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मीडिया मजूरी

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कुकुरमुत्तों की तरह उग आए ज्यादातर समाचार चैनलों की हालत खराब है. उनमें काम करने वालों की दशा उससे भी ज्यादा खराब है. तो क्या भारत में समाचार चैनलों की क्रांति अब इतिहास बनने के रास्ते पर है? अतुल चौरसिया की रिपोर्ट.

बात साल 2005 की सर्दियों की है. एक महिला पत्रकार अपनी मॉर्निंग शिफ्ट के लिए तड़के पांच बजे नोएडा स्थित एक समाचार चैनल के दफ्तर पहुंची थीं. पता नहीं क्यों उनका इलेक्ट्रॉनिक कार्ड काम ही नहीं कर रहा था. इसके बिना कड़कड़ाती ठंड में गेट पर मौजूद चौकीदार उन्हें अंदर ही नहीं जाने दे रहे थे. पूछताछ करने पर पता चला कि उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है. उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वे वापस अपने घर जा सकें. दुख इस बात का तो था कि नौकरी गई मगर जिस तरह से ऐसा किया गया था वह बेहद अपमानजनक था. किसी तरह उन्होंने अपने एक सहयोगी से संपर्क साधा जिसने उन्हें घर जाने के लिए पैसे दिए. आज वे एक न्यूज चैनल में वरिष्ठ एंकर हैं. ढाई हजार महीने की नौकरी में इस तरह के दुर्दिन महीने के आखिरी पंद्रह दिन में देखना उस समय हिंदी समाचार चैनलों के रंगरूटों के लिए आम बात थी. मगर स्थितियां आज भी बदली नहीं हैं.

हाल ही में घटी महुआ न्यूजलाइन की घटना कई न्यूज चैनलों के अंदर फैली अराजकता का एक दुखद उदाहरण है. चैनल के दो निदेशकों, पीके तिवारी और अभिषेक तिवारी, को सीबीआई ने गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है. दोनों पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर 17,00 करोड़ रुपये का कर्ज लिया और बाद में इसका भुगतान करने से भागते रहे. इसके कुछ दिन बाद ही महुआ समूह के एक चैनल महुआ न्यूजलाइन को प्रबंधन ने बंद करने की घोषणा कर दी. चैनल के 122 कर्मचारियों को अगले दिन से कार्यालय नहीं आने की सूचना जारी कर दी गई. बाहरी केंद्रों के रिपोर्टरों की संख्या इसमें जोड़ दें तो यह संख्या होती है 232. प्रबंधन के एकतरफा और मनमाने फैसले पर पत्रकारों का गुस्सा फूट पड़ा. नतीजा यह हुआ कि न्यूज रूम में ही सारे पत्रकार धरने पर बैठ गए. अगले चार दिन तक उनका उठना, बैठना, सोना सब वहीं होता रहा. पच्चीस से तीस साल के युवा लड़के-लड़कियां बिना कुछ खाए-पिए चार दिन तक न्यूज रूम में ही अनशन करते रहे. रामबहादुर राय और पंरजय गुहा ठाकुरता जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने इनके समर्थन में वहां सभाएं कीं.

उस समय तक कर्मचारियों को जून और जुलाई महीने का वेतन नहीं मिला था और चैनल ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था. उनकी दो मांगें थीं, एक तो दो महीने का बकाया वेतन उन्हें मिलना चाहिए और एक महीने का अतिरिक्त वेतन बतौर क्षतिपूर्ति दिया जाए क्योंकि चैनल ने उन्हें बिना किसी नोटिस के बाहर का रास्ता दिखाया था. अंतत: महुआ प्रबंधन को इस अहिंसक विरोध के सामने घुटने टेकने पड़े. उस समय पूरा देश अन्ना के अनशन के ज्वार में भी था. चैनल ने उनकी मांगंे मान लीं. इस तरह विरोध खत्म हुआ. 100 स्ट्रिंगरों के मामले में चैनल का रवैया अब भी साफ नहीं है. महुआ से बुरी खबरों का आना थम नहीं रहा. 20 अगस्त को महुआ बिहार चैनल से लगभग साठ लोगों को बाहर करने का फरमान प्रबंधन ने सुना दिया है. अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि प्रबंधन असल में अपना मीडिया का पूरा कारोबार ही समेटने की फिराक में है. यानी आने वाले कुछ दिनों में एक बार फिर से पत्रकारों की बड़ी संख्या बेरोजगार होने वाली है. खबरिया चैनलों की दुनिया ऐसी घटनाओं से भरी पड़ी है जब एक झटके में सौ, दो सौ या तीन सौ लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. वॉयस ऑफ इंडिया की घटना बहुत मशहूर है. जब चैनल बंद हो गया, कई दिनों तक कर्मचारी धरना-प्रदर्शन करते रहे, मारपीट की स्थितियां बन गईं, फिर सब अपनी राह चले गए क्योंकि कुछ हुआ ही नहीं.

