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प्रेम, राजनीति और नेहरू-गांधी परिवार

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भारतीय राजनीति के शीर्ष पर खड़ा एक ऐसा परिवार जिसने अकसर राजनीति के आगे प्रेम को तरजीह दी. प्रियदर्शन का आलेख

भारत के सार्वजनिक जीवन में नेहरू-गांधी परिवार की उपस्थिति इतनी व्यापक रही है कि उसे प्रेम जैसे संदर्भ में याद करने के अपने कई खतरे हैं. सबसे बड़ा खतरा जानी-पहचानी सूचनाओं और तरह-तरह के अतिरेकी निष्कर्षों के जाल में फंसने का है. फिर इस परिवार की निजता का इतनी बार उल्लंघन हुआ है कि उसकी कथाओं में कुछ भी गोपनीय नहीं रह गया है. उल्टे इन पर तथ्यों से ज्यादा कल्पना की धूल चढ़ चुकी है.
मिसाल के तौर पर, जवाहरलाल नेहरू और एडविना माउंटबेटन के प्रेम प्रसंग पर कई तरह की चर्चाएं रहीं. 1980 में रिचर्ड हफ ने माउंटबेटन की जीवनी लिखते हुए पहली बार इसे तथ्य के रूप में स्वीकार किया, हालांकि माउंटबेटन परिवार ने तत्काल इसका खंडन किया. बाद में माउंटबेटन के दामाद लॉर्ड ब्रेबॉर्न ने नेहरू और एडविना के बीच हुए पत्र-व्यवहार और उनके जीवनीकारों फिलिप जीग्लर और जेनेट मोर्गन का हवाला देते हुए कहा कि नेहरू और एडविना के बीच कभी कुछ शारीरिक नहीं रहा.

एक और लेखिका एलेक्स वॉन तंजेलमान की किताब ‘इंडियन समर, द सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ द एंड ऑफ एन एंपायर’ से यह विवाद कुछ और तीखा हो गया. तब किताब पर आधारित एक फिल्म बनाई जा रही थी जिसकी स्क्रिप्ट पर भारत सरकार ने आपत्ति जताई और स्क्रिप्ट में मौजूद चुंबन, नृत्य और साथ लेटने के दृश्य हटाने की मांग की. हालांकि यह फिल्म बन नहीं सकी. फ्रेंच लेखिका कैथरीन क्लेमेंट ने नेहरू और एडविना के प्रसंग पर पूरा उपन्यास लिख डाला और दावा किया कि एडविना ने माउंटबेटन को लिखे एक पत्र में कहा था कि नेहरू से उनके रिश्ते ज्यादातर प्लेटॉनिक- आध्यात्मिक- थे. ‘ज्यादातर’ का मतलब था कि निश्चय ही दोनों के बीच करीबी संबंधों के मौके आए होंगे.

बहरहाल इस संबंध में निहित ऊष्मा, आत्मीयता और द्वंद्व को समझे बगैर नेहरू-विरोधी अक्सर इसे नेहरू के चरित्र की किसी भारी विसंगति की तरह पेश करते हैं. वे यहां तक आरोप लगाते हैं कि इस रिश्ते की वजह से कश्मीर, पंजाब और बंगाल बंट गए. इस अतिवादी निष्कर्ष में न इतिहास की समझ दिखती है, न व्यक्ति की. निश्चय ही नेहरू के व्यक्तित्व के अपने कई अंतर्विरोध थे जिनका एक सिरा उनकी राजनीति से जुड़ता है तो दूसरा उस निजी ज़िंदगी से जिसमें पत्नी कमला नेहरू के साथ उनके संबंधों में अपनी तरह की दूरी बताई जाती रही. आखिरी दिनों में कमला नेहरू की बीमारी ने नेहरू विरोधियों को जैसे यह कहने का अधिकार सुलभ करा दिया कि नेहरू ने उनकी उपेक्षा की थी. अब इस उपेक्षा के साथ एडविना के प्रेम प्रसंग को जोड़ दें तो नेहरू का वह खलनायकत्व संपूर्ण हो जाता है. जाहिर है, इन संबंधों की निजता और नजाकत की परवाह किए बिना इनके बारे में टिप्पणी करने वालों को उनके राजनीतिक-सामाजिक पूर्वाग्रह संचालित करते रहे हैं.

