरे चरण में हैं. तेंदुलकर युग में. हम एक ऐसा मुल्क बन चुके हैं जिसे खुद पर यकीन है. हार की चिंता की जगह जीत के भरोसे ने ले ली है. आज हमारी चिंता जीत के अंतराल को लेकर रहती है.  ऐसा नहीं कि हम हारते नहीं. कभी-कभी हम हारते भी हैं, लेकिन अब जीत के प्रति हमारे मन में एक विश्वास होता है. अब इसी विश्वकप को लीजिए. टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही भारत इसका दावेदार था और उसने विश्वकप जीता भी.

सुनील गावस्कर जिन 125 टेस्ट मैचों में खेले उनमें से भारत को 23 मैचों में जीत मिली. लेकिन ड्रॉ मैचों का आंकड़ा रहा 68 मैच यानी 54 फीसदी. यही हाल एकदिवसीय मैचों के मोर्चे पर भी था. 1983 के विश्वकप में भारत के उदय के बावजूद गावस्कर द्वारा खेले गए 108 एकदिवसीय मैचों में पराजयों की संख्या विजयों से ज्यादा थी. तेंदुलकर ने सब बदल दिया. टेस्ट मैचों में उनकी हार-जीत का आंकड़ा 61-46 है और एकदिवसीय मैचों में 230-195. उनके बाद क्रिकेटरों की एक पूरी पीढ़ी तैयार हो चुकी है जिसके हिस्से में सकारात्मक उपलब्धियां अधिक हैं. महेंद्र सिंह धोनी कहते हैं कि उन्होंने 2003 के विश्वकप फाइनल में तेंदुलकर के आउट होने के बाद टीवी बंद कर दिया था. जैसे तेंदुलकर को बैटिंग करते हुए देखना राष्ट्रीय जुनून है उसी तरह उनके आउट होने पर टेलीविजन बंद कर देना भी कुछ समय पहले तक राष्ट्रीय परंपरा का हिस्सा हुआ करता था. 

साहस के साथ हार स्वीकारने से लेकर सम्मानजनक ड्रॉ और अब अवश्यंभावी जीत तक के इस मुकाम तक पहुंचने के लिए भारतीय क्रिकेट ने एक लंबी यात्रा तय की है. 2003 के विश्वकप फाइनल में हारने वाली भारतीय टीम मौजूदा विजेता टीम से बेहतर थी. लेकिन तब तक इस महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक बाधा को न तो खिलाड़ी पार कर पाए थे और न ही उनके प्रशंसक.
भारत में क्रिकेट का प्रशंसक होने का परंपरागत मतलब रहा है तनाव, दबाव और आशंका से जूझना. ऐसा सिर्फ तीन ही बार हुआ कि जिस मैच में अपने युग के महानतम बल्लेबाज गावस्कर ने शतक बनाया उसी मैच में महानतम मैच जिताऊ गेंदबाज बीएस चंद्रशेखर ने भी एक पारी में पांच विकेट लिए हों. यानी वह सामूहिक प्रदर्शन दुर्लभता से ही देखने को मिला जो किसी टीम को अजेय बनाता है. इसलिए प्रशंसक टोटकों की शरण लेते रहे. कोई जीत की मनौती पूरी होने पर बाल मुंडवाता तो कोई शाकाहारी बन जाता. जैसे-जैसे क्रिकेट में बदलाव हुए हैं उसी तरह से प्रशंसकों में भी परिवर्तन आए हैं. भारतीय प्रशंसकों के बारे में यह बात बार-बार कही जाती रही है कि वे क्रिकेट की बजाय क्रिकेटरों के मुरीद हैं. रणजी ट्रॉफी मैचों में दर्शकों की उपस्थिति से आप इसका अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं. दर्शक दीर्घा में तीन आदमी और एक कुत्ता बस यही उपस्थिति होती है और कभी-कभी एक आदमी जब कुत्ते को टहलाने के लिए निकल जाता है तो दर्शकों की संख्या में अचानक 50 फीसदी की गिरावट आ जाती है.
जिस दौर में गुंडप्पा विश्वनाथ बल्लेबाजी की नयी परिभाषा लिख रहे थे उस समय स्थानीय लीग मैचों में भी उनकी बल्लेबाजी देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था. मुझे याद है कि एक टेनिस बॉल मैच में उनकी बल्लेबाजी देखने के लिए मैंने साइकिल उधार ली और लंबी दूरी तय करके मैच देखने पहुंचा. वहां जाकर मुझे पता चला कि वे मैच खेल नहीं रहे थे बल्कि मैच के मुख्य अतिथि थे. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ा.

उस दौर में प्रशंसकों के लिए कोई गारंटी नहीं थी. अनिश्चितता अकसर बेहद निराशाजनक होती थी. उन दिनों प्रशंसक हर तरह के टोटकों और मनौतियों का सहारा भले ही लेते थे मगर अंदर ही अंदर सबको यह एहसास होता था कि वे हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं.
तेंदुलकर और धोनी ने उस सोच को धो दिया है. चिंता भरी धुकधुकी से आत्मविश्वास के मौजूदा दौर तक पहुंचने तक तीन चरणों का यह सफर तय करने में कई दशक लगे हैं. हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि अब भारत सभी मैच जीतेगा, लेकिन यह जरूर है कि प्रशंसकों को जीत की खुशियां मनाने के लिए अब पहले जितना नहीं तरसना पड़ेगा.  

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