खुली व्यवस्था अपनाने के बाद हमारे देश में तमाम उद्योग-धंधों के साथ खबरों का बाजार भी खूब गर्म हुआ. टेलीविजन न्यूज चैनलों की बाढ़ आ गई है. लोग कहते हैं कि मीडिया बहुत 'ताकतवर' हो गया है. आज तीन सौ से ज्यादा न्यूज चैनल हैं. सौ से ज्यादा हिंदी के, बाकी अंग्रेजी और स्थानीय भाषाओं के. तमाम दूसरे गर्भावस्था में हैं. इस ऊपर से ताकतवर लगने वाले मीडिया की नाड़ी, भुजाएं, दिल, दिमाग, स्नायु, नेत्र, अस्थि, मज्जा भी क्या उतने ही ताकतवर हैं? जवाब अपनी पूरी जटिलता के साथ हमारे सामने आता है. न्यूज चैनलों का पूरा अर्थशास्त्र ही गड़बड़ाया हुआ है. सारे बड़े चैनलों की बैलेंस शीटें घाटे के ताल में गोता लगा रही हैं. बड़े चैनलों की हालत तो ठीक-ठाक है, मगर छोटे चैनलों की बेहद खस्ता है. शीर्ष के 4-5 चैनलों में कर्मचारियों की संतुष्टि का स्तर कुछ हद तक ठीक है मगर छोटे चैनलों के कर्मचारियों को दो-दो, तीन-तीन महीने तक तनख्वाह नहीं मिलती. उनकी 12-12 घंटे की शिफ्ट होती है, कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता, तीन-तीन साल तक न तो कोई प्रमोशन मिलता है और न ही तनख्वाह में  बढ़ोतरी होती है. इसका असर टीवीकर्मियोंे की सेहत पर भी पड़ा है. अतिशय काम का लगातार तनाव, आपसी स्पर्धा, टीआरपी की मारामारी में लोग 25-30 जैसी कम उम्र में ही हाई बीपी, डाइबिटीज, इन्सोम्निया जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. ऐसी स्थितियों में काम करने वाला पत्रकारी जीव दुनिया की नजरों में सच्चाई, ईमानदारी, बराबरी और अधिकार की पताका ढो रहा है. न्यूजब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और साधना न्यूज चैनल के प्रमुख एनके सिंह के शब्दों में, 'न्यूज चैनल मुनाफे का धंधा नहीं है.' पर सच्चाई यह है कि इसके बावजूद लोग इस धंधे में आने को व्याकुल हैं.

उतनी ही बड़ी सच्चाई यह भी है कि इस व्याकुलता की कीमत हजारों छोटे, निचले स्तर के पत्रकार, कैमरामैन और तकनीकी विभागों में काम करने वाले लोग चुका रहे हैं. एक चैनल है इंडिया न्यूज. पिछले महीने इस चैनल में बड़ी विचित्र घटना घटी. यहां काम करने वाले पत्रकार बताते हैं कि यहां महीने की बीस तारीख के बाद तनख्वाह का आना मृत्यु जैसा सत्य है. लेकिन पिछले महीने कुछ और हुआ. 20 तारीख को सिर्फ उन कर्मचारियों की तनख्वाह आई जो दस हजार रुपये प्रति माह से कम की पगार पर काम करते हैं. फिर महीने की 22 तारीख आई जब 20 हजार रुपये तक पगार वालों को वेतन मिला. इससे ऊपर वालों का इंतजार अभी जारी था. फिर खबर आई कि 25 तारीख को उन लोगों की आधी पगार आई जो 20 हजार से ज्यादा पाते है. बाकी की आधी तनख्वाह तीस तारीख के बाद आई. कई शिफ्टों में आई पगार की यह कहानी निश्चय ही पत्रकारिता की दंतकथाओं का हिस्सा बनेगी. मगर यह कहानी का अंत नहीं है. जब चैनल के कर्मचारी वेतन रूपी मानसून के सूखे से जूझ रहे थे लगभग उसी समय चैनल के मुखिया कार्तिकेय शर्मा अंग्रेजी के एक बड़े चैनल न्यूज एक्स की खरीद की घोषणा कर रहे थे. इतना ही नहीं, शहर में चर्चा चल रही थी कि वे अपने इस नए 'ब्लूआइड बेबी' के लिए कई बड़े अंग्रेजी पत्रकारों से बातचीत की प्रक्रिया में थे. यह खबरों की दुनिया का दुखद विरोधाभास है. कार्तिकेय कहते हैं, ‘यह सच नहीं है. दो-चार लोगों को कोई परेशानी हो सकती है इसका यह अर्थ नहीं है कि सारे लोग असंतुष्ट हैं. ऐसा किसी भी इंडस्ट्री में हो सकता है.’ वेतन की बंदरबांट का लगभग ऐसा ही नजारा पिछले महीने खबर भारती नामक समाचार चैनल में भी पिछले महीने दिखा.

