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लालगढ़ की लड़ाई जीतकर वाममोर्चा भले ही इस इलाके पर फिर से अपना नियंत्रण स्थापित कर ले मगर यहां के लोगों का दिल फिर से जीतना अब उसके लिए बहुत दूर की कौड़ी लगता है. शांतनु गुहा रे की रिपोर्ट
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दूर देस में मन को ठेस

लगातार हमलों के शिकार होने के बावजूद आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे भारतीय, पुलिस को इनकी सूचना क्यों नहीं देना चाहते? मेलबॉर्न से रोहित रेवो की रिपोर्ट...
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‘मैं वरुण गांधी के भाषण की वजह से हारा’

भाजपा महासचिव मुख्तार अब्बास नकवी नेहा दीक्षित को बता रहे हैं कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सांप्रदायिक भाषणों को दृढ़ता से नकारने में असफल रहा ...
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‘बस में हो तो खुशी से पीछे हट जाऊं, पर ये नामुमकिन लगता है’

जेल के अनुभव और अपने सरोकारों पर हाल ही में रिहा हुए मानवाधिकारकर्ता बिनायक सेन की शोमा चौधरी से बातचीत...
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‘राजनीति में सावित्री नहीं बल्कि द्रौपदियों की जरूरत है’

नेहा दीक्षित से बातचीत में शरद यादव कह रहे हैं कि महिला आरक्षण पर उनका विरोध जातिवाद को खत्म करने की कोशिश है...
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भविष्य की रेखाओं में उलझे भविष्यदृष्टा

तहलका ने भविष्यवक्ताओं से चुनावों की भविष्यवाणी करने को कहा था. गलत साबित होने पर उनसे सवाल करतीं तुषा मित्तल...
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सदाबहार यमला जट

धर्मेंद्र का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि जिंदगी से उन्होंने जो कुछ भी चाहा उन्हें मिल गया. हिंदी फिल्म जगत में अपने 50 साल पूरे करने वाले इस जाने-माने अभिनेता पर शांतनु गुहा रे का आलेख...
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    मां ने कहा था

     मां ने कहा थाचार साल का होने पररोटी का कौरमुंह में रखा ही थामां कह उठीअजी सुनते होदेखो तो इस जितिया कोपूरा एकलखोर हैइसकी चट्टी
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    खाने

     बचपन से देखा था, ढेरों खाने थे खानों के बाद खाने, बड़े-छोटे, पतले-मोटे अनगिनत और इन्हीं खानों से तय होते थे रिश्ते इन्हीं के आकार
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    'तोप' बड़ी या 'तोपची'

    ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...
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    पिताजी ठीक ही कहते थे...

    ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...
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    मातृभाषा

    जैसे चींटियां लौटती हैं बिलों में कठफोड़वा लौटता है काठ के पास वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक लाल आसमान में डैने पसारे हुए हवाई अड्डे की ओर ओ मेरी भाषा मैं
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    मैं बहुत खुश थी अम्मा ! - अंशु मालवीय

    ये कविता, तहलका के एक पाठक कुमार मुकेश ने गुजरात पर तहलका के विशेष अंक में लिखे तरुण जी के संपादकीय पर टिप्पणी करते हुए
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