वैसे इस पूर्वाग्रह के निशाने पर जितना नेहरू रहे, उससे कहीं ज़्यादा उनकी बेटी इंदिरा गांधी रहीं. इंदिरा गांधी ने फिरोज गांधी से प्रेम किया और फिर पिता की मर्जी के विरुद्ध जाकर विवाह किया. बताते हैं कि फिरोज और इंदिरा की मुलाकात मार्च, 1930 में हुई थी जब आजादी की लड़ाई के क्रम में एक कॉलेज के सामने धरना दे रही कमला नेहरू बेहोश हो गई थीं और फिरोज गांधी ने उनकी देखभाल की थी. संयोग से यह सिलसिला काफी आगे तक गया. फिरोज भुवाली के टीबी सैनिटोरियम में कमला नेहरू के साथ रहे और जब कमला इलाज के लिए यूरोप गईं तो वहां भी उन्हें देखने पहुंचे. 1936 को जब कमला नेहरू का देहांत हुआ तब भी फिरोज गांधी उनकी मृत्युशैया के पास थे. शायद फिरोज गांधी के भीतर सेवा और संवेदना का यह नितांत आत्मीय तत्व था जिसने युवा इंदिरा को उनकी ओर आकृष्ट किया होगा. मार्च, 1942 में आखिरकार उन्होंने शादी कर ली. नेहरू ने भी अंत में इसे अपनी स्वीकृति दी. इसके तत्काल बाद भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ जिसमें पति-पत्नी ने जेल भी काटी.

हालांकि बाद के दौर में यह रिश्ता जटिल हुआ. कहना मुश्किल है, पति और पिता के निजी और राजनीतिक संबंधों के बीच बंटी इंदिरा गांधी वह संतुलन नहीं बैठा पाईं, या उनकी निजी जिंदगी में ऐसे झंझावात आए कि तीस के दशक में परवान चढ़ा प्रेम धीरे-धीरे परस्पर खिन्नता की तरफ बढ़ता गया. 1949 में इंदिरा गांधी अपने बच्चों को लेकर पिता का घर संभालने चली आईं जबकि फिरोज लखनऊ में बने रहे. 1952 में रायबरेली से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद फिरोज दिल्ली आ गए, लेकिन तब भी इंदिरा जवाहरलाल नेहरू के आवास तीन मूर्ति भवन में ही बनी रहीं. हालांकि फिरोज गांधी का चुनाव अभियान रायबरेली जाकर इंदिरा गांधी ने ही संभाला था.

बाद के वर्षों में यह दूरी कुछ और बढ़ी जब राजनीतिक विवादों ने नेहरू और फिरोज गांधी को आमने-सामने ला खड़ा किया. 1956 में फिरोज गांधी ने तब देश के सबसे अमीर लोगों में एक रामकिशन डालमिया का घपला उजागर किया जो सरकार के बहुत करीब थे. डालमिया को दो साल की जेल हुई. इसके फौरन बाद 1958 में फिरोज ने चर्चित हरिदास मूंदड़ा घोटाला उजागर किया तो एक बार फिर नेहरू सरकार की काफी किरकिरी हुई. मूंदड़ा को जेल जाना पड़ा और वित्त मंत्री टीटी कृष्णमचारी को इस्तीफा देना पड़ा.