दूसरी श्रेणी के चैनलों में एक और नाम है लाइव इंडिया का. यही वह चैनल है जो उमा खुराना नाम की शिक्षिका का फर्जी स्टिंग ऑपरेशन चलाकर उनकी हत्या की व्यवस्था लगभग कर चुका था. यहां दो महीने पहले यह स्थिति थी कि तीन महीने से कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं मिली थी. एक चैनल है एटूजेड. चैनल के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि यह चैनल आसाराम बापू के आशीर्वाद से चल रहा है. इसी चैनल के एक पत्रकार यहां की दुर्दशा कुछ इस तरह बयान करते हैं, ‘जो आप चाहते वह यहां कर ही नहीं सकते. जो बापू और उनके भक्त चाहते हैं, वही यहां होता है. यह धनपशुओं की दुकान है. वेतन हमेशा एक महीने देर से मिलता है. हम लोग उधारी पर जीवन काट रहे हैं. लोग यहां जनसत्ता, एनडीटीवी जैसी जगहों से नौकरी छोड़कर आए थे. अब पछता रहे हैं.’ स्थितियां बड़े चैनलों में भी बहुत सुखद नहीं हैं. साल 2008 की मंदी में एनडीटीवी जैसे प्रतिष्ठित चैनल ने बड़ी संख्या में पत्रकारों की छंटनी की थी और कर्मचारियों के वेतन कम कर दिए थे. हालांकि इस छंटनी में छांटे गए लोगों को समुचित मुआवजा दिया गया था. एक और बड़ा नाम है सहारा समय. इस चैनल के गैरपेशेवर कामकाजी माहौल की चर्चा इसकी खबरों से कहीं ज्यादा होती है. एक तरफ यह चैनल सात लाख रुपये प्रति माह पर पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे पत्रकार को नौकरी देकर नए कीर्तिमान तय करता है तो दूसरी तरफ चैनल के दूसरे और तीसरे दर्जे के पत्रकारों और कर्मचारियों की तनख्वाह में तीन-तीन बार कैंची चलाई जाती है. इंडिया टीवी जैसे नंबर वन की दौड़ में रहने वाले समाचार चैनल में भी पिछले दो साल से कर्मचारियों की तनख्वाह में बढ़ोतरी नहीं हुई है. कुछ समाचार चैनल अपनी महिला पत्रकारों को कानूनी तौर पर अनिवार्य मैटर्निटी लीव तक की सुविधाएं देने से मना कर देते हैं.

चैनलों का अस्तित्व में आना और उनका मुनाफे में तब्दील होना दो अलग स्थितियां हैं. महज कुछ महीनों पहले तक हर वह व्यक्ति न्यूज चैनल का लाइसेंस पा सकता था जिसकी जेब में तीन करोड़ रुपये और एक पीआईबी कार्डधारक पत्रकार हो. अक्टूबर, 2011 में जाकर सरकार ने न्यूज चैनल के लाइसेंस के लिए नेट वर्थ क्राइटेरिया तीन से बढ़ाकर 20 करोड़ किया है. हालांकि सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों की मानें तो अब भी लाइसेंस की इच्छा रखने वालों की कतार छोटी नहीं हुई है. कार्तिकेय के शब्दों में, ‘हर इंडस्ट्री में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. पर मीडिया सनराइज सेक्टर है. भविष्य में यहां ग्रोथ की संभावनाएं प्रबल हैं. समस्या सरकारी नीति के स्तर पर है. इसने थोक के भाव में लाइसेंस बांट दिए हैं.’ एक अन्य चैनल मौर्य के मालिक प्रकाश झा इतने आशावादी नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘आज तक मैंने यहां एक भी रुपया कमाया नहीं है, सिर्फ गंवाया है. पर मुझे इस बात का अहसास था कि यह मुनाफे का धंधा नहीं है.’

चैनलों के इस धंधे के तीन अहम किरदार हैं और इनमें से नायक जैसा एक भी नहीं. जाहिर है नायकों की अनुपस्थिति वाले इस खेल में आपाधापी और अराजकता तो रहेगी ही. पहला किरदार सरकार है. सरकार के पास आज भी कोई मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं है. यहां मॉनिटरिंग का अर्थ है लाइसेंस की मॉनिटरिंग. वह लाइसेंस देने के बाद भूल जाती है कि उसके द्वारा दिए गए लाइसेंस का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है. छोटे बजट के कई चैनलों का कार्यभार संभाल चुके पत्रकार अनुरंजन झा कहते हैं, 'सरकार तीन करोड़ या बीस करोड़ में लाइसेंस बेचने के बाद पल्ला झाड़ लेती है. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि जिसे उन्होंने लाइसेंस दिया है उसके पास चैनल चलाने के लिए बाकी 80 करोड़ रुपये हैं या नहीं. इस खामी ने मीडिया में काले धन को बढ़ावा दिया है. लाइसेंस का दुरुपयोग हो रहा है. पचास फीसदी से ज्यादा चैनलों के पास अपना लाइसेंस नहीं है. वे दूसरों के लाइसेंस किराये पर लेकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. सरकार को भी यह बात पता है. पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों, जिनके ऊपर लाइसेंस का दुरुपयोग रोकने की जिम्मेदारी है, उनकी जानकारी में यह काम चल रहा है.'

दूसरे किरदार हैं चैनलों के मालिक. उन मालिकों के दिन लद गए जिनका मुख्य काम ही मीडिया हुआ करता था. दूसरे धंधों में लगे लोगों ने तेजी से मीडिया के धंधे में हाथ डाला है. चैनलों की बाढ़ में बढ़ गए मालिकों की प्रोफाइल एक मजेदार ट्रेंड की ओर इशारा करती है. मुख्यत: तीन तरह के लोग बड़ी संख्या में इसमें घुसे हैं - रियल एस्टेट, चिट फंड कंपनी और राजनेता उनके रिश्तेदार. ये तीनों ही विवादग्रस्त क्षेत्र हैं. यहां मीडिया उनके लिए तारणहार बनकर अवतरित होता है. मीडिया ऐसे लोगों को तात्कालिक ताकत पहुंचाता है. इस ताकत के लालच में लोग खिंचे चले आते हैं. उदाहरण के तौर पर, एक बार फिर से इंडिया न्यूज को ही लीजिए. यह चैनल हरियाणा के ताकतवर राजनेता विनोद शर्मा का है. ये वही विनोद शर्मा हैं जिनके बेटे मनु शर्मा को मीडिया की सक्रियता के चलते जेसिका लाल की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है. अब वे खुद इसी बिरादरी का हिस्सा हैं. उनके पास दो क्षेत्रीय और एक राष्ट्रीय चैनल है, आज समाज नाम का अखबार है. खबरिया चैनलों की अर्थव्यवस्था पर मंडी में मीडिया नाम की किताब लिख चुके मीडिया क्रिटिक विनीत कुमार कहते हैं, 'यह धंधा गलत लोगों के लिए सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करता है. हर तरह की गड़बड़ी में लिप्त लोग मीडिया फ्रेटर्निटी का हिस्सा बन जाते हैं. फिर मीडिया इनके ऊपर बात करने से कतराने लगता है. जब सुरक्षित नौकरियां भाप बनकर उड़ गई हों तब कौन इनसे दुश्मनी लेकर अपनी संभावनाएं खत्म करेगा.'

निहित स्वार्थों के तहत मीडिया में आ रहे लोगों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि यह उनका मुख्य धंधा नहीं होता. वे अपने दूसरे धंधों को कवच देने के लिए मीडिया के व्यवसाय में आ रहे हैं. हाल ही में इसका अभद्र नमूना गीतिका आत्महत्या कांड में देखने को मिला. जिन गोपाल गोयल कांडा के पर गीतिका को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप है, वे हरियाणा के गृह राज्यमंत्री थे और बड़े व्यवसायी हैं. इनका भी अपना न्यूज चैनल है- हरियाणा न्यूज. जब देश भर का मीडिया कांडा को अपराधी, भगोड़ा और अय्याश साबित कर रहा था तब उनका अपना चैनल उन्हें महान समाजसेवी और गरीबों के मसीहा के रूप में प्रस्तुत कर रहा था. जाहिर है यह काम पत्रकार बिरादरी के लोग ही कर रहे थे. कहने का अर्थ है कि मीडिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता भी कहीं न कहीं इस हड़बोंग में बेमानी हो गई है. ऐसे लोगों की चांदी हो गई है जिनकी जेब में पैसा है और वे तथाकथित विवादित धंधों में लगे हुए हैं. उनकी प्राथमिकताओं में दूर-दूर तक किसी पत्रकार या कर्मचारी का कल्याण है ही नहीं. ऐसे चैनलों की गिनती बड़ी है जो अस्तित्व में हैं किंतु किसी ने उन्हें देखा तक नहीं है.