इस एक फैसले से वे भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी, सबसे ऊपर हो गईं. राजीव गांधी के प्रेम का इससे बेहतर प्रतिदान और क्या हो सकता है

हालांकि एक साल बाद ही फिरोज गांधी को दिल का दौरा पड़ा. इस दौर में फिर इंदिरा गांधी ने उनकी देखभाल की. लेकिन 1960 में दूसरे दिल के दौरे के साथ फिरोज चल बसे और आजादी की लड़ाई के समय परवान चढ़ी एक प्रेमकथा अपने अनिश्चित और धुंधले अंत के साथ खत्म हो गई.
फिरोज और इंदिरा गांधी के दोनों और एक-दूसरे से काफी अलग मिजाज के बेटों ने भी प्रेम विवाह किया- संजय गांधी ने मेनका के साथ और राजीव गांधी ने सोनिया के साथ. यह देखना बेहद दिलचस्प है कि इन दोनों जोड़ियों का अपनी पारिवारिक विरासत के साथ क्या रिश्ता रहा.

कहते हैं, मेनका जब सिर्फ 17 साल की थीं तब बॉम्बे डाइंग के एक विज्ञापन में उन्हें देख संजय उनकी तरफ आकृष्ट हुए. महज एक साल बाद उन्होंने मेनका से शादी कर ली. संजय गांधी दुस्साहसी और महत्वाकांक्षी नौजवान थे जिन्होंने अपनी मां की सत्ता का भरपूर इस्तेमाल किया. एक दौर में संजय और मेनका देश के दो सबसे ताकतवर नौजवान थे जिनके इशारों पर सरकार चलती थी. इमरजेंसी के दौर की ज्यादतियों और इंदिरा गांधी के पतन के लिए भी संजय को जिम्मेदार बताया जाता रहा. हालांकि कई लोग 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी का श्रेय भी संजय को देते रहे. 23 जून 1980 को दिल्ली में एक विमान हादसे में संजय गांधी की मौत हो गई. कुछ ही समय के बाद मेनका अपनी सास से नाराज होकर अपने छोटे-से बेटे वरुण का हाथ थामे घर से निकल गईं. इसके बाद तो मेनका और वरुण जीवन और राजनीति की राहों पर इतने दूर और अलग हो चुके हैं कि यह याद करना अजीब-सा लगता है कि कभी यह परिवार इंदिरा और नेहरू-गांधी की विरासत संभालने का सबसे आक्रामक दावेदार था.

दूसरी तरफ इंदिरा और संजय गांधी के रहते राजीव गांधी विमान चलाकर खुश थे. 1965 में कैंब्रिज के एक रेस्टोरेंट में उनकी सोनिया गांधी से मुलाकात हुई थी. तीन साल बाद, 1968 में उन्होंने सोनिया से शादी कर ली. यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं कि देश के सबसे ताकतवर घराने का सबसे बड़ा बेटा होते हुए भी राजीव की सत्ता में दिलचस्पी नहीं थी. उनकी पत्नी सोनिया भी खुद को इन सबसे दूर रखना चाहती थीं. जब 1977 में इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं तब यह अफवाह भी उड़ाई गई कि राजीव इटली जाकर बस सकते हैं. 1980 में संजय गांधी की मौत के बाद इंदिरा आखिरकार उन्हें राजनीति में ले आईं. सोनिया ने ख़ुद स्वीकार किया है कि वे इस फैसले के पूरी तरह खिलाफ थीं और नहीं चाहती थीं कि राजीव राजनीति में आएं. लेकिन आखिरकार उन्होंने महसूस किया कि नेहरू-गांधी परिवार में होने की कुछ क़ीमत तो उन्हें अदा करनी ही पड़ेगी.

और यह कीमत एक लिहाज से काफी महंगी साबित हुई. 1984 में इंदिरा गांधी की आकस्मिक मौत हो गई और राजनीति में नितांत अनुभवहीन राजीव गांधी ने देश की कमान संभाल ली. फिर 1991 में 21 मई का वह दिन भी आया जब श्रीपेरुंबदूर की एक सभा में मौत माला लिए आई, उनके पांव के पास झुकी और फट गई.

सोनिया गांधी इसके बाद बिल्कुल अकेली थीं- दो छोटे-छोटे बच्चों राहुल और प्रियंका का हाथ थामे. उन्होंने खुद को राजनीति से दूर रखने की कोशिश की. पूरे सात साल उन्होंने दस जनपथ का वह दरवाजा बंद रखा जो कांग्रेस मुख्यालय में खुलता है. लेकिन सोनिया घर के दरवाजे बंद कर सकती थीं, उस नियति और विरासत के नहीं जिसके साथ वे जाने-अनजाने जुड़ चुकी थीं.