तीसरा किरदार उन महत्वाकांक्षी पत्रकारों का है जो इस खेल के सबसे बड़े खलनायक हैं. इनके स्तर पर गैरजिम्मेदारी और गड़बड़ियां कहीं ज्यादा बड़ी हैं. ये अपने पीआईबी कार्ड का एक तरह से दुरुपयोग करते हैं. वे मोटे जेब वाले मालिकों को अधपकी जानकारियां देकर उन्हें 'धंधे' में उतारने का सब्जबाग दिखाते हैं. मीडिया ट्रेंड से जुड़ी वेबसाइट समाचार फॉर मीडिया चलाने वाले अनुराग बत्रा इस पर विस्तार से रोशनी डालते हैं, 'यह छोटा-मोटा धंधा नहीं है. अगर आपके पास 100 करोड़ का बजट हो और चार-पांच साल तक इंतजार करने का धैर्य तभी इस धंधे में आएं. आज बड़े पत्रकार मालिकों को 20-30 करोड़ रुपये में चैनल दौड़ा देने का ख्वाब दिखा देते हैं. नतीजा होता है कि साल भर के भीतर चैनल हांफने लगते हैं. इसकी कीमत कौन चुकाता है, नीचे के लोग, छोटे कर्मचारी.' हाथी खरीदना और उसे खिला पाना दो अलग-अलग बातें हैं. टीवी न्यूज का धंधा ऐसा ही है. यह प्रतिदिन लाखों के हिसाब से रुपया हजम करता है. फिर तीन से चार साल बाद कहीं जाकर धीरे-धीरे फल देना शुरू करता है. अब जिन मालिकों को पत्रकारों ने आधी-अधूरी जानकारी देकर धंधे में उतार दिया है वे चैनल लॉन्चिंग के बाद ही सकते में आ जाते हैं. विजिबिलिटी की समस्या उन्हें घेर लेती है. चैनल का मतलब ही क्या जब वह कहीं दिखे ही नहीं. यहां उनका सामना केबल और डिश ऑपरेटरों के गिरोहनुमा समूह से होता है. यहां एक तरह से चैनल बंधक बन जाते हैं. इनसे केबल और डिश ऑपरेटर उगाही करते रहते हैं और 'ताकतवर' मीडिया उनके सामने गिड़गिड़ाता रहता है. बिना इस गिरोह को चढ़ावा चढ़ाए आपका चैनल कहीं नजर नहीं आएगा. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर हुए एक शोध के मुताबिक शीर्ष के चार-पांच न्यूज चैनलों का डिस्ट्रीब्यूशन बजट ही लगभग पचास करोड़ रुपये सालाना है. छोटे या क्षेत्रीय चैनलों के लिए यह लागत बीस करोड़   रुपये के आस-पास बैठती है. यहां डिश और केबल वालों का पूरा शरीर घी-शहद में डूबा हुआ है. वे दर्शकों से भी मासिक कीमत वसूलते हैं और चैनलों से भी. लगभग सभी चैनल फ्री-टू-एयर हैं. यानी न तो इन्हें दर्शकों से कुछ मिलता है न ही डिस्ट्रीब्यूशन वालों से. जितने में चैनल लॉन्च हुआ है, उतना डिस्ट्रीब्यूशन के लिए लगाने की बात सुनते ही मालिक का माथा खराब हो जाता है. इस खराब माथे को दुरुस्त करने के लिए सलाहकारों की मंडली तरह-तरह के उपाय लेकर आती है. वह कॉस्ट कटिंग की सलाह देती है, जिसके नतीजे में जब-तब पच्चीस, पचास, सौ लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है, इतने पर भी बात नहीं बनती तो तनख्वाह लटका दी जाती है, कम से कम लोगों से ज्यादा से ज्यादा काम लेने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है, नतीजतन छुट्टियों, कामकाजी घंटों आदि की अवधारणा ही यहां नष्ट हो जाती है. जब इस तरह की मानसिकता में चैनल जी रहे  हों तब प्रमोशन, इन्क्रीमेंट जैसी चीजें तो बांस के उन फूलों सरीखी हैं जो चालीस साल बाद यदा-कदा फूलते हैं. इसका एक परिणाम हिंदी समाचार चैनलों पर आ रहे ऊल-जुलूल कार्यक्रमों के रूप में भी दिखाई देता है.

इस अव्यवस्थित माहौल में चैनल की आय का जरिया सिर्फ  विज्ञापन होता है. विज्ञापनों की दशा यह हुई है कि 2000 में जब आधे घंटे का आज तक आता था तब विज्ञापन की दर 80,000 रुपये प्रति दस सेकंड तक हुआ करती थी. आज यह घटकर 2,000 रुपये प्रति दस सेकंड तक आ गिरी है. यह कमाल चैनलों की भीड़ का है. बाजार की भाषा में कुछ आंकड़ों पर नजर दौड़ाएंगे तो आप पाएंगे कि खबरिया चैनलों की दुनिया कितनी क्षणभंगुर है. ये आंकड़े मीडिया और मनोरंजन जगत पर हर साल सबसे बड़ा तुलनात्मक अध्ययन करने वाली संस्था केपीएमजी-फिक्की के हैं. अपनी निष्कर्ष रिपोर्ट में संस्था लिखती है, 'दर्शकों की तुलना में समाचार चैनलों को मिल रहा विज्ञापन राजस्व दोगुना है.' कहने का अर्थ है कि मनोरंजन, फिल्म, संगीत और इन्फोटेनमेंट चैनलों के मुकाबले न्यूज चैनलों पर जितने दर्शक आते हैं उसका दोगुना पैसा इन्हें मिलता है. जब पैसे का ही सारा खेल है तब आज नहीं तो कल बाजार के विशेषज्ञों की नजर इस भेदभाव की तरफ जाएगी और तब न्यूज चैनलों के लिए हालात और दुश्कर होंगे. रिपोर्ट आगे भी कहती है, 'साल 2011 न्यूज चैनलों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है. न्यूज चैनलों के संचालन की लागत तो इस दौरान बढ़ी है लेकिन विज्ञापन राजस्व जहां का तहां अटका है. एक नहीं पिछले तीन साल के दौरान विज्ञापनों की दर में स्थिरता बनी रही है. इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है. न्यूज चैनलों के राजस्व में बढ़ोतरी की संभावनाएं भी बहुत सीमित हैं. दर्शकों की संख्या में बड़े परिवर्तन ला पाना संभव नहीं है. न्यूज चैनलों के लिए स्थितियां कठिन होने वाली हैं.'

चैनलों को ले-देकर सिर्फ विज्ञापन का आसरा है. लेकिन इसका अपना अलग ही खेल है. विज्ञापन यानी आय का सारा बंदोबस्त टैम नामक कंपनी के इशारों पर होता है. यह कंपनी टीआरपी रेटिंग तय करती है जिसके आधार पर विज्ञापनदाता कंपनियां अंधश्रद्धा के साथ चैनलों को विज्ञापन देती हैं. ज्यादा टीआरपी ज्यादा विज्ञापन की गारंटी है. लेकिन टैम का चोला भी उतरने लगा है. ज्यादातर चैनलों के मुखिया अब इसकी जकड़ से मुक्त हो जाना चाहते हैं. एनके सिंह कहते हैं, 'चैनलों को जल्द से जल्द टैम के चंगुल से निकलना होगा. इसकी पूरी प्रक्रिया खामियों से भरी है.' अब जिन छोटे चैनलों की विजिबिलिटी ही नहीं है या जो वितरकों की मुंहमांगी मुराद पूरी नहीं कर सकते उन्हें टीआरपी रेटिंग क्या मिलेगी. और टीआरपी रेटिंग नहीं मिलेगी तो विज्ञापनदाता उनकी तरफ क्यों देखेगा. इस तरह छोटे चैनल अपनी मौत मरने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