इसके बाद का सफर भी कम नाटकीय नहीं है. उनके राजनीति में आने पर संदेह जताया गया, उनके विदेशी मूल पर सवाल उठे, उनकी हिंदी की खिल्ली उड़ाई गई,  उन्हें कमजोर बताया गया. लेकिन 2004 आते-आते तस्वीर बदल चुकी थी. 2004 में यूपीए को मिली चुनावी कामयाबी ने यह सुनिश्चित कर दिया कि वे देश की प्रधानमंत्री बनेंगी. उनके समर्थन में राष्ट्रपति को चिट्ठियां तक चली गईं. उनके विरोध में सुषमा स्वराज और उमा भारती जैसी नेत्रियों ने बाल मुंडाने तक के एलान कर दिए.

लेकिन इन सबके बीच बिल्कुल आखिरी लम्हे में सोनिया मुड़ीं, उन्होंने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री पद नहीं चाहिए. अब इस फैसले की बहुत तरह से व्याख्या होती है. चापलूस कांग्रेसी संस्कृति इसे सोनिया के त्याग और उनकी महानता के बहुत सतही और कभी-कभी भोंडे बखान में बदल डालती है. विरोधी इसे ऐसा चालाकी भरा कदम बताते हैं जिसके बाद सोनिया सुपर प्रधानमंत्री हो गईं.

लेकिन शायद वह झिलमिलाता हुआ लम्हा एक बहुत मानवीय लम्हा है. उस लम्हे में सोनिया गांधी को अपना पूरा भारतीय अतीत याद आया होगा, राजीव गांधी याद आए होंगे, सत्ता की ताकत और उसकी सीमाएं याद आई होंगी, इसका नशा और वह विडंबना भी याद आई होगी, जिसने एक ओर नेहरू-गांधी परिवार को देश का सबसे ताकतवर परिवार भी बनाया और दूसरी ओर सबसे वेध्य भी. शायद ये सारे धागे कहीं ज्यादा मजबूत साबित हुए- सत्ता का मोहपाश कम से कम उस घड़ी में सोनिया को नहीं बांध सका. इस एक फैसले से वे भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी, सबसे ऊपर हो गईं. राजीव गांधी के प्रेम का इससे बड़ा प्रतिदान और क्या हो सकता है.

नेहरू-गांधी परिवार की यह प्रेम कहानी और आगे बढ़ चुकी है. प्रियंका ने रॉबर्ट वाड्रा से विवाह किया है. राहुल गांधी को लेकर तरह-तरह की अटकलें चलती रही हैं. लेकिन इन सबके बीच कम से कम दो-तीन बातें साफ हैं. एक तो यह कि जीवन अलग-अलग खानों में पूरी तरह बंट नहीं पाता. ऐसा संभव नहीं है कि प्रेम अपनी जगह रहे, राजनीति अपनी जगह. निजता अपनी जगह और सार्वजनिकता अपनी जगह. सब एक-दूसरे में घुसपैठ करते हैं- जीवन और रिश्तों का रसायन शायद बनता भी इसी तरह है. फिर जब आप एक ऐसे परिवार से हों जिस पर पूरे देश की निगाह रहती हो तो निजता बार-बार खंडित होती है, रिश्ते बार-बार कसौटी पर चढ़ाए जाते हैं और अकसर अलग-अलग ढंग से उनकी कीमत चुकानी पड़ती है. नेहरू-गांधी परिवार ने भी यह कीमत चुकाई- आपसी रिश्तों की चुभन से लेकर बाहरी चर्चाओं तक की छाया उनके प्रेम पर पड़ी.

लेकिन इसमें शक नहीं कि उन्होंने सरहदें तोड़ीं, प्रेम किए, जोखिम उठाए और अंततः अपनी शर्तों पर जीते रहे, जी रहे हैं.

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