टैम की खामियों की बात करें तो देश भर में टैम के सिर्फ 8,150 मीटर लगे हैं. इनकी भी समस्या यह है कि आठ हजार मीटरों का वितरण उल्टा-सीधा है. दिल्ली जैसे छोटे राज्य में 100 से ज्यादा मीटर लगा दिए गए हैं, बिहार में साल भर पहले एक मीटर लगाया गया है,  झारखंड को दो मीटर के लायक समझा गया है और जम्मू-कश्मीर की हैसियत एक की भी नहीं है. इस अंड-बंड वितरण के दम पर टैम सवा अरब लोगों का मूड भांप लेने का दावा करता है. विज्ञापनदाता पूरी श्रद्धा से उसका अनुसरण कर लेते हंै.  टैम की दूसरी गड़बड़ियां भी अब सामने आने लगी हैं. हाल ही में एनडीटीवी ने टैम की मातृ कंपनी नील्सन के पर न्यूयॉर्क की अदालत में साढ़े सात हजार करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति का दावा ठोंका है. एनडीटीवी का आरोप है कि टैम के अधिकारी भारत में कुछ लोगों से मिलीभगत करके टीआरपी के आंकड़ों में हेराफेरी करते हैं. बदले में टैम के लोग घूस लेते हैं. टैम की गड़बड़ियां कुछ स्तरों पर नंगी आंखों से देखी जा सकती हैं. आज भी देश में सबसे ज्यादा पहुंच डीडी न्यूज की है. ग्रामीण इलाकों में जहां केबल की पहुंच नहीं है वहां आज भी डीडी न्यूज और डीडी नेशनल खबरों और मनोरंजन के बेताज बादशाह हैं. पर टैम की रेंटिंग में ये आज तक अपनी जगह नहीं बना पाए हैं. अब प्रसार भारती भी इनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में है.

चैनल की आय में एक और रास्ते से सेंध लगी है. पिछले पांच सालों के दौरान ऑनलाइन और न्यू मीडिया की पहुंच तेजी से लोगों तक हुई है. झा कहते हैं, ‘ऑनलाइन और न्यू मीडिया ने चैनलों की आय का एक मोटा हिस्सा खींच लिया है. लिहाजा चैनलों के समक्ष स्थितियां और कठिन हो गई हैं.’ विज्ञापनदाता कंपनियों की मजबूरी यह है कि वे मुनाफे को ध्यान में रखकर काम करती हैं. आज सबसे ज्यादा क्रयशक्ति रखने वाला मध्यवर्ग ऑनलाइन माध्यमों का भरपूर इस्तेमाल करता है, लिहाजा वे इसे यूं ही नहीं छोड़ सकतीं.

इस तरह के अव्यावहारिक आर्थिक ढांचे वाले एक धंधे में एकाएक तीन-चार सौ लोग कूद पड़े हैं. और उन्होंने अपने पीछे हजारों लोगों की उम्मीदें चिपका ली हैं. उनके पास न तो कोई दीर्घकालिक योजना है, न ही बटुए में उतना पैसा. ऐसा भी नहीं है कि उनके पास कोई योजना नहीं है. मगर कई मामलों में ये योजनाएं अपने मुख्य धंधों को आगे बढ़ाने तक सीमित हैं. चैनल इस काम में उनके हथियार बन गए हैं. धीरे-धीरे जर्नलिस्ट यूनियनों का भी विलोप हो गया है. पत्रकारों की आवाज उठाने वाली कोई विश्वसनीय संस्था नहीं है. महुआ हो या वीओआई या फिर  फोकस टीवी, यहां हो रहे विरोध प्रदर्शनों का दायरा बहुत सीमित और व्यक्तिगत है. वही लोग लड़ाई लड़ रहे हैं जिनकी दाल-रोटी संकट में है. दिल्ली पत्रकार संघ के पूर्व सचिव और वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ कहते हैं, 'पत्रकार असंगठित मजदूर हो गए हैं. अब उनकी बात रखने वाला कोई नहीं है. नब्बे के दशक में यूनियन के पदाधिकारियों का चुनाव हजारों मतदाता करते थे. आज दो सौ से भी कम सदस्य रह गए हैं. इतनी छोटी संख्या से चुनकर आए लोग पत्रकारों की इतनी बड़ी जमात का प्रतिनिधित्व तो नहीं कर सकते. दूसरे इनकी गतिविधियां भी संदिग्ध हैं. यूनियन के लोग मालिकों के साथ मिलकर कर्मचारियों से धोखा करते रहे हैं. हिंदुस्तान टाइम्स के मामले में यह देखा गया.'

हाल ही में संघ के महासचिव पद से हटे जावेद फरीदी एक दूसरा पक्ष उद्घाटित करते हैं, 'जिस समय यूनियनें अस्तित्व में आई थी, उस समय तक सिर्फ प्रिंट मीडिया हुआ करता था. यूनियन का कानून कहता है कि इसके सदस्य सिर्फ प्रिंट मीडिया के पत्रकार ही हो सकते हैं. टीवी वाले नहीं. हालांकि यह बात सच है कि पिछले एक दशक में प्रिंट के मुकाबले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार बढ़े हैं. पर समस्या यह है कि आज पुरानी प्रिंट की यूनियन ही बेमानी हो चुकी है तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सोचने की फुर्सत किसे है.'

आज पत्रकारों की बात रखने वाली एक भी ढंग की संस्था नहीं है जबकि पिछले एक दशक में अकेले दिल्ली शहर में पत्रकारों की संख्या कई गुना बढ़ गई है. कहने को वेज बोर्ड और लेबर लॉ जैसी कानूनी प्रक्रियाएं हैं पर कोई मीडिया संस्थान इन्हें मानता ही नहीं. मजीठिया बोर्ड की हालिया सिफारिशों की हवा टाइम्स ऑफ इंडिया और एचटी जैसे बड़े मीडिया संस्थानों ने पत्रकारों के जरिए ही निकाल दी. जनवरी, 2011 में इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) के लोगों ने ही प्रस्ताव पारित कर दिया कि मजीठिया बोर्ड की सिफारिशें सरकार कतई लागू न करे. आज कॉन्ट्रैक्ट का जमाना है. सारे चैनल, सारे अखबार कॉन्ट्रैक्ट पर पत्रकार रखते हैं, मनमाफिक शर्तें लगाते हैं, उनमें साफ-साफ लिखा होता है कि किसी भी तरह की यूनियनबाजी में शामिल पाए जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी. इस तरह चैनल जब चाहें तब पत्रकारों से मुक्ति पा लेते हैं. चैनलों में वेज बोर्ड के आधार पर नौकरी देने की कभी कोई परंपरा रही ही नहीं, अखबारों में भी वेज बोर्ड पर नियुक्त गिने-चुने लोग ही बचे हैं. मीडिया संस्थानों का तर्क है कि वे सरकारी प्रावधानों से कहीं ज्यादा मोटी पगार देते हैं इसलिए उन्हें किसी वेज बोर्ड का गुलाम बनने की जरूरत नहीं है. पर यह आधी सच्चाई है. सौरभ बताते हैं, 'जिन्हें बड़े मीडिया हाउस मोटी पगार वाला कहते हैं, उनकी संख्या कितनी है, पांच फीसदी भी ऐसे लोग नहीं हैं किसी संस्थान में. शोषण निचले स्तर पर हो रहा है.'

इसका एक मानवीय पहलू भी है. दिल्ली के ज्यादातर पत्रकार हिंदी में काम नहीं करते. हिंदी का काम करने के लिए मानव श्रम का आयात उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों से होता है. घर-परिवार की जो परिकल्पना है उसमें इनके पास परिवार तो होता है लेकिन दिल्ली में एक अदद घर नहीं होता. नौकरी की क्षणभंगुरता में उसका अपना ही भविष्य निश्चित नहीं होता तो वह परिवार को क्या भविष्य देगा. ऊपर से यह बौद्धिक संपदा से जुड़ा मामला है. लिखाई-पढ़ाई से नाता रखने वाला पत्रकार अपने जीवन के सबसे ऊर्जावान दिनों को नौकरी की जुगाड़ में जाया कर रहा है. अपनी बौद्धिक संपदा का विकास वह क्या करेगा. यहां हम सन पचपन में बने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की बात न ही करें तो बेहतर है, जिसके मुताबिक छह घंटे से ज्यादा की शिफ्ट नहीं होनी चाहिए, हफ्ते में एक दिन छुट्टी जरूर होनी चाहिए, साल में 15 छुट्टियां मिलनी चाहिए, 10 दिन की आकस्मिक छुट्टी भी मिलनी चाहिए आदि-आदि.

यह तनावग्रस्त चैनलों के संसार में रामराज की स्थिति होगी. और रामराज की हमारे यहां सिर्फ कल्पना की जाती है.       

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yogesh agrawal 29/09/2012 11:46:54
Chaurasia ji, es Burning topic per apne vicharo ko behad sateek dhang se aur data^s ke sath khoole roop se likhne ke liye Hardik Shubhkamnaye aur Badhai. Yogesh Agrawal.
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तहलका के इस साहस को भी सलाम... बहुत शानदार स्टोरी हैं...
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tarun goswami 20/09/2012 01:20:15
bhut hi behtareen aur sateek lekh hai. patrakarita ki iss badnuma basti se aap ne kaafi kuch sacchaiyan talash kar ujagar ki hain. Bhut bhut sadhuvaad ek dum spashat aur bebaak rai rakhne ke liye.
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